आईपीएस दोयम दर्जे की नौकरी

के. विक्रम राव
के. विक्रम राव
: इसीलिए सेलेक्शन के बावजूद इस नौकरी को करना मैंने उचित नहीं समझा-  के. विक्रम राव : इंटरव्यू : के. विक्रम राव आज पत्रकारिता क्षेत्र में एक स्तम्भ बन गए हैं. ख़ास कर पत्रकारों के हक़ की लड़ाई को लेकर. प्रख्यात पत्रकार और नेशनल हेराल्ड के पूर्व सम्पादक के रामाराव के लड़के विक्रम राव स्वयं भी एक लब्धप्रतिष्ठ पत्रकार रहे हैं. पर अब मूल रूप से स्वतंत्र पत्रकारिता के साथ ही इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किग जर्नलिस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में पूरे देश के पत्रकारों के विभिन्न हितों के लिए संघर्षरत हैं.

पिछले दिनों उनसे पीपुल्स फोरम, लखनऊ की संपादक नूतन ठाकुर ने कई मुद्दों पर बातचीत की. पेश है के. विक्रम राव से हुई बातचीत के कुछ महत्वपूर्ण अंश-

-सबसे पहले अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के विषय में बताएं?

–हम लोग मूल रूप से आंध्र प्रदेश के रहने वाले हैं. मेरे पिताजी नेशनल हेराल्ड के सम्पादक रह चुके थे. स्वतन्त्रता संग्राम में भी काफी बढ़-चढ़ कर हिस्सा किया था. इस क्रम में अंग्रेजी सरकार का विरोध करने की वजह से कई बार जेल भी गए. उनकी मुलाकात पंडित नेहरु के साथ हुई और वह मित्रता में बदल गयी. उनके काफी करीबी रहे.

-अपने प्रारम्भिक जीवन के विषय में कुछ बताएं?

–शुरुआती जीवन काफी संघर्षों भरा रहा. कई बार पिता के जेल जाने का असर पूरे परिवार पर पड़ा, खास कर के मुझ पर कुछ ज्यादा ही. अंग्रेजों के प्रति मन में गहरा असंतोष और गुस्से का भाव बढ़ता ही चला गया. मुझे लगता था कि बिना किसी गलती के ही मेरे पिता को और पूरे देश के लोगों को प्रताड़ित किया जा रहा है. मुझे अक्सर लगता अपना वाजिब हक़ माँगने का सबको अधिकार है फिर हक़ मांगने पर सज़ा क्यूँ?

-पत्रकारिता के क्षेत्र में कैसे आना हुआ?

–मैं तो वास्तव में आईएएस अधिकारी बनाना चाहता था और इसके लिए आईएएस की परीक्षा भी दी लेकिन परीक्षा में थोड़े कम नंबर आये और उसमें सेलेक्शन नहीं हो पाया. यहां तक कि आईएफ़एस में भी नहीं हुआ. इसकी जगह आईपीएस में सेलेक्शन हुआ. मैं इसमें जाना नहीं चाहता था. वजह यह थी कि आईएएस की तुलना में मैं इसे दोयम दर्जे की नौकरी समझता था और आज भी ऐसा ही मानता हूं. एक तो समाज में इसका कोई विशेष सम्मान नहीं है और दूसरे इसमें ज्यादातर गलत काम ही करने पड़ते हैं.

-तो फिर आपने क्या किया?

–उसी समय मुझे टाईम्स ऑफ इंडिया का भी ऑफर आया था और मैंने वहां जाना बेहतर समझा. आज भी मुझे लगता है कि मैंने कोई गलत निर्णय नहीं किया था. इस क्षेत्र में काम करने के जितने अवसर हैं वह अन्यत्र मुश्किल ही हैं. उसके बाद कई अखबारों के लिए काम किया. एक समय ऐसा आया जब मुझे लगाने लगा कि अब किसी एक अखबार से बंध कर रहने के स्थान पर फ्रीलांस काम किया जाए. अब तो लगभग ढाई सौ अखबारों के लिए मैं नियमित तौर पर लिखता हूँ.

-तबकी और अबकी पत्रकारिता में क्या अंतर महसूस करते हैं?

–अंतर तो कई सारे हैं. पहले जो कुछ सीखना होता था वह खुद या सीनियर से ही जानना, समझना और सीखना पड़ता था. अब तो इसके लिए बाकायदा पढाई होने लगी है और कई सारे लड़के इन संस्थाओं के जरिये आते हैं. हाँ लेकिन इतना जरूर है कि जब ये वास्तविक रूप से इस क्षेत्र में आते हैं तो सीनियरों द्वारा इन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता है. उन्हें काम करने के लिए एक बड़े तालाब में बिलकुल अकेला छोड़ दिया जाता है. इसकी वजह से कईयों की प्रतिभा उतनी नहीं निखर पाती जितना सही दिशानिर्देशन मिलने पर निखरती.

