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इस सिस्टम में रांग फान्ट की तरह थे अनिल सिन्हा

: अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन का पहला आयोजन संपन्न : जनसांस्कृतिक मूल्यों के लिए काम करेगा अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन- वीरेन डंगवाल : भूमंडलीकरण के खिलाफ संघर्ष करने वालों का संबल बनेगा अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन : हर साल दिया जाएगा अनिल सिन्हा स्मृति सम्मान : अनिल के व्यक्तित्व में  संघर्ष की अदम्य इच्छाशक्ति थी- आनंद स्वरूप वर्मा :

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ईमानदारी के साथ अनवरत अपने विचारों और मूल्यों के साथ सक्रिय रहने वाले शख्स कभी हमख्याल लोगों द्वारा विस्मृत नहीं किये जाते, इसका साक्ष्य मिला 23 जुलाई की शाम को अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन की ओर से ललित कला अकादमी के कौस्तुभ सभागार में आयोजित पहले आयोजन में, जिसमें अनिल सिन्हा के परिजनों और जसम-सीपीआई (एमएल) के साथियों के साथ-साथ वाम-लोकतांत्रिक साहित्यिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक जगत के बड़े दायरे के लोग उमड़ पड़े। लखनऊ जहां उनके जीवन का लंबा समय गुजरा, वहां से जसम के उनके कई महत्वपूर्ण साथी इस आयोजन में मौजूद थे। उनकी बेटी रितु ने कहा कि फाउंडेशनों की भीड़ में यह अलग किस्म का फाउंडेशन होगा, जो व्यक्ति तक सिमटा नहीं रहेगा, बल्कि उन मूल्यों, सिद्धांतों और संघर्षशील चेतना को आगे बढ़ाएगा, जो अनिल सिन्हा की जिंदगी का मकसद था।

साहित्य-कला-पत्रकारिता की दुनिया में मौजूद अजीब से बनावटीपन और सरोकारों की कमी का जिक्र करते हुए रितु ने अनिल सिन्हा की एक कहानी के शब्दों के हवाले से कहा कि पिछले बीस-पच्चीस साल में भारत में एक ऐसा समाज उभरा है, जो भूमंडलीकरण का शिकार है। बाजार की शक्लें परिवार के भीतर तक पैठ कर चुकी हैं, कलाकार, पत्रकार, साहित्यकार भी कहीं न कहीं इन परिस्थितियों से जूझ रहे हैं, अनिल सिन्हा मेमेरियल फाउंडेशन की नींव ऐसे ही लोगों को संबल देने के लिए डाली गई है। रितु ने बताया कि हर साल लखनऊ में फाउंडेशन की तरफ से एक आयोजन होगा, जिसमें अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान होगा और एक संगोष्ठी होगी तथा उनके नाम पर एक सम्मान दिया जाएगा।

इस मौके पर अनिल सिन्हा के दूसरे कहानी संग्रह ‘एक पीली दोपहर का किस्सा’ का लोकार्पण मशहूर कवि वीरेन डंगवाल ने किया। अनिल सिन्हा के साथ दोस्ती के अपने लंबे अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि वे हमेशा विनम्र और सहज रहे। उनकी तरह लो प्रोफाइल रहकर गंभीरता के साथ काम करने वालों को हिंदी साहित्य समाज प्रायः वह सम्मान नहीं देता, जिसे वे डिजर्व करते हैं। कला-साहित्य की कई विधाओं में उनकी रुचि का जिक्र करते हुए वीरेन डंगवाल ने कहा कि अनिल एक संजीदा पाठक भी थे। जसम की स्थापना में उनकी भूमिका को याद करते हुए उन्होंने उम्मीद जाहिर की, कि फाउंडेशन उन्हीं जन सांस्कृतिक मूल्यों के लिए काम करेगा, जिसके लिए जसम की स्थापना हुई थी।

चर्चित कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि जीवन के ऐसे निर्माणाधीन दौर में अनिल सिन्हा से उनकी दोस्ती हुई, जिस दौर में बनी दोस्ती हमेशा कायम रहती है। लखनऊ में अमृत प्रभात अखबार में काम करने के दौरान सहकर्मी और साथी के बतौर अजय सिंह, मोहन थपलियाल और सुभाष धुलिया को भी उन्होंने याद किया। उन्होंने कहा कि हमलोगों के नाम

कामरेड अनिल सिन्हा की एक फाइल फोटो

कामरेड अनिल सिन्हा की एक फाइल फोटो

व्यक्तिवाचक नहीं थे, हम भाववाचक संज्ञाओं की तरह रहा करते थे। मंगलेश डबराल ने कहा कि बिना कोई शिकायत किए अनिल सिन्हा जिस तरीके से अपने पारिवारिक जरूरतों और वैचारिक मकसद के लिए पूरे दमखम के साथ संघर्ष करते थे, वह उन्हें आकर्षित करता था।

