पेड न्यूज : मालिक पकड़ा जाए, पत्रकार नहीं

शेष नारायण सिंह: क्योंकि पैसा तो मालिक खाता है, माध्यम बनता है पत्रकार : चुनाव में पेड न्यूज के चलते लोकशाही पर मुसीबत संभव : सोमवार को सभी पार्टियों के नेताओं के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त ने नयी दिल्ली में बैठक की और उनसे पैसा लेकर खबर लिखने और प्रकाशित करने की समस्या पर बात की.

लगभग सभी पार्टियों की राय थी कि चुनाव आयोग ने जो खर्च पर सीमा बाँध दी है उसकी वजह से पेड न्यूज़ का सहारा लेना पड़ रहा है. नेताओं ने कहा कि जुलूस, पोस्टर, भोंपू और अखबारों में विज्ञापन पर लगे प्रतिबन्ध की वजह से सभी पार्टियां अपनी बात पहुंचाने के लिए कोई न कोई रास्ता तलाशती हैं और पेड न्यूज उसमें से एक है. नेताओं ने इस मुसीबत से छुटकारा पाने के लिए चुनाव आयोग से आग्रह तो किया लेकिन यह भी सुझाव दिया कि इस से बचने का सबसे महत्वपूर्ण तरीका यह होगा कि चुनाव आयोग प्रचार के पुराने तरीकों पर लगी पाबंदी पर एक बार और नज़र डाले और यह जांच करे कि क्या पुराने तरीकों की बहाली से हालात सुधारे जा सकते हैं.

बीजेपी के प्रतिनिधि ने कहा कि पेड न्यूज़ की वजह से निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा को ज़बरदस्त चुनौती मिल रही है और इसे फ़ौरन रोका जाना चाहिए. बीजेपी के इस सुझाव का सभी पार्टियों ने समर्थन किया. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के बासुदेव आचार्य ने कहा कि पेड न्यूज़ को भ्रष्ट आचरण की लिस्ट में डाल देना चाहिए जिससे अगर कोई पेड न्यूज़ के बाद चुनाव जीतता है तो उसका चुनाव रद्द किया जा सके. लेकिन उन्होंने कहा कि इस सारे खेल में पत्रकारों की सुरक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए और सज़ा का भागीदार मालिकों को ही बनाया जाना चाहिए क्योंकि पेड न्यूज़ में पैसा मीडिया संस्थानों के मालिक ही खाते हैं, पत्रकार नहीं. उनका कहना था कि अगर यह सुनिश्चित न किया गया तो हर केस में बलि का बकरा पत्रकार ही बनाया जाएगा.

बीजेपी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों पर उठ रहे सवालों की बाकायदा जांच करने का आग्रह किया और कहा कि कुछ ऐसा किया जाना चाहिए जिससे इन मशीनों में पड़े वोटों का कोई कागजी रिकार्ड भी बन जाय जिससे मन में उठ रही शंकाओं को शांत किया जा सके. चुनाव में धन की बढ़ रही भूमिका पर भी चिंता जताई गयी और चुनाव आयोग से निवेदन किया गया कि इस पर भी उनकी पूरा ध्यान जाना कहिये. मुद्दा राजनीति के अपराधीकरण का भी उठा लेकिन कोई भी पार्टी अपराधियों को चुनाव लड़ाने के बारे में संभावित सख्ती से सहमत नहीं थी. चुनाव आयोग समेत देश के सभी ठीक सोचने वाले लोगों में आमतौर पर एक राय है कि राजनीति के अपराधीकरण के ज़हर को ख़त्म करने के लिए पार्टियों को ही आगे आना पड़ेगा लेकिन अभी इस मसले  पर राजनीतिक आम राय कायम होने में वक़्त लगेगा.

