पत्रकार कहीं क्रांतिकारी हिंसा की ओर न जाने लगे

पत्रकारिता में जिस तरह से पूंजीवादी शक्तियों का शोषण बढ़ता जा रहा है, उसे देखते हुए ऐसी संभावना बन सकती है कि पत्रकार क्रांतिकारी हिंसा का रास्ता अपनाकर चुन-चुन कर उन लोगों को मारे जो इस मानवीय क्षेत्र को पाशविक शोषण का शिकार बनाए हुए हैं. पत्रकारिता में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं, जिनके अंदर खुदी राम बोस, चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह वाला ज़ज्बा पलता है, लेकिन इस देश में उस ज़ज्बे की चिंगाड़ी को शोला बनाने वाली विचारधारा का अभाव है.

पूरे विश्व के इतिहास में दो विरोधी धारा हमेशा आपस में द्वन्द्व करते रहे हैं. पूंजीवादियों ने शोषण को जायज ठहराया और शोषण के नए-नए तरीके विकसित किये. वहीं शोषित लोगों ने हथियार उठाकर या अहिंसक तरीके से उनका प्रतिरोध करते रहे. आज का समय अहिंसक तरीकों से विरोध करने का नहीं है. इस तरीके से अब अब शैतानी ताकतों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता.

आज के युग में व्यक्तियों के एकजुट होकर आंदोलन करने का भी समय नहीं रह गया है क्योंकि सभी अपनी अपनी समस्याओं के समाधान की चिंता में रहते हैं और उनकी समस्या का समाधान होते ही वो दूसरों की समस्या भूल जाते हैं. मैं ऐसे कई पत्रकारों को जानता हूँ, जो जब तक शोषित रहे तब तक पत्रकारिता जगत को शोषण मुक्त बनाने के लिए आंदोलन की बड़ी-बड़ी बातें करते रहे, लेकिन जैसे ही उनकी समस्याओं का समाधान हुआ यानी उन्हें अच्छे वेतन की नौकरी मिली, वे सब भूल गए.

ऐसी हालत में एक व्यापक आंदोलन की संभावना क्षीण है. मार्क्सवादी नज़रिए से भी इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता क्योंकि सर्वहारा पत्रकारों में कई तरह के वर्ग हैं. उनमे आपसी फूट है इसलिए ऐसा नारा तो बेकार है कि ‘भारत के सभी पत्रकारों एक हो.’ दरअसल शोषण करनेवाली बिरादरी भी पत्रकार ही है जिनको ऊँचा वेतन दिया जाता है.

इसलिए अब खुदीराम बोस, चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह वाली विचारधारा के जिंदा होने का समय आ गया है. आज की पूंजीवादी शक्तियां अंग्रेजों से भी ज्यादा खतरनाक हैं, ये समाज और देश के लिए घातक हैं. इसका खात्मा अहिंसक तरीके से कठिन ही लगता है. उम्मीद है कि भविष्य में पत्रकारों की छोटे-छोटे समूह शोषण से उबकर क्रांतिकारी हिंसा करेंगे और ऐसे शोषकों को चुन-चुन कर मारेंगे. पत्रकारों जैसे बुद्धिजीवी वर्ग का जिस तरह से भयानक शोषण हो रहा है वह एक न एक दिन मजबूर होकर हथियार उठा ले, तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

लेखक राजीव सिंह पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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Comments on “पत्रकार कहीं क्रांतिकारी हिंसा की ओर न जाने लगे

  • dusaro ki aawaj uthanewale aaj itane shoshit hai ki Gar Aur bahar dono jagar hey ki drasti se dekhe jate hai. gar-ristedar aur dosto ki kushi-gum me shamil nahi ho pate hai. paper prabhandhan ke kam aur adever. ke liye balckmailing karte-karte patrkar ko inlogo ne najaro se gira diya hai. in sabke baad bhi patrkar ke hi peechhe prabhandhan padha rahta hai. shayad inhe apne kad se uchh patrkaro ka kad lagta hai. ary koi inhe batae ki aaj jab log Rs. kamane ke liye MBA, Eng. Sahit any job me ja raha hai. vahi kam salary ke bad bhi patrkar banane ki chah kuchh long rakte hai. ye sirf likhna hi jante hai. ye baat prabandhan samjh le. inhe aap na moti rakam dete hai aur na ye log kahi aur se kamate hai. ha prabandhan ke liye jaroor dalali kar dete hai. agar inlongo ki harkat sodhari nahi to vo din door nahi jab maliko ke khilaf hi patrkar maorch kholege.

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  • मदन कुमार तिवारी says:

    भाई शोषण की बात को पहले किनारे रखें और यह सोचें की पत्रकार कौन है। ? बहुत कमदिनों से शौक पैदा हुआ। पेशे से वकील हुं। लिखना शुरु किया, लोगो को भाया भी लेकिन तथाकथित जमें जमायें मठाधीशों ने मुहं पीछे गालियां देना शुरु किया । एक दो प्रेस कांफ़्रेस भी अटेंड किया , बिहार में चुनाव का माहौल है । नक्सल पुलिस में खुब चल रही है। चार आदमियों को बोधगया से दिन दहाडे सी आर पी एफ़ वाले उठाकर अपने कैंप में रखकर यातना दे दे कर पुछ ताछ ्कर रहे थें , मैने एस एस पी , सी आर पी एफ़ कमांडेंट से पुछा आखिर ४ दिनों तक कीस कानुन के तहत और कैंप में क्यों रखा है। ४०-५० तथाकथित पत्रकार बिरादरी के लोग जिलाधिकारी के प्रेस कांफ़्रेंस में थें उनमें से दो , दैनिक जागरण के पंकज और हिन्दुस्तान के सतीश मिश्रा के अलावे कोई भी एक प्रश्न नही पुछ रहा था । वह दोनो भी वह हीं पुछ रहें थें जो पहले बताया जा चुका था .लगता।था सब कुछ मैनेज है या यहां चमचों की हीं भीड है। मैने एस एस पी अमित लोढा से पुछ डाला क्यों बंधक बनाये हो ४ दिनों से , जबाब सुनकर लगा या तो पुलिस वालें कानून जानते नहीं अगर जानते हैं तो उसको ठेंगें पर लेकर चलते है । खैर अब आपकी बात करता हुं , आप भी तो पाठक का शोषण करते हैं । सरकारी महकमें के भ्रष्टाचार निकाले कि वि्ग़्यापन बंद , अफ़सर के खिलाफ़ लिखा तो दलाली का धंधा बंद । एक और बात एलेक्ट्रोनिक मीडिया का कैमरा और माईक लेकर घुमने वाले करीब – करीब सभी ब्लैक मेलर हैं , ईनको पहले जेल भेजवाओं उसके बाद सही पत्रकारों का शोषण करने वालों के खिलाफ़ लडो वह भी तरीके से । अपनी आत्मा को मारकर जिंदा रहने वाले क्रांति की बात नहीं करते ।

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