अरुंधति राय कानूनन दंड पाने योग्य हैं

अमिताभ ठाकुर: देशद्रोह बनाम निर्दोष : अरुंधती रॉय देश की विख्यात लेखकों-सामाजिक कार्यकर्ताओं में मानी जाती हैं. देश-विदेश में उनके समर्थकों और चाहने वालों की एक बहुत लंबी कतार है. कई विषयों पर उनके अपने स्वयं के विचार हैं जो बहुधा विवादास्पद भी हो जाते हैं. संभव है उन्हें इन तमाम विवादों से लाभ भी मिलता हो और उनकी सामजिक छवि में इजाफा होता हो.

शायद इन्ही चर्चाओं ने उन्हें एक बुकर पुरस्कार प्राप्त लेखिका से जगविख्यात व्यक्तित्व बना दिया है. यहाँ तक किसी को भी शिकायत नहीं हो सकती है और होनी भी नहीं चाहिए- एक व्यक्ति के रूप में भी नहीं और न ही इस देश के नागरिक के रूप में. एक महिला, जो सामान्यतया अतीव बुद्धिजीवी मानी जा रही हैं, विभिन्न विषयों पर अपने विचार रख रही हों जो आम लोगों के विचारों से अलग हो, इससे भला दूसरों को क्या आपत्ति होनी चाहिए. यह एक स्वतंत्र देश है और यहाँ हम सबों को मौलिक अधिकार प्रदान किये गए हैं. इनमे अनुच्छेद 19 (1)(ए) के अनुसार हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है. लेकिन साथ ही उसी संविधान में अनुच्छेद 19(2) (ए) में साफ़ अंकित  है कि अनुच्छेद 19 (1) (ए) में किसी बात के होते हुए भी भारत की एकता और अखंडता, देश की सुरक्षा, वैदेशिक रिश्तों, लोक व्यवस्था, न्यायिक व्यवस्था आदि के मद्देनज़र इस अधिकार को नियंत्रित तथा सीमित किया जा सकता है. इसके अलावा धारा 124 ए, आईपीसी के अनुसार देशद्रोह परिभाषित है जबकि धारा 121 ए देश के विरुद्ध अपराध करने को प्रोत्साहित करने का काम सम्मिलित है.

अभी तक हमारे देश में यही संविधान तथा यही क़ानून लागू है. कई बार सर्वोच्च न्यायालय तक यह प्रकरण गया, विशेष कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नियंत्रित तथा सीमित करने के सम्बन्ध में. पर हर बार सर्वोच्च न्यायालय ने इन सीमाओं तथा नियंत्रण को पूर्णतया न्यायोचित और संवैधानिक बताया है. इसी प्रकार देशद्रोह से सम्बंधित धारा 124 ए, आईपीसी को भो उच्चतम न्यायालय ने संवैधानिक करार क्या है. ऐसे में इस देश के नागरिक होने के नाते और क़ानून को सर्वोच्च मानने के नाते हम सबों का यह स्वाभाविक रूप से कर्त्तव्य हो जाता है कि इन कानूनों का पूर्ण अनुपालन करें.

यदि हम इन कानूनों को नहीं मानते हैं तो हमें इसे बदलने के लिए प्रयास करने चाहिए. प्रयास दो ही तरीके से समझ आते हैं- या तो भारतीय संसद के जरिये संविधान तथा भारतीय दंड संहिता में उचित बदलाव कराएं, या फिर न्यायपालिका के जरिये इन्हें अवैधानिक कहवा दें. पर जब तक इन दोनों में कोई एक बात नहीं होती है तो यही इस देश का कानून रहेगा और इस देश के हर नागरिक को इसका पालन करना ही होगा. किसी भी क़ानून का पालन नहीं करने पर तदनुसार दंड का प्रावधान है और नियमानुसार सम्बंधित व्यक्ति को वह दंड मिलना ही चाहिए. मैं समझता हूँ इसमें किसी भी प्रकार के मतभेद की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए. ऐसा नहीं होने की दशा में हर व्यक्ति अपने हिसाब से क़ानून को परिभाषित कर सकता है और फिर आगे कहेगा कि उसके लिए तो क़ानून वही है जैसा वही समझता है. ऐसे में कोई भी व्यवस्था नहीं चल सकती. और हम सभी जानते हैं कि संविधान और क़ानून का मूल उद्देश्य किसी व्यवस्था का समुचित और समग्र संचालन करना ही है. इसमें व्यक्तिगत इच्छाओं और व्यक्तिगत अभिमत का कोई स्थान नहीं है.

