अब तो सारे संपादक एक ही जैसे दिखते हैं

रमेश नैयर
रमेश नैयर
: इंटरव्यू : रमेश नैयर (छत्तीसगढ़ के जाने-माने और वरिष्ठ पत्रकार) : भाग-दो : ”हमने स्पेस बेच दिया… अपना ईमान बेच दिया… अपने सारे मूल्यों को हम विस्मृत कर गये… तो अपनी आत्मा को आदमी पहले मारता है, तब वो बेचता है अपनी अस्मत को… उर्दू का एक शेर है, ”कुछ भी कहिये जमीर कांप तो जाता होगा / वो गुनाह के पहले हो या गुनाह के बाद”…


रमेश नैयर से दिनेश चौधरी की बातचीत का दूसरा हिस्सा…

  • कभी कोई घटना आपके साथ ऐसी हुई कि प्रबंधन या मालिकों का दबाव आया हो?

–नहीं। नहीं आया। मैं इस मामले में अपने आपको सौभाग्यशाली मानता हूं कि जब तक मैं संपादक रहा, मुझे कभी भी यह महसूस नहीं हुआ कि मेरे ऊपर अखबार का जनरल मैनेजर या मालिक हॉवी हो गया हो। बावजूद इसके कि जिन अखबारों में मैंने काम किया उनमें से कुछ के मालिकों की रेपुटेशन बहुत अच्छी नहीं थी। ऐसा एक भी प्रसंग नहीं हुआ कि मेरे लिखे को रोका गया हो। बल्कि पहले विज्ञापन के नाम से भी अगर समाचार बनता था तो वह संपादक की निगाह से होकर गुजरता था।

बहुत बाद में, कह लीजिये कि 1995 के बाद से, ये अनुभव किया जाने लगा कि मार्केटिंग के नाम से कुछ समाचार सीधे लगने लगे और जब हमने उस पर थोड़ी सी आपत्ति की तो वे कहने लगे कि नहीं ये तो व्यवसाय का पेज है और उसके लिये हमने एक विशेष संवाददाता रखा हुआ है। ये महज उद्योग और व्यवसाय की चीज है। और उद्योग व व्यवसाय का संवाददाता वे ऐसे व्यक्ति को रखते थे जो उनके हितों का पोषण कर सके, या उनके कहने पर, उनके इशारों पर चल सके। ये होने लगा था….

  • क्या ये ‘पेड न्यूज’ की शुरूआत थी?

रमेश नैयर
रमेश नैयर
–नहीं, इतना भी नहीं था कि आज ही किसी का विज्ञापन छप रहा है और आज ही उसका राइट-अप भी छप रहा है। जब राइट-अप छप जाता था तब बाद में वे लोग विज्ञापन देते थे या पहले केंपेन हो गया, विज्ञापन हो गया, उसके बाद राइट-अप जाता था। ये अनुभव किया जाने लगा कुछ बाद में। मैं तब तक अखबार छोड़ चुका था। पेड न्यूज का सिलसिला 2003 के बाद में शुरू हुआ और ये अपनी पूरी विकरालता के साथ 2004 के बाद सामने आया। मैं तो अपना सौभाग्य मानता हूं कि मैं उस समय तक पत्रकारिता में नहीं रहा। लेकिन इसके बारे में सबसे पहले मैंने ‘प्रभात खबर’ में हरिवंश जी के कहने से छत्तीसगढ पर केंद्रित एक पूरा समाचार भेजा कि किस तरह से अखबारों ने सेंटीमीटर के हिसाब से नाप कर अपना ईमान बेच दिया है और उसमें एक नयी वर्णसंकर पत्रकारिता के पैदा होने की चिंता थी। बाद में जब प्रभाष जी की हरिवंश जी से मुलाकात हुई तो उन्होंने उसे पढ़ा व कहा कि मैं इसे बहुत अच्छे ढंग से उठाता हूं और उन्होंने उठाया भी। पूरे देश की पत्रकार बिरादरी का ध्यान इस ओर आकर्षित करने में आदरणीय प्रभाष जी की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

पेड न्यूज ने अखबारों की, बल्कि पूरे मीडिया की विश्वसनीयता खत्म कर दी। अखबारों की एक ओपिनियन होती थी, उनकी एक विचारधारा होती थी जिसका पोषण वे अपने संपादकीय पेज में किया करते थे। सन्‌ 1990 के बाद से कुछ अखबारों को विज्ञापन चुनावों के पहले मिला करते थे। थोड़ा-बहुत वे समाचारों में भी हल्का सा पुट देने लगे थे कि किसकी क्या स्थिति है, क्या रूझान है.. तो ये सब तो 87-88 से ही शुरू हो गया था। और चूंकि सत्तारूढ दल के विज्ञापन रहते ही थे और उस समय आमतौर पर कांग्रेस ही सत्ता में रहती थी इसलिए अखबारों का वैचारिक रूझान भी उन्होंने अपनी ओर बना रखा था।

