जनपक्षधर पत्रकारिता का अग्रणी है डीएनए

बी पी दुर्भाग्य है या सौभाग्य नहीं पता, पर पत्रकारिता में मेरा कोई गुरू नहीं है। शायद, इसीलिए हर समय सीखने की प्रक्रिया में ही लगा रहता हूं। खैर, मन में न कोई आदर्श था और न किसी के जैसा बनने की कल्पना थी, लेकिन मन ही मन इतनी प्रतिज्ञा जरुर कर ली थी कि गुणवत्तापरक पत्रकारिता का अग्रणी नेता न बनूं, तो न सही, पर कम से कम ह्लास करने वालों की सूची में भी नाम दर्ज न हो।

पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में जिन वरिष्ठ पत्रकारों के संपर्क में पहुंचा, संयोग या सौभाग्य से अधिकतर मुझे अपनी विचारधारा वाले ही मिले, इसीलिए पत्रकारिता जीवन का हिस्सा कब बन गयी, पता ही नहीं चला? सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था। मन में हर समय पत्रकार होने पर गर्व का अहसास होता था। शरीर में एक अलग तरह की स्फूर्ति रहती थी, पर दशक बदला, वातावरण बदला, सोच बदली तो लोग भी बदलते दिखाई देने लगे। जिस खबर पर वरिष्ठों की शाबासी मिलती थी, वही खबर अचानक वरिष्ठों को गुणवत्ता व तर्कहीन नजर आने लगी। जिस शेरदिली की लोग तारीफ करते थे, उसी शेर दिली को सबसे बड़ा अवगुण करार दिया जाने लगा, जिससे मेरे संघर्ष के दिन शुरु हो गये, फिर भी कसम को दोहरा लिया, साथ ही दृढ़ संकल्प भी कर लिया कि जो भी हो अपनी सोच और कार्यप्रणाली नहीं बदलूंगा और अपनी बनाई राह पर सबसे अलग अकेला ही चलता रहा।

इस बीच कई बार विचार आता, मित्रों से चर्चा भी करता कि अब वह समय लौट कर आयेगा या नहीं, तो अंदर से आवाज आती कि यह सब बहुत दिन तक तो नहीं चलेगा। कब तक चलेगा, इसको लेकर संशय ही रहा? इस बीच पेड न्यूज की आमद होने से बाकी बची विश्वसनीयता को भी ग्रहण लग गया। समय-समय पर हुए इन बदलावों के कारण पाठक की सोच भी बदल गयी। पाठक जिस अखबार की खबर पर आंख बंद विश्वास करते थे, अब उसी अखबार की छोटी व बड़ी खबर पढ़ते पर ही संपादक और पत्रकार की समीक्षा कर देते हैं और हर खबर के पीछे का सच भी बयां करते जाते हैं, लेकिन फिर भी अधिकतर मालिकों या संपादकों को शर्म आती नहीं दिख रही, जिससे मेरा भी विश्वास डोलने लगा था।

लग रहा था कि बदलाव तो होगा, पर शायद, उस बदलाव को मैं अपनी आंखों से नहीं देख पाऊंगा, लेकिन पिछले साल लखनऊ के मेरे एक मित्र ने फोन पर बताया कि यहां से एक डेली न्यूज एक्टिविस्ट नाम का अखबार निकल रहा है, उसने भ्रष्टाचारियों, लापरवाहों और उदासीनों की नींद हराम कर रखी है। उसने यह भी बताया कि ओहदे या कद को नजरअंदाज करते हुए यह अखबार सबकी पोल खोल रहा है। बात समाप्त हो गयी और शाम को नेट पर बैठा तो प्रथम पेज से लेकर अंतिम पेज तक पढऩे के बाद वाकई आंखें खुली की खुली रह गयीं। उसी दिन से डेली न्यूज एक्टिविस्ट का नियमित पाठक हो गया, साथ ही भरोसा भी बढ़ गया कि अब औरों को भी इस राह पर लौटना ही पड़ेगा।

मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि गुणवत्तापरक पत्रकारिता का अग्रणी नेता वर्तमान में सिर्फ यही अखबार है। हालांकि एक-दो हिंदी अखबार और भी हैं, जो अभी खुद को सच के साथ स्थापित किये हुए हैं, पर कई बार मैंने उन अखबारों में ग्रहण लगते देखा है। शायद, व्यापारिक परिस्थितियों के चलते उन्हें झुकना पड़ता होगा, इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं कह सकता, लेकिन यह आशा या अपेक्षा जरुर करुंगा कि गुणवत्ता परक पत्रकारिता अगर सीखनी है तो डेली न्यूज एक्टिविस्ट से बेहतर प्रेरणा नहीं मिल सकती।

लेखक बीपी गौतम स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

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