इसके बाद प्रश्न यह उठता है कि जो बात अरुंधती ने कही है वह क़ानून का उल्लंघन है या नहीं. मैं मीडिया के जरिये उनके द्वारा कही गयी वे मुख्य बातें प्रतुत करता हूँ जो मेरी निगाह में प्रथम दृष्टया ही विधि के प्रावधानों के विपरीत है. 21 अक्टूबर 2010 को नयी दिल्ली में “कश्मीर- आज़ादी, एक मात्र विकल्प” नामक आयोजन में वे कहती हैं- ”कश्मीर को भूखे-नंगे हिंदुस्तान से आजादी मिलनी चाहिए. भारत कश्मीर से आजादी चाहता है और कश्मीर भारत से.” पुनः दिनांक 24 अक्टूबर 2010 को कोएलिशन ऑफ सिविल सोसायटीज की ओर से “मुरझाता कश्मीर : आजादी या गुलामी” विषय पर आयोजित सेमिनार  में श्रीनगर में कहती हैं- ”कश्मीर भारत का कभी भी अभिन्न हिस्सा नहीं रहा। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है। यहां तक कि भारत सरकार ने भी इसे स्वीकार किया है.” इसके अलावा जब सय्यद अली शाह गिलानी कहते हैं कि “कश्मीर की भारत से पूर्ण आज़ादी” हो तो वे इस बात का बारबार बचाव भी करती हैं.

हमारे देश के क़ानून के अनुसार यह सीधे-सीधे देशद्रोह की परिभाषा में आ जाता है. साथ ही मैं नहीं समझता कोई भी देश अपने स्वयं के मूल अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगाने की बात को भी देशद्रोह का अपराध नहीं मानता होगा. जाहिर है कि उसका मूल स्वरूप रहेगा तभी तो देश अन्य बातों के विषय में सोचेगा और कार्य करेगा. अरुंधती और गिलानी जैसे लोगों द्वारा कही गयी बातें तो सीधे देश के टूटने से जुडी हुई हैं और स्वतः देशद्रोह कहलायेगा. संभव है अरुंधती मन के अंतरतम से कश्मीर के लोगों का भला चाहती हों. पर यदि वे किसी देश में रहती हैं तो उसके कानून का पालन तो करेंगी ही. यह तो नहीं हो सकता कि उनकी महान मेधा और बुद्धि के अनुसार उनके द्वारा कही गयी कोई बात अपने आप सही हो जायेगी.

ऐसे में इन्हें या किसी भी व्यक्ति को यह कह कर बचाव नहीं करना चाहिए कि वे सही बात ही कह रही हैं. वे सही हैं या गलत, इस पर अलग-अलग विचार और मत-मतान्तर हो सकते हैं पर उनकी बात धारा 124 ए, आईपीसी तथा धारा 121 ए का सीधा उल्लंघन है, इस बात पर कोई दो विचार नहीं हो सकते. अतः सय्यद अली शाह गिलानी, अरुंधती रॉय तथा एसएआर गिलानी हों या कोई अन्य, भले एक मनुष्य के रूप में कुछ भी सोचते हों पर यदि वे सार्वजनिक स्तर इन बातों को उदघाटित करते हैं तो उन्हें देश के क़ानून का पालन करना ही चाहिए. खास कर के यदि मामला देश की एकता और अखंडता से जुड़ा हुआ हो और जान बूझ कर तथाकथिक बुद्धिजीवी लोगों द्वारा यह अपराध कारित किये गए हों. कोई व्यक्ति, मात्र अपनी इच्छा से देश के क़ानून का उल्लंघन नहीं कर सकता है.

अब इस विवाद के सामने आने के बाद अरुंधती ने कहा है कि – “मैंने वही कहा जो दूसरे लेखक सालों से लिखते और कहते आये हैं.” साथ ही यह भी कि “मैंने कश्मीरी लोगों के लिए इंसाफ के बारे में कहा है जो दुनिया के सबसे क्रूर फौजी कब्ज़े में रह रहे हैं.” यह भी जोड़ती हैं कि “उस देश पर जो लेखकों की आत्मा की आवाज़ को खामोश करता है. तरस आती है, उस देश पर जो इंसाफ की मांग करनेवालों को जेल भेजना चाहता है”.

