ऐ सर्किट, पिस्टल-पैसा छोड़, पौव्वा ला

यशवंतपत्नी आजकल कभी-कभार टोक देती हैं- थोड़ा पैसा बचाने की सोचिए. जमीन या मकान लेने की सोचिए. चुपचाप सुन लेता हूं. दिल्ली में 20-25 हजार रुपये महीने की आमदनी वाला आदमी क्या बचाएगा, क्या खाएगा, क्या लेकर परदेस जाएगा. मतलब, कितना बचा पाएगा. एनसीआर में जमीन-मकान खरीदना कोई पांच रुपये वाली आइसक्रीम खरीद कर खा लेना थोड़े ही है.

पैसे की चिंता न कल की न आज है. जो है, बहुत है. नहीं है तो भी खुश रहेंगे क्योंकि खुशी व प्रसन्नता पैसे से नहीं मिलती. मिलती होती तो कल दिल्ली में वो आईएफएस अधिकारी अपनी ही पिस्तौल से अपने माथे पर गोली न मार लेते. अच्छा खासा आदमी. कई देशों में राजदूत रहा. बच्चे विदेश में सेटल हैं. दिल्ली में ठीकठाक बंगला. पर नहीं थी तो उसके पास सिर्फ खुशी और प्रसन्नता. अकेलापन मार गया उसे. जवानी में खूब धन-दौलत बनाया पर 75 की उम्र में उसे कोई रोक नहीं पाया खुद को गोली मारने से. तो क्या, जीवन में बेहद अकेलापन था और रोगों से घिर गया था. बुढ़ापे में रोग दुख सबको आते हैं. उसको भी आए होंगे. घर में जब कोई है नहीं तो अकेलापन तो होगा ही. पर अकेलापन भी किसी को इतना नहीं उकसा सकता कि वह अपने ही माथे में गोली मार ले. यह भयानक अवसाद था.

यह अवसाद पैसे वालों को ज्यादा होता है. अपन लोग तो एक पौव्वा दारू पीकर कबीर को गाने लगते हैं. सारा अवसाद छू मंतर. पौव्वा पीने का पैसा नहीं है तो घर में आलू छीलकर व उसे पतला-पतला काटकर फिंगर चिप्स बनाकर खा कर खुश हो जाते हैं. गोबर के उपले इकट्ठे कर रात में घर की छत पर बाटी-चोखा बनाते हुए जो आनंद-सुख पा लेते हैं हम लोग, उतना आनंद कई हजार रुपये खर्च करके होटल हयात की डिनर पार्टी या अट्टा के बार में भी नहीं मिलता. दरअसल खुशी और आनंद पैसे से आ जाएंगे और इसीलिए पैसे के पीछे पागल हुए रहना हमारे समय का सबसे बड़ा पागलपन है. इस पागलपन ने रुप्यया को मइया-बप्पा बना दिया है. रुपय्या जरूरी है. पर जीने-खाने भर रुपये तो ज्यादातर को मिल ही जाते हैं. सवाल यह है कि हम अपने जीवन का अधिकांश समय देते कहां है.

अगर हम ऐसे काम में लगे हैं जहां दिल को खुशी नहीं, दिल को सुकून नहीं, मन को आराम नहीं तो फिर वो रुपया भी घर आकर बेचैनी पैदा करेगा. मैं ऐसा मानने लगा हूं. रोटी में घी नहीं लगा पाएंगे, वो मंजूर है लेकिन घी लगाने के लिए अपने शरीर का घी, शरीर की ऊर्जा खर्च निरर्थक कामों में खर्च कर डालेंगे, यह अच्छा नहीं लगता. नई दुनिया अखबार में पूर्व आईएफएस अधिकारी की छपी खबर पढ़कर बहुत देर तक मैं हैरत में रहा. इस खबर को पढ़ा तब जब मैं टायलेट में घुसा हुआ था. हाथ में एक ताजा अखबार लेकर ही सुबह टायलेट में घुसने की आदत है. पन्ने पलटते हुए इस खबर पर नजर पड़ी तो पूरा पढ़ गया.

