एक आईपीएस भी है अन्याय का शिकार

: पत्नी लिखेंगी अपने पुलिस अधिकारी पति के संघर्ष की कहानी : पूरी कहानी किताब के रूप में दो महीने में हाजिर होगी : नाम होगा- “अमिताभ ठाकुर स्टडी लीव केस” : बात बहुत छोटी सी थी. और आज भी उतनी बड़ी नहीं. मसला मात्र छुट्टी का था. लेकिन कहते हैं ना कि बात निकले तो बहुत दूर तलक जायेगी. इसी तरह यह बात भी जब शुरू हुई तो बस बढती ही चली गयी. और अब तो इस मामले में छह-छह केस हो चुके हैं.

इनमें दो हाई कोर्ट में और चार सेंट्रल ऐडमिनिस्ट्रटिव ट्रिब्यूनल (कैट) में हैं. इनमे दो मामले अवमानना के भी शामिल हैं. लेकिन अभी यह कहानी चल ही रही है और ना जाने कब तक चलेगी. दो साल की छुट्टी में डेढ़ साल निकल गए बाकी भी निकल जाएगा. लेकिन अब मामला छुट्टी का नहीं रह गया है, मामका न्याय का और अधिकारों का हो गया है. और इस रूप में मैं इसे अब हार-जीत के ऊपर एक सिद्धांत की लड़ाई के रूप में देखती हूँ. ये बात जुडी है मेरे पति अमिताभ ठाकुर से, जो 1992 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं और उत्तर प्रदेश काडर के हैं,  वर्तमान में आईआईएम लखनऊ में अध्ययनरत हैं. ये कहानी तो तभी शुरू हो गयी थी जब उन्होंने अक्टूबर 2007  में पुलिस अधीक्षक (बलिया) की तैनाती के दौरान आईआईएम का कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (कैट) दिया था.

इसके बाद उनका चयन अप्रैल 2008 में आईआईएम में फेलो प्रोग्राम इन मैनेजमेंट में हो गया. 30 अप्रैल 2008 को आईआईएम लखनऊ में होने वाले इस कोर्स करने के लिए उन्होंने स्टडी लीव के लिए आवेदन किया था. अब अक्टूबर 2010 है. पर कई सारे कोर्ट केस और कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद अभी तक उन्हें अध्ययन अवकाश नहीं मिल सका है. यह हमारी ब्यूरोक्रेसी के दो पहलुओं को ख़ास कर के दिखाता है-

1. एक तो यह कि यहाँ हर नियम आदमी देख कर बनाया जाता है।

2. प्रशासन के बड़े अधिकारी भी अपनी खुद की दुर्भावनाओं और द्वेषों से ऊपर नहीं उठ पाते हैं।

मैं इस पूरी प्रक्रिया की शुरू से ही बहुत नजदीक की गवाह रही हूँ और चाहती हूँ कि अब ये सारी बातें जनता के सामने आ जाए ताकि इस मामले के कई छुए-अनछुए पहलु जमाने और समाज के सामने आ सके. मैं इस भागम-भाग और परेशानी का बहुत नजदीकी हिस्सा रही हूँ. कई-कई बार कोर्ट और ट्रिब्यूनल में मैं साथ गयी, यहाँ तक कि कई बार वकीलों तक ने इन्हें कह दिया कि इनको यहाँ मत आने दिया कीजिये पर मैं अपनी मर्जी से जाती थी क्योंकि मुझे लगता था कि इससे इनको बल मिलेगा. कोर्ट के कागज़ बनाने और उनको सही ढंग से प्रस्तुत करने में भी मेरी भूमिका रहती और देखते ही देखते मुझे ऐसा लगने लगा था कि अब मैं भी इनके मुकदमे के बारे में कमोबेश उतना ही जानती हूँ जितना ये.