लेकिन पेड न्यूज के आने से एक साथ कई बातें हुईं। पहली बात तो ये हुई कि अखबार की विश्वसनीयता खत्म हो गयी। दूसरी बात ये हुई कि अखबारों के लेखन का प्रभाव भी कम हो गया। जब ये बात दिखाई पड़ने लगे कि चार अखबारों में एक ही चीज छपी हुई है -क्योंकि वो ‘पेड’ है- तो उस पर कोई विश्वास नहीं करता। इससे समाचारों का महत्व समाप्त हुआ। तीसरे मतदाता के सामने चिंतन के जो मुद्‌दे हुआ करते थे, वे समाप्त हो गये।पहले चूंकि पैसों का प्रभाव नहीं होता था तो वे मतादाताओं के सामने मुद्‌दे भी रखते थे कि भाई, इन मुद्‌दों पर चुनाव लड़ा जा रहा है।

पेड न्यूज का इस्तेमाल पार्टी के पूरे प्रचार के लिये कम, व्यक्तिगत रूप से प्रत्याशी के लिये ज्यादा होने लगा। इससे एक साथ दो बातें हुई। एक तो ये हुआ कि इसका खर्च  प्रत्याशी के चुनावी खर्चे में शामिल नहीं होता था और दूसरे अखबार को बेनामी आमदनी होने लगी। लेकिन बाद में तो स्थिति ये आ गयी – मैंने अनुभव किया और  मुझे कुछ लोगों ने आकर बताया भी- कि जैसे माफिया के डॉन होते हैं उस तरह से अखबार के जनरल मैनेजर आकर उम्मीदवारों को धमकाने लगे कि यदि एक से पैसे लिये हैं तो दूसरे से भी वसूलना है। वे आकर धमकाते थे कि तुम्हारा इतने का टारगेट रखा है। एक उस समय के मंत्री मेरे अनुजवत हैं, उन्होंने बताया कि उनसे दो करोड़ रूपये मांगे गये। अब यदि अखबार का प्रबंधन माफिया के डॉन की भूमिका में आ जाये तो इससे अधिक विनाशकारी दिन और क्या हो सकता है- उस भारतीय पत्रकारिता का, विशेष रूप से हिंदी की पत्रकारिता का जो कि लोकचेतना की भाषा रही हैं, जो कि हमारे पूरे के पूरे स्वतंत्रता-आंदोलन की भाषा रही है। उस भाषा के लिये इससे अधिक लज्जास्पद स्थिति और क्या हो सकती है?

  • क्या ‘पेड न्यूज’ का यह सिलसिला महज चुनावों तक सीमित है?

–देखिये, कारपोरेट क्षेत्र में तो यह पहले ही आ चुकी थी। अब ये वहां तक सीमित नहीं है। आप अपना प्रचार कराने के लिये पेड न्यूज का इस्तेमाल करते हैं तो चलिये वहां तक भी ठीक है कि आप पैसे देकर स्पेस खरीद रहे हैं। लेकिन उस खरीदे हुए स्पेस में आप अपने विरोधियों पर लांछन भी लगवा रहे हैं, ये तो बड़ी विचित्र बात है। इसका मतलब यह हुआ कि हमारे अखबारों को, हमारे मीडिया को अब अच्छे रिपोर्टर्स की जरूरत नहीं है, उन्हें चरित्र हत्या करने में प्रवीण शार्प शूटर्स की जरूरत है, ऐसा महसूस किया जाने लगा। और ये लोग चलते भी हैं। अखबार के संपादक की संस्था का इससे ज्यादा पतन और क्या होगा कि औद्योगिक व व्यसायिक घराने जो अखबार चलाते हैं, उनमें उन्हें संपादक की जरूरत नहीं होती है। उनको संपादक का कार्ड लिये हुए ऐसे दलाल की जरूरत होती है जो कि सचिवों से, मंत्रियों से जाकर मिल ले और उसे प्रबंध संपादक या संपादक या ऐसा ही कुछ नाम दे दिया जाये..

  • तो क्या यह मान लिया जाये कि संपादक नाम की संस्था समाप्त हो चुकी है?

–वैसे संपादक तो अब नहीं बचे जिनकी एक दृष्टि होती थी, जिनका एक लक्ष्य होता था। अब तो सारे संपादक एक ही जैसे दिखते हैं, एक ही जैसे लिखते हैं। कुछ लोग अभी भी हैं जो कि मूल्यों की पत्रकारिता करते हैं। तो कुल मिलाकर मुझे अखबार में तीन तरह की धारायें बहती हुई दिखाई पड़ती हैं। एक तो वे हैं जो आज भी पत्रकारिता के मूल्यों को लेकर चलते हैं। वो यद्यपि अखबारों में बहुत दिनों तक नहीं टिक पाते, अखबारों में उनकी कोई निर्णायक भूमिका नहीं हो पा रही है लेकिन फिर भी वे हैं। बहुत सारे नाम हैं, लेकिन कुछ नाम छूट न जायें इसलिए किसी का नाम नहीं ले रहा हूं पर ऐसे लोग हैं। दूसरी श्रेणी के वे हैं जो कि प्रोफेशनल्स हैं। कैरियर ओरियेंटेड प्रोफेशनल्स हैं। वो अच्छी भाषा सीखते हैं, अच्छा लिखते हैं, उनकी शैली अच्छी है ताकि अखबार के बिकने में वे मददगार हो सकें। दूसरी धारा उन लोगों की है। और तीसरे वे हैं जो धनोपार्जन के लिये औजार की तरह, शोहदों की तरह इस्तेमाल हो सकें और वे आतुर हैं कि औजार की तरह हमारा इस्तेमाल किया जाये। बड़ी संख्या में ऐसी एक बड़ी पीढ़ी पत्रकारिता में आ गयी है जो उस देश के लिये कठिन है जहां बाजार बड़ी विकरालता के साथ आ गया हो, उससे मुक्ति का कोई मार्ग न दिखता हो और जहां पर विचार समाप्त होता जा रहा हो। क्योंकि इलेक्ट्रानिक मीडिया में तो विचार की फुर्सत ही नहीं है। अखबार थोड़ा-सा विचार दे सकता है पर समाज से विचार गायब हो रहा है। पाठक गायब हो रहा है। अखबार के संपादकीय पृष्ठ कम से कम पढ़े जाने लगे हैं। ये चिंताजनक स्थिति तो है।