एक बार मैं ऐसे ही एक पत्रकारिता के कालेज में लेक्चर देने गया था तो मैंने उन छात्रों से आईएएस, आईपीएस या डॉक्टर, इंजीनियर ना बन कर इसी क्षेत्र को चुनने का कारण पूछा तो मुझे जो जवाब मिला, उसमे मुझे गर्व और घमंड के ही भाव ज्यादा दिखाई दिए. कइयों का कहना था कि इसमें हम राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री से भी सीधे सवाल पूछ सकते हैं. मुझे उनकी सोच सही नहीं लगी कि महज सवाल पूछने के लिए ही वे पत्रकार बनाना चाहते हैं. उन लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के तो और भी कई जरिये हो सकते हैं. केवल सत्ता से निकटता बढाने के लिए पत्रकारिता को जरिया बनाना उचित नहीं है.

-क्या आपको लगता है कि आज की पत्रकारिता में पहले की तुलना में गिरावट आई है?

–बिलकुल नहीं आई हो, ऐसा तो नहीं कह सकते हैं लेकिन इतना जरूर है कि बड़े-बड़े बिजनेस हाउस के अखबार मालिक होने के कारण कई बार ये अखबार स्वतंत्र रूप से अपनी बात नहीं कह पाते. उनके हितों और स्वार्थों का भी ध्यान रखने की मजबूरी हो जाती है. जैसे पहले अखबारों में विज्ञापन होते थे, वैसे अब जबसे पेड न्यूज़ का प्रचलन हो गया हैं तबसे ख़बरों ने भी विज्ञापन का काम करना शुरू कर दिया है. पेड न्यूज़ से ज्यादा घृणित बात पत्रकारिता के लिए और कुछ भी नहीं हो सकती. कई बार पत्रकारों को ऐसा करने की मजबूरी हो जाती है.

-आप पत्रकारों के यूनियन से कैसे जुड़े?

–पत्रकारिता में एक बहुत लम्बे समय तक रहने के बाद मुझे ऐसा अनुभव होने लगा कि बेचारे पत्रकार सारी दुनिया के लोगों के लिए हक़ और इन्साफ की आवाज उठाते हैं लेकिन उनकी आवाज कहीं ना कहीं दबी रह जाती है. मैंने देखा कि कई स्तरों पर इन पत्रकार साथियों का शोषण होता है. मैं इन बातों से बहुत अधिक आहत था और शुरू से ही इन लोगों के साथ मिल कर इनके लिए कुछ करना चाहता था. इन्ही तमाम बातों ने मुझे पत्रकार यूनियन में धकेल दिया और फिर धीरे-धीरे यह मेरे जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन गया. आज तो मैं अपने आप को जर्नलिस्ट एसोशिएयेशन के बगैर कल्पना भी नहीं कर सकता.

-क्या पत्रकारों में भी आर्थिक रूप से बड़े और छोटे पत्रकार की दो बिरादरियां हो गयी हैं?

–हाँ, यह आपने बहुत ही अच्छा सवाल पूछा. ऐसा निश्चित रूप से है. अखबारों में कांट्रैक्ट पर भर्तियाँ हो रही हैं उससे सबसे ज्यादा शोषण इन पत्रकारों का ही हो रहा है. एक तो इन्हें काफी कम पैसे दिए जाते हैं साथ ही जब भी अखबार मालिक चाहें इन्हें नौकरी से बाहर निकाल दिया जाता है. काम करने के पूरे पैसे नहीं मिलते. इन सारी बातों को ध्यान में रखते हुए पत्रकार साथियों के लिए हम लोगों ने कई सारी मांगें भी रखी हैं और इन्हें सभी उपयुक्त फोरम पर भी उठाया है. हम लोगों का यह प्रयास है कि इस तरह की वेतन विसंगतियों, पत्रकारों के अखबार मालिकों द्वारा शोषण और पत्रकारों के साथ किये जा रहे अनुचित व्यवहार के सम्बन्ध में सभी लोगों को जागरूक करते हुए पूरे देश में एक ऐसा माहौल बनाया जाए जिसमे इन लोगों का हक़ दिलवाने में हर तरह से मदद मिल सके.

