Connect with us

Hi, what are you looking for?

कहिन

खामोश हो गई एक ताकतवर कलम

आलोक जी के जाने की खबर से मर्माहत हूं और चिंतित भी। मर्माहत इसलिए कि इस बार वह वीर जिंदगी की लड़ाई कैसे हार गया, जो बड़ों-बड़ों से बेधड़क पंगा लेता रहा और उनकी काली करतूतों को जग जाहिर करता रहा। चिंतित इसलिए कि आलोक भाई के जाने का अर्थ बहुत व्यापक है।उनका जाना एक ताकतवर कलम का खामोश हो जाना है। ऐसी कलम जिसने न कभी दैन्यता दिखाई और न ही किसी के सामने झुकी। उसे न अर्थ खरीद सका और न कोई भय डरा सका।

<p style="text-align: justify;">आलोक जी के जाने की खबर से मर्माहत हूं और चिंतित भी। मर्माहत इसलिए कि इस बार वह वीर जिंदगी की लड़ाई कैसे हार गया, जो बड़ों-बड़ों से बेधड़क पंगा लेता रहा और उनकी काली करतूतों को जग जाहिर करता रहा। चिंतित इसलिए कि आलोक भाई के जाने का अर्थ बहुत व्यापक है।उनका जाना एक ताकतवर कलम का खामोश हो जाना है। ऐसी कलम जिसने न कभी दैन्यता दिखाई और न ही किसी के सामने झुकी। उसे न अर्थ खरीद सका और न कोई भय डरा सका।</p>

आलोक जी के जाने की खबर से मर्माहत हूं और चिंतित भी। मर्माहत इसलिए कि इस बार वह वीर जिंदगी की लड़ाई कैसे हार गया, जो बड़ों-बड़ों से बेधड़क पंगा लेता रहा और उनकी काली करतूतों को जग जाहिर करता रहा। चिंतित इसलिए कि आलोक भाई के जाने का अर्थ बहुत व्यापक है।उनका जाना एक ताकतवर कलम का खामोश हो जाना है। ऐसी कलम जिसने न कभी दैन्यता दिखाई और न ही किसी के सामने झुकी। उसे न अर्थ खरीद सका और न कोई भय डरा सका।

आलोक जी से एक बार ‘जनसत्ता’ हिंदी दैनिक के कोलकाता आफिस में मुलाकात हुई थी। पीली टी शर्ट पहने एक गठीले बदन का जवान हमारे सामने था। उनकी कलम से तो हम सभी वाकिफ थे ही, उनसे साक्षात का वह पहला मौका था। वैसे गाहे-बगाहे प्रभाष जोशी की चर्चाओं में उनका जिक्र अवश्य होता था। एक बार प्रभाष जी ने ही बताया था कि आलोक की श्रीमती सुप्रिया जी बंगाल की हैं और उन्होंने कभी उन्हें कोई बंगाली व्यंजन बना कर खिलाया, जो प्रभाष जी को बहुत भाया।

अरसे बाद जब मैं जनसत्ता छोड़ ‘सन्मार्ग’ दैनिक के उड़ीसा संस्करण का स्थानीय संपादक बना तो एक दिन उड़ीसा (भुवनेश्वर) से कोलकाता वापसी पर ‘सन्मार्ग’ के प्रधान संपादक (अब स्वर्गीय) रामअवतार गुप्त जी से मिलने ‘सन्मार्ग’ के मुख्य कार्यालय गया। उड़ीसा संस्करण की बातें खत्म हुईं तो श्री गुप्त ने मुझसे कहा कि मैं उन्हें किसी ऐसे पत्रकार का नाम सुझाऊं जो साहसिक पत्रकारिता का पक्षधर हो और सच को सच की तरह कहने की हिम्मत रखता हो। वे सन्मार्ग में ऐसे पत्रकार के समाचार और लेख वगैरह छापना चाहते थे। सच कहूं उस समय मुझे आलोक जी के अलावा और कोई नाम याद नहीं आया। हमारे लिए तो वे साहसिक और खोजपरक पत्रकारिता के पर्याय थे।

श्री गुप्त जी ने आलोक जी के कुछ डिस्पैच मंगाये और उसके बाद जिंदगी के अंतिम दिन तक आलोक जी ‘सन्मार्ग’ में छपते रहे। आलोक जी जैसे जीवट वाले पत्रकार कभी मरते नहीं, अपनी विचारधारा और अपने कृतित्व से वे हमेशा अमर रहते हैं और अपनी परवर्ती पीढ़ी को दे जाते हैं सार्थक पत्रकारिता की वह विरासत जो अनाचार, अन्याय और भ्रष्टाचार के अंधेरे के बीच दीपशिखा बन राह दिखाती है। उस महान आत्मा को शत शत नमन।

लेखक राजेश त्रिपाठी कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों हिंदी दैनिक सन्मार्ग में कार्यरत हैं.

Click to comment

0 Comments

  1. डा. महाराज सिंह परिहार

    March 22, 2011 at 2:55 pm

    [b]यह मेरा दुर्भाग्‍य रहा कि पत्रकारिता के जीवंत इतिहास से मैं नहीं मिल पाया। हालांकि विभिन्‍न पत्र पत्रिकाओं के माध्‍यम तथा भडास के माध्‍यम से उनकी धारदार कलम से अवश्‍य रूबरू हुआ। आज जबकि पत्रकारिता अपना दम और विश्‍वास तोडती जा रही है ऐसे समय में आलोकजी का जाना निश्चित रूप से हिंदी पत्रकारिता की अपूरणीय क्षति है। इस संदर्भ में मुझे गोपाल सिंह नेपाली की यह पंक्तियां याद आ रही हैं-

    तुझ सा लहरों में बह लेता तो मैं भी सत्‍ता गह लेता

    ईमान बेचता चलता तो मैं भी महलों में रह लेता

    तू दलबंदी पर मरे, यहां जीवन में तल्‍लीन कलम

    मेरा धन है स्‍वाधीन कलम

    डा. महाराज सिंह परिहार

    ब्‍यूरो चीफ आगरा

    जनसंदेश टाइम्‍स

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

Uncategorized

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम तक अगर मीडिया जगत की कोई हलचल, सूचना, जानकारी पहुंचाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. इस पोर्टल के लिए भेजी...

टीवी

विनोद कापड़ी-साक्षी जोशी की निजी तस्वीरें व निजी मेल इनकी मेल आईडी हैक करके पब्लिक डोमेन में डालने व प्रकाशित करने के प्रकरण में...

हलचल

: घोटाले में भागीदार रहे परवेज अहमद, जयंतो भट्टाचार्या और रितु वर्मा भी प्रेस क्लब से सस्पेंड : प्रेस क्लब आफ इंडिया के महासचिव...

प्रिंट

एचटी के सीईओ राजीव वर्मा के नए साल के संदेश को प्रकाशित करने के साथ मैंने अपनी जो टिप्पणी लिखी, उससे कुछ लोग आहत...

Advertisement