दीपक चौरसिया ने अन्ना का अपमान किया!

जगमोहन फुटेलासन अस्सी के दशक के शुरू में मेरी पहली नौकरी लगी तो मैं उपसंपादक था और मेरी पहली तालीम ये कि जब भी किसी मसले पर किसी भी संस्था का सहमति या विरोध में कोई प्रेस नोट आए तो उसमें लिखे नामों में से कम से कम आधे ज़रूर छाप देना. बाकी आधे अगली बार.

इसके पीछे सोच ये कि कल कम से कम पांच अखबार वो हर आदमी खरीदेगा, अपनों में दिखाने बांटने के लिए और कुछ फिर वो भी जिन्हें वो फोन कर कहेगा कि देखो आज के अखबार में मेरा नाम छपा है. मुझे याद है कि ऐसे कुछ लोगों को उनका नाम छप रहा होने की जानकारी फोन से रात को ही दे दी जाती थी. ताकि वे अपने लिए अपनी आवश्यकता की प्रतियां हाकर से कह के पहले ही सुनिश्चित और सुरक्षित कर लें.

समय के प्रवाह के साथ वो अखबार बहुत बड़ा हो गया और मेरा ये यकीन पक्का कि अखबार मुद्दों नहीं, नामों के सहारे भी छपते और बिकते हैं. फिर नब्बे के दशक में मैं इस देश के पहले प्राईवेट टीवी चैनल में रिपोर्टर हुआ तो देखा कि मीडिया अपनी सुविधा और ज़रूरत के लिए खबरें कवर ही नहीं करता, उन्हें गढ़ता भी है. मुझे एक घटना याद आती है… मैं ब्यूरो देखता था एक न्यूज़ चैनल में. कहीं किसी शहर में एक हत्या हुई.

मुझे जनसत्ता के दिनों से इंडियन एक्सप्रेस के मेरे एक मित्र ने फोन किया. बताया कि हमारा स्ट्रिंगर मृतक की पत्नी से ऐसे बैठने वैसे बैठने, इधर देखने उधर देखने, और फिर जैसे ही इशारा करे वैसे ही रोना शुरू कर देने की हिदायतें दे रहा था. मेरे मित्र जैसे प्रिंट मीडिया के लोगों ने इस पर आपत्ति की तो उसने कहा कि भाई समझो, हम विजुअल मीडिया में हैं. आपने आंसू हों न हों लिखने हैं, मुझे दिखाने भी पड़ेंगे. अम्बाला में पुलिस एक ऐसे पत्रकार की धुनाई कर चुकी है जिसने रिपोर्ट दर्ज न होने से दुखी थाने में आई एक महिला से कहा कि तू अपने कपड़े फाड़ ले, इन सबकी वर्दियां तो मैं उतरवा दूंगा. आपने पढ़ा सुना ही होगा कि कैसे एक बड़ी खबर के चक्कर में एक महिला को उकसा कर कुछ टीवी पत्रकारों ने जिंदा जला दिया था.

मेरा ये अनुभव है कि पत्रकारों के मौके पर पंहुचने से पहले लोग खामोश और उनके कैमरे देखते ही चिल्लाने लगते हैं. वे अगर चिल्ला चिल्ला के थक चुके हों तो बाद में पंहुचे कैमरों के लिए उन्हें फिर से चिल्लाना पड़ता है. और अगर उसके भी बाद पंहुचे कैमरों को मौके से सब जा चुके मिलें तो फिर खुद कुछ लोग जुटा कर चिल्लाहट करानी पड़ती है. कभी कभार तो उनकी भी बाईट ली, भेजी और चलाई जाती है जिनका उस मुद्दे या उस संस्था से कोई ताल्लुक ही नहीं होता.

