प्रभाष जोशी ही नहीं, आलोक तोमर और उनकी पत्नी सुप्रिया का भी किया गया अपमान

प्रभाष जी के निधन के बाद उनकी स्मृति को संजोने के लिए न्यास बनाने का विचार उनके करीबी लोगों व परिजनों के दिमाग में आया तो न्यास के नामकरण का काम आलोक तोमर ने किया. आलोक तोमर के मुंह से निकले नाम को ही सबने बिलकुल सही करार दिया- ”प्रभाष परंपरा न्यास”. प्रभाष जोशी नामक शरीरधारी भले इस दुनिया से चला गया पर प्रभाष जोशी संस्थान तो यहीं है. प्रभाष जी की सोच, विचारधारा, सरोकार, संगीत, क्रिकेट, लेखन, जीवनशैली, सादगी, सहजता… सब तो है..

और उनसे जुड़े लोग शिद्दत से महसूस करते हैं कि प्रभाष जोशी की जो स्टाइल है, जो दर्शन है, जो जीवनशैली है… उसे समवेत रूप में कहें तो जो परंपरा है, उसको आगे बढ़ाया जाना चाहिए. इसी कारण आलोक तोमर के मुंह से निकले ‘प्रभाष परंपरा’ को कोई खारिज नहीं कर पाया क्योंकि ये दो शब्द खुद ब खुद प्रभाष जोशी नामक शरीरधारी के न रहने और प्रभाष जोशी नामक संस्थान के काम को आगे बढ़ाने की जरूरत महसूस कराने के लिए बिलकुल सटीक लगे. तो, इस ”प्रभाष परंपरा न्यास” का गठन हुआ. लेकिन हद देखिए कि कुछ लोगों ने उसमें न्यास में आलोक तोमर को ही शामिल नहीं होने दिया. जिस प्रभाष जोशी और आलोक तोमर के नाम को जनसत्ता का पर्याय माना गया और जो आलोक तोमर दुनिया भर को डंके की चोट पर बताता रहा कि प्रभाष जोशी मेरे गुरु हैं, पिता तुल्य हैं, भगवान हैं, उनसे कोई पंगा लेगा तो नंगा कर दूंगा… और ऐसे पंगों के अनेक मौकों पर आलोक तोमर लाठी लेकर प्रभाष विरोधियों को नंगा करने दौड़ पड़े…. उन्हीं आलोक तोमर को प्रभाष परंपरा न्यास में शामिल नहीं किया गया.

कहते हैं, अच्छे लोग जल्द दुनिया छोड़ जाते हैं. प्रभाष जोशी चले गए तो उनकी याद को अमर रखने के लिए और उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए न्यास का नामकरण करने के बाद एक दिन आलोक तोमर भी इस फानी दुनिया को नमस्ते कर चले. आलोक तोमर को इंदौर के लोग बहुत चाहते थे. आज भी चाहते हैं. इंदौर प्रेस क्लब के बुलावे पर वे पिछली बार भाषाई पत्रकारिता महोत्सव में इंदौर गए भी थे, अपनी पत्नी व पत्रकार सुप्रिया रॉय के साथ. आलोक तोमर के अचानक निधन से छाए मातम के बीच इंदौर प्रेस क्लब ने घोषणा कर दी कि वे लोग हर साल भाषाई महोत्सव में एक यशस्वी पत्रकार को आलोक तोमर की स्मृति में पुरस्कार देंगे ताकि आलोक तोमर के नाम व काम को जिंदा रखा जा सके और उनके इंदौर से लगाव को भी याद किया जा सके.