  • ऐसे हालात में वैकल्पिक मीडिया की क्या गुंजाइश बनती है या उनकी क्या भूमिका हो सकती है?

–वैकल्पिक मीडिया तो अपनी-अपनी जगह चल रहे हैं। लेकिन अभी तो बाढ़ का पानी है न! तो बाढ  में तो सब कुछ गंदा हो चुका हुआ है। समाज जब ठहरेगा, देश जब सोचेगा तब कुछ बात साफ होगी। क्योंकि नयी पीढ़ी में अकुलाहट तो है। ये नहीं कहा जा सकता कि पूरी की पूरी पीढ़ी कैरियर ओरियेंटेड है। देश व समाज पर विचार करने वाले लोग हैं। तो ये देखना होगा कि मीडिया में उनकी क्या भूमिका बनती है? वैकल्पिक मीडिया बन रहा है। छोटे-छोटे अखबार निकल रहे हैं। जिले-जिले के अखबार निकल रहे हैं। लेकिन दिक्कत यह होती जा रही है कि इन्हें जीवित रहने के लिये सरकार पर आश्रित होना पड़ता है ओर सरकार पर निर्भरता कभी भी जन-आंदोलनों को, सामाजिक आंदोलनों को जन्म नहीं दे सकती। उनकी पक्षधर नहीं हो सकती।

  • यह बात तो विचारों की हुई। आज के अखबार की भाषा क्या है?

–भाषा का भी वही हाल है। जब बाजार की भाषा अंग्रेजी है, जब कंप्यूटर की भाषा अंग्रेजी है, जब एस.एम.एस. की भाषा अंग्रेजी है तो अखबार में भी तो इसे ठूंसा जायेगा न! मुझे तो ऐसा लगता है कि एक योजना के तहत हिंदी अखबारों में अंग्रेजी को ठूंसा जा रहा है और ये संदेह और मजबूत हो जाता है जब हिंदी के भी कुछ लेखक कहने लगते हैं कि देवनागरी की जगह रोमन लिपि अपनायी जाये। तो ये तो 1942 में भी आया था और उससे पहले भी आया था जब कहा गया कि रंगरूटों को रोमन लिपि में सिखाया जाये। लेकिन देवनागरी के लोगों ने बड़ी प्रामाणिकता के साथ, उसकी जो वैज्ञानिकता थी, भाषा की और व्याकरण की उसे सामने रखा। और फिर ये प्रचलित भी हुई। ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि 60- 65 वर्षों जो पर्यायवाची शब्द हिंदी के लोगों ने बनाकर के दिये थे, हिंदी की पत्रकारिता को, उन्हें प्रचलन से निकालकर अब वापस उन्हीं अंग्रेजी शब्दों को लादा जा रहा है। जैसे अंतरिम शब्द उतना ही प्रचलित है जितना अंग्रेजी का इंटरिम। हजारों ऐसे शब्द हैं। संसद है, सांसद है। अब ये कोई जरूरी तो नहीं की जानबूझकर एम.एल.ए. लिखा जाये। विधायक भी उतना ही छोटा व सरल-सहज शब्द है।

जानबूझकर अंग्रेजी के शब्दों को ठूंसने का यह प्रयास भारतीय समाज की – खासतौर पर व्यापक हिंदी भाषी समाज की -अपनी संस्कृति, अपने संस्कार, अपने सरोकार से कटने का एक बड़ा त्रासद दौर है। और यह त्रासद दौर किस दिशा में जायेगा यह सोचना बड़ा मुश्किल है क्योंकि शेष भाषायें अंग्रेजी की इस बाढ  में प्रवाहित नहीं हुई हैं। बांग्ला बची हुई है, मराठी बची हुई है, तमिल है, तेलुगू है और मलयालम ने तो अपने-आपको पूरी तरह से बचाकर रखा हुआ है। ऐसे में हिंदी भाषी समाज जो कश्मीर से लेकर अब दक्षिण तक में फैल गया है, जिसे बोला व समझा जाने लगा है, जिसकी शक्ति भी अब बढ़ी है, उसे कमजोर करने के प्रयासों का औचित्य क्या है?

  • क्या इसका एक कारण यह भी है कि हिंदी पट्‌टी के लोगों में अपनी संस्कृति के प्रति वैसा लगाव दिखाई नहीं पड़ता जैसा भाषायी हल्कों में है?

