आलोक तोमर को चाहने वाले कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया, डिप्टी स्पीकर हॉल-नई दिल्ली में एकत्रित हुए और मैं चाहते हुए भी उपस्थित नहीं हो सका। इस आयोजन की तारीफ तो नहीं करूंगा, क्योंकि हमारा, हम सबका फर्ज ही यही है कि कैंसर-ग्रस्त पत्रकारिता को बचाने के लिए आलोक तोमर को जिंदा रखा जाए, इसके बावजूद कि वह सदेह अब हमारे बीच नहीं रहे।
वैसे साफ यह भी करते चलें कि हम इस बात को मानने के लिए तैयार बिलकुल नहीं हैं कि आलोकजी हमारे बीच नहीं हैं। एक अप्रैल की शाम जब भोपाल स्टेशन के लिए निकल रहे थे, दाऊ (जी हां, आलोकजी को हम दाऊ ही कहते थे, क्यों? बाद में बताते हैं) की त्रयोदशी में दिल्ली जाने के लिए, तब भी अपनी बेटी को नहीं बताया था कि जा कहां रहा हूं? वह 11 वर्ष की है और जब उसकी बात नहीं मानता हूं, तो वह अब भी धमकाती है कि दिल्ली वाले दाऊ को फोन करती हूं और यह कहकर वह मोबाइल मेरे हाथ से जबरन छीनती है। दाऊ के रहते जब वह यह बात कहती थी, तो एक निराले सुख की अनुभूति होती थी, पर जब अब वह यह कहती है, तो कलेजे में शूल-सा चुभ जाता है। चाहता हूं कि यह शूल बार-बार चुभे, तो दाऊ याद आते रहेंगे, इसलिए मैंने उसको यह बात बताई भी नहीं कि दाऊ अब रहे नहीं।
हम आलोक तोमर से दाऊ क्यों कहते हैं? हम बुंदेलखंडी हैं। और बुंदेली भाषा में दाऊ उसी को कहा जाता है, जो बेहद सम्मानित, दृढ़ और वरिष्ठ होता है और ठाकुर बिरादरी के लोगों से भी। शायद अप्रैल या मई-2005 की बात है, जब उनका एक प्रशंसक यानी मैं भोपाल के होटल पलास में उनसे मिलने गया था, पहली बार। दरअसल, एक पत्रिका में (सब जानते हैं कि उस समय वे किस पत्रिका के संपादक थे) उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में बहुत कुछ लिखा था, अपन को लगा कि वह सब सही नहीं है। दिल्ली के एक पत्रकार मित्र से मांगा मोबाइल नंबर और मिला दिया और अपनी शिकायत दर्ज करा दी। जवाब मिला, इस विषय पर भोपाल आकर बात करते हैं। आलोकजी बोले कि वे जल्दी ही (तारीख मुझे याद नहीं) भोपाल आएंगे, क्योंकि माखनलाल वालों ने बुलाया है। उन्होंने यह भी बताया कि वे अब उस पत्रिका के संपादक नहीं रहे और जेल भी हो आए हैं।
बहरहाल, दाऊ भोपाल आए और उन्होंने फोन करके बताया कि आ चुका हूं, होटल पलास आ जाओ। वहां पहुंचते ही उनका पहला सवाल यही था कि कहां के रहने वाले हो? बताया कि झांसी मैं बचपन बीता और अब वहीं का बाशिंदा भी हो गया हूं, तो बोले, बुंदेली भाषा में बात करो ना। फिर, उन्होंने ही शुरुआत भी कर दी-अपन बुंदेलखंडियन में जा आदत भौत बुरई है कै अपन अपनी पिहचान छिपाउत। भरोसा नहीं हुआ था कि कोई दिग्गज पत्रकार इतना सरल-हृदय भी हो सकता है। फिर, बहुत बातें हुईं, शुद्ध बुंदेली में। शाम को जब वे जाने लगे, तो हम हबीबगंज स्टेशन पहुंचे, उन्हें विदा करने के लिए। देखा कि वहां बहुत-से नामचीन टाइप के पत्रकार खड़े हैं। पास जाने में संकोच हुआ, तो उन्होंने बुलाया और उन लोगों से परिचय कराया, जिनका नाम तो मैं कम से कम जानता ही था और वह भी इस तरह, जैसे वे मुझे वर्षों से जानते हों।
इसके बाद बहुत मुलाकातें हुईं। दिल्ली गए और मिल नहीं पाए और जब बाद में बताया, तो सुनने को मिला-हां भैया तुम बड़े आदमी हौ, हमाए लिगां काये आऊते। एक बार उनका फोन आया और श्रीमतीजी ने कर लिया रिसीब, हे भगवान, पता नहीं क्या बात हुई कि उसके बाद मैडम भी दिल्ली वाले दाऊ से शिकायत करने की धमकियां देने लगीं। बेटी पर भी इसका असर हुआ। बेटी तो अभी शनिवार की रात ही धमका रही थी, जब उसने लिस्ट थमा दी कि ये लाना है और वो लाना है और हमने कहा कि कुछ नहीं आएगा। बेटी ने धमकाया, तो आंखों की कोरें गीली हो गईं, मेरी और श्रीमतीजी की भी। मुंह से यही निकला, दे दो लिस्ट, कल सामान आ जाएगा। उसने कहा, पापा केवल दो लोगों से डरते हैं, दिल्ली वाले दाऊ से और झांसी वाले दाऊ से। दरअसल, हम अपने पिताजी से भी दाऊ कहते हैं और आलोकजी से नजदीकी के बाद से पिताजी झांसी वाले दाऊ हो गए हैं।
बहरहाल, कहने को तो बहुत कुछ है, पर ज्यादा नहीं कहूंगा। तीन बातों का अफसोस ताजिंदगी रहेगा। वे भोपाल आए और मेरे घर आने को तैयार थे, पर तब चाहते हुए भी ला नहीं पाया, क्योंकि घर पर मेरे अलावा कोई नहीं था। करीब सात वर्ष उन्होंने अभिभावक की भूमिका निभाई। हम दिल्ली गए, तो कम से कम तीन मौके ऐसे आए, जब दाऊ जिद पकड़ गए कि घर चलो, पर दुर्भाग्य कि हम नहीं जा पाए। तीन-जब वे अस्पताल में थे, मैं उन्हें देखने नहीं जा पाया। मैंने कहा आ रहा हूं, तो जवाब मिला, यार हम इत्ती जल्दी मरवे बारन मैं सें नैयां। जिद की, तो बोले अप्रैल में आइयो, लेकिन घरै। हम उनके आदेश के मुताबिक अप्रैल में गए, उनके घर भी गए, पर वहां दाऊ नहीं थे। मकान नं. डी-298 है या 598 यह भी भूल गया था। तब भड़ास के ही अनिल भाई ने बताया था, 598। इन सभी बातों पर सिर्फ अफसोस ही किया जा सकता है। उनके संस्मरण तो किस मुंह से सुनाएं और श्रद्धांजलि तो उन्हें दूंगा नहीं। दाऊ मेरे लिए तब तक जीवित रहेंगे, जब तक मैं स्वयं जीवित हूं। यशवंतजी, इसीलिए नहीं आया, जबकि आ सकता था। माफ करना।
राजेन्द्र चतुर्वेदी
जर्नलिस्ट
राज एक्सप्रेस
भोपाल












Srish Dwivedi
April 23, 2011 at 6:18 am
!!!!!!!!!!!!!!!!! 🙁
Deepak Shrivastava
April 23, 2011 at 11:08 am
Rajendra Bhai Kaise Ho. Raj me Lambi Pari Ho Gai.