हम ख़ास कर ये मांग रहे हैं कि छठे वेतन आयोग की संस्तुतियों को आधार मानते हुए पत्रकारों का भी वेतन तय किया जाये और सारे अखबारों द्वारा इसका पूरा अनुपालन भी किया जाए. साथ यी यह भी मांग हम लोगों ने रखी है कि इलेक्ट्रौनिक मीडिया को भी कायदे-क़ानून के दायरे में लाया जाए और इनके द्वारा ख़बरों को दिखाने के लिए भी दिशानिर्देश और मानक तय हों.

-आज के कई पत्रकार यह बात कहते सुने गए है कि ख़बरें निकालने में शराब की भी अपनी एक अहम् भूमिका होती है. इस बारे में आपके क्या विचार हैं?

–(हंसी के साथ) नहीं, ऐसा तो नहीं है. कम से कम मैं तो इसे बिलकुल नहीं मानता. मैं शराब, सिगरेट वगैरह से कोसों दूर हूँ और ना ही मुझे खबर निकालने के लिए इसकी जरूरत महसूस हुई. इतना जरूर है कि मैंने इसकी वजह से कई युवा पत्रकार साथियों को लीवर सिरोसिस और ऐसी ही तमाम बीमारियों से ग्रसित हो युवावस्था में ही मरते देखा है. इसीलिए मैं तो हमेशा सबों को इससे दूर रहने की ही सलाह देता हूँ.

-आपके पिताजी नेहरु के करीब रहे हैं और आप जयप्रकाश नारायण के. दोनों में आपकी विचारधारा किससे अधिक मिलती है?

–पिताजी भले ही नेहरूजी के करीब रहे हों पर मैं तो शुरू से ही उनकी नीतियों का धुर विरोधी रहा हूँ. मेरा ऐसा मानना है कि उनकी कई सारी नीतियों का खामियाजा आज हमारे देश को भुगतना पड़ रहा है. जैसे अभी हाल ही में बिहार में होने वाले चुनाव में मैं देख रहा था कि लगभग सभी विधायकों और मंत्रियों के बेटों को चुनाव में टिकट दिए गए हैं. आम आदमी के लिए तो कोई जगह बची ही नहीं है. इसकी शुरुआत नेहरु ने इंदिरा जी को उत्तराधिकार देने की परम्परा से नहीं की होती तो आज शायद ऐसी स्थिति नहीं होती. कॉमनवेल्थ गेम्स को ही देख लीजिये, जहां एक तरफ इस खेल के नाम पर करोड़ों का भ्रष्टाचार हो रहा है वहीँ आम आदमी को जीवन-यापन के लिए भारी संघर्ष करना पड़ रहा है.

-कुछ बातें घर परिवार की. आपकी पत्नी रेलवे सर्विस में रही हैं और आप पत्रकारिता में. अलग अलग क्षेत्रों में रहने का आपके काम पर कोई विपरीत प्रभाव पड़ा क्या?

–मुझ पर तो नहीं, हाँ मेरी पत्नी को मेरी वजह से अपनी नौकरी में कई मुश्किलों और विरोधों का सामना करना पड़ा. कई जगह उनके तबादले मात्र मेरे कारण कर दिए गए. जब इमरजेंसी में मैं जेल में था तो उन्हें पाकिस्तान बोर्डर के पास मात्र मेरी नाराजगी के चलते भेज दिया गया लेकिन इन तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने मेरा पूरा साथ दिया.

-हर पिता चाहता है कि उसकी संतान उसके काम को आगे बढ़ाये. आप भी ऐसा चाहते थे?

–मेरे दो लड़के हैं जिनमे कम से कम एक लड़का इस क्षेत्र में आये ऐसा मैं जरूर चाहता था. लेकिन बच्चों ने मेरी बात नहीं मानी और अपने मन मुताबिक़ अलग-अलग राह चुनी.

-क्या वे लोग पत्रकारिता के प्रति किसी गलत धारणा के कारण यहाँ नहीं आये?

–नहीं ऐसा नहीं है. वैसे भी दूसरी नौकरी तो एक से पांच की होती है पर पत्रकारिता में तो रोज-रोज ही एक नयी चुनौती सामने होती है. काम के लिहाज से हर दिन काफी तनावपूर्ण होता है. शायद नए लड़के उतना तनाव और उतनी परेशानियाँ पसंद नहीं करते हों.

-युवा पत्रकारों को कोई सन्देश देना चाहेंगे?