इस पूर्व आईएफएस अधिकारी ने पहली पत्नी को तलाक देकर स्पने में राजदूत रहते हुए वहीं की एक महिला से दूसरी शादी की थी. इनका एक बेटा आस्ट्रेलिया में वैज्ञानिक है तो दूसरा बेटा दुबई में एक मैग्जीन का एडिटर. ये दोनों उन्हीं जगहों पर सेटल हैं. पूर्व आईएफएस अधिकारी अपनी स्पेन वाली पत्नी के साथ अपने बंगले में रहते थे. पत्नी पिछले माह स्पेन चली गईं तो अधिकारी महोदय अकेले रह गए. उन्होंने खुद के माथे पर गोली मार ली. शायद, दूसरी पत्नी से उनका लगाव इतना ज्यादा नहीं था कि वह जीने के लिए एक मजबूत बहाना हो पातीं. दिल की यह दूरी अच्छा-खासा पैसा होने के बावजूद पैदा हुआ. अपन लोग घर में और मोहल्ले में कई बच्चों को इकट्ठा कर उनके साथ कुछ खेल लेते हैं तो लगता है कि दिल तो बच्चा है जी.

यह दिल का बचपना हम लोग जवान होते-होते मुर्दा कर देते हैं. सीरियस हो जाते हैं. ऐसी गंभीरता ओढ़ लेते हैं जैसे इस सृष्टि को विनाश से बचाने का कोई बड़ा जतन कर रहे हों. गाना-गुनगुनाना भूल जाते हैं. बचपन में जिन गानों को यूं ही गाते-गुनगुनाते रहते थे, वे अब खुद ब खुद जुबान पर नहीं चढ़ते क्योंकि हम जाने कबके संगीत से दूर हो गए हैं. क्यों हो गए जी, पता नहीं जी. इसलिए हो गए क्योंकि जवान हो गए और पैसे कमाने पड़ रहे हैं. पैसे कमाने के दौरान किसने कहा है कि बच्चों के संग खेलना मत, अच्छे गाने पर नाचना मत, जो मुंह में आ जाए उस गाने को गुनगुनाना मत, खाना पकाना सीखना मत, दूसरों से बिना वजह दोस्ती करना मत. बिना मतलब सड़कों-पार्कों में पैदल दूर तक चलना मत. अपने बचपन के दोस्तों-मित्रों को खोज खोजकर उनसे बतियाना मत. बिना मतलब कई दिन तक यूं ही सोना खाना मत.

हम तो दौड़ रहे हैं. पैसा पैसा पैसा पैसा…. करते हुए दौड़ रहे हैं. और ज्यादा, थोड़ा और बड़ा पद. थोड़ी और बड़ी जिम्मेदारी. यह सब ठीक है लेकिन किस कीमत पर. अपनी खुशियों और अपने परिजनों की खुशियों की बाजी लगाकर. अरे भाई, कहा गया है न, मस्त-प्रसन्न रहो. न रह पाते हो तो बताओ. हम लोगों के पास ढेरों उपाय है मस्त रहने के. आज शाम ताजी मछली मंगा रहा हूं बाजार से. भूनकर खाने की इच्छा है. बचपन में खुद कटिया लेकर मछली मारते और छोटी मछलियों को तो तत्काल लकड़ियों को जलाकर भूंज डालते व नमक छिड़क कर खा लेते. चने-मटर के खेतों में घुस जाते और इनकी कोमल पत्तियों को किसी गाय-भैंस की तरह चर जाते.

