अयोध्या : किसकी हार, किसकी जीत

नदीम अख्‍तर आजकल इस बात पर खूब बहस चल रही है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय से संबद्ध लखनऊ बेंच द्वारा सुनाए गए अयोध्या पर फैसले के खिलाफ सुन्नी वक्फ बोर्ड को सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए या नहीं। हालांकि वक्फ बोर्ड अब ऐलान कर चुका है कि वह मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाएगा, लेकिन समाज के कई तबकों से यह आवाज भी आ रही है कि मामले को हिंदू और मुसलमान, दोनों समुदायों के प्रतिनिधि मिलबैठ कर आपस में सुलझा लें। अगर ऐसा होता है तो इससे अच्छी बात कुछ और नहीं हो सकती लेकिन फैसला अगर कोर्ट से ही आना है, तो मामला सुप्रीम कोर्ट में जरूर जाना चाहिए। हालांकि आस्था से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे पर फैसला देना इलाहाबाद हाई कोर्ट के लिए भी आसान नहीं था, लेकिन फैसला पढ़ने के बाद यह धारणा बनती है कि कोर्ट का फैसला ऐतिहासिक तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर कम और आस्था (पापुलर बिलीफ) पर ज्यादा आधारित है। न्यायालय का फैसला संविधान-कानून सम्मत होता है, विश्वास और आस्था पर बेस्ड कतई नहीं होता। सो, अगर इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चैलेंज नहीं किया गया तो यह न्यायपालिका में एक बिल्कुल नए और असम्मत ट्रेंड को पनपने देने जैसा हो जाएगा।

आस्था अंधी होती है और यह न्याय का आधार कभी नहीं हो सकती। मसलन जिस आस्था या विश्वास के आधार पर खाप पंचायतें अपनी आन-बान-शान की खातिर हारर किलिंग को वैध मानती हैं, वह हारर किलिंग सही ठहराई जा सकती है क्योंकि उस गांव या इलाके के ज्यादातर लोग इस परंपरा में विश्वास करते हैं। फिर तो सती प्रथा जैसी गलत परंपराएं और इससे जुड़े विश्वास पर भी कानूनी मुहर लगाना आसान हो जाएगा क्योंकि धार्मिक-सामाजिक-ऐतिहासिक कारणों से लोग इन्हें मानते आए हैं। हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिया जाना इसलिए भी जरूरी है कि यह संवैधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष-पंथनिरपेक्ष भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों की आइडेंटिटी से जुड़ा हुआ है।

बाबर ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई, इस तथ्य पर मैं नहीं जाता क्योंकि तब बादशाहत-रियासत का जमाना था, जिसकी लाठी उसकी भैंस का दौर था। लेकिन 6 दिसंबर 1992 को हिन्दू कट्टपंथियों ने जो ढांचा गिराया (जिसे मुसलमान बाबरी मस्जिद कहते हैं) और जो विवादों के घेरे में था, वह सिर्फ “मस्जिद” का गिराया जाना नहीं था, एक अल्पसंख्यक समुदाय की धार्मिक-राष्ट्रीय अस्मिता पर हमला था। एक रंगदारी थी कि इस देश में हम बहुसंख्यक हैं, इसलिए हम जैसा चाहेंगे-करेंगे, आपको वैसे ही रहना होगा। संविधान अगर आपको बराबरी का हक देता है, तो ऐसे संविधान को हम दिनदहाड़े अपने पैरों तले रौंद सकते हैं, झुठला सकते हैं। कोर्ट के फैसले ने उन हिंदू कट्टरपंथियों की हरकत को अपरोक्ष रूप से सही ठहराया है कि धार्मिक आस्था के नाम पर “मस्जिद” तोड़ने का जो काम किया गया था, वह सही था, क्योंकि उनके आराध्य देवता का जन्म वहीं हुआ था और उनके धार्मिक स्थल को तोड़कर ही “मस्जिद” बनाई गई थी।