लेकिन क्या इस तरह के जबरिया ओढ़े और भड़काऊ जज्बाती बातों का कानून के सामने कोई अर्थ है. क्या ये सत्य नहीं है कि अपनी पूर्णता में क़ानून सबसे ऊपर है और इस प्रकार से अपने स्वयं का उल्लंघन होता देख कर उसके सामने एक ही विकल्प होना चाहिए- “अपनी शक्तियों का पूर्ण निर्लिप्तता, निष्पक्षता और आदर के साथ सम्यक अनुपालन ताकि यह शेष सभी लोगों के लिए एक बार पुनः नजीर के रूप में पेश हो सके.” इन मामलों में कोई कार्यवाही नहीं होने से इस प्रकार का कार्य करने वालों का निश्चित रूप से मनोबल भयानक रूप से बढ़ेगा और इनकी देखा-देखी हर आदमी क़ानून को अपने ढंग से परिभाषित करने का गलत प्रयास करेगा.

लेखक अमिताभ ठाकुर लखनऊ में पदस्थ आईपीएस अधिकारी हैं. पुलिस की नौकरी से अवकाश लेकर इन दिनों शोध कार्य में रत हैं.

Comments on “अरुंधति राय कानूनन दंड पाने योग्य हैं

  • Bilkul ! Is desh ka aalam ye hai ki *abhivyakti ki swatantrata* ke naam par koi kuch bhi kahe ! Na Desh ka lihaaz aur na qanoon ka dar ! Aisa nahi ki ye sirf Arundhanti Roy ka maamla hai ! Aap dekhiye ki filmon mein nangaapan ka virodh hota hai to Bade Bade Samaadakon ki kalam se niklata hai ki – [b]Ye vyakti ki swatantrata ka hanan hai [/b]! Park mein khuleaam Ladke-Ladkiyaan sharmnaak harqat karte hain to kai *Modern log* kahte hain ki Sabko apne tarique se jeene ka haq hai ! Is Desh mein Aazaadi ka matlab ab SEEMAAON KA ATIKRAMAN ho chala hai ! Swatantrata ka matlab – Buddhijivi bankar Algaaw-waadi tatwon ke SUR-MEIN-SUR milaao ! Aisa sirf Hindustaan mein hi hota hai ! Yahaan 2 quam ke liye 2 qanoon ban jaate hain ! Yahaan gaaon mein rahne waali budhi MAA ko Police pakad kar le jaati hai, qanoon ka waasta dekar ! Sansad par hamla karne waale doshi Afzal Guru ki fhaansi par rok lagayee jaati hai , Qanoon ka waasta dekar ! Koi bhi karodon ka ghotaala kar saalon ghumta hai , chutte saand ki tarah ! Ek saadhaaran si chori karne waale ki police jee-bhar ke peetayee karti hai , par bade-bade criminals ki jee-huzuri karti hai ! Har taraf Aazaadi ! Aisee aazaadi, jiska har koi mureed ho chala hai ! Khas-Taur par wo log, jo is desh ko, Bharshtaachaar aur aalgaaw-waad ke zariye, todne ya yahaan par ashaanti failaane ka mansuba rakhte hain ! Ab waqt aa chala hai ki log is par bahas shuru kar de ki *ABHIVYAKTI KI SWATANTRATA * ki had kya honi chaaiye ?

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  • rahul aditya rai says:

    amitabhji,
    arundhati roy ek lekhika ke rup me jani jati hain.per esa lagta hai ki ve aapni rah bhatak gai hain. kam umra me bukar puruskar milne se unhen jo sohart mili usse vo pagla gain. unhen sahitya ke jariye desh or samaj me alakh jagani thi, lekin ve sasti lokpriyata pane utpatang bayan dene per utar aain. agar nuse puchha jaye ki bukar milne ke bad sahitya ke prati jo jababdari badhi use unhone kitna nibhya or lekhan me kya yogdan diya ? to unke pas koi jabab nahin hoga. agar unhone sahitya per dhyan diya hota to unki lokprita kuch achhi pustkon ki vajah se hoti.