इस घोषणा के बारे में बाकायदे खबरें भी प्रकाशित हुई. पर जब आलोक तोमर के नाम पर पुरस्कार देने का मौका आया तो किसी को आलोक तोमर और उनकी पत्नी का नाम ही याद नहीं आया. इंदौर प्रेस क्लब और प्रभाष परंपरा न्यास की तरफ से जो दो दिनी महोत्सव इंदौर में आयोजित किया गया, उसमें आलोक तोमर का कोई नामलेवा न था. और तो और, आलोक तोमर की पत्नी और पत्रकार सुप्रिया जी को बुलाया तक नहीं गया. हालांकि कार्यक्रम होने के काफी पहले सुप्रिया जी से कहा जाता रहा कि आलोक तोमर की स्मृति में एवार्ड दिया जाना है इसलिए आपको आना ही पड़ेगा, आप अपनी मेल आईडी दे दीजिए ताकि आपको टिकट भेजा जा सके आदि इत्यादि. पर बाद में किसी को याद नहीं रहा कि आलोक तोमर की स्मृति में पुरस्कार दिया जाना है और यह भी कि सुप्रिया जी को न्योता देकर भी टिकट नहीं भेजा गया. और न ही किसी ने उन्हें फोन कर न बुला पाने के लिए खेद प्रकट किया.

कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि पूरी राजनीति रामबहादुर राय की है. आलोक तोमर को जीते जी भी राम बहादुर राय ने इसलिए पसंद नहीं किया क्योंकि आलोक तोमर उनकी लकीर के फकीर नहीं बने. आलोक तोमर अपने अंदाज में बिंदास और बेबाक लेखन करते रहे और इसी शैली में जीवन जीते रहे. आलोक तोमर ने जरूरत पड़ने पर राम बहादुर राय का विरोध भी किया. राम बहादुर राय के करीबियों का कहना है कि राय साहब की ये आदत है कि वे जहां होते हैं, वहां अपने अलावा किसी और की चलने नहीं देते और इसका भी ध्यान रखते हैं कि कोई और उनसे महान न बन जाए. यही कारण है कि इस बार राम बहादुर राय के आभामंडल में इंदौर प्रेस क्लब इस कदर उलझा कि काफी कुछ गोड़गोबर हो गया.

राम बहादुर राय खुद जहाज के टिकट से इंदौर गए और कार्यक्रम खत्म होने पर जहाज से ही इंदौर से सीधे दिल्ली लौट आए. पर उन्होंने करीब ढाई दर्जन छोटे-बड़े पत्रकारों को ट्रेन के स्लीपर से उमस भरी गर्मी में दिल्ली से इंदौर भेजा. लौटने के लिए स्लीपर का भी टिकट कनफर्म नहीं हो सका इस कारण 25 से ज्यादा पत्रकार बिना वजह 48 घंटे से ज्यादा इंदौर में यहां-वहां पड़े रहे. ये परेशान हाल पत्रकार आपस में बतियाते रहे कि धन्य हैं हमारे महान पत्रकार जो हमको सादगी का पाठ पढ़ाकर स्लीपर ट्रेन में बिठा गए और वह भी टिकट बिना कनफर्म कराए, और खुद जहाज से उड़ चले. ऐसे पाखंड भरे माहौल में कोई क्या किसी से सबक लेगा और कोई क्यों प्रभाष जी की परंपरा को समझ पाएगा.

चलिए, आलोक तोमर के नाम पर कार्यक्रम नहीं हुआ या उनके नाम वाला घोषित एवार्ड नहीं दिया गया लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वहां एवार्ड का कार्यक्रम ही नहीं हुआ. वहां पुरस्कार प्रोग्राम जमकर हुआ और थोक के भाव में पत्रकारों को पुरस्कार बांटे गए. ऐसे ऐसे पत्रकारों को पुरस्कार दिए गए जो दलाली और बदनामी के शिरमौर हैं. सहारा समय के एमपी छत्तीसगढ़ हेड मनोज मनु इसके उदाहरण हैं जिन्हें हाल में ही मध्य प्रदेश सरकार ने सर्टिफिकेट दिया है कि उनके आने से उनके चैनल को विज्ञापन मिलने लगा है और वे बहुत अच्छे से सब कुठ बना-बुझा कर रखते हैं, सो, इस कारण वे महान पत्रकार हैं.

