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बड़े अखबार ही मीडिया की नैतिकता भूले : ठकुरता

चिंतक, वरिष्ठ पत्रकार और भारतीय प्रेस परिषद के पूर्व सदस्य परंजॉय गुहा ठकुरता का मानना है कि आज पेड न्यूज छाप कर बड़े अखबार ही मीडिया की नैतिकता भूल रहे हैं। यह शर्मनाक है। मीडिया में भ्रष्टाचार व्यक्तिगत से बढ़कर संस्थानिक हो गया है। यह स्थिति देश और समाज के हित में नहीं है। चुनावों के दौरान मीडिया में पेड न्यूज के मामले में भारतीय प्रेस परिषद को चौंकाने वाली रिपोर्ट पेश करने वाले परंजॉय शनिवार को राजस्थान पत्रिका और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि भोपाल द्वारा आयोजित पं. झाबरमल्ल शर्मा स्मृति व्याख्यान दे रहे थे।

चिंतक, वरिष्ठ पत्रकार और भारतीय प्रेस परिषद के पूर्व सदस्य परंजॉय गुहा ठकुरता का मानना है कि आज पेड न्यूज छाप कर बड़े अखबार ही मीडिया की नैतिकता भूल रहे हैं। यह शर्मनाक है। मीडिया में भ्रष्टाचार व्यक्तिगत से बढ़कर संस्थानिक हो गया है। यह स्थिति देश और समाज के हित में नहीं है। चुनावों के दौरान मीडिया में पेड न्यूज के मामले में भारतीय प्रेस परिषद को चौंकाने वाली रिपोर्ट पेश करने वाले परंजॉय शनिवार को राजस्थान पत्रिका और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि भोपाल द्वारा आयोजित पं. झाबरमल्ल शर्मा स्मृति व्याख्यान दे रहे थे।

जयपुर के इंद्रलोक सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में राजस्थान पत्रिका की ओर से सृजनात्मक साहित्य और पत्रकारिता पुरस्कार भी दिए गए। ठकुरता ने कहा कि अखबारों में खबर और विज्ञापन का अंतर समाप्त होता जा रहा है। बड़े अखबार ही मीडिया की नैतिकता को खत्म कर रहे हैं। पेड न्यूज के मामले में भारतीय प्रेस परिषद को दी गई अपनी रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए ठकुरता ने कहा कि यह रिपोर्ट 36 हजार शब्दों और 71 पृष्ठों की थी और इस रिपोर्ट में टाइम्स ऑफ इण्डिया, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, आजतक चैनल जैसे लगभग सभी बड़े अखबारों व मीडिया हाउस का नाम था, यही कारण था कि सरकार को सिर्फ 3600 शब्दों की रिपोर्ट दी गई। उन्होंने इस बात पर खुशी जाहिर की कि इस रिपोर्ट में राजस्थान पत्रिका का नाम नहीं था।

उन्होंने कहा कि आज भी लोग मानते हैं कि हमारी समस्या अखबार में आ जाए तो उस पर सरकार कुछ न कुछ कर देगी, लेकिन अब यह विश्वसनीयता धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। मीडिया में व्यक्तिगत भ्रष्टाचार बहुत समय से है। लेकिन अब यही व्यक्तिगत भ्रष्टाचार संस्थानिक होता जा रहा है। बड़े अखबार विज्ञापनों के बदले कम्पनियों के शेयर खरीद लेते हैं और फिर उन कम्पनियों के बारे में कुछ भी गलत नहीं छापा जाता।

इसे देखते हुए ही सेबी को यह निर्देश जारी करने पड़े कि किसी कम्पनी के बारे में कुछ छापने के साथ अखबार को बताना होगा कि उसका कोई वित्तीय रिश्ता तो नहीं है। इस तरह मीडिया पाठकों के साथ तो बेईमानी कर ही रहा है, बिना रसीद पैसा लेकर देश के कानून का भी उल्लंघन कर रहा है। हालांकि उन्होंने कहा कि निराश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि आम आदमी का विश्वास आज भी पत्रकार पर कायम है। इस विश्वास को और ताकत देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि राडिया टेप ने यह साबित कर दिया कि मीडिया अब मंत्री व विभाग भी तय कर रहा है। ठकुरता ने कहा कि पत्रकार को वॉचडॉग माना जाता है, लेकिन यह ध्यान रखिए कि वॉचडॉग कई तरह के होते है। काटने वाले, भौंकने वाले, कुछ अमीरों और पूंजीपतियों की गोद में बैठ जाते हैं, लेकिन कुछ ऎसे होते हैं जो अंधे को रास्ता पार कराते और विस्फोटकों का पता लगाकर निष्क्रिय करते हैं।

विश्वास बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती : समारोह की अध्यक्षता करते हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति वीके कुठियाला ने जनता का विश्वास बनाए रखना मीडिया के सामने बड़ी चुनौती बताई। शोध और अनुभव के आधार पर उन्होंने माना कि मीडिया की विश्वसनीयता में कमी आई है। साथ ही पेड न्यूज और सुपारी पत्रकारिता जैसी विकृतियां चर्चा में आई हैं। पेड न्यूज की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि प्रेस परिषद की प्रभावी भूमिका सुनिश्चित होनी चाहिए, वहीं सरकार की ओर से कन्टेन्ट रेगुलेशन एक्ट लाने के प्रयास पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रयास है। ऎसा करना न राष्ट्रहित में है ना समाज हित में।