नीम की कोमल पत्तियों को इसलिए चबा जाते क्योंकि बड़े बुजुर्गों से सुना था कि इससे खून साफ हो जाता है और शरीर में फोड़ा-फुंसी नहीं होते. किसी गाय के पीठ पर आधे घंटे तक हाथ फेरते रहते और उसकी आंखों में आंख डालकर देखते रहते. किसी कुतिया के शरीर पर चिपके छोटे-छोटे जूं को निकालते रहते और उसके प्यार-दुलार की तरंगों को रिसीव करते रहते. यार अच्छे खासे आदमी थे हम लोग लेकिन दिल्ली मुंबई ने क्या बना डाला. पैसा कमाने वाली मशीन. और वो पैसा भी साला आता है तो यूं चला जाता है जैसे आया ही न हो. पर पैसे होते हों तब, न होते हों तब, दुखी तो हम हर वक्त रहते हैं. एक स्थायी उदासी घेरे रहती है हम सभी को. मुख मलिन मन कांटा बनाए किसी उधेड़बुन में फंसे रहते हैं. कभी नौकरी की चिंता, कभी जीवन की चिंता, कभी बच्चों की चिंता, कभी परिजनों की चिंता… चिंता चिंता चिंता और नतीजा दुख दुख दुख.

पैसे से अगर दुख व चिंता खत्म हो गए होते तो दुनिया के ढेर सारे लोग सर्वाधिक अमीर होने के बाद यही कहते कि दुनिया की सारी खुशी-प्रसन्नता उन्हीं के पास है. पर होता उल्टे है. वे अपनी अमीरी के मायाजाल में ऐसे फंसते-मरते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता उनका अंत कब आ गया. और वे छोड़ जाते हैं भयानक अमीरी को ढोते हुए मरने के लिए अपने बाल-बच्चों को. पहले तो हम इकट्ठा करने में मरते हैं और फिर इकट्ठा को बचाए रखने और उसे बढ़ाने में जान गंवा देते हैं. मोक्ष नहीं मिल पाता. इसी धरती के स्वर्ग नरक के हिस्से में हम नरक का हिस्सा भोगते रह जाते हैं क्योंकि नर्क अगर कुछ है तो वह सिर्फ चिंता और दुख है. प्रसन्न मन, हंसता तन, फक्कड़ अंदाज, हर स्थितियों में खुश रहने वाला उस्ताद तो कोई दिखता नहीं.

पर हैं वो. बहुत लोग हैं. हमारे आसपास भी हो सकते हैं. पर हम उन्हें पहचान नहीं पाते क्योंकि हमें लगता है कि वो तो नाकारा है. हमें लगता है कि वो तो दुनियादार नहीं है. हमें लगता है कि वह तो अपने धुन का धनी है. हमें लगता है कि वह तो हमारे धन-सुख कमाने-पाने के अभियान का साथी नहीं है. पर सच्ची बात तो ये है कि वो आपको बहुत कुछ देता है. वो आपको हंसाता है. वो आपमें मस्ती भरता है. वो बिना टीच किए आपको जीने का सलीक सिखा देता है. उसकी बाडी लैंग्वेज बोलती है. उसका चेहरा बोलता है. उसकी बातें बोलती हैं. ऐसे लोग कम हैं पर हैं. ऐसे लोग सिखा सकते हैं जीना. वरना एक दिन रुपयों का अंबार लेकर अपने घर-फ्लैट में ही अपने माथे पर गोली मारने पर मजबूर हो जाएंगे आप. जमाना कहेगा कि वो बीमार था, बूढ़ा था और अकेले था.

तो चलिए, एक बार जोर से बोलिए …. जय हो…. और फिर कोई गाना खुलकर गाइए, वो गाना जिसे आप अपने टीन एज के दिनों में अपने सपनों की राजकुमारी या राजकुमार के लिए सोचते-गाते-गुनगुनाते थे. और फिर, करिए कुछ बचकानी हरकतें. बिना वजह दो चार ठुमके मार कर मुंह फाड़ कर हंसिए खुद पर और मार्केट से खुद अपनी पसंद की सब्जी खरीद लाइए और अपने इच्छा से खुद पकाइए. एकाध पियक्कड़ दोस्त को न्योता दे दीजिए ताकि आपके पकाए को वह भी खा कर धन्य हो सके. यार, बहुत छोटी है जिंदगी. कब हम 20 की उम्र से तीस में पहुंच जाते हैं और देखते देखते तीस से चालीस के हो जाते हैं और अचानक पता चलता है कि हम पचास पार वाले हो गए और एक दिन साठ का मानकर हमको रिटायर कर दिया जाता है और हम खुद को भी रिटायर मान लेते हैं. ऐसे कैसे चलेगा यार. अब तो कुछ करना होगा. और आज से ही करना होगा. बिना वजह दिल्ली-एनसीआर के बाहर जाती किसी बस या ट्रेन या जहाज में बैठकर निकल लेना चाहिए और किसी छोटे शहर का चक्कर लगाकर लौट आना चाहिए.