–हां, हिंदी में वो बात नहीं है और एक और खतरनाक प्रवृत्ति ने इन दिनों जन्म लिया है। हिंदी को शक्ति लोकभाषाओं से मिलती है। किसी जमाने में लोकभाषा थी खड़ी बोली। यह पूरी तरह लोकभाषाओं से मिलकर बनी थी और साहित्य की भाषा ब्रज थी। खड़ी बोली में उस समय की तमाम बोलियों का संग्रह हुआ करता था और इसलिए यह एक शक्तिमान भाषा बनकर उभर पायी थी। अब ये बिल्कुल भी अच्छा संकेत नहीं है कि हिंदी के मुकाबले या हिंदी के विरोध में लोकभाषाओं को खड़ा किया जाये। जैसे छत्तीसगढ़ी है। लोकभाषा है तो इसे बढ़ावा मिलना चाहिये क्योंकि लोग अपने आपको इसी भाषा में अभिव्यक्त करते हैं। इसे पढ़ना चाहिये, इसमें लिखना चाहिये, इसका साहित्य समृद्ध हो, इसमें नये-नये शब्द आयें इसको लेकर किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये। लेकिन यदि इसे हिंदी के विरोध में खड़ा कर दिया जाये तब क्या होगा? लोकभाषाओं का विरोध अंग्रेजी से हो सकता है, लेकिन उन्हें हिंदी के विरोध में खड़ी करने की राजनीति बहुत खतरनाक है। यह देश की एकता के लिये भी खतरा है।

  • ”हंस” की सालाना गोष्ठी में स्वामी अग्निवेश ने कहा कि रायपुर के पत्रकार उद्योगपतियों के एजेंट है। आपके नाम का हवाला देते हुए कहा है कि ”रमेश नैयर जी ने कहा कि यहां की पत्रकारिता का यही हाल है”। इसकी वास्तविक पृष्ठभूमि क्या है?

–उनका आशय मालिकों से था और इससे मैं भी असहमत नहीं था। लेकिन पत्रकारों के संदर्भ में एक बात बहुत साफ समझनी पड़ेगी कि जो लोग बेचारे दंतेवाड़ा में हैं, या बीजापुर में हैं, या सरगुजा में हैं और वहां पर रहकर काम कर रहें हैं, समाचार भेजते हैं उनको मैं पूंजीपतियों का एजेंट नहीं मानता। पूंजीपतियों के अपने दलाल हैं। संपादक भी हैं, प्रबंध संपादक भी हैं, जिन्हें उन्होंने इसी काम के लिये रखा हुआ है। स्वामी जी का आशय इन्हीं लोगों के साथ में था और चूंकि उन्होंने व्याखयान में टिप्पणी की है इसलिए शायद स्पष्ट नहीं हो पाया होगा। जहां तक छत्तीसगढ  के पत्रकारों का प्रश्न है, सारे के सारे पत्रकारों को पूंजीपतियों का एजेंट नहीं माना जा सकता। उनमें से बड़ा बहुमत ऐसा है जो कि जनता से जुड़ा हुआ है। वे लोग नक्सलवादियों की हिंसा को पसंद नहीं करते है, लेकिन रहते वहीं पर हैं। वो ये भी पसंद नहीं करते हैं कि आदिवासियों को नक्सल के नाम पर प्रताडि़त किया जाये। इसकी भी वे रिपोर्ट भेजते हैं। अब अखबार में कितना छपता है या नहीं छपता है, ये उनके हाथ में नहीं है। मैं जब अपने-आपको संवाददाता की जगह रखकर देखता हूं तो मुझे उसकी नीयत पर कतई कोई शंका नहीं होती।

मुझे पीड़ा तब होती है जब कुछ अखबारों के जो मालिक हैं, वे स्वयं एन.जी.ओ. चलाते हैं, विमान यात्रा से नीचे कभी पैर नहीं रखते, अपने कर्मचारियों को महीनो वेतन नहीं देते, वो जब सिद्धांतों की बात करते हैं और पत्रकारों को गरियाते हैं तो मुझे लगता है कि यह पाखंड समाप्त होना चाहिये। मैं उन पाखंडियों को उन बेचारे पत्रकारों से बहुत दोयम दर्जे का मानता हूं जो कि मजबूरी में कभी-कभी सच नहीं लिख पाते।

  • क्या आपको नहीं लगता कि अखबारों के संस्करणों ने अपने-आपको बहुत ज्यादा स्थानीय बना लिया है?

–हां, ये तब शुरू हुआ जब अखबारों में स्पर्धा शुरू हुई। आप उस समय आ गये थे। जिस जमाने में हमने पत्रकारिता शुरू की थी उस जमाने में छः पेज का अखबार हुआ करता था और पूरे छत्तीसगढ़ का एक ही संस्करण होता था। यह बाद में शुरू हुआ कि जिस क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा अखबार बेचना है उस क्षेत्र की ज्यादा से ज्यादा खबरें दो। नतीजा ये हुआ कि खारून नदी के उस पार का संस्करण अलग हो गया और नदी के इस पार का संस्करण अलग हो गया। तो ये समाज को बांटने वाला काम है। एक तो वैसे ही ये बाजार हमें अपने घरों तक समेट रहा है, अपनी कालोनी तक भी नहीं जाने देता। सवांद के सारे पुल ये बाजार तोड  रहा है। पत्रकारिता संवाद का एक सशक्त माध्यम है। वो भी इस पुल को तोड  रही है तो ये अच्छी पत्रकारिता नहीं है। ये हो सकता है कि वहां के संस्करण में, वहां की खबरों को, वहां की समस्याओं को प्रमुखता से छापा जाये लेकिन जो पूरे के पूरे समाज के चिंतन के मुद्‌दे हैं और जिस खबर का पूरे के पूरे इलाके पर असर पड  सकता है उन खबरों को तो नहीं मारना चाहिये। और ये पेड न्यूज में तो यह भी हुआ कि विधानसभाओं के हिसाब से संस्करण छापे गये। जिसमें जिनकी खबरें हैं लादकर ले जायें और बांटते फिरें। ये तो ठीक नहीं है और पूरी दुनिया में ऐसा कहीं नहीं है। मै बहुद से देशों में गया हूं। टीक है अखबार वहां कम हो रहा है, इंटरनेट का चलन बढ़ रहा है लेकिन इंटरनेट भी अगर बढ़ रहा है तो वहां भी तो पत्रकार ही पढा जायेगा न! पत्रकारिता तो समाप्त नहीं होगी। लेकिन ये लोग तो पत्रकारिता को ही समाप्त करने पर तुले हुए हैं।