सभागार में अनिल सिन्हा की पत्नी आशा सिन्हा भी मौजूद थीं। मंगलेश डबराल ने कहा कि आशा जी और अनिल जी की जोड़ी बहुत आदर्श जोड़ी मानी जाती थी। अनिल सिन्हा के साथ आशा सिन्हा ने भी बहुत संघर्ष किया। उन दोनों में अदभुत तालमेल था। आर्थिक और वैचारिक संघर्ष के साथ-साथ ही एक पिता के बतौर बच्चों को सुशिक्षित और योग्य नागरिक बनाने में अनिल सिन्हा की जो भूमिका थी, उसे भी मंगलेश डबराल ने याद किया। मंगलेश डबराल ने फोटोग्राफी के उनके शौक और कला-संबधी उनके लेखन का खास तौर पर जिक्र किया और कहा कि उनके कलासंबधी लेखन की पुस्तक जरूर प्रकाशित की जानी चाहिए। विस्तार से लिखने की अनिल सिन्हा की आदत की भी उन्होंने चर्चा की, जिसके कारण उनके लेख प्रायः लंबे हो जाया करते थे।

समकालीन तीसरी दुनिया के संपादक आनंदस्वरूप वर्मा ने सत्तर के दशक से शुरू हुई अनिल सिन्हा के साथ अपनी दोस्ती को याद करते हुए कहा कि उनके विचारों में जबर्दस्त दृढ़ता और व्यवहार में लचीलापन था। साहित्य-संस्कृति और राजनीतिक-सामाजिक समस्याओं से संबंधित उनके लेखन की तो जानकारी मिल जाती है, लेकिन मूलतः वे पत्रकार थे। उन्होंने 80 के दशक में सरकार और पुलिस द्वारा एक जनपक्षीय पत्रकार के दमन और हत्या के विरुद्ध भडके जनाक्रोश और स्कूटर इंडिया के कर्मचारियों के आंदोलन की पृष्ठभूमि में पत्रकारों और श्रमिकों के बीच एकता की जरूरत महसूस की थी। नेता, पुलिस, ब्यरोक्रेसी और दलाल पत्रकारों के नेक्सस के खिलाफ उन्होंने जनपक्षीय पत्रकारों को संगठित करने की पहल भी की।

मीडिया पर ग्लोबलाइजेशन का जो खतरनाक असर हुआ, खास तौर से उसके बारे में उन्होंने काफी लिखा। जब 93 में नवभारत टाइम्स से 92 पत्रकारों को हटाया गया, तब उसी बिल्डिंग से निकलने वाला टाइम्स आफ इंडिया एक दिन के लिए भी बंद नहीं किया गया। कर्मचारियों में कोई हलचल नहीं हुई, एक दिन भी उन्होंने अपना काम बंद नहीं किया। होना तो यह चाहिए था कि लखनऊ के सारे अखबार कम से कम एक दिन के लिए बंद कर दिए जाते। इसे लेकर अनिल सिन्हा ने लेख भी लिखे। उन्होंने लिखा कि इस घटना ने यह भी सिद्ध किया है कि वर्तमान पत्रकार संगठन और ट्रेड यूनियन किस तरह विभाजित, असंगठित और अपने अंतर्विरोधों का शिकार हैं। अखबारों में फिर से नए रूप में ट्रेड यूनियन का गठन करना चाहिए। बहुत जल्दी चीजों को समझ लेना और दूर तक देखना अनिल सिन्हा की खूबी थी।

नितांत निजी स्वार्थों के लिए निरतंर श्रमिक विरोधी होती पत्रकारिता के प्रति वे बेहद चिंतित रहते थे। वे देख रहे थे कि कि किस तरह हिंदी पत्रकारिता पर लहराने वाले संकट के पीछे दलाल चरित्र के संपादक और अखबार मालिक जिम्मेवार हैं। वे दलाल लोग अपनी गरिमा व काम की महत्ता को ताक पर रखकर सरकारी अधिकारियों और सरकार के चाकर बन गए हैं। नवभारत टाइम्स से अलग होने के बाद उन्होंने एक फ्रीलांसर की तरह काम किया। दरअसल इस सिस्टम में वे रांग फान्ट की तरह थे।

आनंद स्वरूप वर्मा ने कहा कि अनिल चाहे नौकरी में रहे या नौकरी से अलग हुए, उनके चेहरे पर हमेशा विनम्रता और लाचारगी-सी रहती थी, जिसे देखकर दया आती थी, पर उनके व्यक्तित्व में बेचारगी कभी नहीं देखी गई, उनमें संघर्ष की अदम्य इच्छाशक्ति थी। उनका हमारे बीच न होना, एक दुखद अनुभूति है, पर यह देखकर अच्छा लग रहा है कि इतने सारे लोग अनिल को याद करने इकट्ठे हुए हैं।

निश्चित तौर पर वे सब उस पत्रकारिता, उस विचार और उस साहित्य साधना को आगे ले जाएंगे, जो संघर्ष में विश्वास बनाना चाहते हैं या सामाजिक बदलाव में अपनी भूमिका तय करना चाहते हैं। इस आयोजन में इरफान ने अपनी सधी हुई आवाज में अनिल सिन्हा के ‘एक पीली दोपहर का किस्सा’ संग्रह की एक कहानी ‘गली रामकली’ का पाठ किया। कुछ तो इरफान की आवाज का जादू था और कुछ कहानीकार की उस निगाह का असर जिसमें एक दलित मेहनतकश महिला के प्रति निर्मित होते सामाजिक सम्मान के बोध की बारीक दास्तान रची गई है, उसने कुछ समय के लिए श्रोताओं को अपने मुहल्लों और कस्बों की दुनिया में पहुंचा दिया।

बेहतर दुनिया के लिए ख्वाब और उन ख्वाबों के लिए होने वाले संघर्षों को अपनी चित्रकला में जगह देने वाले एक विलक्षण कलाकार थे चित्त प्रसाद, जिनकी चित्रकला के बारे में पिछले मार्च माह में गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में चित्रकार-कथाकार अशोक भौमिक ने पहला अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान दिया था। वही व्याख्यान-प्रदर्शन उन्होंने इस आयोजन में भी पेश किया। अपनी कला-समीक्षाओं में अनिल सिन्हा की जितनी गहरी निगाह चित्रकारों के सामाजिक सरोकारों पर रहती थी, उसी परंपरा को मानो अशोक भौमिक ने बड़े प्रभावशाली तरीके से मूर्त किया। कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चले तेलंगाना, तेभागा जैसे क्रांतिकारी किसान आंदोलनों और नाविक विद्रोह पर बनाए गए चित्रों की राजनीतिक पृष्ठभूमि, रचना-प्रक्रिया और उनकी विशेषताओं को देखना-सुनना खुद को आज के दौर में राजनैतिक-सांस्कृतिक ऊर्जा से लैस करने के समान था।

आयोजन की अध्यक्षता कर रहे प्रो. मैनेजर पांडेय इस व्याख्यान-प्रदर्शन से बेहद प्रभावित दिखे। उन्होंने चित्त प्रसाद की सारी व्यापकता, गहराई और नवीनता को सहज-सरल और संप्रेषणीय ढंग सामने रखने के लिए अशोक भौमिक की तारीफ की। अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन के बारे में प्रो. पांडेय ने दो सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि हिंदी और अंग्रेजी में अनिल सिन्हा का जो लेखन इधर-उधर बिखरा हुआ है, उसे एक क्रम में व्यवस्थित करके ठीक से एक जगह रखा जाना चाहिए। उन्होने कहानी, आलोचना, पत्रकारिता के साथ-साथ राजनीतिक-सामाजिक विचारों के क्षेत्र में जो काम किया है, उसके बारे में व्यवस्थित बात होनी चाहिए तथा लेख लिखे जाने चाहिए। संचालन युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने किया।

आयोजन में इब्बार रब्बी, मुरली मनोहर प्रसाद, रेखा अवस्थी, मदन कश्यप, नीलाभ, विमल कुमार, योगेंद्र आहूजा, रंजीत वर्मा, कुमार मुकुल, भाषा सिंह, गोपाल प्रधान, कविता कृष्णन, संदीप, असलम, कनिका, उमा, मनोज सिंह, अशोक चैधरी, मुकुल सरल, कौशल किशोर, भगवान स्वरूप कटियार, सुभाषचंद्र कुशवाहा, निधि, अनुराग, कौशलेश आदि भी मौजूद थे। अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन का ईमेल [email protected] है।

सुधीर सुमन की रिपोर्ट

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0 Comments

  1. anchalsinha

    July 26, 2011 at 6:01 am

    Yah mera durbhagya hi kaha jaayega ki mai Unki mrityu ke samay bhi nahin tha aur na aise aayojan me. Videsh ki naukari ka yahi sabse dukhad Chhan hota hai. Kuchh log is majboori ko samajh paate hain, par jyadatar log nahiin.

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