एक डिप्रेशनधारी तन-मन की एक्सरे रिपोर्ट

: जीवन दुख ही दुख है! सुख बिलकुल नहीं है!! : आज सुबह से नहीं बल्कि कल दोपहर बाद से ही डिप्रेशन का दौर शुरू हो गया. पी7न्यूज के तीन साथियों का कैलाश हास्पिटल में भर्ती होना और उसमें से एक पत्रकार साथी जयंत चड्ढा का अभी भी बेहोश हालत में होना, नोएडा में दो बहनों का कंकाल में तब्दील हो जाना और एक का मर जाना…, वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह का हफ्ते भर से अस्पताल में भर्ती रहना, खबरों-सूचनाओं से हिलती-मचलती इस दुनिया को थर्रा देने का दम रखने वाले आलोक तोमर के गुजर जाने पर अब तक यकीन न हो पाना…

इंडिया गेट पर बरखा के खिलाफ नारेबाजी करने वाले होनहार छात्र योगेश शीतल की परेशानी महसूस करना… घटनाओं के घटाटोप में चहुओंर सिर्फ उदासी और दुखों का प्रेक्षिपत होते रहना… और इस प्रक्षेपण से ग्रहित रुदाली भावों का काया प्रवेश करते हुए मन में चिपक जाना… दिल्ली में जीने के लिए न्यूनतम आवश्यकता हेतु धन पाने-कमाने हेतु शीर्षासन करने की इच्छा-आकांक्षा का दिन ब दिन मरते जाना…. सोकर उठना कुछ घंटे काम करना खाना आराम करना टहलना फिर खाना टीवी देखना अखबार पढ़ना एकाध लोगों से मिलना-जुलना कहीं इनसे उनसे मिलने चले जाना चले आना.. और दिन का रात में तब्दील हो जाना फिर रात का दिन में… यूं करते कराते दिन महीने साल का बीतते जाना और फिर फिर वही वही करते रहना…. बड़े हो रहे बच्चों को देखकर सोचना कि एक दिन ये भी बुढ़ाएंगे और मर जाएंगे, उससे पहले हम लोग निपट जाएंगे और हम लोगों के जो पिता सरीखे उम्र वाले हैं वे भी एक एक कर हम लोगों के सामने ही राम नाम सत्य हो जाएंगे….

जो सुखी दिखते हैं सबको, उनके निजी दुखों को जानकर दुखी रहना… जो दुखी हैं, उनके दुखों के पार न सोच पाने की सीमा को महसूस कर परेशान रहना…. और… इन हर कामों घटनाओं प्रसंगों क्षेपकों नाटकों के आखिर में दिल-दिमाग के घुमड़ने का अंत सोचने में होना… फिर सोचते रहना….

और, सोचते.. सोचते… सोचते….. सोचते…… दिमाग ने सोचना बंद कर दिया.

चेहरे पर कोई भाव नहीं. न ऊर्जा न तेज न दुख न उदासी. स्तब्धता से युक्त भावविहीनता. न दुख न सुख न उछाह. न विरह न व्यग्रता न प्रसन्नता. बस डिप्रेसिव तटस्थता.

अजीब तटस्थता भरती जा रही है शरीर में. चेहरे पर इसी की परत जमने लगी है.