इन सारी बातों के मद्देनज़र मैंने यह निर्णय किया कि मैं इस पूरी प्रक्रिया और स्टडी लीव केस पर एक पुस्तक लिखूं. पुस्तक का नाम  “अमिताभ ठाकुर स्टडी लीव केस” रखा है क्योंकि यह इस प्रकरण को पूरी तरह प्रकट कर पा रहा है. पूरी कोशिश है कि यह पुस्तक अधिकतम दो महीने के अन्दर आ जाए. अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में यह पुस्तक रहेगी. अंग्रेजी में पहले क्योंकि कि अंग्रेजी पुस्तक लिखने में कुछ सहूलियत हो रही है क्योंकि ज्यादातर कोर्ट केस के कागजात अंग्रेजी में है और इनका सीधा उपयोग अंग्रेजी में हो जा रहा है.

इस पुस्तक में कई ऐसे तथ्य प्रस्तुत होंगे और कोर्ट के ऐसे कागजात पाठकों के सामने लाये जायेंगे जो अपने आप में काफी हैरतंगेज़ होंगे और शासन, प्रशासन और न्यायिक प्रक्रिया को कुछ सोचने को मजबूर करेंगे.इस पुस्तक का उद्देश्य ही यथासंभव अपने पाठकों को इन तमाम जानी-अनजानी दुनिया से रू-ब-रू कराना है. पुस्तक आईआरडीएस संस्था द्वारा प्रकाशित की जायेगी.

डॉ नूतन ठाकुर

सम्पादक

पीपल’स फोरम

लखनऊ

Comments on “एक आईपीएस भी है अन्याय का शिकार

  • Pratul Joshi says:

    Nutanjee,vivah sanstha me mera vishwaas thoda kam hee hai kintu Amitabhjee kee jeevan sangini ke roop me aapko dekh ker bahut khushee ho rahi hai.mere to aaj tak yehi nahi samajh me aaya ki achche khaase padhe likhe naujwaan IAS,IPS service me jaaker kyon turat bhrast tantra ka hissa ban jaate hain.kajaal kee kothree ka asar saare sayano per itnee jaldee kaise ho jata hai.aapko hardik badhaee kee aap dono ne is tantra ke aage na jhuk ker samaj me ek adarsh prastut kiya hai.

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  • नूतन जी, आप पुस्तक छपवाने का कष्ट क्यों करती हैं. bhadas4media है न,इसी पे छाप दीजिये. अपने यशवंत जी को IRDS पुरस्कार दिया है, अब bhadas4media आपके और आप जैसे लोगो के बाप की हो गयी है. फोटो जर्नलिस्ट भाइयो को तो आप सलाम कर ही चुकी है, यशवंत जी का चरण वंदन कर किताब यहीं छाप दें.

    आप बेझिझक हो के bhadas4media पे लिखिए. सुबह आप लिखें, शाम को आप के पतिदेव लिखें. जो भी आपके बालमन, बालबुद्धि में आये उसे लिखें.हम कितना भी अपने बाल नोचें सर पीटें आप अपना लेखन जारी रखें. हम आपको ये अधिकार कदापि नहीं देते के आप अपनी मौलिकता से खिलवाड़ करें. आपको कसम है जो अपने कभी सोंच विचार कर के लिखा.

    ६ लाख हिट्स रोज़ होते हैं bhadas4media पे, ६०० लोग भी आपको बाल नोचते हुए पढ़ लें तो क्या बुरा है. मौलिक लेखन तो आपका मौलिक अधिकार है. हम पढ़ने से इनकार करें तो आप अनुच्छेद ३२ के तहत यशवंत जी से शिकायत कर देंगी के ये मेरा लिखा पढ़ नहीं रहे हैं, इन्हें पढ़वाओ. फिर हमे मजबूर होके पढ़ना पढ़ेगा. अब का करें…..

    चलो आप अपना मौलिक भौकालिक लेखन जारी रखो मैं डिस्पिरिन की टिकिया लेके आता हूँ.
    …….