महानता के सरकारी सर्टिफिकेट पर पत्रकारिता में महान बने लोगों को अगर प्रभाष परंपरा न्यास पुरस्कृत करा रहा है या पुरस्कृत किए जाने को मौन सहमति दे रहा है तो इसे शर्मनाक ही कहा जाएगा. और, इंदौर प्रेस क्लब को भी यह सोचना चाहिए कि आखिर वे अपने पुरस्कारों को किस दिशा में ले जा रहे हैं. मनोज मनु तो सिर्फ एक उदाहरण मात्र हैं. पुरस्कृत कई पत्रकारों के नाम और उनके नेक-अनेक काम गिनाए जा सकते हैं. ये दौ कौड़ी के दलाल टाइप लोग ठीकठाक ब्रांड नाम वाले मीडिया हाउसों में बड़े पदों पर हैं, इसलिए उन्हें महान मान लिया जाता है, और शायद इसलिए भी कि तू मुझे सम्मानित कर, मैं तुझे ओबलाइज करूंगा वाला कोई अंतरसंबंध होता है.

काश ये लोग भ्रष्टाचार से नाराज उस साहसी युवक को सम्मानित कर पाते जिसने एक बड़े कांग्रेसी नेता से दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस में सरेआम सवाल किया, चप्पल दिखाया और इसी ‘अपराध’ के कारण कांग्रेसी चम्मच पत्रकारों का लात-हाथ खाने को मजबूर हुआ. जाहिर है, उस अदम्य साहसी युवक ने अनेक युवकों को आइना दिखाया और नेताओं को डरने पर मजबूर किया कि ज्यादा यूं ही उड़ोगे तो चपलियाये जाओगे, सरेआम. नेताओं और सिस्टम पर जनदबाव न रहेगा तो यह तंत्र लूटने खाने के लिए ही आपरेट होता रहेगा. यह जन दबाव व जन भय ही है जो तंत्र को लोक के लिए काम करने को मजबूर करता है अन्यथा अपने ओरीजनल तेवर में तो तंत्र लूट खाने को नाम है.  उस युवक सरीखे अनेक युवक हैं जो पत्रकारिता में या पत्रकारिता से इतर बड़ा काम कर रहे हैं, जिन्हें मीडिया को, प्रेस क्लबों को रिकागनाइज करने की जरूरत है. अन्यथा भ्रष्टाचारियों, दलालों और भरे पेट वालों की लंबी लाइन है जो सम्मान लेने के लिए कुछ भी देने को तैयार रहते हैं.

इंदौर से लौटे कई लोगों ने कहा कि वे आगे से प्रभाष परंपरा न्यास के कार्यक्रमों में शरीक नहीं होंगे क्योंकि इसका इस्तेमाल कुछ लोग खुद को चमकाने के लिए कर रहे हैं, न कि प्रभाष जोशी की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए. इस आयोजन ने पाखंड की कई परतें उजागर कर दी हैं. न सिर्फ प्रभाष जोशी की परंपरा अपमानित हुई है बल्कि उनके अजीज शिष्य आलोक तोमर व उनकी पत्नी का भी अपमान किया गया है. किन्हीं जुगाड़ू अफसर की पत्नी स्वाति तिवारी द्वारा प्रभाष जोशी पर लिखित किताब के इस समारोह में लोकार्पित किए जाने के पीछे की सच्चाई की कथा अभी हाल में ही पता चली और भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित भी हुई है.

कोई एक दो पाप या ब्लंडर नहीं हैं, कई बड़े पाप हैं और ये जानबूझकर किए गए हैं या इन्हें मौन सहमति दी गई है. इन पापों के तले दबे इंदौर प्रेस क्लब और प्रभाष परंपरा न्यास के लोग अगर आत्मग्लानि महसूस करें सकेंगे तो संभव है उन्हें खुल दिल वाले संत प्रभाष जोशी और मस्तमौला शेर आलोक तोमर माफ कर दें, अन्यथा बेहयाई भरे जीवन जीने के लिए सारे रास्ते खुले पड़े हैं, चतुर घाघ सरीखी दिखावटी मुस्कान के हर मौके पड़े हैं.

लेखक यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया से जुड़े हैं.