छोटी खबर को बड़ा करना व्यावसायिक मजबूरी हो गई है और बड़ी खबर को उस से भी बड़ी बताना खुद को बड़ा बताने की कोशिश. जैसा दीपक चौरसिया ने संसद पर हुए हमले के दौरान किया. वे दो घंटे तक चीख चीख के बताते रहे कि संसद परिसर में बम फटा है. बड़ी जोर का धमाका हुआ है. उनने खुद सुना है. उनने खुद देखा है. धुंआ है. भगदड़ है. पुलिस है. बम निरोधी दस्ते हैं. भय का माहौल है. वगैरह वगैरह… अब आप ज़रा दिल्ली पुलिस, खुद संसद या बाद में अदालत में चली कारवाई का रिकार्ड उठा के देख लीजिये. उसमें संसद पे हमले का ज़िक्र तो है. बाहर किसी बम के फटने का कोई ज़िक्र कहीं नहीं है.

तब दीपक आजतक में थे. अब स्टार में हैं. वे वही हैं. उनकी सोच, आदत और समझ भी वही है. ज़ाहिर है पत्रकारिता का स्तर भी. अन्ना की रिहाई वाले दिन ‘हमने बीस कैमरे’ लगाने का दम भरने और बरसात के बावजूद सुबह शाम तिहाड़ से लेकर वाया राजघाट रामलीला मैदान तक डटे रहने और निरवरत अन्ना के कसीदे पढ़ने वाले श्रीमान दीपक चौरसिया बीती रात अभिषेक मनु सिंघवी के घर पर थे. वन टू वन कर ये दिखाने कि जिसे बरखा, राजदीप या अरनब गोस्वामी तक नहीं पकड़ पाए, वे उन अभिषेक मनु के साथ उनके घर, उनके सोफे पे, उनके साथ बैठे हैं. और फिर जैसा मैंने कहा, खबर अगर न हो तो बनानी पड़ती है. खबर यहाँ भी नहीं बन रही थी. वो ही न बने तो मज़ा ही क्या. सो लगे दीपक चौरसिया अभिषेक मनु के मुंह में शब्द ठूंसने.

एकाध नहीं कई बार पूछा, क्या आपको नहीं लगता कि अन्ना टकराव पैदा कर रहे हैं संसद के साथ? अब अभिषेक सिंघवी भी आखिर अभिषेक सिंघवी हैं. राजनीति और शब्दों के चयन का सलीका उन्हें पहली बार अपने पिता का अंगूठा चूसने के समय से तब से है जब शायद दीपक के पिता जी की शादी भी नहीं हुई होगी. वे नहीं बोले अन्ना के खिलाफ एक शब्द भी. दीपक ने बहुत कोशिश की. अभिषेक ने हर बार कहा, आप स्वतंत्र हैं, कुछ भी कह सकते हैं, मैं वैसा नहीं कहूँगा.

और फिर दीपक ‘स्वतंत्र’ हो गए. चाय वो शायद पहले पी चुके होंगे. उसके साथ शायद कुछ नमकीन और उस नमक का असर रहा हो. वो उन पे तारी हुआ. और वे बोले,” मुझे तो ये अन्ना का मज़ाक लगता है”. अभिषेक फिर कुछ नहीं बोले. वकालत के पेशे ने उन्हें बखूबी समझा दिया है कि जब सामने वाला ज्यादा बोलने के चक्कर में अपने पैरों पे खुद कुल्हाड़ी मार लेने पे आमादा हो तो उसे मार ही लेने देनी चाहिए. वे चुप रहे. दीपक को लगा मैदान खाली है. एक शाट और मारो. बोले, “मुझे तो लगता है, अन्ना आन्दोलन नहीं मखौल कर रहे हैं”.

जब ये इंटरव्यू चैनल पे चला तो इसके आगे उसने काट दिया. मुझे नहीं मालूम इसके आगे दीपक ने अन्ना को और क्या क्या कह कर निरादरित किया होगा. कोई पूछे इन भाईसाहब से कि भैया, आप इंटरव्यू लेने गए थे कि देने? और अगर आपको लगता है कि अन्ना भारतीय संविधान, संसद या जनता के साथ मज़ाक कर रहे हैं तो आप क्या कर रहे हैं उनके साथ तिहाड़ से लेकर रामलीला मैदान तक? इन से भी बड़ा सवाल ये है कि जब आप अपनी बुद्धि, दिमाग, सोच और प्रतिबद्धता से हैं ही नहीं अन्ना या उनकी सोच के साथ तो उनके लिए सुबह सुबह बिना नहाए धोये रामलीला मैदान आ के सिटी रिपोर्टर की तरह उनकी रिपोर्टिंग क्यों कर रहे हो?