राजनीति के अपराधीकरण के बाद सबसे बड़ा ज़हर मीडिया संस्थानों की पैसे लेकर खबर लिखने की प्रवृत्ति है. इस बात में कोई दो राय नहीं है कि पेड न्यूज़ की वजह से लोकशाही की बुनियाद पर ही हमला हो रहा है. पिछले चुनावों में यह बात बहुत ज्यादा चर्चा में रही. नतीजा यह हुआ कि एक ही पेज पर उसी क्षेत्र के तीन तीन उम्मीदवारों की जीत की मुकम्मल भविष्यवाणी की खबरें छपी देखी गयीं. दिल्ली विधान सभा चुनाव के दौरान एक दिन एक बहुत बड़े अखबार में खबर थी कि मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ कोई राजीव जी पक्के तौर पर जीत रहे हैं. खुशी हुई कि चलो स्थापित सत्ता की एक बड़ी पैरोकार की हार से सत्ताधारियों को कुछ सबक मिलेगा.

ढूंढ कर राजीव जी को तलाशा. एक राष्ट्रीय पार्टी के उम्मीदवार थे. अपनी जीत के प्रति वे खुद आश्वस्त नहीं थे बल्कि वे अपनी हार को निश्चित मान रहे थे. मैंने कहा कि अखबार में तो छपा है. उन्होंने कहा कि यह तो मैं आपके लिए भी छपवा दूंगा अगर आप सही रक़म अखबार के दफ्तर में जमा करवा दें.  कई लोगों से इसका जिक्र किया. सबके पास ऐसी ही कहानियाँ थीं. उसके बाद तो दुनिया जान गयी कि पेड न्यूज़ का ग्रहण मीडिया को लग चुका है और वह लोकशाही के लिए दीमक का काम कर रहा है. अपने जीवन काल में प्रभाष जोशी ने पेड न्यूज़ के मामले पर बहुत काम किया था और जनमत बनाने की कोशिश की थी लेकिन जल्दी चले गए. अब भी बहुत सारे पत्रकार इस समस्या से चिंतित हैं और कोई राह निकालने की कोशिश चल रही है. वरिष्ठ पत्रकार प्रनंजोय गुहा ठाकुरता इस सन्दर्भ में एक अभियान चला रहे हैं. उम्मीद की जानी चाहिये कि बहुत जल्दी पेड न्यूज़ की मुसीबत से भी लोकतंत्र को छुटकारा मिलेगा.

लेखक शेष नारायण सिंह जाने-माने पत्रकार हैं. एनडीटीवी समेत कई न्यूज चैनलों-अखबारों में काम कर चुके हैं. पत्रकारिता में जनपक्षधरता के लिए अलख जगाने वाले शेषजी इन दिनों स्तंभकार के रूप में कई जगह अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

Comments on “पेड न्यूज : मालिक पकड़ा जाए, पत्रकार नहीं

  • Ekdam sahi baat kahi, Shesh ji Aap ne ! Kyonki Media mein naukari karne waale patrakaaron ke paas koi adhikaar to hota nahi aur bhavishya ka koi ata-pata nahi lagta , Lihaaza apni bhaashaa ko kisi aur ka gulaam banaate der nahi lagate. Aakhir, Paapi pet ka sawaal hota hai ! Jaisa Maaliqaan kahte hain, waisa hi wo karta hai ( Ye baat aur hai ki Naukari se hath dhone ke baad wo *BADI-BADI* baatein kar ne lagta hai ). Kathputali to hain hi hum sab . Agar aisa na hota to paid news ke bal-bute, patrakaarita karne waalon ka wajood hota ?
    Kuch dino pahle ek bade patrakaar ne paid news ka virodh karne ke bawjood kaha ki *Hum vigyaapan dene waale bade gharaanon ka virodh nahi kar sak te, kyonki hume bhi to channel chalaana hai* ! In bade patrakaar mahoday ki baat mein dam hai ! Par ek buniyaadi sawaal ki – Jab Aap Paise waale ya Taqatwar aadmiyon ( jo vigyaapan dene ke bahaane, Vichaaron aur Nishpakshta par kabza kar lete hain) ke khilaaf KHABAR nahi chala sakte to Media ka maaliq ban ne ka uddeshya kya tha ? Choti machliyon ko pakad-na ? Desh ki Disha aur Dasha ko prabhaawit karne waale ,Sattadhaari aur Industrialists ke khilaaf agar aap khabar nahi chala sakte to TV channels ya News Paper ka maqsad kya hai ?
    UMMID ! is maqsad se hum sab waaqif hain ! Kyonki paisa bolta hai ! TV par bhi aur News paper mein bhi.

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