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  • यशवंत says:

    जातक जी, आप जो भी हों लेकिन इतना तो आपके नाम व मेल आईडी से तय है कि आप ओरीजनल नाम पहचान के साथ नहीं हैं.
    मैं खुद इसलिए यह लिख रहा हूं क्योंकि मुझे यह लगने लगा है कि इस देश दुनिया के 99.99 प्रतिशत लोग हींग खाई मुर्गी की तरह होते हैं, जिनकी एक डांट में फट जाती है या फिर एक लोभ के प्रस्ताव में मुंह में पानी आ जाता है. अगर आप अपनी पहचान ही नहीं बता सकते तो फिर आपको आलोचना का अधिकार नहीं है. बिलकुल नहीं है. ये कमेंट सिर्फ इसलिए मैंने छाप दिया ताकि नूतन जी व अमिताभ जी, जो बिलकुल एक अलग किस्म के प्रोफेशन से रूबरू हो रहे हैं, यहां की चिरकुटई से दो चार हो लें. और इसलिए भी छापा कि जब मुझे बिना मकसद लोग गरियाते हैं और बिना मकसद गाली खाने के बावजूद उसे मैं छाप देता हूं और यह करने के बाद मेरे मन दिल दिमाग में लोगों के प्रति धारणा में कैसा नकारात्मक बदलाव आता है और जाने क्या क्या सैडिस्ट, सुसाइडल फीलिंग आती है, वह ये लोग समझ सकें. मैं तो इन दोनों बंदों को सलाम करता हूं कि ये एक भौकाली किस्म की जिंदगी से तौबा करके बेहद डेमोक्रेटिक किस्म के माध्यम की ओर आ रहे हैं लेकिन आप जैसे ….. और चिरकुट टाइप लोग कभी किसी भले आदमियों को इस माध्यम की ओर नहीं आने देंगे.
    तेरे अंदर बूता है तो गिना मुझे कितने आईपीएस नौकरी कार्यकाल के दौरान इस कदर सक्रिय होते हैं, अपने लिए खुलेआम जंग लड़ते हैं जैसा अमिताभ और उनकी संगिनी नूतन कर रही हैं.
    दरअसल, मुझे तुम जैसों के कमेंट छापने ही नहीं चाहिए, लेकिन मुझे लगता है कि अगर तुम लोग न होते तो हम लोगों के जीवन में उत्तेजना व रोमांच बिलकुल न होता, इसलिए मेरे प्रभु लगे रहो रे….
    एक पव्वा पी के लिख रहा हूं, इसलिए ज्यादा सच और ज्यादा खुला लिख रहा हूं, इसे पचा लेना.
    आभार
    यशवंत

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  • भारतीय़ नागरिक says:

    नूतन जी, आप अपने पति के अनुभवों को सार्वजनिक अवश्य करें. और भी बेहतर हो यदि इस मंच के जरिये करें..

    Reply
  • यशवंत जी, आपने हमारे साथ ज्यादती की है. शिकायत है आपसे. मैंने अपने कमेन्ट में किसी भी अशिस्ट शब्द का उपयोग नहीं किया और आपने एक पौवे में बह के मुझे “हरामी” की संज्ञा दे डाली. मैं कभी किसी के विषय में ऐसी धारणा नहीं रखता. माँ तो आदरणीय होती है, उसे क्या गाली देना. खैर, आप अपनी माँ जी के साथ हुए अन्याय को लेके व्यथित हैं, और हम ठहरे आपके शैदाई इसलिए सब भुला देते है. बस आप खुश रहे.

    बेहतर तो यही था के वे ही कमेन्ट करते, या उपेक्षा करते. पर सत्य तो यही है के नूतन जी बेवजह का लिखती है. बिना सर पैर का लिखती हैं, सिर्फ लिखने के लिए लिखती हैं, छपने के लिए लिखती हैं. और जब वो छप सकती हैं तो अपना तो हक उनसे ज्यादा बनता है. आपने शायद ध्यान न दिया हो, एक साल हो गया होगा, मैं हमेशा तो नहीं पर अक्सर जब मन करता है कमेन्ट करता हूँ. और क्यों न करूं आप जो ६ लाख का आंकड़ा गिनाते हैं उसमें मैं भी हूँ. आप कह दीजिये के भाई न आओ हमारी साईट पे, हम नहीं आएंगे. मैं कोई आपकी फील्ड का आदमी थोड़े हूँ, बस आपके लेखन का मुरीद हूँ इसलिए साईट पे आता हूँ और कमेन्ट करता हूँ. रही भाषा और कमेन्ट की बात तो आलोक तोमर से शिष्ट लिखता हूँ.