संबंधित खबरें-

  1. अपनी आलोचना के समय खामोश हो जाता है मीडिया उद्योग

  2. प्रभाष जी के जन्मदिन पर इंदौर में उड़ाया गया उन्हीं का मजाक

  3. प्रभाष जी पर किताब लिखने के लिए स्वाति तिवारी ही मिलीं

Comments on “प्रभाष जोशी ही नहीं, आलोक तोमर और उनकी पत्नी सुप्रिया का भी किया गया अपमान

  • मदन कुमार तिवारी says:

    क्य अजीब संयोग है । कल रात को आपका वह एस एम एस जो होली के दिन आपने भेजा था, उसे पढ रहा था और आलोक तोमर जी के बारे में सोच रहा था। राम बहादुर राय जैसे लोग हर जगह भरे पडे हैं। लेकिन अफ़सोस है कि जुते सिर्फ़ नेताओं पर चलते हैं।

    Reply
  • प्रभाष जोशी के स्वयंभू उत्तराधिकारी उनके नाम पर अपनी दुकानदारी चला रहे है .अलोक तोमर इन महान प्रतिभाविहीन छुट्टा पत्रकार के बारे में पिछले साल काफी प्रकाश डाल चुके है . इलाहाबाद के आंदोलनकारी छात्र तो इन्हें ट्रस्ट माफिया घोषित कर चुके है और प्रभाष जोशी के साथ काम कर चुके पत्रकार इनके आयोजन तक में नही जाते है अपवाद वे है जो प्रभाष जोशी के संपादक रहने पर उनके खिलाफ साजिश करते थे वे जरुर इन आयोजनों में मिल जाएंगे .अब उनके नाम पर कोई किताब लिख कर कमाएगा तो कोई आयोजन कर .

    Reply
  • Ravi chandra says:

    यशवंत भाई जी , हद कर दी आपने तो ! चने भूनड़े जैसे सम्मान हर मीडिया हाउस को बांटे गए थे तो उसको भी दे दिया. मनोज मनु ने नेताओं और विज्ञापनदाताओं से प्रेस क्लब अध्यक्ष को फोन करा करा कर परेशां कर डाला था और उन्होंने ओबलाइज कर दिया, इसमें क्या गलत है?

    Reply
  • praveen khariwal says:

    yashwant ji… aap ki sirf aadhe suchna sahi he… supriya ji se mere baat hui the lekin unhone mahotsav me aane k nivedan ko thukra diya tha… uski vajah aap ne batai he… alok ji ne bhe mujai ye baat batai thi… khair indore press club ne alok ji ko nahi bhulaya he,na bhulaige… hum ne award ki ghoshna ke the our diya bhi… 15 varisht patrkaro me se ek manoj manu jo gwalior k he ,ko alok tomer award diya gaya he…aage bhi alokji ke smrtiu me aayojan kiye jaigai…

    Reply
  • प्रभाष जोशी को जिस दिन प्रभात परंपरा बनाया था उसी दिन तय हो गया था कि अब वो नहीं रहे । जब लोग परंपरा बन जाते हैं तो वो सिर्फ कर्मकांड के काम के होते हैं । अब प्रभाष एक कर्मकांड का नाम है । कर्मकांड से या तो पुरोहित का घर और पेट भरता है या आयोजक की छाती थो़ड़ी चौड़ी होती है । जिसकी पूजा होती है या जिस के नाम का पिंड दान होता है उसे सिर्फ ठेंगा मिलता है । सुप्रिया जी एक पल के लिये हो सकता है कि ये अपमान दिल में लगा हो लेकिन इससे आखिर आलोक तोमर बच गए । वर्ना वो भी कर्मकांड बन जाते । कोई उन्हें आहूति का धुंआ सुंघाता और मलाई चाट कर निकल जाता । पता नहीं कितने आलोक के दुश्मन उनके जीवन भर के किये कराये के आलोक से प्रखऱ हो जाते ।
    किसी भी व्यक्ति के बारे में मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता इसलिये राम बहादुर राय या मनोज के बारे में भी नहीं करूंगा । लेकिन पुरस्कार देने वालों के मन में न तो प्रभाष जी के लिये कोई श्रद्धा रही होगी न इनके लिये । ये पुरस्कार तो इन्वेस्टमेंट के लिए दिये जाते हैं । मनोज के पास जब तक सहारा मध्यप्रदेश की सत्ता है वोमहान बने रहेंगे और ऐसे ही उनकी चिट्ठियां तलाशी जाती रहेंगे ।

