घनघोर दिनों में अचानक इतना उजास… क्या यही चमत्कार है!

नीरज भूषण भावनाओं का महल, मृगतृष्णाओं का पहाड़; सूनी-सहमी आत्माएं, अवाक खड़ा देश…  कहीं यह अप्रैल फूल तो नहीं : तब हमें देश की जनसँख्या बताई गई थी. हम सवा अरब हो चुके थे. इतने सारे मानव. इतने सारे. हमें लगने लगा– चंद दानवों को तो चुटकी में ही मसल देंगे. तभी हमनें दर्जन भर क्रिकेट खेलने वाले देशों की महफिल में वर्ल्ड कप पर भी कब्ज़ा जमाया था.

हम भारतीयों का आत्मविश्वास हनुमान जी की पूँछ की भांति एकदम ऊपर उठा हुआ था. माहौल गुनगुना था. आसमान नीचे जमीन पर गिर आया था. ऐसे में लंका में डंका बजाने को मिले तो कौन अपनी पूँछ में आग लगाकर न कूद पड़े ? जला दूंगा, मिटा दूंगा… निश्छल, अबोध, शांत व प्रेमी भी कांड करने पर उतारू थे, इंडिया गेट पर अपने वही कारगिल वाली बरखा पर भी बरसने को आतुर.  क्या था वह सब? कुछ महीनों से बिगुल तो बज रहा था. भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार — इतना सुनने को मिल रहा था मानों कोई सरदारजी पाचक के साथ साथ भ्रष्ट-अंचार, भ्रष्ट-अंचार, भ्रष्ट-अंचार बेच रहे हों. कान पक गए थे. भारत भाग्य विधाता की जगह भारत भ्रष्ट विधाता हो रहा था. हर आम आदमी को मैंगो मैन बनाकर चूसा जा रहा था. कुकुरमुत्तों की तरह गलियों और चौराहों पर सफ़ेद महल और लंबी-काली गाड़ियां खड़ी होने लगीं थीं. आये दिन साईकिल-रिक्शा वाले सड़कों पर कुत्तों की तरह कुचले जाने लगे थे.

जहां  देखो वहीं पैसे का नाच. सब कुछ बिक रहा था– आदमी, घोड़ा, ईमान, चमड़ा. लगने लगा था कि हमारे यहां गोरखालैंड बने न बने, कोड़ालैंड जरूर बन जाएगा, जहां एक-से-बढकर-एक बेशर्म कानूनों की धज्जियाँ उड़ायेंगे… जहां एक बेशर्म दूसरे बेशर्म के घर अपनी बेटी तबतक नहीं ब्याहेगा जबतक यह कन्फर्म न हो जाए कि हां दुल्हे ने कम-से-कम हज़ार करोड़ तो हजम किया ही है. बाप रे बाप. एक घोटाला हुआ नहीं कि खबरे ही खबरें. उन ख़बरों को रोकने के लिए फिर एक नया घोटाला फोड़ना पड़ रहा था. और फिर खबरें फटाफट, म्यूजिक के साथ. टनाटन.

बोफोर्स, चारा घोटाला, हर्षद मेहता  का स्टाक एक्सचेंज, हवाला, सुखराम, लवलीन कांड, केतन पारेख, बराक मिसाइल, तहलका, ताबूत, ताज कारिडोर, तेलगी, कैश के बदले वोट, सत्यम आदि आदि… अदरक हिंग सब. इन तमाम घोटालों से बौने से लंबे, घसीटा राम से मोटूमल, टुनटुन से भुवन, रजनी से गजनी, अमर-अकबर-एंथोनी सभी बेबस, असहाय, सकुचाये, पिचाए दलित हुए जा रहे थे. सत्यम से धुंआ बंद नहीं हुआ था कि मधु कोड़ा के घोटाले के आंकड़ों में शून्य लगता ही जा रहा था.

ऐसे में भारत के मैंगो मैन मुठ्ठियाँ भींच-भींचकर इकठ्ठा होना सीख रहे थे. मोमबत्तियाँ जलाने की प्रैक्टिस कर रहे थे. नीतीश कटारा मर्डर, जेसिका लाल और रुचिका छेड़छाड़ मामले में ‘जस्टिस’ दिलवा रहे थे. उनके दांतों के बीच जीभें बिलबिलाने लगी थी. ऊँची बिल्डिंगों को देखो तो आदर्श दिखता था, स्टेडियम देखो तो भ्रष्टमंडल खेल, प्याज छुओ तो करंट. आखिर मैंगो मैन कहां जाता भाई? बारूद इतना गरम हो चुका था कि उसे तिल्ली भी दरकार नहीं थी. ए-जी, ओ-जी, लो-जी सुनो-जी का लखन अब वन-टू-का-फोर करते-करते राजा लखन बन चुका था. वह अब टू-जी, थ्री-जी गा रहा था. लोग साँसों में भ्रष्टाचार लेने-छोड़ने लगे थे.

ऐसे में रायसीना हिल पर कैसी पंचायत बैठी थी. कोई राजा का चीरहरण करने को उठता भी था तो करूणानिधि  कलयुगी कृष्ण की भांति  उसकी साड़ी बढाने लग जाते थे. ऊँचे पदों पर बैठे लोग गूंगे, बहरे, उलटे लटके दिखने लगे थे. बड़े बड़े भवनों में सन्नाटा, टोटल अँधेरा फैला था. सत्य और न्याय की रक्षा करना अब धर्म मापिक जरूरी हो गया था. देश के स्तंभों को बिकने से रोकना जरूरी हो गया था. भ्रष्टाचार की बाढ़ और आंधी दोनों को ही धकेलकर बाहर फेंकना लाजमी हो गया था. अपराधियों को अपराधी कहना आन पड़ा था. चोर उचक्कों को धमकाना फितरत बनाने जैसे हो गया था. देश को सड़ांधभरे घोटालों का देश कहलाने से रोकना जरूरी हो गया था. दस जनपथ, सात रेस कोर्स रोड और तीस पृथ्वीराज रोड से कम-से-कम चूं-चाँ की आवाज निकलवाना समय की मांग थी. दिन के उजाले में राज कर रहे उल्लुओं को चुनौती देना जरूरी था. है न?

ऐसे हाहाकार को एक सोलह आना विशुद्ध नेता और पवित्र घाट भी मिलना जरूरी था. और तभी मिल गए अन्ना हजारे !!! मिल गया जंतर-मंतर !!! देश के प्रेजेंट हॉट जेनरेशन ने स्वतंत्रता आंदोलन नहीं देखा था, आधे से ज्यादा लोगों ने जयप्रकाश की सम्पूर्ण क्रांति नहीं देखी थी. सब पागल हुए जा रहे थे. कह रहे थे अन्ना नहीं आंधी है, देश का नया गांधी है. सवा अरब होने का एहसास उनकी छाती फाड़ रहा था. वर्ल्ड कप जीतने का खुमार बीयर-पिज्जा-बर्गर से भी नहीं उतर रहा था. इलेक्ट्रानिक मीडिया के अनपढ़ रिपोर्टर-एंकर को कुरुक्षेत्र के प्रिंस के गड्ढे में गिरने के बाद दुबारा झरने की तरह चौबीस घंटे बहने का मौका नहीं मिला था. नए नए सोशल मीडिया एक्सपर्ट उग आये थे. फिर क्या था जंतर-मंतर की कोर्ट में पी.आई.एल. फ़ाइल हो गया. केस का नाम रखा गया — सिविल सोसाइटी वर्सेज डेविल सोसाइटी.

पांच दिन तक लगातार बहस चलती रही. यह पहली ऐसी कोर्ट बहस  थी जिसका लगातार लाइव टेलीकास्ट  होता रहा, मुंबई हमलों से भी ज्यादा देर तक. सभी टेलीविजन से चिपके दिखे. आफिसों में  चर्चा बरोबर होती रही. रोड-बस-ट्रेन-जहाज-मेट्रो-गाड़ी-ढाबे-चाय दुकानों पर हर कोई अन्ना अन्ना करता रहा. निरंतर. आई.बी.एन. सेवन के सुलझे हुए आशुतोष भी संतुलन खो बैठे. उन्होंने जंतर-मंतर को ताहिर चौराहा कह डाला. एन-डी.टी.वी. के रवीश ने पहले ही दिन मंच पकड़ लिया. बुड्ढे प्रीतीश नंदी भी आ धमके. कई भ्रष्टाचारियों ने तो वहां पहुंचकर अपनी ड्राईक्लीनिंग ही करा ली. मीडिया तो ऐसा जुटा जैसे उसके माफिक पाक कोई और नहीं पृथ्वी पर.

मगर आज सब कुछ उजड़ा उजड़ा लग रहा है भाई. हवा, तूफ़ान, भूकंप, जलजला, सुनामी सब ठंडे पड़ गए से लगते हैं. जंतर मंतर अब फिर से मुर्दों का गाँव लग रहा है. सन 2002 में मैने वहीं 12 दिनों की भूख हड़ताल की थी. सत्याग्रह से रू-ब-रू हो चुका था. शायद इसलिए मैं जलसा देखने जंतर-मंतर नहीं गया. मगर… मुझे लगता है कि शायद यह एक संयोग ही है कि देश को यकायक एक साथ पहले अन्ना प्रभाव और अब विनायक मुक्ति देखने को मिली है. मुझे भरोसा नहीं हो रहा. सोते-जागते लग रहा है कि कहीं यह सब अप्रैल फूल तो नहीं. कितनी आत्माओं को सलाम करूँ. किन संवेदनाओं के साथ क्या एनालाइज करूँ. घनघोर दिनों में अचानक इतना उजाला… इतना स्पार्क. क्या यह चमत्कार है ? देश अन्ना और विनायक गा रहा है. ध्वनि है, साज है, राग है. आपका विश्वास साथ है न ? भूलिएगा नहीं – भ्रष्टाचार मिटाना है. दिल में इक लहर सी उठी है अभी… कोई ताजा हवा चली है अभी.

नीरज भूषण पेशे से पत्रकार हैं और गुड गवर्नेंस तथा इम्पावरमेंट पर मुहीम चला रहे हैं. इनका खुद का ब्लॉग है नीरज भूषण डाट काम. यह लेख इन्होने भड़ास के लिए विशेष तौर पर लिखा है.

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