व्यक्तित्व में पाने की लालसाओं और खो देने के भयों का शेयर-हिस्सा-भाग लगातार क्षीण होता जा रहा है, गिरता जा रहा है, कमतर होता जा रहा है. ये होता तो क्या होता… वो होता तो क्या होता… टाइप की बहसों विवादों की सार्थकता-निरर्थकता दोनों से अप्रभावित होने लगा हूं. नामचीन बनने की इच्छाओं और धन कमाने की लालसाओं ने अचानक खुद ब खुद असमय दम तोड़ना शुरू कर दिया है. सरवाइवल कोई मुद्दा नहीं रहा क्योंकि बहुत दिनों से कहीं  कोई नौकरी न करके भी जिंदा बचे रहना सरवाइवल के संकट की आशंकाओं-भयों से मुक्त कर चुका है. जब तक पैसे रहते हैं, पड़ा रहता हूं अपने ही आसपास. जब खत्म होते हैं दो-चार-दस ऐसे लोग करीबी हो चुके हैं जिनसे मुंह खोलकर मांग लेता हूं और वो दे देते हैं. और कुछ पैसे खुद ब खुद अपने पैरों पर चलकर चले आते हैं, भड़ास के नाम से. अब इन पैसों को भड़ास की खेती मानिए, डोनेशन मानिए, ब्लैकमेलिंग मानिए, मार्केटिंग मानिए, दान मानिए, भिक्षा मानिए, मेहनत मानिए, विज्ञापन राशि मानिए, कंटेंट सपोर्ट और ब्रांडिंग के एवज में मानिए… जो मानिए… लेकिन मेरे लिए ये पैसे बस जीने खाने गाड़ी चलाने भर के लिए साधन के रूप में हैं, इससे इतर इनका इस्तेमाल प्लान नहीं कर पाता. बहुत हो जाएंगे पैसे तो क्या बन जाऊंगा और जब नहीं है तो क्या हूं, दोनों में बहुत फर्क नजर नहीं आता.

ये पैसे जीवन और सोच को बदल नहीं पाए इसलिए पैसे कभी ज्यादा न हो पाया और न हो सकेगा. और, पैसे प्रियारिटी में न होने के कारण जिंदगी के थिएटर में कई कई रूपों-स्वरूपों में ताथैया करता आ रहा हूं. और जिंदा हूं, इसीलिए पैसे होने, न होने को लेकर अब मुक्त होने लगा हूं. नई खबर ये है कि कर्ज वगैरह लेकर आम्रपाली बिल्डर वालों के एक प्रोजेक्ट में एक एलआईजी फ्लैट बुक करा लिया है. किश्त देता रहूंगा. और ये काम करके पत्नी के नालायकी के श्राप से मुक्त हो गया हूं बशर्ते किश्त पूरा अदा कर जाऊं. जिस किश्त के चक्कर से बचता रहा हूं और कभी-कभार फंसता रहा हूं, उसी घनचक्कर में उलझ गया. बच्चों के भविष्य का भय दिखा दिखा कर एक अदद मकान के लिए कान में फूंकने का दौर काफी दिनों से चल रहा था और अंततः कान के आसपास की इस भिनभिनाहट से मुक्ति के लिए यह कर्म भी कर ले गया.

और, शायद यह भी मुझे लगता रहा है कि कुछ बरसों पहले, या कहिए बाजारवाद के पहले के दिनों में एक ईमानदार सरकारी या गैर सरकारी अफसर नौकर के ठीकठाक जीवन का लक्ष्य यही हुआ करता था कि वह 60 तक रिटायर होते होते लड़के लड़की को पढ़ा ले, एक कार ले ले, शहर में एक मकान बना ले. और बच्चों का शादी ब्याह कर उन्हें सेटल कर अपने कर्मों, अपनी सांसारिकता से मुक्त हो जाए. लगता है कि ये काम मैंने 38 साल की उम्र में कर दिया. पांच साल पहले अमर उजाला के पीएफ के पैसे से कार ले ली, अब फ्लैट बुक करा लिया, और नालायक बापों के जिस तरह बच्चे लायक हो जाया करते हैं उसी तरह मेरे भी बच्चे समय व उम्र से कुछ ज्यादा समझदार दिक्खे हैं, आजकल वे भी मुझे समझाने लगे हैं- पापा ये न करो, वो न करो. तो इनका भविष्य मुझे उज्जवल लगता है कि ये अभी से इतने सयाने हैं तो आगे जाकर ये खुद अपना काम स्थान नाम हासिल कर लेंगे. मतलब ये कि जब सब कुछ रुटीनी हो जाए, कोई महत्वाकांक्षा न बचे, कोई खास चिंता न बची हो, कोई लालसा न शेष हो और खाने-पीने-हंसने-रोने-गाने से भी मन भरता हुआ लगे तो कोई क्या करे.