    अब आता हूँ इस ओर “तेरे अंदर बूता है तो गिना मुझे कितने आईपीएस नौकरी कार्यकाल के दौरान इस कदर सक्रिय होते हैं, अपने लिए खुलेआम जंग लड़ते हैं जैसा अमिताभ……” सक्रिय होने से आपका क्या अर्थ है मैं नहीं समझ पाया. RTI का काम आजकल हर हिन्दुस्तानी कर रहा है. IIM से पढ़ाई कोई व्यक्ति समाज के लिए नहीं करता, अपने लिए करता है. एक श्वान एक शूकर पूरी जिंदगी सक्रिय रहते है इससे किसी मूल्य का सृजन नहीं होता. अपने पेट का इंतज़ाम करना कोई महती कार्य नहीं है जिसका मंडन किया जाए.

    रही बात पव्वे की, तो यशवंत जी शराब का सच्चाई से कोई सम्बन्ध नहीं. सत्य तो सापेक्ष होता है, निरपेक्षता तो पशुता है. शराब के नशा हमे अतीतगामी बनता है, एक आग्रह होता है पीछे लौटने का जहां हम पशु थे. निरपेक्ष थे. ये एक दार्शनिक सत्य हो सकता है, पर दुनयावी सत्य नहीं. यहाँ सबके अपने अपने सत्य हैं. अर्धसत्य हैं. शायद आप ये कमेन्ट न छापें, जैसा अपने कहा. कोई बात नहीं. आपके प्रति हमारे लगाव में कोई बदलाव नहीं आएगा. बस एक गुज़ारिश है, बस उस शब्द को वापस ले लें. “हरामी”. जैसे आपको अपनी माता से प्यार है, वैसा ही मुझे भी अपनी माता से.

    आपका
    jaatak

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  • यशवंत says:

    जातक भइया, गलती का एहसास होते ही माफी मांग लेने में कोई बुराई नहीं. मैं गलत शब्द के इस्तेमाल के लिए माफी मांगता हूं.
    मेरा मकसद किसी मां को आहत करना बिलकुल नहीं था, जैसा कि आपने लिखा है. शायद मैं उस शब्द के कुत्सित अर्थ को बिना समझे लिख गया था.
    आपकी बातों से एक चीज तो साफ है कि आप बेहद संवेदनशील और दार्शनिक किस्म के इंसान हैं.
    फिर यह असंवेदनशीलता क्यों… ”नूतन जी बेवजह का लिखती है. बिना सर पैर का लिखती हैं, सिर्फ लिखने के लिए लिखती हैं, छपने के लिए लिखती हैं.”
    हम आप अपनी मां की पेट से लिखना सीखकर नहीं आए थे. लिखते लिखते सीखा था. लेखन कला पर मत जाइए, उसमें जो भाव, तथ्य, बात निहित है उसे पकड़िए. अगर गैर पत्रकार पेशे के लोग पत्रकारिता में सक्रिय हो रहे हैं, पूरे उत्साह के साथ लेखन कर रहे हैं तो उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए. इससे सड़ांध मार रही पत्रकारिता का ही भला होगा. और, नए लोगों को हम आप अवसर नहीं देंगे तो कौन देगा. क्या आपको लगता है कि परंपरागत मीडिया माध्यमों में सीखने लिखने की कहीं कोई गुंजाइश बची है.
    आपको याद होगा कि इसी तरह के प्रोत्साहन में मैं राहुल से गाली खा चुका हूं जिसके अतिरेक में आकर लिखे गए लेख को छापने के बाद दिल्ली स्पेशल सेल से बुलावा आया और जब बुलावा आने के बाद दुबारा वो लेख कायदे से पढ़ा तो लगा कि इसमें तो वाकई सिर्फ भावना है, लाजिक और फैक्ट्स बिलकुल नहीं है. राहुल को साथ ले गया, उसे बचाने और समझाने की कोशिश की. उसे बाद में लगा कि मैं फट्टू किस्म का आदमी हूं. खैर, हर आदमी अपने हिसाब से सोचने और अभिव्यक्त करने के लिए स्वतंत्र है. लेकिन उसकी गाली को भी मैंने प्रकाशित किया. ऐसा इसलिए नहीं कि मैं महान हूं. ऐसा इसलिए कि अगर कोई भावुकता की तीव्रता में अपने को एक्सप्रेस कर रहा है तो उसे सुना जाना चाहिए, भले वह बेहद कड़वा हो.
    रात डेढ़ बजे के बाद यह सब लिख रहा हूं, अपने पहले लिखे हुए कमेंट के आपत्तिजनक शब्द को हटा रहा हूं. उस आपत्तिजनक शब्द की जगह डैश डैश लगाकर छोड़ दिया है ताकि आप अपने हिसाब से कोई गाली चुन लें.
    नूतन की सक्रियता मुझे सम्मोहित करती है. उनके लिखे से जो आपको बच्चापना दिख रहा है, उसमें मुझे उनका निर्दोषभाव दिख रहा है. यही पत्रकारिता की पहली पहचान है कि आप आत्मा से ईमानदार हो के लिखें. और वो इसी भाव से लिखती हैं. तभी तो उनके एक लेख में मुझे हिदायत है कि यशवंत जी, आप मां के मुद्दे के अलावा मीडिया वालों के उत्पीड़न के बाकी दो मुद्दों को उतनी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं.
    तीसरी बात, नूतन जी का कई लिखा मेरे यहां पेंडिंग पड़ा हुआ है काफी दिनों से. अमिताभ जी का भी लिखा हुआ पेंडिंग पड़ा हुआ है. ऐसा नहीं है कि जो यहां लिखकर भेज देता है वही छप जाता है. करीब डेढ़ सौ मेल पेंडिंग में हैं जो मेरे आलस और रुटीन की खबरों की अधिकता के कारण पेंडिंग हैं.
    एक और बात, अगर प्रिंट और इलेक्ट्रानिक की तरह वेब मीडिया पर भी लोगों के लिखने और छपने में पहरेदारी होने लगे तो यह माध्यम अपनी मौलिकता और अपनी खासियत खो देगा और हममें यानि न्यू मीडिया व पुरानी में कोई फर्क न रहेगा.
    अमिताभ जी को लेकर आपने जो लिखा है उसका जवाब मैं नहीं दूंगा लेकिन सिर्फ इतना कहूंगा कि किसी के बारे में सुनकर कोई धारणा नहीं बना लेनी चाहिए. आदमी के अंदर हजार आदमी होता है. जिस एक दो पक्ष को पेश किया जाता है वह अंतिम और प्रामाणिक नहीं होता, वो केवल एक सामान्य सा पक्ष होता है, व्यक्तित्व के अन्य 999 पक्षों के बीच.
    आपकी एक बात से मैं बिलकुल सहमत हूं – ”एक श्वान एक शूकर पूरी जिंदगी सक्रिय रहते हैं, इससे किसी मूल्य का सृजन नहीं होता. अपने पेट का इंतज़ाम करना कोई महती कार्य नहीं है जिसका मंडन किया जाए.” आपकी इस बात में जो दार्शनिकता है वो मुझे यह सोचने को मजबूर कर रहा है कि आखिर किस दबाव में आप पहचान छुपाकर लिख रहे हैं, श्वान दबाव या शूकर दबाव में. कम से कम अमिताभ एक आईपीएस की नौकरी दांव पर लगाकर सिस्टम से लड़ रहे हैं, दीमक लगे अंधे बहरे सिस्टम के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, लोकतांत्रिक तरीके से, बहुत कुछ खुलेआम आकर लिख रहे हैं जिस पर उनके विभाग के चिरकुट नौकरशाहों को आपत्ति हो सकती है. तो फिर मैं कह रहा हूं कि मैं आपको अब भी धिक्कारूंगा कि आप अपने नाम से सामने ना आकर और बिना नाम पहचान के किसी के लेखन व चरित्र पर गंभीर सवाल उठाकर अपराध कर रहे हैं.
    एक और बात सच सच कह दूं. पत्रकारिता में हजारों बेहद बुद्धिजीवी किस्म के लोग हैं लेकिन उनकी पहचान के साथ सामने आकर लिखने में इतनी ज्यादा फटती है कि उनके जबर्दस्त बौद्धिक व तेवरवाले होने के बावजूद उनसे मुझे अब घिन है. वे फोन पर और कमेंट पर ढेर सारे अति बौद्धिक प्रलाप करेंगे लेकिन सामने आकर लिखने के नाम पर कन्नी काट जाएंगे क्योंकि उन्हें जाने कौन कौन सा महान पद पाना है और उन्हें भड़ास पर छप जाने से जाने क्या कुछ खो जाने का भय है. ऐसे में मैं यही मानता हूं कि भड़ास4मीडिया पर खुलकर जो लिखने वाले लोग हैं वो मेरे लिए उनसे ज्यादा साहसी और महान हैं जो छिपकर अपनी कथित महानता और दार्शनिकता का बखान करते हैं.
    मैं रोक रहा हूं खुद को. क्योंकि ऐसी बहसों का कोई अंत नहीं है. लेकिन आखिर में एक बार आपसे अनुरोध जरूर करूंगा कि नूतन के अब तक सब लिखे को फिर पढ़ें और उसमें कहीं आपको सच्ची और अच्छी आत्मा व मौलिक बात दिख जाए तो उनसे माफी मांग लीजिएगा, एक कमेंट लिखकर, अपने जातक नाम से ही.
    मैं आपकी संवेदनशीलता को सलाम करता हूं और अपनी भदेस अभिव्यक्ति के लिए माफी मांगता हूं, जिसने आपको आहत किया. आप जैसे लुके छिपे पाठक हमारे लिए पूंजी व थाती हैं. आप न होते तो हम क्यों होते.
    आभार
    यशवंत