पी7 न्यूज़ के एक रिपोर्टर को मैंने देखा टीवी पर. पीस टू कर रहा था. कल. सर पे ‘मैं अन्ना’ वाली टोपी लगा के. अरे भैया, इतना ही शौक है अन्ना का साथी दिखने का तो पहले वही कर लो. चैनल की नौकरी और रिपोर्टिंग बाद में कभी कर लेना… तुम्हीं बताओ कैसे भरोसा करें तुम्हारी रिपोर्ट पर? क्या भरोसा है कि जो तुम बोल और बता रहे हो वो सब निष्पक्ष है. कैसे मान लें कि तुम आस पास वैसी टोपी वालों को खुश करने के लिए या फिर उनसे डर के नहीं बोल रहे हो?

कल रात आशुतोष ने और भी गज़ब किया. एक कमाल का शो करते हैं करन थापर उनके चैनल IBNCNN पर. आशुतोष चूंकि चैनल के सम्पादक मंडल में हैं सो आशुतोष को आजकल बिठाना ही पड़ रहा है कार्यक्रम में. कल का प्रोग्राम अन्ना आन्दोलन में मीडिया की भूमिका पर था. करन ने पूछा आशुतोष से कि क्या मीडिया ने अपनी ज़रूरतों के लिए कुछ ज्यादा ही बढ़ा चढ़ा कर पेश नहीं किया है आन्दोलन को?… अब पत्रकारिता में करन थापर का कद देखिए, आशुतोष का भी और फिर आशुतोष का जवाब देखिए. पलट कर बोले, “ये उन अंग्रेजीदां पत्रकारों की सोच है जिन्हें पत्रकारिता के बाद सरकार की मदद से कोई पी.आर.ओ. टाईप नौकरी चाहिए.” उनके ये कह लेने के बाद आशुतोष का मुंह हमेशा की तरह काफी देर तक खुला ही रहा कि जैसे करन थापर को अभी के अभी निगल ही जाएंगे. हद हो गई है. हम रसातल में ले गए हैं पत्रकारिता को. और फिर अपने भी लोगों को सुनने को तैयार नहीं हैं!!

लेखक जगमोहन फुटेला चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हैं, जर्नलिस्टकम्युनिटी.कॉम के संपातक हैं. इनसे संपर्क journalistcommunity@rediffmail.com के जरिए किया जा सकता है.

Comments on “दीपक चौरसिया ने अन्ना का अपमान किया!

  • संजीव कुमार says:

    जगमोहन जी आपके इस लेख से ये तो ज्ञात होता है कि आपने कहां कहां नौकरी की व किस-किस अखबार या चैनल में काम किया लेकिन अण्णा के अपमान वाली कुछ बात यहां दिखाई नहीं दी। हां लेकिन में आपकी इस बात से सहमत हूं की कुछ पत्रकार व मीडिया संस्थान सरकार को सर्पोट कर रहे हैं लेकिन वह जनता के गुस्से को भी समझ रहे हैं और इसी लिए उन्हें अण्णा के फेवर वाली खबरों को दिखाना पड़ रहा है।

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  • Ashutosh Kumar says:

    ye baat to thik hai deepak churasiya Aag lagane me no 1 hai.khbar bada karne ke liye kisi bhi had tak ja sakte hai