और, ऐसी मनःस्थिति में जब सब कुछ रीता हुआ, खाली सा, फानी सा, तटस्थ सा लगने लगे और अचानक आपको पता चले कि वो बीमार, वो परेशान, वो अस्पताल में, वो गिरा, वो मरा, वो कोमा में, वो कोठरी में, वो दुखियारा, वो बेबस, वो चिंतातुर, वो रुआंसा… तो क्या करेंगे. सबका कुछ न कुछ अपने भीतर खुद ब खुद समाने लगेंगे और सब मिलाकर एक दुख का गोला सा बन जाएगा दिमाग में जो पृथ्वी की माफिक अपनी धुरी पर घूमने लगेगा. कभी उनकी मौत उपर तो कभी उनकी बामारी नीचे, कभी उनका रोना दाएं तो कभी उनका चुप रहना बाएं… और इस घूमते दुख के गोले के साथ-साथ आपका मन भी बुरी तरह घूमने लगता है लगातार,,, बारंबार,,, कई कोणों से सोचते विचारते दुखी होते अफसोस करते…. और अंततः सब क्रैश हो जाता है. हैंग हो जाता है. फेल हो जाता है.

दुख के गोले को मुक्का मारकर फोड़ देता हूं, दुख के गोले को देख दुखों के दुःस्वप्न के इर्दगर्द गोलगोल घूमते मन को भी पीट देता हूं. सब शांत, सब भौचक, सब स्तब्ध. और…. फिर सब अशरीरी होने लगता है. बिलकुल कुछ न करने का मन करने लगता है. किसी सन्नाटे भरे अंधेरे में कई घंटे चुपचाप चेहरा मुड़े हुए घुटने से सटाकर पड़े रहने का दिल चाहता है.

और, दो लड़कियों की कथा ने, दो बहनों की कथा ने जाने क्यों इंस्पायर किया है कि न खाते तो क्या होता और खा भी रहे हैं तो क्या हो रहा है…. सिर्फ नमक चाटकर भी तो जिंदा रहा जा सकता है…. और, भरे पूरे मनुष्यों-फ्लैटों के जंगल में जब खुद को नष्ट कर देने की तपस्या कर ली तो फिर कर ली, अंजाम से क्या डर. हर आदमी में कंकाल होता है और हर आदमी सांस लेता है. किसी को अपना कंकाल देखने को नहीं मिलता और कई लोग खुद अपने कंकाल का प्रकटीकरण कर लेते हैं, चमड़े व चर्बी से मुक्त हो हो कर. जिस खाते रहने की उद्दाम लालसा, जिस बटोरते रहने की प्रचंड इच्छा ने अच्छे खासे समाज, दुनिया, पृथ्वी, ब्रह्मांड को नर्क बना दिया है वहां दो बहनों की कथा कुछ लोगों को भले ही कुछ क्षण के लिए ठिठका देती है पर इन अकेली लड़कियों की दास्तान में जो प्रेरणादायी तत्व है वो ये कि वो हर तरह के भावों-भयों-सुखों-आकांक्षाओं-इच्छाओं-परिघटनाओं से मुक्त हो चुकीं थीं. संभव है, ये मेरे लिए प्रेरणादायी है तो किसी और के लिए दुखदायी.