मामले को देश की सर्वोच्च अदालत में ले जाना इसलिए भी जरूरी है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद हिंदू कट्टरपंथियों के हौंसले बढ़े हैं। अब अयोध्या के बाद काशी और मथुरा का राग दुबारा छेड़ा जाने लगा है। इस बीच हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के कुछ समझदार लोग यह कह रहे हैं कि जो एक तिहाई जमीन मुसलमानों को मिली है, दरियादिली दिखाते हुए वह भी उन्हें हिंदू भाइयों को सौंप देनी चाहिए। इससे आपस में विश्वास और सौहार्द का अभूतपूर्व माहौल बनेगा। बेशक ऐसा हो सकता है, लेकिन क्या गारंटी है कि इसके बाद धर्म की राजनीति करने वाले हिंदू संगठन अपने एजेंडे में काशी, मथुरा और न जाने कहां-कहां से ढूंढ के ऐसे मामले नहीं लाएंगे और फिर एक नया बखेड़ा नहीं खड़ा करेंगे। तब फिर जहां से चले थे, वहीं दोबारा वापस आ जाएंगे यानी पुनर्मूषिकोभव। इसलिए अगर दोनों समुदायों में ऐसी कोई सहमति बनती है तो क्या दोनों पक्षों की अगुवाई करने वाले संगठन या नुमाइंदे कोई ऐसा लिखित समझौता करेंगे कि मंदिर-मस्जिद विवाद का ये आखिरी अध्याय है और आगे ऐसा कोई मामला दोनों पक्ष नहीं उठाएंगे। मेरी समझ से अगर भूले-बिसरे ऐसा हो भी गया तो धर्म के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले फिर नए नाम से कोई नया संगठन बनाकर मामले को सुलगा देंगे। यह ठीक वैसे ही होगा, जैसे किसी आतंकवादी संगठन पर बैन लगा नहीं कि नए नाम का एक और संगठन खड़ा हो जाता है, जो उनकी दुकानदारी चलाता रहता है।

अयोध्या एक संप्रभु और सेक्युलर देश की न्याय पालिका का एसिड टेस्ट है। यह सच है कि कोई भी इंसानी अदालत, भगवान के घर का फैसला नहीं कर सकती। वह सिर्फ इंसान द्वारा बनाए गए कानूनी मापदंडों के अनुसार उस “घर” के मालिकाना हक पर अपना फैसला सुना सकती है। यह भी एक सचाई है कि इस देश की धर्मभीरू जनता इस फैसले को इसे अपने धर्म की हार या जीत के रूप में देखने को व्याकुल है। वह इतनी आतुर है कि अपनी जीत देखने-सुनिश्चित करने के लिए कोई भी उपाय नहीं छोड़ना चाहती। बीच-बीच में ऐसी भी आवाजें उठती रहती हैं कि अगर कोर्ट का फैसला हमारे हक में नहीं आया, तो संसद में कानून बनाकर हम अपनी जीत निर्धारित कर लेंगे। और एक लोकतांत्रिक देश की संसद में बहुमत की चलती है, और बहुमत को यह ताकत जनता देती है। तो फिर अयोध्या मामले में किसकी जीत होगी..बहुसंख्यकों की, अल्पसंख्यकों की, बहुमत की, अल्पमत की या फिर इस देश की न्याय व्यवस्था की !!! मेरी दुआ है कि जीत दिल पर दिल की हो, प्यार-मोहब्बत की हो और इंसानियत की हो क्योंकि जब किसी का दिल जीता जाता है, तो इसमें किसी की हार नहीं होती, किसी को कोई शिकवा नहीं होता। फिलहाल तो देश की न्याय व्यवस्था के अंतिम पायदान पर चलने का वक्त है और महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद के शब्दों में यह मानने का वक्त है कि पंच ही परमेश्वर होता है।

नदीम अख्तर न्यूज 24, दिल्ली में सीनियर प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं.

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Comments on “अयोध्या : किसकी हार, किसकी जीत

  • when i read this article i already guess that writer should be muslim and finally i found that is Nadeem Akhtar….mere khayal se inko shanti nahi mili ki ayodhya ke case ki sunvai ke baad desh mein itni shanti kiu hai…islye uss shnti ko bhang karne ke liye inhone apna 2 paise ka article daal diya…shame on u nadeem ji

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  • Chandrabhan Singh says:

    Sriman Nadeem
    Punch Parmeshwar ko sirf hindu samuday manta hai apne samuday walon se ek bar baat to kar ke dekho Akkal thikane laga denge.