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  • भाई यशवंत जी..टीवी चैनल पत्रकारिता के नाम पर जिस तरह की कुत्ताकारिता कर रहे हैं,उसमें खुद को बड़ा संपादक साबित करने की होड़ सी मची है..आलीजनाब यहां पत्रकारिता कर कौन रहा है।सभी चैनलों के संपादकों की एप्रोच फ्यूड्रल यानि सामंती सोच है।अपने से जूनियरों को गाली देकर टीआरपी बढ़ाने की कोशिश होती है।नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था कि तुम मुझे ख़ून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा।लेकिन चैनलों में उल्टा है।तुम मुझे टीआरपी दो वरना में तुम्हें निकाल बाहर करूंगा..जिन पत्रकारों का यहां ज़िक्र किया गया है वो लाखों रुपए लेकर शीशे से बाहर की दुनियां देखते हैं।बड़ी-बड़ी गाड़ियों में आते हैं।वातानुकूलित स्टूडियो में एक-दो शो करते हैं और सोचते हैं कि वे देश के खुदाई ख़िदमतगार हैं।ये सभी सरकार के दलाल हैं,इनका काम ही दलाली करना है।ये कभी सोनिया के पीछे होते हैं.कभी अमर सिंह के या कभी कांग्रेस के खजांची अहमद पटेल के साथ।दिल्ली में ऐसे ढेरों पत्रकार हैं,मीडिया की बात करें तो खासकर टीवी चैनल दावा कर रहे हैं कि वो राष्ट्रहित के मुद्दे को उृठा रहे हैं..बात ये नहीं है,बात ये है कि इंसानी खाल में छिपे टीआरपी के इन भेड़ियों को दिखाने के लिए मसाला चाहिए,जितना लंबा अन्ना का अनशन चलेगा,उतना ही अपनी भूख मिटाएंगे।अन्ना का अनशन वाकई काबिल-ए-तारीफ है लेकिन मुझे इन मीडिया वालों की नीयत पर शक है

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  • Deepak Chaurasia ki baat apne sahi likhi hai par Ashutosh ne sahi jawab diya. Media ne Annaji ke mudde pe sahi coverage diya hai aur jimmedari ke sath kam kiya hai sirji. Jai Hind…Jai Anna

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  • Ek aur kissa chaurasiya ka. Iraq War ke waqt Baghdad gaye the. Saddam ke toote-phoote mahal me walkthrough kar rahe the. Ek kamre me table tennis ke mez dekhi. Phir lage baghaarne ki Saddam ko table tennis ka shauq tha, aur mujhe bhi. Idiot! aur use channel ne bhi use jyon ka tyon dikha diya. Ab dusra mudda: chahe Ashutosh hon, ya Karan thapar, ya Padmashri Barkha Hon, ya Padmashri rajdeep, ya Padmashri Vir Sanghvi… yeh sabhi sarkaari chamche hain, aur kuch nahin. Ye main nahin, unki prerna-srot Niira Radia ke tapes kah rahe hain. chahe maano ya na maano. chaurasiya to nautankibaaz hai. Bependi ka lota. Barson pahle jab ek five-star hotel me BJP ka sammelan chal raha tha, to ek swimming pool ke andar apni donon taange daal-kar PTC kar raha tha. Aisa log patrkarita ke naam par kalank hain.

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  • Deepak Kumar says:

    जगमोहन जी…..सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा….आपने बात पते की…की है……साधुवाद….इतनी साफगोई से आप जैसे कोई वरिष्ठ पत्रकार ही कह सकते हैं…..

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  • नरेन्दर says:

    बहुत खूब साहब, दिल खुश कर दिया। शुक्रिया

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  • mirchinamak says:

    जगमोहन भईया छोटा मुंह और बडी बात पर हमाम में सभी नंगे है क्या दीपक और क्या बर्खा दत्ता ….