    Reply
  • [b]@रही भाषा और कमेन्ट की बात तो आलोक तोमर से शिष्ट लिखता हूँ. [/b]…..जातक जी,हमें भी जबरन घसीट लिया.? मैं आपसे शिष्टता की प्रतियोगिता तो नहीं करना चाहता नगर आपका असली नाम बहुत विनम्रतापूर्वक जानना चाहता हूँ.छिप कर वार क्यों करते हो बन्धु ?

    Reply
  • Nutan Thakur says:

    जातक साहब,

    मैं अब एक बात जानती हूँ कि मैं अपनी तरह से लिखती रहूंगी, लगातार लिखती रहूंगी. हर उस बात पर लिखूंगी जो मुझे सही लगता है या जिसके प्रति मेरे मन में कोई अंदरूनी भावना जगती है. यदि यशवंत जी मेरा लिखा हुआ छापेंगे तो बहुत अच्छा, आपके डर के मारे या आपकी बात पढ़ कर छापना बंद कर दें तब भी अच्छा.
    क्योंकि मैं वही लिखती हूँ जिस पर मुझे लगता है कि मुझे चुप नहीं रहना चाहिए.
    इसके अलावा मैं अपनी लेखनी के बारे में कुछ और दावा न अब कर रही हूँ और ना मैंने कभी किया है.
    यदि मेरे लिखे से आपको तकलीफ पहुंचा हो तो भी मैं अपने आप को उसके लिए जिम्मेदार नहीं मानती. हाँ, इतना जरूर है कि आगे से कोशिश करुँगी कि ज्यादा ध्यान दे कर लिखूं जिससे आप को भी मेरा लिखा अच्छा लगने लगे.
    साथ ही मैं यशवंत जी का धन्यवाद देती हूँ कि इस लायक नहीं होते हुए भी मेरे और मेरे पति के प्रति इस तरह का अपनापन रखते हैं.