  • पत्रकारिता के लिये आने वाले दिन शायद नेट के हैं, क्योंकि वहां कोई सेंसरशिप नहीं है.

–सेंसरशिप तो खैर यहां भी नहीं है। लेकिन जब अपने आपको बेच दिया हो तो बिके हुए आदमी के लिये क्या सेंसरशिप रहेगी? हमने स्पेस बेच दिया, अपना ईमान बेच दिया, अपने सारे मूल्यों को हम विस्मृत कर गये.. तो अपनी आत्मा को आदमी पहले मारता है, तब वो बेचता है अपनी अस्मत को .. उर्दू का एक शेर है, ”कुछ भी कहिये जमीर कांप तो जाता होगा/वो गुनाह के पहले हो या गुनाह के बाद।” जमीर तो कांपता है जब आप गुनाह करते हैं। तब मैं अगर संपादक होता ओर मेरे सामने खबरों का स्पेस बेचा जाता तो मेरे सामने दृश्य उभरता महाभारत के उस सभा कक्ष का जहां भीष्म जैसे लोग असहाय, निरूपाय ओर खामोश हैं और उनके सामने द्रोपदी का चीरहरण किया जा रहा है.. तो लोकतंत्र का चीरहरण देखते हुए या तो मैं अपने परिवार का ध्यान रखकर मालिकों की हां में हां मिलाऊं या नौकरी छोड़ दूं.. लेकिन नौकरी अगर छोड  भी दूं तो जब सारे ही कुएं में भांग पड़ी हो तब जाऊं कहां? तो ये जो बेबसी है पत्रकार की, जो संवेदशील है और मूल्यों के प्रति थोड़ा भी सजग है, उनके लिये यह बहुत बडी त्रासदी है।

  • एक समय आपने बयान दिया था कि पत्रकारिता राजनीति की रखैल है…

–हां, अब ये दोनों मिलकर पूंजी की रखैल हो गयी हैं। अब आप देखिये न कि सारे चेहरे एक जैसे क्यों दिखाई पड़ते हैं? सारे दलों का चरित्र एक जैसा है। वही लोग सब जगह हैं। जनता तो परिवर्तन चाहती है। वह परिवर्तन करती भी है। वो सरकार बदलती है। लेकिन हर सरकार का चाल-चलन, चेहरा, चरित्र एक जैसा होता जाता है तो ऐसा लगता है कि उनके आपस में समझौते हैं। अब ऐसे में क्या किया जाये?

कार्टूनिस्ट और फोटोग्राफरों का प्रभाव अखबार में या तो कम हो गया है या वे गायब हो रहे हैं। हम लोग अपने समय में एस. अहमद या अनिल कामड़े की ब्लेक एंड व्हाइट तस्वीरें देखते थे, जो बड़ी प्रभावी होती थीं… इसका एक कारण तो इंटरनेट का चलन है। फिर जब अखबार से विचार ही गायब हो गये हों, स्पेस बिक गया हो, तो कार्टून या फोटो की जगह कहां बचती है? अब आप देखिये न कि जब कभी भी अखबार उठायें तो उसमें समाज का दर्द बयान करने वाली एक तस्वीर नहीं दिखती, उसकी जगह ग्लैमर ने ले ली है। हमको एक ऐसा समाज बनाया जा रहा है जिसमें आदमी सब चुहल करते रहते हैं या हंसते रहते हैं। एल्डुअस हुक्सले के ”द ब्रेव न्यू वर्ल्ड” में एक ऐसा समाज है जो सिर्फ हंसता रहता है, लेकिन वो समाज बड़ा  दुखी है। तो वो दुखी क्यों है, संतप्त क्यों है? वो संतप्त इसलिए है कि उसके विचार की क्षमता समाप्त हो गयी है, वो विचारशून्य होकर केवल हंसता रहता है। तो क्या हम ऐसा समाज बनते जा रहे हैं और क्या हमारा मीडिया हमें ऐसा ही समाज बना रहा है? और कहीं यह मीडिया भी तो सामूहिक आत्महत्या की ओर नहीं बढ़ रहा है? क्या अखबारों की और तमाम इलेक्ट्रानिक मीडिया की भूमिका लॉफ्टर चेलैंज जैसी हो गयी है?