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  • futela ji aap pahle clear kar lo chahte kya ho aur ha kafi andar tak ki khabre rakhte ho lagta hai berojgar hai =========isislye bade bade logo pe coment karte rate ho app=

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  • काहे सुनेगें मौका जो मिला है टीआर पी का इस आंदोलन में मीडिया की जो भूमिका है वो देश में आरजकता फैलाने की थी लेकिन भला हो इस देश के लोगों का जो मीडिया को जमकर ———अरे दस लोग जलूस लेकर क्या निकल रहे थे पूरा शहर ही आंदोलन की चपेट में दिखा रहे थे , हां मीडिया के इस नेक दरिया दिल का फायदा कुछ लोगों ने खुब उठाया नंगे होकर फोटो खिचवाएं को कई यज्ञ किया मीडिया चिखती रही लोग फोटो खिचवाते रहे भले उन्हे जनलोकपाल और लोकपाल में क्या अंतर मालूम यह पता नही हो । और आपने एक बात लिखी है कि नाम लिखे जाते थे कि कल अखबार इसी बहाने और बिकेगा । मान्यवर यहां तो फोटो छप रहा है तो जाहिर है अखबार ज्यादा बिकेगा यही खेल चल रहा है जहां इलेक्ट्रानिक मीडिय़ा टीआरपी के लफडे में फंसी वही अखबार अपने सर्कुलेशन के चक्कर में भगवान इस देख का भला करे अन्यथा मीडिया तो कर चुकी इस देश का भला। एक बात और आपने लिखा करनथापर जी का इन्टरब्यू महोदय यह वही वक्त है जब सबू पर चिखने के कारण भारी पड़ा जाय तो ये वही लोग है करन जी का मुंह बंद हो खुला हो इससे इनको कोई सरोकार नही बस ये टीवी पर चिखते ही रहते है। और चिखने दिजिए अगले हफ्ते टीआरपी आयेगी तो पता चलेगा कितना चीखे और इनके चैनल को कितना फायदा हुआ अंत में आपको धन्यवाद

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  • Rahul Kumar Thakur says:

    dipak chourasia bhale hi media ka apne ko mathadhis man le,lekin unki reportng me banawatipan aur badha chadhakar pes karne ki baat surru se hi hai.reporting me anadar karna purani fitrat hai.

    Reply
  • puran chand says:

    बहुत बढ़िया जगमोहन जी ,

    ये दीपक चौरसिया तो शक्ल से ही चोर लगता है .

    एंकरिंग के बदले बन्दर की तरह बाजीगरी करता है .

    भूसनी का, भाव-भंगिमा ऐसे बनाता है , जैसे देश यही चला रहा हो .

    ऐसे ही अनपढ़ हिंदी मीडिया की माँ -बहन कर रहे हैं .

    दीपक चौरसिया रेल बजट पर ममता बनर्जी का interview लेने गया तो डर से

    इसकी बोलती बंद हो गयी थी . हलक से आवाज़ नहीं निकल रही थी .

    टीवी पर इस सीन को देखकर दुःख हुआ था कि कैसे -कैसे लोग इस पेशे में आ गए हैं .

    ये कल्लू आशुतोष टीवी पर तो हगता ही है, अख़बारों में भी हर हफ्ते हग मारता है .

    दूसरे फ्रीलांस पत्रकारों के अवसर खा रहा है .

    आज ही “हिन्दुतान” में पता नहीं किस तरह की लप्पेबाज़ी लिख गया है.

    शशिशेखर इसलिए छाप रहे हैं , ताकि आशुतोष अपने चैनल पर बुलाता रहे .

    अच्छा धंधा है. अख़बार और चैनल न हुआ, खाला का घर हो गया .

    कुछ भी बोल दो , कुछ भी दिखा दो .

    करण थापर ने कल्लू को बुलाकर ही गलती की.

    आशुतोष तो करण के चपरासी के लायक भी नहीं है .

    अपने हिंदी चैनल पर दिन भर कचरा दिखाता रहता है .

    कांशीराम से थप्पड़ खाकर खुद को गौरवान्वित महसूस करता है .

    शर्मनाक हैं ऐसे लोग !

