बैठी रहीं, पुलिसिया गुंडों के बीच, रात भर…

justice for मांयुवा और प्रतिभाशाली पत्रकार मयंक सक्सेना ने थाने में कैद मां के बारे में सोचते हुए एक कविता लिखी है. इन दिनों यूएनआई टीवी, दिल्ली में कार्यरत मयंक ने ‘justice for मां’ कंपेन से खुद को जोड़ते हुए इस मामले से संबंधित सभी खबरों, तस्वीरों, वीडियो को अपने सभी परिचितों के पास मेल से भेजा है और ‘justice for मां’ कंपेन से जुड़ने का आग्रह किया है. मयंक की कविता इस प्रकार है-

 

 

मां थी थाने में रात भर

घर की दहलीज

के अंदर

स्वर्ग था जिसका

मेरी वो मां

बैठी रही

पुलिसिया गुंडों के बीच

रात भर

 

जिसने कभी

किसी से बात नहीं की

ऊंचे स्वर में भी

वो सुनती रही

अपशब्द

जो दिए जाते रहे

उसी के नाम पर

 

मेरी मां

ने मुझे बताया था

बचपन में

कि

गलत काम करोगे

तो पुलिस पकड़ के

ले जाएगी

पर मेरी मां ने

तो कभी कुछ गलत न किया

पर फिर भी

वो झेलती रही

अपने बेटों की उम्र के

सिपाहियों का

पुलिसिया कहर

 

मेरी मां बैठी रही

थाने में

रात भर

 

मैं कैसे समझाऊं

उसको

कि उसका बेटा

पढ़ लिख कर

बड़ा आदमी हुआ है

उसका नाम है बहुत

क़ाबिल बनाया था

उसने मुझे

और मैं

चाह कर भी

पाया न कुछ कर….

 

मेरी मां

बैठी रही

थाने में

रात भर.

-मयंक सक्सेना

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