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  • aapkiawaz.com says:

    अमिताभ जी, अरुंधती ने जो कुछ कहां, वो सही है या गलत, ये बहस का मुद्दा है, लेकिन ऐसी बातें तो औरों ने भी कही है। फारूक अब्दुल्ला व उस सेमीनार में मौजूद कई अन्य वक्ताओं नें भी कुछ इसी तरह की बात कही। तो मै ये जानना चाहता हूं कि यूएन रिज्योलेशन की बात करें या शिमला समझौते तो इनका क्या मतलब है? दुसरे पहले तो ये बात तय कीजिये की इनकी बात गलत है, फिर कार्यवाही की बात की जानी चाहियें। क्या किसी वर्ग विशेष की बात के खिलाफ बोलना देशद्रोह है तो रामजेठ मलानी को क्यों भूल जाते है। शायद हमें इस तरह मुंह करने की कोशिश करने के बजाये सच्चे मन से समस्या का समाधान तलाश करना चाहिये। संपादक- आपकी आवाज़.कां

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  • वाह अमिताभ जी, क्या खूब लिखा है. सराहनीय. भावपूर्ण अभिव्यक्ति. सारगर्भित. निश्छल देशप्रेम. कितना भोलापन झलकता है विचारों में.

    गिलानी और अरुंधती पर निश्चय ही कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए. केंद्रीय गृहमंत्रालय में लगता है नासमझ लोग बैठ गए हैं. अमिताभ जी आप विद्वान् हैं इसमें शक नहीं, मेरा ये कहना है के आप लखनऊ में इस मामले में FIR दर्ज कराएं. हमें सरकार पे दवाब बनाना होगा. या जैसा आपने कहा के “… फिर न्यायपालिका के जरिये …..कहवा दें” तो अगर FIR दर्ज न होतो आप कोर्ट से कहवा दें, के भैया गिलानी और अरुंधती को धर लो, याने के केस दाखिल करें.

    हम सब आपके साथ हैं. देश की अखंडता पे हमला करने वाले बचने नहीं चाहिए. भले ही एक बार को बिहार और यूपी के लोगों को मुंबई से बाहर निकालने का नारा देने वाले बच जायें पर ये कश्मीरी और कश्मीर की आज़ादी की बात करने वाले बचने नहीं चाहिए. AFSPA से भी अधिक थ्रिलिंग कोई और कानून आपके ज़हन में आता हो तो हम पाठको का ज्ञानवर्धन अवश्य करें.

    वापस आतें हैं…अरे आयोजन का विषय “कश्मीर- आज़ादी, एक मात्र विकल्प” हुआ तो क्या हुआ. सरकार ने इस विषय पर आयोजन की अनुमति देदी तो क्या आपको हक मिल गया के आप कश्मीर की आज़ादी का ही राग अलापेंगे. विषय गंभीर होने पर भी उसके अन्दर मुन्नी बदनाम वाला गाना गाके आयोजन को इतिश्री की जा सकती थी. अमिताभ जी इस बात की भी जांच होनी चाहिए के ऐसा क्यों नहीं किया गया.

    बस जी और क्या कहें हम आम लोगों के नसीब में शायद ये ही लिखा है के हम कानून का मज़ाक बनते हुए देखते रहे. अमिताभ जी आप लिखो इस मुद्दे पे रोज़ लिखो इससे नैतिक दवाब बनेगा सरकार पे. और शीघ्र ही दवाब इतना अधिक हो जाएगा के चिदंबरम जी की छाती फटने को हो आएगी. उनकी लुंगी गीली हो जायेगी आंसू पोछते पोछते. फिर उन्हें कार्यवाही करनी ही पड़ेगी. जीत आपके विश्वाश की होगी. आप महान हो सर जी.

    आपके अगले लेख के इंतज़ार में.

    आपका
    जातक

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  • भारतीय़ नागरिक says:

    अमिताभ जी, आपने बिल्कुल ठीक लिखा है. बाकी कश्मीर के मामले में कुछ लोगों को आदत है कि सही बात को गले से नीचे उतार कर हजम नहीं कर पाते इसलिये फिर एक मात्र रास्ता बचता है उसे निकालने का. जिसे देखो भारत और भारतीयों को ही पाठ पढाने लगता है. इन तथाकथित आजादी के इच्छुकों के किन बाप-दादाओं ने अंग्रेजों से मुक्ति हेतु अपना शीश चढ़ाया. इतनी ही चिन्ता है मानवाधिकारों की, तो चीन जायें, बांग्लादेश, पाकिस्तान जायें, मलेशिया जायें, वहां के धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करें. उन पर होने वाले अत्याचारों की तुलना में यहां तो कुछ भी नहीं, यदि सेना द्वारा देश की रक्षा को अत्याचार की श्रेणी में रखा जाये तो..

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