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  • jagmohan ji namaskar
    acha artikal hai
    vaise aap ne kon ci kam dabanggiri ki hai jab aap total tv beauro ship me the
    by the way abhi aap kaha par ho

    Reply
  • jagmohan ji namaskar
    acha artikal hai
    vaise aap ne kon ci kam dabanggiri ki hai jab aap total tv beauro ship me the
    by the way abhi aap kaha par ho

    Reply
  • Deepak Tiwari says:

    सर जी पुतले तो कई बार हमने भी जलवाले है अपनी सुविधा आनुसार क्योकि हर जगह टाइम से पहुचना मुमकिन नहीं होता था, मगर मीडिया में एसी बहुत मंडी है जंहा देश को जलाने का सौदा किया जाता है, एसे छिछोरे टईप के पत्रकार हर जगह मिलते है जो खबरों को अपने हिसाब से बनाते है और धंधा करते है! इनके बारे में ज्यादा कहना अपना मूड ख़राब करना है! किसी ज़माने में दीपक चौरसिया, प्रभु चावला जी की कहानिया अच्छी लगती थी, लेकिन जब से इन्होने राखी सावंत का इंटरव्यू जिस अंदाज से लिया है,तब से खुद से घृणा करने लगा हूँ! सच कहू तो पुण्य प्रसून वाजपेयी, कमल खान ,रवितेश और विनोद दुआ इनके आलावा किसी और की शकल टीवी में देखने का मन नहीं करता खबरे तो बहुत दूर की बात है !

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  • Sonu Upadhyay says:

    महोदयर बिल्‍कुल 100 फीसदी सही बात कह रहे हैं… रामलीला मैदान पर रामदेव के साथ भी वही किया .. और अब भी यही कर रहे हैं.

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  • rajendra sharma says:

    jagmohan ji apne bahut badiya bat batai, dhanyavaad, kya kare aaj ka dour hi kuchh asa chal raha hai. admi dikhta kuchh hai our hota kuchh hai. mai apki bebak lekhni ko salalm karta hu.

    Reply
  • मै मृनाल पान्डेय की “अपनी गवाही” की याद ताजा कर कुछ सोचने को मजबूर हुआ।

    Reply
  • 13dec 2001 ko me sansad me tha dipak chorasyiya andar tha hi nahi vo to bad me aaya aur aajtak par bam ki khabar batata raha. khud sab khatam hone ke bad andar ja paya tha.

    Reply
  • Tarkeshwar Mishra says:

    बधाई ! जगमोहन जी आप ने एक घटना के माध्यम से पत्रकरों की भावी पीढ़ी के लिए एक सबक पेश किया है. आशा है इस लेख को हम सभी पत्रकार आत्मालोचना के रूप में ग्रहण करेंगे. ये पत्रकार बिरादरी के लिए , जिसे आम लोग अभी भी सम्मान की नजर से देखतें हैं, “निंदक नियरे राखिये” वाली बात है.

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  • जगमोहन फुटेला says:

    सच, सच बहुत कड़वा होता है. मुद्दई तो मुद्दई कई बार चमचे भी भडवागिरी पे उतर आते हैं. चरित्रहनन की हद तक. एक भाई ने पूछा है कि मैं दीपक के पीछे पड़ा हूँ. भैया, जो बात मैंने लिखी, उसकी बात करो. मैं आपको क्या, दीपक को क्या, स्टार न्यूज़ को चैलेंज करता हूँ कि जिस इंटरव्यू में अन्ना के लिए दीपक के मुंह से ही सही जो शब्द उसने प्रसारित किए उनको झुठला कर या प्रसारित किए ही हैं तो जायज़ ठहरा कर बताये. करे हिम्मत प्रोमो चलाने की कि अन्ना आन्दोलन को मज़ाक बताने वाला कार्यक्रम फलां दिन फलां समय फिर प्रसारित किया जाएगा. मुझे चिंता किसी दीपक की नहीं उस उजाले की है जिस में अभी मुझ आप जैसे लोगों को बहुत काम करना है.

    एक भाई ने मेरे ब्यूरो चीफ रहते दबंगई की बात कही है. मैं चाहूंगा कि वे ज़रा इसका खुलासा कर दें कि किस अर्थ में कह रहे हैं. इमानदारी से की बता रहे हैं तो धन्यवाद. बेईमानी बता रहे हैं तो खुलासा ज़रूर करें. कभी किसी की दारु पी तो हो बता दें. कभी किसी से कोई गिफ्ट लिया हो तो बता दें. कभी किसी स्कूल कालेज में अपने बच्चे के एडमिशन के लिए गया होऊं तो बता दें. कभी किसी भी नौकरी के लिए बायोडाटा नौकरी लगने से पहले दिया हो तो बता दें और किसी की नौकरी लगाने के लिए उस से पैसा लिया हो तो भी बता दें.

    एक साहब ने पूछा है मैं लिखता हूँ, कहीं बेरोजगार तो नहीं हूँ?… लिखने का शऊर अगर बेरोज़गारी से ही आता है तो भगवान करे बेरोजगार आप भी हों. सकारात्मक, सार्थक आलोचना के लिए सभी का धन्यवाद.

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  • sanjay thakur says:

    sir, aapka aarticle vaakai bhot achha tha…but aajkal patrakaar ko wahi karna padta hai jo uske channel ki demand hoti hai…..isliye har galti ke liye patrakar ko hi dosh dena thik nai hoga…..aur jaisa ki har ungali samaan nahi hoti,,,waise hi har patrakar ko ek taraju me taulna thik nai hoga……..

    sanjay thakur,,,,bansal news jagdalpur

    Reply
  • A.K.Tiwari (Kushinagar U.P.)
    dipak chaurasia ji khabar ko tod kar to pesh nahi karate hai, khabar to sahi hi pesh karate hai, agar aap ko lagata hai ki badha kar pesh karate hai to yah aapkaa najariyaa hai, kisi ke upar aarop lagane ke pahale apane girebaan me jhaank kar dekhanaa chahiye….

    Reply
  • Dileep dudi rajasthan patrika says:

    jagmohanji aapne jo ramayan likhi hai is par kitne log vishwas karenge. ye bhi to janna jaruri hai…. media ganda nahi… media me kuch log galat aaye huye hai jo kichad uchal rahe hai…

    Reply
  • Jagmohan Phutela says:

    Aap ke vishvaas karne ya na karne se ye sach naheen badal jaayega Dileep Dudi ji ki deepak ne Anna ke aandolan ko mazaak bataaya aur star news ne usko chalaaya bhi…. Fir bhi aapko ye ramayan lagti hai to ye aapki soch hai. Usko salaam!

    Reply
  • manish chaturvedi says:

    bahut hi gatia vichaar hai. patrakarita ke sataye hue bhi lagte hai tabhi deepak aur aashutosh ke bare me bak kar apne ko unke kad ke sath naap rahe hai.

    Reply
  • jagmohan ji ,
    namskar aapne very frenkli journlist ke bare me likha he yah kabiletarif baat he aapke is prayas ke liye koti -koti pranam
    p.d.soni
    sampadak JANMAT YUG gwalior [m.p.]

    Reply
  • anand pratap says:

    Maine aapki lekhni thoda der me padhi……pr jo aapne news channelon ki riporting ka bariki se vislesan(analysis) kiya hai vo kabile tareef hai….iske liye apka jabab nahi….. mere jile me sahara samay k ek Reporter ne ek adhbane sarkari collage ki building ki FARGI Reporting karne k liye uske ek kamre me sarab ki kuch khali botlen or kuch door pr apne pahchan k ladko ko Taas khelte hue baitha diya………or yahi nahi uske ujaad pade campus me kuch janbar gaay or gade hankkar le aae or unke VISUAL lekr reporting kr li…Is fargi ki gai reportig ko sahara samay ne ek baar nahi 4-4 baar dabakr chalaya….news channelon ki riporting me esi ek nahi kai baate hoti hain jinki baad me hum pramanikta(Authenticity) siddh nahi kr sakte. aap parde me dekhnge aapko sahi nazar aaega pr uski asliyat kya hai isko samajane k liye sayad uski tah tak jana pade…

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