–मैं तो बस इतना ही कहूँगा कि वे अपना सार्वजनिक और पारिवारिक जीवन उतना ही साफ़-सुथरा रखें जिसके बारे में वे अपने  कलम के माध्यम से लिखते-पढ़ते रहते हैं. उनके वास्तविक जीवन और उनकी लेखनी में कोई विरोधाभास न हो. बुराइयों से दूर रहें और परिवार के लोगों के प्रति आचरण ठीक रखें. जो वहां ईमानदारी से रहेगा वही अच्छा और सच्चा पत्रकार भी होगा.

Comments on “आईपीएस दोयम दर्जे की नौकरी

  • hahahahahah…bas bhi karo Vikram Rao..Aapki Imaandaari ke kisse yahin bata dun kya sabko..?..aap jaise log jab ye sab batein kehte hain toh hansi rukti nahi aa hi jati hai…waah vikram rao…hahahahahahah.

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  • Bahut hi Inspired karne wali personality hai RAO SAHAB ! Bahut hi prabhawit hua hu . Itne achche vyakti se mulaaqaat ke liye SAADHUWAAD !

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  • Raj Kumar Sahu, Janjgri, Chhattisgarh says:

    k. vikrama rao sir,
    Aaj patrakarita mein bhale hi glamer chhaya ho, phir bhi is kshetra mein bahut kam hi yuva chunauti swikaar karte hain. jaisa ki aapko kuch prashikshu chhatron ne mahaj unche padon par baithe logon ke damkham ke sath kadam taal karne ki baat kahi hai, yah sab karne vaale patrakarita mein unche mukam hasil nahin karte. patrakarita mein vichaarshil tatha adhyayanshil jyada saphal ho sakte hain.
    AAPKA INTEVIEW PADHKAR KAI BAATEN SIKHNE KO MILI. INTERVIEW LENE VAALE NUTAN THAKUR JI KO BHI BADHAI. SATH HI YASHWANT JI KO BHI, KYONKI NAYI PIDHI KE PATRAKARON KO AISI KUCH SIKH KI JARURART BANI HUI HAI.

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  • एस. के. नागवंशी says:

    यशवंत जी सादर प्रणाम, परम आदरणीय के. विक्रम राव का साक्षात्कार पढ़ने का सौभाग्य भडास पर मिला. आपको बहुत बहुत धन्यवाद. भाई साहब आपसे और नूतन ठाकुर जी से निवेदन है की आगे भविष्य में जब कभी भी आदरणीय के.विक्रम रावजी से मुलाकात हो तो एक निवेदन यह अवश्य करियेगा की चैनल की पत्रकारिता करने वाले लोगो को भी अपना मार्ग दर्शन देवे. उम्मीद है की अगर आदरणीय के.विक्रम राव जी कुछ पहल कर देते है तो छोटे शहरों में चैनल की पत्रकारिता करने वालो की कारगुजारी से पत्रकारिता बदनाम होने से बच जाएगी. चैनलों के स्ट्रिंगर अपनी कार्य प्रणाली से पत्रकारिता पर जो काला धब्बा लगा देते है उस पर सफाई देते नहीं बनता. आम समाज का आदमी सभी पत्रकारों को एक ही तरह समझता है.
    एस. के. नागवंशी
    धन्यवाद

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  • drshyamgupta says:

    बहुत अच्छा इन्टर्व्यू—–के विक्रम राव की चिकित्सक पत्नी मेरी कुलीग हैं। दोनों ही पति-पत्नी अत्यन्त ही सुलझे हुए, सरल स्वभाव के व्यक्तित्व हैं एवं अपने अपने कार्य में पूर्ण सक्षम। विक्रम राव जी से मेरे अच्छे मित्रवत सम्बन्ध हैं पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उनकी अच्छी ख्याति है।

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  • patrakaro ke liye sangharsh ke naam par aap jo bhee kar rahe hai rao sahab, uska koi matlab nahi. chhote shahron me patrakaar muft me kaam karne ko majboor hai. patrakaar aur dalal ko samanarthi mana jana laga hai. lekin aap ki or se patrakarita ke pavitrata ko kayam rakhne ka koi prayas nahi dikhta. aap sangathan chala rahe hai lekin us sangathan se aise log hee jyada sankhya me jude hai jo dalal kism ke hai. imandaar aur karmath patrakaron ko badhava dene aur haramkhoro ko field se hatane kee muhim chhediye. sirf sammelan aur goshthee ke madhyam se bayanbaazi achchhi nahi lagti. ummeed hai ……..aap meri baton ko serious lenge.

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  • kya baat hai yashvantji kya aap nai jante krvikram rao ke bare me plz aise logo ka mahimamandan na kiya kijiye koi zaruri nai purana reporter dalla nai hota kuch to khayaal kijiye sir aap log to saab jante hai fir ye kya hai.

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