    नूतन ठाकुर ,
    लखनऊ

    Reply
  • आलोक तोमर says:

    [b]@रही भाषा और कमेन्ट की बात तो आलोक तोमर से शिष्ट लिखता हूँ…….शिष्टाचार के हे महान अवतार, नकली नाम वाले जातक, आपने याद किया. आप जैसे फर्जी इंसान से शिष्टाचार की प्रतियोगिता तो क्या करना? असली होने की बात करनी चाहिए. मां के नाम पर विलाप करने वाले जातक, आपको अमिताभ नूतन और मेरे अस्तित्व तक से आपत्ति है. बदतमीज़ तो खैर हो ही. असली नाम के साथ आते तो मेहरबानी होती. आप कुल मिला कर मूर्ख और कायर हैं और ब्रजलाल के चमचे होने का आभास देते हैं. अपन जैसे हैं , वैसे हैं मगर मां का दिया नाम इस्तेमाल करते हैं.आइन्दा नाम बता कर बात करना. वरना शिखंडियों को घर बैठना चाहिए. [/b]

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  • Gone through whole article and comments.. I must say that in India we love to throw stone at somebody who try to stand up for some cause or other.. Jatak bhai aap se..Please do not let yr personal grudge or conviction act as glaucoma on yr inner eyes where we feel clouded by the hatred and biases so much that we forget tyhe real issue in focus.. if amitabh and Nutanji are doing something even if u consider this as insignificant.. the real issue is actual empowerment and the result that an individual put through for collective strength of the society as a whole. .. Carry sir n ma’m

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  • Lets not get threatened by the intellect of others or our lack of it … we have been example of all these .. will contribute the terrible story of the residents and lack of faith in system being generated by the inept, biased and corrupt..

    Reply
  • Professor C.B. Sharma says:

    I have read the mails of Mr. & Ms. Thakur for a long time and also enquired from a few friends from Lucknow about them. They are not the ones who follow footprints but create footprints for others to follow. The fact that Mr. Amitabh Thakur got into IPS is enough testimony that he is amongst the intelelctual elites but I am slightly surprised to find that he has put himself in a situation where he needs to defend his case in public and in the law courts. I feel he would have done better service to many more people by managing his case and help many people in future not falling a prey to such a situation. Thakurs you are different, you are fighters I salute you. Very few people have the metal to do this. But I have a few practical suggestion to give on the basis of my own experiences:

    Don’t author the book yourself, ask a wellwisher to examine and write dispassionately as it is likely that you will flow in emotion and also blur the line between legal and personal issues;
    Listen to the suggestions of the friend you rely upon to write the case;
    Instead of writing the case-history make it a general case. A case of a common Indian as not many people would be interestd in one person. Make it a ‘fiction’.
    India was never so corrupt so you will find many more such cases so add afew more cases and then generalise.

    I can see both of you have refined tastes and obviously refined manners. You will take care of the laguage and the expressions. Jataks and the type would come in your way because they also have to survive and survive on others sweat. Where can they find better food than fighters like you.Don’t get disheartened by such comments but I must say God has perhaps sent both of you to do better service to manking so don’t just let the larger goal get lost in fighting a small case of one person. You must not come out of the system and also not spoil your objective of taking admission into IIM. Your course is most important at the moment. I hope you have not lost sight of the end date of the course and the expectations from you. You must come out with flying colours.
    All the best. You deserve our appreciation, friends. There is a serious derth of people like you.

    Reply
  • This is no longer stray incident. The Bureaucracy, headed by the IAS had been circumventing rules and regulations for a very long time. Since fighting against these misuse of power had always been time consuming and also required a good deal of money, people had always been opting for the easy options like getting things done by bribing or simply accepting fait acompli.

    Today The IAS and lower bureaucracy are expanding their misrule over other services, richer people, and such other classes who were earlier capable of fighting bureaucracy. If this continues, then a time will come, when we will all be helpless against the Deshdrohis.

    It is good that one Mr Thakur has suffered at the hands of the IAS. At least it brings the IPS closer to people who had always been suffering at the hands of the IAS and lower bureaucracy.

    Mr Thakur may finally go for his MBA course, but the question is whether the people who had done hthis injustice to him will ever get punished. The answer is “NO”. The people who are in a position to do such things are actually too big and beyon punishments.