लेकिन जिस तरह से पश्चिम के नाम पर हमें यह सब परोसा जा रहा है वो पश्चिम में तो नहीं है। मैं तो महीनों रहा हूं यूरोप के कई देशों में। वहां ऐसा नहीं लगता। वहां थियेटर जिंदा है। आज भी आप लंदन में जाइये तो वहां आपको बहुत पहले से शेक्सपियर के नाटक की टिकिट बुक मिलेगी। मैं देखना चाहता था हेमलेट, लेकिन मुझे दस दिनों तक रहना था और दस दिनों तक कोई टिकिट खाली नहीं थी। बाद में जब दोबारा गया तो ऑनलाइन टिकिट की सुविधा हो गयी थी, इसलिए बेटे से कहा कि टिकिट बुक कराके रखो और तब कहीं देख पाया। इसके विपरीत हम लोगों का थियेटर मर रहा है, जहां एक समृद्ध लोक थियेटर की परंपरा रही है। ये भी तो वैकल्पिक मीडिया की भूमिका निभाते हैं। और इस संबंध में मैं कहना चाहूंगा कि मैं नक्सलियों की वर्तमान कार्य शैली से कतई सहमत नहीं हूं लेकिन वैकल्पिक मीडिया उन लोगों ने -इस मीडिया से भी प्रभावशाली- अपने प्रभावों के क्षेत्र में बनाकर रखा हुआ है। उनकी बात उनके प्रभाव क्षेत्र में पूरी तरह सुनी जाती है और पूरी तरह मानी जाती है। और उनकी बात की जो विश्वसनीयता उनके प्रभाव क्षेत्र में बनी है, वो विश्वसनीयता यह मीडिया खोता जा रहा है। तो वैकल्पिक मीडिया लोक नाट्‌य के माध्यम से हो सकता है, छोटे-छोटे अखबारों से हो सकता है, हैण्डबिल से हो सकता है, हाथ से लिखे परचों से हो सकता है और मैं ये कहना चाहता हूं कि यह जो वक्त है, ये एक तरह से अपने आपको दोहरा है।

रमेश नैयर साहब का इंटरव्यू लेते दिनेश चौधरी.
रमेश नैयर साहब का इंटरव्यू लेते दिनेश चौधरी.

आजादी के आंदोलन के दिनों में भी बड़े अखबार चाहे वह “टाइम्स ऑफ इंडिया” था, चाहे “स्टेट्‌समैन” था या उधर नार्थ में “सिविल एंड मिलिट्री गजट” था ये सब अंग्रेजों के पक्ष में थे। उस समय भी छोटे-छोटे अखबार निकाले गये। वो छोटे अखबार जैसे कि ‘ट्रिब्यून’ साप्ताहिक केवल चार पन्ने का, ‘राष्ट्रवादी’, इधर ‘अमृत बाजार पत्रिका,’ ‘मराठा’ ये सभी अपने समय के वैकल्पिक मीडिया थे। फिर एक बात और कि जब इन वैकल्पिक मीडिया के लोगों को भी गिरफ्तार कर लिया जाता तब छोटे-छोटे हैण्डबिल्स, छोटी छोटी बुकलेट्‌स निकाली जाती और भगतसिंह या उनके साथी मेले में या कीर्तन में इन्हें बांटते थे। वो वैकल्पिक मीडिया बहुत असरदार हुआ करता था। साइमन कमीशन जब आया तो अखबारों में कुछ नहीं छपा था। छोटे-छोटे परचों से, छोटी-छोटी नुक्कड  सभाओं से इतना बड़ा हुजूम इकट्‌ठा हो गया कि कल्पना भी नहीं की गयी थी।

  • इसका मतलब यह हुआ कि यदि वास्तविक पत्रकार बनना है तो एक्टिविस्ट बनना पड़ेगा?

–हां। मगर किसके लिये? वो (नक्सली) भी तो अपने-आप को एक्टिविस्ट कहते हैं। किसी जमाने में वे थे। मैं जानता हूं जब 1966 के बाद वे बस्तर में आये थे तो उनके सामने एक तस्वीर हुआ करती थी। आज तो खैर नहीं है और ये अपने विचार का मुद्‌दा भी नहीं है। लेकिन वैकल्पिक मीडिया का एक दूसरा उदाहरण भी अपने सामने है, पर उसे हम लोग स्वीकार नहीं करते। एक कल्याण पत्रिका है। कोई विज्ञापन नहीं लेती, बाजार की बात नहीं करती। ठीक है उसके अपने मूल्य हैं, जो भी हैं, लेकिन वह खूब ज्यादा बिकती है। किसी समय युग निर्माण वालों ने पत्रिका निकाली थी तो वो लाखों की तादाद में बिकती थी। एक पैसे का विज्ञापन वो नहीं लेते थे।

अभी तो ये हाल है कि कोई अच्छा संगठन भी अगर खड़ा होने को होता है तो मैं देखता हूं कि इसे किसी व्यापारी ने तो नहीं खड़ा किया? बाबाओं को देखता हूं तो वे अपना प्रचार करते हैं ओर फिर अरबों का प्रोडक्शन चालू कर देते हैं। ये किसी भी बड़े शातिर उद्‌योग समूह से कम रणनीति पर काम नहीं करते। ये सारी चिंताएं- बहुत सारी चिंताएं -एक साथ हैं।  लेकिन वैकल्पिक मीडिया तो बनेगा। क्योंकि ये देश मरा नहीं है और मुझे कोई खतरा भी नहीं लगता कि ये देश मर जायेगा। आंदोलन खड़ा होगा। कैसे होगा ये अभी कहना मुश्किल है।