    Reply
  • vineet kumar says:

    praveen khariwalji
    sada sach bolie agar aapne supriyaji ko koi chitthee bheji hoti ya sammaan se nyotaa hota to itna bawal nahee kattaa. aap bataiye jinke marhoom pati ke nam pe puraskar ho unko hi pata nhee ho ki kise diya ja raha hai?/ wah janab ap kam se kam nirnayak samiti me hi unko rakh sakte the.

    निहायत शर्मनाक !! “बहादुर” लोगों से इस तरह की उम्मीद तो किसी को नही थी. कथनी और करनी का फर्क इसी को कहा जाता है| सम्मान के भूखे ना तो आलोक थे ना सुप्रिया हैं मगर जिस व्यक्ति के नाम पे पुरस्कार दिए जा रहे हों उनकी पत्नी को तो सम्मानित मंच दिया जाना चाहिए क्योंकि वे भी एक मानी हुई पत्रकार हैं और नाना प्रकार की चुनौतियों के बावजूद आलोकजी के सपने को पूरा करने.. डेटलाइन इंडिया को कायम रखने के लिए डटी हुई हैं|

    Reply
  • girish pankaj says:

    रपट पढ़ कर बेहद दुःख हुआ. अब तो यही लगने लगा है, कि टुच्चे लोगों को टुच्चा न कह कर केवल ”महान” कह दो, तो लोग समझ जायेंगे कि क्या कहा जा रहा है. समय के साथ शब्दों के अर्थ भी बदल रहे है. ”नेता ” कहो, तो लगता है किसी की निंदा हो रही है, ”गुरु” कहो, तो ‘घंटाल’ की प्रतिध्वनि आने लगती है. यही हाल ”महान” शब्द का हो रहा है. इस समय जो जितना बड़ा ‘टुच्चा’ है, उतना बडा ‘महान’ है. मीडिया में इस वक्त कोई महान नहीं है, अधिकाँश क्या हैं, यह लिखने की ज़रुरत नहीं. इनडोर में जो कुछ हुआ, वह शर्मनाक था. आयोजको की मती मारी गयी थी क्या? जब सुप्रिया राय से बात हो गयी तो उन्हें ससम्मान बुलाना ही थी. साफ़ है कि किसी ने बीच में टांग अदाई है. इस कार्यक्रम में सुप्रिया को बुला कर आयोजक आलोक तोमर को सच्ची श्रद्धांजली दे सकते थे. लेकिन लगता है, आयोजक ”बड़े महान” किस्म के है. इन्दोर में ऐसे लोग तो नहीं रहते? पत्रकारिता के अन्दर का यह चेहरा कोइ नया भी नहीं है. फिर भी यह घटना बिलकुल ताज़ा है इसलिए एक बार फिर दुःख व्यक्त किया जाना चाहिए. सुप्रिया के दुख को समझने की ज़रुरत है आयोजक सुप्रिया से माफी मांगे.

    Reply
  • डी दयाल says:

    आलोक तोमरजी के नाम पर चल रही इस तरह की “दूकानदारी” की हम कड़े शब्दों में निंदा करते हैं और उम्मीद करते हैं कि आलोकजी के निमित्त जो भी आयोजन किए जाएंगे उसके लिए सुप्रियाजी से जरूर लिखित सहमति ली जाएगी. सुप्रियाजी को जो मानसिक कष्ट पंहुचा है उसके लिए मांग करते हैं कि आयोजक बिना शर्त माफी मांगें वरना उनके खिलाफ “आलोक मित्र मंच” कड़ी कार्रवाई करने के लिए बाध्य होगा.

    डी दयाल
    संयोजक
    आलोक मित्र मंच

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *