जंतर मंतर डायरी – दो

किशन बाबूराव हजारे ऊर्फ अण्णा हजारे मंगलवार से दिल्ली के जंतर-मंतर पर बैठे हैं. वे कुछ खा -पी नहीं रहे हैं. उनकी मांग है कि सरकार जन लोकपाल विधेयक को पास करे. उन्होंने घोषणा की है कि अगर सरकार जन लोकपाल विधेयक को पास नहीं करेगी तो वे यहीं बैठे-बैठे जान दे देंगे. उनके समर्थन में वहाँ 169 अन्य लोगों ने भी आमरण  अनशन  कर लिया है. मीडिया में लगातार खबरे आ रहीं हैं कि अण्णा के समर्थन में देश के अन्य शहरों में भी बड़ी संख्या में लोगों ने खाना-पीना छोड़ दिया है.

अण्णा कहते हैं, भ्रष्टाचार रूपी कैंसर देश को चट कर रहा है. अण्णा और उनके आंदोलनकारियों की मांग है कि सरकार उनकी ओर से तैयार जन लोकपाल विधेयक को लेकर आए और लोकपाल की नियुक्ति करने वाली समिति में गैर सरकारी लोगों को भी 50 फीसद का आरक्षण दिया जाए.

मीडिया अण्णा के अनशन को बहुत प्रमुखता दे रहा है. देना भी चाहिए आखिर क्रिकेट के महाकुंभ विश्व कप के बाद और भारतीय क्रिकेट के सबसे बड़े तमाशे आईपीएल से पहले कुछ तो चाहिए जगह भरने के लिए, सो अण्णा की जय हो. आठ अप्रैल के बाद क्या होगा?

सबसे पहले जंतर-मंतर. बुधवार शाम इंडियन काफी हाउस में कुछ मित्रों के साथ बैठा था. वहीं से विचार बना की जंतर-मंतर की ओर कूच किया जाए जहाँ अण्णा खाना-पीना छोड़कर बैठे हैं. सो हम तीन दोस्त काफी हाउस से जंतर-मंतर कि ओर कूच कर गए.

वहाँ पहुंचे तो लगा कि किसी बड़ी पार्टी में आ गए हैं, चारों तरफ लंबी-चौड़ी और छोटी-बड़ी कारों का जमावड़ा था. जिधर देखो कारें ही कारें नजर आ रही थीं. जबसे दिल्ली में रह रहा हूँ तबसे कई बार राजनीतिक-अराजनीतिक और संतों-असंतों के धरना-प्रदर्शनों में जंतर-मंतर जाना हुआ है, लेकिन कभी भी मुझे इतनी कारों वाले प्रदर्शनकारी नहीं दिखे, जितना बुधवार को दिखे. चारो तरफ एक साफ-सफ्फाक लकदक चेहरे घूम-टहल रहे थे.

एक और चीज सबसे अधिक ध्यान खींच रही थी वह थी टीवी चैनलों की ओवी वैन (जिससे किसी खबर का घटनास्थल से ही सजीव प्रसारण किया जाता है शार्टकट में कहें तो लाइव करते हैं.). शायद ही कोई चैनल हो जिसकी ओवी वैन वहां नहीं थी. सब चले आए थे उस अभियान की खबर लेने, जो भ्रष्टाचार के विरोध में चल रहा है. इन चैनलों के संवाददाता एक अदद एक्सक्लूसिव बाइट की आस में इधर-उधर भागदौड़ कर रहे थे.

इन्हीं वीर बालक-बालिकाओं में से एक को लाइव करने के लिए कोई अच्छा शॉट नहीं मिल रहा था. वह अनशन कर रही एक महिला को पटा लाई और अपने पीछे उनके झोले-डंडे के साथ सुलाकर स्टूडियों में बैठे एंकर को खबर देने लगी. यह देखकर पंजाब की एक घटना याद आ गई जब इन्हीं वीर बालक-बालिकाओं के कहने पर एक व्यक्ति ने कैमरों के सामने आग लगाकर जान दे दी थी, वह भी भ्रष्टाचार से परेशान था. ठीक उसी तरह अभियानकारी महिला रिपोर्टर के कहने पर किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह चुपचप आकर लेट गई थी.

अण्णा जहाँ खाना-पीना छोड़कर बैठे हैं,उसके पीछे एक पोस्टर लगा है जिस पर अभियान के संबंध में कुछ बातें लिखी गई हैं और देश के कुछ महान लोगों की फोटो के साथ-साथ ‘भारत माता’ की बड़ी सी फोटो लगीं है, ठीक वैसा ही जैसा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की प्रचार सामग्रियों और सरस्वती शिशु मंदिरों की किताबों में अक्सर छपी  रहती है. अभियान के कर्ता-धर्ताओं ने बताया कि कृपया इसे अन्यथा न लें. यह फोटो राष्ट्रवाद का प्रतीक है लेकिन अल्लाह की कसम इसका संबंध किसी राइट विंग से बिल्कुल नहीं.

जंतर-मंतर पर जो जुटान थी उसमें मेरी आंखें किसी ऐसे इंसान की तलाश कर रहीं थीं जो भ्रष्टाचार से रोज दो-चार होता है, जिसे जन लोकपाल की जरूरत हो. लेकिन वहाँ मुझे कोई ऐसा आम आदमी नजर नहीं आया जिसकी गाड़ी भ्रष्टाचार की वजह से फंस जाती हो. वहाँ जो भी नजर आ रहे थे सबकी गाड़ी भ्रष्टाचार की वजह से ही फर्राटे भरती है, तो भइये, जन लोकपाल विधेयक के आने-जाने और लोकपाल की चयन समिति में आरक्षण मिल जाने से फायदा किस जीव का होगा?

लेखक अजय प्रकाश छात्र राजनीति, मजदूर आन्दोलन से होते हुए पिछले छह वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. फिलहाल हिंदी पाक्षिक पत्रिका ‘द पब्लिक एजेंडा’ में वरिष्ठ संवाददाता और जनज्वार डॉट कॉम के माडरेटर के तौर पर काम कर रहे हैं. इनसे ajay.m.prakash@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है.

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