उन्होंने पत्रिका की तारीफ करते हुए कहा कि संघर्ष करते हुए पत्रिका ने आज समाज में मित्र का स्थान ले लिया है। चुनौती भरे कार्य पत्रिका ने खूब निभाए हैं। पत्रकारिता की तीन धारा बताते हुए वे बोले, पत्रिका ने जन सरोकारों की पैरवी की है। वह एडवोकेट जर्नलिस्ट व एक्टिविस्ट जर्नलिस्ट की भूमिका में रहा। उन्होंने पत्रिका के इस कार्यक्रम की सराहना करते हुए कोठारी को बधाई दी कि पत्रिका समाज को दिशा देने के साथ नए पत्रकारों का सृजन कर रहा है।

मीडिया की भूमिका माता-पिता से भी बड़ी : इस मौके पर पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी ने पत्रकारिता क्षेत्र में पिछले दिनों हुए घटनाक्रम पर दुख जताते हुए कहा कि आज के माहौल को देखकर दिल रोता है। पिछले 10 सालों में जो उदाहरण सामने आए उससे लगता है कि लक्ष्मण रेखा पीछे छूट गई। पत्रकार बनने वाले को सोचना होगा कि उसने कलम क्यों पकड़ी। सिर्फ पेट भरने के लिए या समाज, देश के लिए। आम आदमी मीडिया में विश्वास करता है, लेकिन मीडिया में जो लोग आ रहे हैं, वे उस समर्पण के साथ नहीं आ रहे, जो समर्पण पिछली पीढ़ी के पत्रकारों में था।

पत्रकारिता में आज विशेषज्ञता की स्थिति तो आ गई, लेकिन विश्वसनीयता खत्म हो गई है। पेड न्यूज के मामले में राजस्थान पत्रिका को छोड़कर लगभग सारे अखबार आ गए और देखकर लगा कि इन्हें अखबार कहें भी या नहीं। हमें गर्व है कि पत्रिका के संवाददाता ने पैसे लेकर खबर नहीं छापी। उन्होंने कहा कि पत्रकार यदि सुविधाओं के लिए सरकार की ओर देखेंगे तो निश्चित रूप से उन पर दबाव रहेगा।

राडिया प्रकरण का हवाला देते हुए कोठारी ने कहा कि जो पत्रकार मीडिया जगत में छाए हुए थे, आज हमको यह कहने में भी शर्म आ रही है कि वे मीडिया के अंग हैं। हमें पुनर्विचार करना होगा कि इस डोर में क्या हो कि पुनर्विश्वास का सिलसिला शुरू हो सके। आज धर्म, शिक्षा या एक सीमा तक मां-बाप से भी आगे बढ़कर मीडिया महत्वपूर्ण हो गया है। व्यक्तित्व निर्माण में मां-बाप, शिक्षक की भूमिका सीमित हो गई है। नए परिदृश्य और वैश्विक प्रतिस्पर्घा के युग में व्यक्तित्व तैयार करने की जिम्मेदारी मीडिया पर आ गई है। आज पत्रकारिता भी नकल सिखा रही है, संस्कृति का हिस्सा नहीं बन रही।

आम आदमी भी जागरूक नहीं है, अपने उत्तरदायित्वों को नहीं निभा रहा, सब बातों के लिए सरकार और प्रशासन की तरफ ताकता है। विज्ञापनों में नकल की प्रवृत्ति का जिक्र करते हुए कोठारी ने कहा कि दिशा देने का काम मीडिया का है। लेकिन हम जाएंगे कहां, यह मीडिया नहीं बता रहा। उन्होंने आह्वान किया कि हम भीतर की ताकत को समझें और बाहर के जीवन से संतुलन बिठाएं। मूल जीवन में हमारी शैली है। उन्होंने गर्व के साथ कहा कि पत्रिका ने अपनी मूल शैली को अपना रखा है, यह नहीं हो सकता कि हमारी कलम पर रोक लग जाए। लोगों से पत्रिका का व्यापारिक नहीं विश्वास का रिश्ता है।

इस सिलसिले में उन्होंने भोपाल में तालाब की खुदाई से लेकर किसान आंदोलन और गुर्जर आंदोलन का जिक्र किया। विश्वास की ताकत ही है कि भोपाल से लेकर छत्तीसगढ़ तक हमें कोई रोक नहीं पा रहा। पत्रिका का यही दृष्टिकोण रहा है कि अपने बजाय समाज का चिंतन करें, लाखों-करोड़ों लोग खुद ही आपका ध्यान रखेंगे। इसे ही मास मीडिया कहते हैं। पत्रिका के सामाजिक सरोकार का भी यही उद्देश्य है कि लोगों को माटी से जोड़े रखें। समारोह के प्रारम्भ में कोठारी व कुठियाला ने मां सरस्वती और पत्रिका के संस्थापक कर्पूरचंद कुलिश की तस्वीरों के समक्ष द्वीप प्रज्‍ज्‍वलित किया।

कोठारी ने मुख्य वक्ता ठकुरता का साफा पहनाकर स्वागत किया। पत्रिका के निदेशक एचपी तिवाड़ी ने कुठियाला को स्मृति चिह्न भेंट किया। कार्यक्रम का संचालन सहायक महाप्रबंधक रेस्पांस प्रवीण नाहटा ने किया। डिप्टी एडिटर सुकुमार वर्मा ने आगंतुकों का आभार व्यक्त करते हुए विश्वास दिलाया कि पत्रिका अपनी मूलधारा को कभी नहीं छोड़ेगा। कार्यक्रम में पत्रकार, साहित्यकार जगत की प्रमुख हस्तियां, प्रबुद्ध व गणमान्य नागरिक, पं. झाबरमल्ल शर्मा के परिवार के सदस्य मौजूद थे।

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