बहुत दिनों से क्लीनशेव चेहरा है थोड़ा दाढ़ी-मूंछ बढ़ाकर जीते हैं. बहुत दिनों से छोटे बाल हैं थोड़े बड़े करके पीछे से बांध लेते हैं. बहुत दिनों से पुराने कपड़े पहनकर बोर हो गए चलो पचास रुपये का एक सलमान खान टाइप सड़क छाप टीशर्ट पहनते हैं और घर-मोहल्ले में पहनकर घूमते हैं. बहुत दिनों से किसी पान वाले के खोखे के पास खड़े होकर आते-जाते लोगों की शक्ल गंभीरता से नहीं देखी, तो चलो आज मीठा पान ही खाकर कुछ घंटे सड़क छाप बन जाते हैं. जिंदगी में कोई कैसे बहुत देर तक अकेला और डिप्रेस्ड रह सकता है. हां, ये दौरा पड़ता है सभी को क्योंकि सिस्टम ऐसा बन गया है कि यहां अब सामूहिकता रही नहीं और निजी असुरक्षाबोधों को हर किसी को जीना होता है लेकिन सिस्टम ने अगर सामूहिकता खत्म किया है तो हमने भी निजी तौर पर खुद को निजी बना लिया है. सिस्टम वाले पार्ट को कोसकर हम संतोष पा लेते हैं लेकिन अपने वाले पार्ट में हम झांकते नहीं.

तो ऐ सर्किट, पिस्टल पैसा छोड़, चल पव्वा ला. आज जरा रोते और हंसते हैं, साथ-साथ और फिर आलू बैगन खुद उबाल-भून पकाकर भर्ता बनाते हैं और उसमें हरी-हरी धनिया भी थोड़ी डालते हैं….पेट भर खाने के बाद ठंडा पानी पीते हैं और फिल्मी गाने की अंताक्षरी खेलते हैं.. मने मन मुनक्का और मने मन छोहारा हो लेते हैं यार….

तो ऐ भइया, बाबू, मुन्ना, छोटू, गोलू, चपटू, अंकू, टिंकू…. चल हंस और आगे बढ़, हम भी साथ हैं तेरे… चलते चलते मैं आपको अपना एक प्रिय फिल्मी गाना सुना जाता हूं जिसे मैं अक्सर गाता हूं…. आइए मेहरबां, बैठिए जानेजां… शौक से लीजिए जी… इश्क के इम्तहां…. फिल्म हावड़ा ब्रिज के इस गाने को सुनिए… आशा जी की आवाज में… आशा जी के दर्शन करते हुए….

कैसा लगा यह गाना? बढ़िया है ना… तो एक बार आप भी गुनगुनाइए…..!!!! मैं तो चला… ऐ भाई सर्किट… सुन, पैसा – पिस्टल का धंधा छोड़, जरा पौव्वा ला… आज मछली भूनकर खाते हैं….

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया के एडिटर हैं. उनसे संपर्क yashwant@bhadas4media.com या फिर 09999330099 के जरिए किया जा सकता है.

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Comments on “ऐ सर्किट, पिस्टल-पैसा छोड़, पौव्वा ला

  • मयंक says:

    अब इत्र भी मलते हैं तो खुशबू नहीं आती…
    वो दिन हवा हुए कि पसीना गुलाब था….

    सही है यशवंत भाई…ये बात सबको समझ में आ जाए तो टंटा-पंगा…सवाल-बवाल सब खत्म हो जाए….