  • आंदोलनों की भी तो इस देश में इतनी अधिक धारायें है कि वे एक फोर्स नहीं बना पातीं…

–इसका एक कारण तो यह है कि इक्कीसवीं सदी में इंडीविजुअलिज्म बहुत ज्यादा बढ़ा है। फिर भारतीयों का यह स्वाभाव भी है। स्वामी विवेकानंद जब अमेरिका से घूमकर आये थे ओर वहां के समाज को जब उन्होंने देखा था तो एक बात उन्होंने कही थी कि भारतीयों में और खासकर हिंदुओं में जो परस्पर द्वेष और ईर्ष्या है वो इनके पतन का सबसे बड़ा कारण है। तो आप जो कह रहे हैं कि आंदोलन इतनी धाराओं में बंटे हुए है, इसका कारण इनके नेताओं के अहम के टकराव हैं, व्यक्तिगत ईर्ष्या, राग-द्वेष हैं जो एक समग्र आंदोलन नहीं बनने दे रहे हैं। इसके लिये तो अंततः जनता को ही दबाव बनाना होगा।

  • जैसा कि आपने बताया कि पत्रकारिता आपका चुनाव था, पर आज आप क्या सोचते हैं? क्या इस चुनाव पर अफसोस होता है?

–नहीं। जितने दिनों तक मैंने पत्रकारिता की मुझे कोई अफसोस नहीं हुआ। लेकिन आज की तारीख में मुझे यदि चुनना पडता, या मुझे कोई कहे…. बल्कि कहा भी गया कि आप आकर अखबार के कार्यालय में सिर्फ एक-दो घंटे ही बैठ जायें….. तो मेरे लिये आज की तारीख में, आज के परिवेश में पत्रकारिता का कोई विशेष महत्व नहीं रह गया है। एक अच्छा पत्रकार बनने की संभावनायें इस समाचार पत्र उद्योग ने बंद कर दी हैं। इसलिए कोई व्यक्ति यदि बहुत संवेदनशील है तो पत्रकार बनने के बदले यदि वो स्कूल का मास्टर बने तो समाज के लिये कुछ बेहतर कर सकेगा।

…..समाप्त…..

इंटरव्यू का पहला पार्ट पढ़ने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें… अब रिपोर्टर्स नहीं, शार्प शूटर्स चाहिए

भड़ास4मीडिया के लिए इस इंटरव्यू को किया है दिनेश चौधरी ने.

Comments on “अब तो सारे संपादक एक ही जैसे दिखते हैं

  • om prakash gaur says:

    ऐसी अच्छी सामग्री के लिए धन्यवाद.
    ओम प्रकाश गौड़ भोपाल मो ०९९२६४५३७००

    Reply
  • girish pankaj says:

    NAIYAR JI KE VICHARO KO PARH KAR ACHCHHA LAGAA. MAINE TO UNKE SATH KAM BHI KIYA HAI.AAJ BHI MAI ANEK KARYAKRAMO MEY UNKE SATH JATA RAHA HOO.UNKO SUNATA HU. UNKE CHINTAN SE OORJA MILATI HAI. RAJESH CHAUDHARI NE ANEK SUNDAR-SANTULIT SAVAALKIYE .NAIYAR JI NE BEBAKI K SAATH ZAVAB BHI DEYE. CHHATTISGHARH KI PATRAKARITA KE SIRMAUR HAI NAIYAR JI.

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  • vinod prashad says:

    naiyar ji kam ke douran jo kiya aaj uske thik ulta bol rahe hain… range siyar ko pahchanne ke jarural hai….chahiye ke bhasha sirf sampadkiye me chalega aur chalta hai…

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  • Raj Kumar Sahu. Janjgir says:

    bahut hi prabhavshaali interview. Naiyar ji apne aap mein patrakarita ka school hain. unki kahi baaton se kaphi kuch sikhne ko milta hai. lambe samay se unko padhne ka avsar milta raha hai.
    baaten kadvi jarur hai, lekin vartmaan patrakarita ka sach ismein dikhai deta hai.

    Reply
  • Prof D N Sharma says:

    Patrakarita ke aaj ke halaton per Naiyerjee ki bevak tippaniya sachhai ko ujagar kar rahi hain. Kitna sach kaha hai ki aaj patrakarita aur rajniti dono punjipatiyon ki rakhail ho gai hai. Media ke naitik mulyon me iss hadd tak ki giravat khatarnaak hai.

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  • vikas sharma, atal says:

    भड़ास को धन्यवाद्, नैयर सर को नमन..सवाल ये नहीं कि नैयर सर ने क्या कहा वो तो महत्वपूर्ण है ही पर उससे ज्यादा अहम् बात कि जो नैयर सर कहते हैं वैसा ही उनका आचरण है..मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनसे मुलाकात का लगातार अवसर मिलता है..उनके विचार मैंने कभी जानने का औपचारिक तरीका नहीं अपनाया क्योकि उनके साथ कुछ घंटे बिताने पर ही पत्रकारिता, पत्रकारों के प्रति उनका क्या नजरिया है समझा जा सकता है…वो आज भी हिंदी ग्रन्थ अकादमी को समय देते हैं..उनका उसूल उनकी भाषा के प्रति सजगता आदि हर समय बनी रहती है..मै उन्हें पत्रकारिता की पाठशाला या महाविद्यालय न कहते हुए नयी पीढ़ी के लिए चलते फिरते मार्गदर्शी कहना ज्यादा ठीक समझता हूँ. उनसे जो मिला होगा वो उनके सहज व्यव्हार का कायल न हुआ हो ऐसा हो नहीं सकता. हम जैसे नए और नौसिखिये पत्रकारों को सदैव मनोबल बढाने और व्यावहारिक तौर पर अच्छी पत्रकारिता कर पाने का उत्साह वर्धन करते हैं , वे आज की सच्चाई को तल्ख़ अंदाज में बया करते हैं वही इसमें से कैसे निकला जाये ये भी बखूबी सुझाते है एक पंक्ति में कहू तो वे हमारे पत्रकारीय बुजुर्ग हैं जिनका होना ही हमें सहारा देता, आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है…आखिर में आपको अशेष बधाई और नैयर सर चिरायु हो हमारी शुभकामनाये. – विकास शर्मा, अटल, raipur

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  • Excellent interview,Thanks to Mr.dineshji and Thanks to Mr. Naiyarji
    now India Need Press person like Mr.Naiyar”s.
    Once again thanks to mr.Dineshji &Bhadas.

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  • naiyarji ke chahey interview padhe ya unhe sakchat sune hamesha nai urja milti hai democretic world me kaam karne ke douran or naidunia raipur me rahte huye sir se milne ka or unke sath kaam karne ka soubhagya prapt hua dineshji or yashwantji hardik aabhaar

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  • sudeep thakur says:

    दिनेश लंबे अरसे बाद तुम्हारा लिखा देखा. अच्छे इंटरव्य़ू के लिए बधाई. संभव हो तो मेल करो.

    सुदीप ठाकुर

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  • “अखबार के संपादक की संस्था का इससे ज्यादा पतन और क्या होगा कि औद्योगिक व व्यसायिक घराने जो अखबार चलाते हैं, उनमें उन्हें संपादक की जरूरत नहीं होती है। उनको संपादक का कार्ड लिये हुए ऐसे दलाल की जरूरत होती है जो कि सचिवों से, मंत्रियों से जाकर मिल ले और उसे प्रबंध संपादक या संपादक या ऐसा ही कुछ नाम दे दिया जाये..”

    vijay budhia ne jansatta raipur ki franchise li thi tab mahan aadarniy ramesh naiyar ji eksamay usme sthaniy sampadak ki bhumika me rahe. tab ve kya kar rahe the, yahi na jo unhone upar kaha….. उनको संपादक का कार्ड लिये हुए ऐसे दलाल की जरूरत होती है जो कि सचिवों से, मंत्रियों से जाकर मिल ले और उसे प्रबंध संपादक या संपादक या ऐसा ही कुछ नाम दे दिया जाये..”

    aisa hai ki khud dalali karein to thik hai….. baki ke liye thu thu, bas yahi niti hai hamare naiyar ji ki, ghar k baju me khatu wale shyam baba ka mandir hai, subah sham pravchan sunte honge lekin fir bhi dil itna kala hai hamare naiyar ji ka ki puchho mat. inki awaz hi inka kaminapan bata deti hai….
    yar naiyar ji khud to sanghi chaddhi wale rahe hain lekin aisa chhipa ke ki congress sarkar me bhi malai mile aur bjp sarkar me bhi, abhi dekh lo, raman sarkar me itne sal se malai kha rahe hain, bete sanjay naiyar ko to jansampark vibhag me salon pahle hi fit karwa diye hain sarkari naukari me….
    itna sab karne k bad budhauti me, jab kabar me taange latkane ki umar paas aa rahi ho to pravchan dena aasan ho jata hai na, adarniya naiyar ji? kahein to tulsi wali chai pilwa du sir?

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  • S. K. Choube says:

    Dinesh ko dhanyawad. Mujhe 01/02 Feb., 2001 ko Dongargarh mein Naiyyarji ka 4 page ka bhashan sunane ko mila tha. kaafi prabhashali lekh tha. Aur Dinesh ke ghar mein unaki baatein sunane ka mauka bhi mila. Sachmuch main bahut prabhawit hua tha. Ab ye interview padhkar aisa laga jaise Dinesh aur Naiyyarji mere saamane khade hokar baatein kar rahe hon.
    Sachchee baatein to bahut se log kahate hain lekin bebaki se sachchaee bayan karane wale pratibhashali log birale hi hain. Naiyyarji unhi mein se ek hain. Shaayad yahi gun ne unhe shikhar par pahunchaya hai.Lekin duniya mein kuchh log aise bhi hain jinhe dusaron ki tarakki bardaast nahi hoti hai. Ab Mr.P. L. (Pol Kholu) ko hi lijiye jab unke naam mein golmaal hai to unki baaton mein sachchaee kahan se aayegi? Ye to wahi baat hui ki blouse khol ke muh chhupa kar chalana. Are bhaiyya sir utha kar seena taan kar chalo. Inka naam P. L. se Pol Kholu nahi balki Pant Khuli hona chhahiye kyonki jab jalti hai to pant khulati hai. Main samajhata hun ki har mahaan vyakti ka yah siddhant hota hai ki
    “Hathi chale bazaar,
    Kutta bhunke hazaar”.

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