उनका लड़कियों का घर उनके आश्रम में तब्दील हो चुका था. उन्होंने इरादतन ऐसे राह पर कदम बढ़ा दिया जो अंततः देह त्याग की तरफ जाता है. और इस देह त्याग का उन्होंने कोई प्रदर्शन नहीं किया. चुपचाप, अपने अंधेरे में देह त्यागती रहीं. बचा खुचा बोध भी खत्म होता गया. समय, काल, हालात, परिवेश से मुक्त होती गईं. बचा बस एक चिरंतन शांति और रीता सा तन. रात भी दिन जैसा लगे और दिन भी रात जैसा. नींद भी जगने जैसा लगे और जगने में भी नींद सा. अंतर, विभेद खत्म. नींद में हर आदमी मरा होता है, अगर जगने से तुलना करें तो. और जगा हुआ आदमी धीरे धीरे नींद की तरफ जाने को मजबूर हो जाता है. इन बहनों ने जाग्रत और सुप्त का भेद खत्म कर दिया. देह और विदेह का फर्क खत्म कर दिया. धीरे धीरे खाना मंगाना बंद कर दिया. सिर्फ नमक पर सिमट गईं. इच्छाएं खत्म होती गईं. बस सांसें शेष थीं. और एक ने दुनियावी असंवेदनशील दखलंदाजी के बाद वो भी तज दिया.

दुनियावी असंवेदनशील दखलंदाजी. जी हां. फ्लैश, कैमरे, माइक, बैनर, आदमियों की भीड़, ये बात, वो बात… बोले.. वो देखो…. अरे सुनो… खींचों, शूट करो….

लड़कियां भौचक्क. ये क्या होने लगा. अचानक. ये कौन आ गए उनके एकांत में, जंगली.

डाक्टर भले कहें कि लड़कियों को कोई खतरनाक बीमारी हो गई थी, भयंकर डिप्रेशन में थीं वो, काला जादू का चक्कर था, परिवार वालों से अलगाव का दुख था… ये था… वो था… पर मैं ऐसा नहीं मानता. दरअसल अब मुझे लगता है कि डिप्रेशन मनुष्य को इसलिए होता है क्योंकि वो खुद को मनुष्य मात्र न समझने का हठ बंद करे. जब हम खुद को मनुष्येतर मानने लगते हैं और अचानक एक दिन फर्श पर आते हैं तो डिप्रेशन होने लगता है. ये डिप्रेसन दो विपरीत मनःस्थिति के बीच का ट्रांजिशन फेज होता है. दो क्यों, कई रास्ताओं का चौराहा होता है डिप्रेशन.

आप किधर को मुड़ते हैं, ये आपको खुद तय करना होता  है. पहले से चले-चलाए रास्ते खींचते हैं, लुभाते हैं या भगाते हैं, नए रास्तों का डर सताता है लेकिन जीवन के सारे रास्ते इस डिप्रेशन रूपी चौराहे के इर्दगिर्द ही होते हैं, राउंड राउंड घूमते रहिए डिप्रेशन चौराहे पर… हर रास्ते पर लगे बोर्ड को पढ़ते जाइए और उस रास्ते की मंजिल मुकाम को बूझते भांपते रहिए रास्ते के अवरोधों की कल्पना करते रहिए… राउंड राउंड घूमते रहिए डिप्रेशन चौराहे पर… सभी रास्तों को देखते पढ़ते समझते बूझते रहिए… और तय करके किसी एक रास्ते पर चल पड़िए… ऐसा सभी करते हैं… ये डिप्रेशन कई बार निर्णायक हो जाते हैं आदमी के लिए.

डकैत बाल्मीकि को डिप्रेशन ने संत बना दिया. भरेपूरे सुख में रहने वाले सिद्धार्थ को डिप्रेशन ने गौतम बुद्ध बना दिया.. सैकड़ों उदाहरण हैं. मनुष्य आज क्या है और कल क्या बन जाएगा, इसके बीच बड़ी महीन रेखा होती है जिसे कम लोग ही पहचान बूझ पाते हैं. ज्यादा से ज्यादा मनुष्य दूसरे मनुष्यों के प्रति पूर्वाग्रह पूर्ण राय रखते हैं. ऐसा हमारी दिमागी और सामाजिक बुनावट के कारण होता है. जबकि वही पूर्वाग्रहपूर्ण राय रखने वाला व्यक्ति जब अपने भीतर झांकता होगा तो पाता होगा कि उसमें भी हर पल कुछ न कुछ बदल रहा है. तो मनुष्य के बारे में, किसी के भी बारे में कोई धारणा न बनाइए. धारणाएं उतनी ही तेज बदलती हैं जितनी तेज समय बदल रहा है, समय का पहिया चल रहा है.