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  • dharamkaram says:

    “मेरी दुआ है कि जीत दिल पर दिल की हो, प्यार-मोहब्बत की हो और इंसानियत की हो क्योंकि जब किसी का दिल जीता जाता है, तो इसमें किसी की हार नहीं होती, किसी को कोई शिकवा नहीं होता। फिलहाल तो देश की न्याय व्यवस्था के अंतिम पायदान पर चलने का वक्त है और महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद के शब्दों में यह मानने का वक्त है कि पंच ही परमेश्वर होता है।” यदि तुम्हारा यह भाव सत्य है तो क्या तुम्हें नहीं लगता कि इस फैसले से बेहतर कुछ नहीं हो सकता। करोड़ो हिंदू जो चाहते थे-उनका दिल जो चाहता था- वो हुआ तो कहानी गढ़ रहे हो। इसमें तुम्हें हार-जीत दिखाई देती है। पंच परमेश्वर होता है, तो लाखो-करोड़ो दिलों का भाव क्या अनीश्वरी है। किस न्याय-प्रक्रिया की दुहाई दे रहे हो। इस देश की नब्ज समझो। यहां सिर्फ आस्था और धर्म न्याय सृजित करते हैं, न्याय से धर्म नहीं। इस देश को मिटाओ मत-कठमुल्लापन मत फैलाओ। यहां राम न्याय करते हैं-कृष्ण न्याय करते हैं-अन्याय पर शिव भी प्रलय करते हैं। अगर उच्चन्यायालय ने सबको शांत करने की कोशिश की है तो शांत ही रहने दो। टुच्चे पत्रकारों की राह पर मत चलो। तीन परमेश्वरों ने जो कहा है, उसे ही मान लो। पांच मत खोजो। इस देश को सिर्फ धर्म और आस्था चलाएगी-छद्म न्याय और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नहीं। यहां सवाल संख्या का है ही नहीं, व्यर्थ राग अलाप रहे हो। तुम छोटी बुद्धि वालों को बस संख्या गिनने में मजा आता है। शरीयत के नाम पर बच्चों के ढेर लगाते जा रहे हो और गाना गाते हो अल्पसंख्यक का। आजादी के बाद से कितने संख्या बढ़ी है, जरा देख लो। बेवकूफ, तुमको देश की अर्थव्यवस्था की भी फिक्र नहीं है, सिर्फ बच्चे गिनते रहते हो और अल्पसंख्यक होने का रोना रोते हो। इस देश में आ गए तो चाहे जो कर लो, चीन होता तो बधिया करके छोड़ देता। इजराइल में-अमेरिका में-आस्ट्रेलिया में अल्पसंख्यक का रोना क्यों नहीं रोते।

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  • chandan srivastava says:

    bhai waah…aapne das hajar se jyada page ka faisla padh liya aur is niskarsh par bhi pahuch gaye ki faisla aastha ke adhar par hua hai…jilani sahab ki jagah waqf board ko aap hi ko vakeel rakhna chahiye tha…kyuki unhone to kha hai ki abhi poora faisla padhne me time lagega padhne ke baad hi supreme court me apeal ki jayegi…aastha ki baat to unhone ki hai par isliye kyuki wo ek paksh ke vakeel hai (patrakar nahi) harne ka karan to unhe batana hi tha…ek warg me faile propeganda ko apne satya maar kar keyboard baja diya…doosri baat mathura aur kashi ki to mahoday abhi 3-4 din pahle vinay katiyar ne nirmohi akhada ke sant bhaskar das se milne ke bad kaha tha ki kashi me bhavnashesh mandir ke bagal naya mandir ban gaya hai mathura me bhavya krishna ka mandir bana hua hai…ashay hai ki ye kattarvadi neta mathura kashi ka mudda nhi uthane ja rahe…bahut ajeeb baat hai ki sirf khas dharm se tallukat rakhne ke nate ek pakshiya article likh diya jaay wo b aap jaise senior producer dwara.

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  • अमनचैन says:

    नदीम साहब आपने जो लिखा है वो एक तार्किक बहस का हिस्सा है लेकिन अगर बातचीत और सदभाव के प्रयास हो रहें हैं तो उन्हे भी जारी रहना चाहिए….बाकी फूटे करम वाले अधर्मी की बात पर मत जाईये इसे लाईलाज बीमारी है…अपना ये कोढ, बांट कर कम करना चाहता है..इसका जवाब मैं दू्ंगा और ये जहां जहां उलटी करेगा वहां मैं राख डालूंगा… सुन बे धरमकरम प्रतीक्षा कर फटके देता हूं तुझे

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  • om prakash gaur says:

    हमारी अदालते न्याय नहीं मामलों का निपटारा करती है
    हमारी अदालतों में दो पक्ष होते हैं. उनके वकील होते है. वकील सच-झूट, न्याय-अन्याय को नहीं मानते हैं. उनका अपना अपना पक्ष ही सही और न्यायपूर्ण होता है दोनों पक्षों में काला-सफ़ेद जितना अंतर होता है इसलिए कोई एक ही सही हो सकता है. पर यह बात वकील नहीं मानते है क्योंकि सवाल जमीर का नहीं पापी पेट का होता है. वकील अदालत को उतना ही बताते हैं जितना उनके पक्ष को मजबूत बनता है. प्रमाण भी इसी प्रकार के रहते हैं. उनकी जानकारी में कोई विपरीत बात जो उनके खिलाफ होती भी है तो उसे छिपा जाते हैं. इन सब के लिए उनका जमीर उन्हें धिक्कारता भी नहीं है.दोनों पक्षों के वकील अपने अपने पक्ष के समर्थन में तर्क और प्रमाण रखने में अपनी योग्यता और प्रतिभा का परिचय देते हैं. अदालत की नजर में जो वकील अपेक्षाकृत ज्यादा सही और अकाट्य होता है वह पक्ष विजेता घोषित कर दिया जाता है. यानि परीक्षा वकीलों की होती है, ज्यादा योग्य वकील पास और कम योग्य फेल. लगता है अदालत का भी न्याय-अन्याय से कुछ भी लेना देना नहीं होता है. अपवाद स्वरूप कभी कभार अदालत का जमीर जग जाता है और वह कहती है कि सही तो हराने वाला पक्ष है पर कानून ने उसके हाथ बांध रके है इसलिए वह गलत को भी मज़बूरी में सही ठहरा रही है. यानि अन्याय का पक्ष ले रही है. लानत है है ऐसे न्याय और न्याय व्यवस्था पर. ओम प्रकाश गौड़ मो- ०९९२६४५३७००

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  • rana pratap singh says:

    बाबर ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई, इस तथ्य पर मैं नहीं जाता क्योंकि तब बादशाहत-रियासत का जमाना था, जिसकी लाठी उसकी भैंस का दौर था।

    eska mtlb smjha do hmare patrakaar shahe ,tb mai aagye ki kahani aapko bahut hi acche se smjhau….rply fast dost

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  • rana pratap singh says:

    बाबर ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई, इस तथ्य पर मैं नहीं जाता क्योंकि तब बादशाहत-रियासत का जमाना था, जिसकी लाठी उसकी भैंस का दौर था।

    ye aapke hi word hai,eska mtlb samjha do patrakaar shaheb,fir aagye ki baat mai aapko bde acche se smjhata hu

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  • Shoaib Ali says:

    Aaj Ke zmane me agar hum in matters par gor kare to we never will go ahead…….Desh kisi ek ek caste ya city ya ek state se nhi chal rha yha sab brabar ke haqdar hah ar sabko ek dusre se kam padta hah……..par india me yhi ki govt Difference rakhti hah….bahut sare matter me muslim logo ko insaaf nhi milta……

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  • ASLAM ALI says:

    SABHI GULAMO KO HIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIIII
    AAJ MERE DESH MEIN KAFI KUCH HOO RAHA HAI PURA DESH SIRF DHARM K MAYA JAAL MEIN FASA HAI CHAHE INEH DHARM KI ABCD MALUM NAA HOO LAKIN YEH DHARM K NAAM PAR LARD RAHE HAI SABHI DHARMO MEIN EK JAISA LIKHA TUMHARE SUBSE BADE BHAGWAN TUMHARE MATA PITA HAI AGAR TUM NE INKI SEWA KARTEY HOO TO TUMHE SAWARG YAA JANNAT MILEGI LAKIN AUR HINDU HOO YAA MUSALMAN WOH SUBSE PHALE EK INSAAN HAI
    AUR
    EK BAAT BHARAT DESH MEIN MUGAL KAAL MEIN JO BHI BANA HAI JAB THOD DE KYA PATA WAHA BHI KOI MANDIR HOGA THOD DO WOH HAR EK IMARAT JO MUSALMAN TUMHE DEKAR GAYE THOD DO LAL KILA THOD TAJ MAHAL KUTUB MINAR JAMA MASJID KYA PATA YAHA BHI KOI MANDIR HOGA YEH TUM ISLEY NAHI THOD TEY KYU KYUKI INDIA INHI HISTORICAL PLACE SE JANA JATA HAI JO BHI VIDESHI ATA HAI INKO DEKHNE ATA HAI YEH SUB BHI THOD DO EK NA EK MANDIR TO MILJAYE GAA SHARM KARO INSAAN HOO KOI JANWAR NAHI
    Dil or Taro Mein Sirf ek fark hai, taare tut kar logo ki khawaish puri kar jaate hai,
    aur log apni, khwaish puri karne ke liye dil tod jate hai…

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