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  • Escapist….Kab tak pauwwa chadha kar gham galat karogey. .Subah phir back to pavilion aa jaogey aur phir biwi poochegi NCR me makaan ke ad nikal rahe hain, makan to lo..Rahi baat K D Sharma ki, unhe stomach cancer tha aur Spanish biwi Delhi ki garmi, Vivek Vihar ke paas naale ki badbu, paani-bijli ki killat se tang aakar Spain chali gayi..Behtar hota K D Sharma Vivek Vihar ki bajaaye Spain me bas jaate to shayad aatmahatya ki naubat na aati. Rahi baat jeevan ke uddeshya ki, iske liye alag article ki zaroorat hogi, par itna kah sakta hoon ki (1) sharaaab chhodo, yeh angrezon ki di hui gandi aadat hai aur (2) jeevan me jo cheez sabse acchi lage wahi karo. Apan to samay nikalkar bhakti ras me doob jaate hain.

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  • rakesh kumar says:

    पिछले दिनों एक वरिष्ठ संपादक के साथ बैठकी जमी थी. १५ मिनट यही मुद्दा छिड़ा रहा. उनका कहना था ६ करोड़ हर दिन कमाने वाला भी खायेगा तो ढाई सौ ग्राम ही. फिर इतनी हाय तौबा क्यों ? जबरदस्त लिखा है यशवंतजी

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  • vineet kumar says:

    सत्य वचन। अब रिजल्ट आने का समय हो गया है। एक-दो पीस और लिखिए और उसमें बताइए कि बच्चे कैसे अपने को मस्त रखें। सीजन का टाइम हैं,ऐसा लिखने के बाद आप चैनलों पर एक्सपर्ट कमेंट देते नजर आएंगे तो हमें भी अच्छा लगेगा।
    …और चलते-चलते एक खूबसूरत गाना, इ विनोद दुआ टाइप का माल हो गया।,कुछ लतीफे जड़ देते तो ज्यादा मजा आता,काहे कि इसको सुनने में ठीक-ठाक बिल उठ जाएगा।..
    जय हो.

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  • Rajesh Tripathi says:

    वाह यशवंत भाई, बहुत खूब है आपका जिंदगी का फलसफा। वाकई जो लोग रोज मर-मर कर जीते हैं वे जिंदगी से बेईमानी कर रहे होते हैं। जिंदगी के झमेले और झंझटों के तूफां तो लगे ही रहेंगे लेकिन आदमी ओ है जो खेला करे तूफानों से। आपकी यह मस्तखयाली कई पस्त जिंदगियों में नयी जान, नयी खुशी भरेगी। यही उम्मीद है.। बीच-बीच में कुछ लिखते रहा कीजिए। आप लिखते हैं तो पूरी तरह डूब कर लिखते हैं। आपका यह हौसला और मनमौजी वाला आपका स्वभाव प्रभु बरकरार रखे। आपने सही लिखा है अगर पैसे से खुशी खरीदी जा सकती तो दुनिया का कोई भी दौलतमंद दुखी न होता।-राजेश त्रिपाठी, कोलकाता

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  • thode dukhi, thode bore hum bhi ho rahe the, makan, zameen ki chinta se, ye chinta shayad bani rahe lekin kush rahne ke aapke tarikon par amal karne ki koshish karnege.

    lekh bhut badia hai
    arvind

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  • Anil Gupta says:

    अनिल गुप्ता बनारस
    यसवंत भइया जिन्दगी के हकीकत को अपनी कलम से रूबरू करने के लिए धन्यवाद……………..आप लिखते हैं तो एकदम से कलम तोड़ देते हैं….अब तो आपके लेखो का भी भडास पर इंतजार रहने लगा है…. सच में इंसान की तलास में भटक रहा है , लेकिन सुख, शांति उसे कहा मिलेगी बताने वाला कोई नही है…..नही…इंसान खुद समझ नही पा रहा है की उसे करना क्या चाहिए … शानदार तरीके से लिखने के लिए आपको एकबार फिर से बधाई….

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  • ahankar bhi koi cheej hoti! khana to bas utna hi hai par dikhane ke chakkar men jeevan men ulajhte chale jate hai

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