पता नहीं किस एक घटना ने या घटनाओं के समुच्चय ने ऐसा किया है कि कल से डिप्रेशन का जो दौर शुरू हुआ है वो खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. दुनियावी अर्थों में खुद के मन को टटोलता हूं तो पाता हूं कि दुनिया के दुखों से दुखी हूं मैं और इस दुखों के बोध ने तात्कालिक सुखों व इस सुख के एहसास करने वाले बोध को कहीं बहुत दूर पटक दिया है… फिलहाल तो दिमाग के हर एक कोने में दुखों की रेतीली आंधी है जिसके धूल में संवेदना और सोच का चक्का जाम है. सो, यही गा रहा हूं कि जीवन दुख ही दुख है. कोई आगे सुख नहीं, सिर्फ दुख ही दुख है. इस क्षण तो ऐसा ही लग रहा है. देखता हूं अगले कुछ घंटों में कैसा लगता है. आबिदा परवीन के एक गीत को सुन रहा हूं…. बारबार… बारंबार… ….लगता है आबिदा कबीर के माध्यम से उसे बुलाती हैं और हम आबिदा के मार्फत उससे मिल लेते हैं….

मन लागो यार फकीरी में….

रुखा सूखा खाय के ठंडा पानी पीय….

और आंख बंद कर कभी खुद के अंदर के महासमुद्र, ब्रह्मांड को देख रहा हूं तो कभी बाहर के अनंत विस्तार के पार जाने की कोशिश कर रहा हूं….

जय हो

इसका लेखक यशवंत नामक आदमी है, दिल्ली नगर में रहता है, भड़ासी डगर पर चलता है. अगर आप सशरीर इससे न मिले हों तो हवा-हवाई, हाई-फाई, वाई-फाई, साईं-साईं टाइप मेलजोल  yashwant@bhadas4media.com के जरिए कर सकते हैं.

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Comments on “एक डिप्रेशनधारी तन-मन की एक्सरे रिपोर्ट

  • Dr.Ajeet Tomar says:

    यशवंत जी, आपने डिप्रेशन पर जो अपना मनोविश्लेषण प्रस्तुत किया वह कईं अर्थों मे न केवल अद्भुत है बल्कि व्यापक भी हैं। मेरा जैसा मनोविज्ञान का थोडा बहुत जानकार भी अक्सर आप जैसी मन:स्थिति से गुजरता हैं लेकिन जीवन शायद इसी का नाम है कि धीरे-धीरे से सब कुछ अपनी गति से उपग्रह की भांति अपनी कक्षा मे स्थापित हो जाता हैं।

    बहरहाल, मै तो यही कहूंगा कि आपका संवेदनशील मन वैराग्य के मार्ग की तरफ बढ रहा हैं लेकिन अभी आपकी उस रंगमंच पर ज्यादा जरुरत है जो वंचितो और आम आदमी के वजूद की जिरह के आपने बनाया हैं।
    आप और भडास अब एक वेबपोर्टल ही नही हैं बल्कि एक आन्दोलन हैं जिससे मेरे जैसे बहुत से देहाती लोग प्ररेणा पातें हैं तथा तथाकथित अभिजात्य और कुलीन वर्ग की आंखो से आंखे मिलाने का हौसला पैदा करते हैं।

    ये वक्त भी गुज़र जायेगा…
    आभार
    डा.अजीत तोमर
    असि.प्रोफेसर,मनोविज्ञान
    हरिद्वार

    Reply
  • shravan shukla says:

    सर जी. सच्चाई ऐसी ही होती है … कई सरे लोगो के साथ होगा.. लेकिन कहने और बताने की हिम्मत नहीं होती किसी में.. आपके इस लेख से शायद कई लोगो को प्रेरणा मिली हो.. दुनिया और परिवार है ऐसी चीज..जिसे दूर जाओ तो भी नालायक..पास रहो और छह कर भी कुछ न कर सको तो आवारा.. क्या करें? हम भी इसी मनोदशा में हैं ..