    Reply
  • मदन कुमार तिवारी says:

    जातक जी, यशवंत , आलोक तोमर जी, नूतन ठाकुर और अमिताभ जी सहित सभी टिप्पणीकारों , आप सब के वाद विवाद और उसका भडास पर प्रकाशन ने इतना तो साबित कर हीं दिया की भडास एक अच्छा उदाहरण है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का। खैर जातक जी शुरुआती काल में जब एक सिनियर पत्रकार ने भडास के बारे में बताया तो कुछ संशय था । नूतन जी और अमिताभ जी को लेकर भी कुछ वैसा हीं था। लगता था की अन्य अफ़सरों की पत्नियां जैसे अपने पति के प्रभाव के बल पर सरकारी कर्मचारिंयो की मुफ़्त सेवा लेकर के गैर सरकारी संगठन चलाती हैं , शायद नूतन भी उन्हीं में से एक हों। लेकिन इनके अपने साईट पर गया, फ़ेसबुक पर विजिट किया। आर टी आई से संबंधित किसी मसले पर नूतन को एक धरना या प्रदर्शन में बैठे देखा तो अपनी सोच में बदलाव किया। अमिताभ ठाकुर के कुछ लेखों में खोज बिनकर निकाले गये तथ्य देखें , लगा सिर्फ़ दिमाग में आये फ़ितुर को लेखों में नही ढाला है । मेहनत की है अमिताभ ने। यशवंत ने सहि लिखा है , प्रजातांत्रिक रुझान वाले और अफ़सरशाही से हटकर चलने वाले है अमिताभ । नूतन के लेखों को पढेंगे तो पता चलेगा की वह सिर्फ़ आंखमुदकर नही लि्खती हैं, मेहनत भी करती है। आज अफ़सरशाही खासकर आइएएस, आईपीएस जिस तरह से ्नव-जमिंदार की ्तरह काम कर रहे है, वैसी स्थिति में एक आदमी खुद अपनी हीं व्यवस्था की खामियों को उजागर कर रहा है , इससे ज्यादा प्रसंशनीय बात क्या हो सकती है। यह तो कबिरा खडा बाजार में लिये लुगाठी हाथ जो घर जारे आपना चले हमारे साथ जैसा है। रहि आलोक तोमर के शब्दो की बात , मुझे भी शुरुआत में वैसा हीं लगा था जैसा आपको लगा और कुछ तल्ख टिप्पणी भी की थी , परन्तु आलोक तोमर का लिखा हुआ पढना बंद नहि किया। अब लगता है हर वह शख्स जो सच्चाइ के लिये लड रहा है, ्भ्रष्टाचार के खिलाफ़ है, उसके पास शब्द नहीं है लिखने के लिये। जिन शब्दों का उपयोग आप चाहते है की आलोक तोमर जैसे लोग करें तो कमीने भ्रष्टाचारियों पर चाशनी में लपेटे हुये शब्दों का कोई असर नही होने वाला । इतनी मोटी चमडी है , भ्रष्टाचारियों की की गालि गलौज वाले शब्दों का भी असर अब नहीं पडता। अब तो सिधे -सीधे गाली दिजिये वह भी उसके परिवार के सामने तब शायद भ्रष्टाचारियों को कुछ शरम आये। एक बार मैने अपने आफ़िस में लिख कर टांगा था घुस लेने का मतलब है , अपनी बेटी से वेश्यावर्‍ति करवाना , आप विशवास करें तकरीबन आधिकांश लोगों ने आना हीं बंद कर दिया था और मुह के पिछे कहने लगे थे की पगला गया है। खैर यशवंत ने माफ़ी मांग ली , आप भी मांग लिये रहते तो अच्छा रहता । आलोक तोमर की आलोचना राडिया और टाटा के बीच बातचीत वाले टेप के ट्रांसलेशन को लेकर मैने की थी , हालांकि आलोचना सही थी लेकि्न मेरे शब्द कडवे थें। आलोक तोमर जिस परिस्थिति में जिवटता के साथ लिख रहें है , उन्हें मेरा सलाम । आजकल उनका लिखा नही दिख रहा है, न हीं उनकी तबियत के बारे में कुछ पता चल पा रहा है , जानने की ईच्छा है की तोमर जी की तबियत कैसी है।

    Reply

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