    Reply
  • आलोक पुराणिक says:

    बेदिली, क्या दिन यूं ही गुजर जायेंगे
    सिर्फ जिंदा रहे, तो हम मर जायेंगे

    Reply
  • nikhil agarwal says:

    dear
    yashwant ji
    I am sending 7 heavenly virtues
    hope by these theories many people will overcome from their depression

    Chastity :Purity, knowledge, honesty, wisdom
    Abstaining from sexual conduct according to one’s state in life; the practice of courtly love and romantic friendship. Cleanliness through cultivated good health and hygiene, and maintained by refraining from intoxicants. To be honest with oneself, one’s family, one’s friends, and to all of humanity. Embracing of moral wholesomeness and achieving purity of thought-through education and betterment. The ability to refrain from being distracted and influenced by hostility, temptation or corruption.

    Temperance : Self-Control, justice, honour, abstention
    Restraint, temperance, justice. Constant mindfulness of others and one’s surroundings; practicing self-control, abstention, moderation, zero-sum and deferred gratification. Prudence to judge between actions with regard to appropriate actions at a given time. Proper moderation between self-interest, versus public-interest, and against the rights and needs of others.

    Charity : CaritasWill, benevolence, generosity, sacrifice
    Generosity, charity, self-sacrifice; the term should not be confused with the more restricted modern use of the word charity to mean benevolent giving. In Christian theology, charity — or love (agäpé) — is the greatest of the three theological virtues.

    Love, in the sense of an unlimited loving kindness towards all others, is held to be the ultimate perfection of the human spirit, because it is said to both glorify and reflect the nature of God. Such love is self-sacrificial. Confusion can arise from the multiple meanings of the English word “love”. The love that is “caritas” is distinguished by its origin – being divinely infused into the soul – and by its residing in the will rather than emotions, regardless of what emotions it stirs up. This love is necessary for salvation, and with it no one can be lost.

    Diligence : Persistence, effort, ethics, rectitude
    A zealous and careful nature in one’s actions and work; decisive work ethic, steadfastness in belief, fortitude, and the capability of not giving up. Budgeting one’s time; monitoring one’s own activities to guard against laziness. Upholding one’s convictions at all times, especially when no one else is watching (integrity).
    (The vice “acedia” is more commonly known as “sloth”.)

    Patience :Peace, mercy, ahimsa, sufferance
    Forbearance and endurance through moderation. Resolving conflicts and injustice peacefully, as opposed to resorting to violence. The ability to forgive; to show mercy to sinners. Not killing or being violent in any way to any life form or sentient being; to practice moderation of meat consumption and consistent life ethic. Creating a sense of peaceful stability and community, rather than engendering suffering, hostility and antagonism.

    Kindness : Satisfaction, loyalty, compassion, integrity
    Charity, compassion and friendship for its own sake. Empathy and trust without prejudice or resentment. Unselfish love and voluntary kindness without bias or spite. Having positive outlooks and cheerful demeanor; to inspire kindness in others.

    Humility :Bravery, modesty, reverence, altruism
    Modest behavior, selflessness, and the giving of respect. Humility is not thinking less of yourself, it is thinking of yourself less. It is a spirit of self-examination; a hermeneutic of suspicion toward yourself and charity toward people you disagree with. The courage of the heart necessary to undertake tasks which are difficult, tedious or unglamorous, and to graciously accept the sacrifices involved. Reverence for those who have wisdom and those who selflessly teach in love. Giving credit where credit is due; not unfairly glorifying one’s own self. Being faithful to promises, no matter how big or small they may be. Refraining from despair and the ability to confront fear and uncertainty, or intimidation.

    nikhil agarwal
    meerut

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