भीमसेन जोशी : एक अनिर्वाण का निर्वाण

भीमसेन जोशी
भीमसेन जोशी
भीमसेन जोशी का अचानक चले जाना जितना चौकाता है उससे ज्यादा चौकाता है उनका इतने दिन काल से होड़ कर के जीतते रहना।  जिस तरह की औघड़ और अराजक जीवन शैली भीमसेन जोशी ने अपनाई थी उसमें लोग ज्यादा चलते नहीं। रात तीन बजे तक फेफड़ों की पूरी ताकत लगा कर अपनी शास्त्रीय मिठास से लोगों को मुग्ध करना।

उसके बाद सोमरस से तन्मय होने और सुबह फिर रियाज शुरू कर देने वाले भीमसेन जोशी का आखिर काया ने बहुत साथ दिया। भीमसेन जोशी बनाए नहीं जा सकते। जैसे बड़े गुलाम अली खां,  जसराज,  कुमार गंधर्व और लता मंगेशकर को रचा नहीं जा सकता। संसार की सारी दैवीय ताकते मिल कर रचे तो इनमे से एक कलाकार जन्मता है। भीमसेन जोशी जितने शास्त्रीय थे उससे कहीं ज्यादा दुनियादार थे। एक तरफ राग जयजयवंती और पीलू में लंबे आलापों और द्रुत की सम्मोहित कर देने वाली ख्याल बंदिशों से बड़े से बड़े रसवंत को स्तब्ध और स्थगित कर दे और कहो तो मिले सुर मेरा तुम्हारा जैसा कालजयी गीत गा कर हमेशा के लिए समाज के अंतरिक्ष में स्थापित हो जाए।

भीमसेन जोशी को किराना घराना का आखिरी आदर्श गायक माना जाता है। किराना शब्द थोड़ा अपभ्रंश है। दरअसल उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर के पास कैराना गांव है जहां 1872 में उस्ताद अब्दुल्ल करीम खान जन्मे थे और 1937 तक उन्होंने संगीत की लगभग हर महफिल में झंडे गाढ़े थे। संगीत की परंपरा उनके दादाजी गुलाम अली और दादा जी के भाई गुलाम मौला ने शुरू की थी और चूकि ये दोनो भाई मैसूर दरबार में जाते रहते थे इसलिए कर्नाटक संगीत का भी अच्छा खासा असर इस घराने और पंडित भीमसेन जोशी पर नजर आता था। अब तो कर्नाटक में किराना घराना वालों की एक पूरी परंपरा बन गई है।

पंडित भीमसेन जोशी ने अब्दुल करीम खान के चचेरे भाई अब्दुल भाई खान से भी सीखा और यह संयोग है कि पुणे के भीमसेन जोशी और प्रभा अत्रे ने भी किराना घराने की गायकी को नए आयाम दिए। इस गायकी में वैसे भी सुरो से ज्यादा अपने आप आ जाने वाली मुरकियों का ध्यान रखा जाता है। कुछ राग खास है जिनमें ललित, मुल्तानी, शुद्व कल्याण और कोमल ऋषभ, असावरी मुख्य है। भीमसेन जोशी ने सिर्फ अपने एक बेटे को शिष्य बनाया लेकिन ख्याति की सीढ़ियां श्रीनिवास जोशी अपने पिता की तरह तेजी से नहीं बढ़ रहे हैं। वैसे बेगम अख्तर, मोहम्मद रफी और पंडित रामनारायण ने भी किराना घराने में ही प्रशिक्षण प्राप्त किया था। रफी की लोकप्रियता को छोड़ दिया जाए तो पंडित भीमसेन गुरुराज जोशी की बराबरी कोई नहीं कर पाया और भारत रत्न तो अभी उन्हें दो साल पहले ही मिला था।

पंडित भीमसेन जोशी जीवन के ज्यादातर हिस्से में पुणे में रहे मगर उनका जन्म उत्तरी कर्नाटक के गाडाग कस्बे में एक कन्नड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता जी स्कूल में पढ़ाते थे और भीमसने जी के सोलह भाई बहन थे। भीमसेन जोशी की मां तो बहुत जल्दी चली गई थी मगर सौतेली मां ने बहुत प्यार से उन्हें पाला। संगीत के प्रति भीमसेन जोशी की आसक्ति बचपन से ही शुरू हो गई थी और उस समय खयाल गायकी का रिवाज था कि बगैर गुरु शिष्य परंपरा के खयाल की पहली सांगीतिक मात्राएं भी नहीं सीखी जा सकती। भीमसेन जोशी गुरु की तलाश में निकले और उस्ताद अब्दुल करीम खान और अब्दुल वहीद खान के शिष्य सवाई गंधर्व से पहली सरगम सीखी। सवाई गंधर्व में आस्था थी और उनके सम्मान में पिछले लगभग 45 साल से एक संगीत समारोह पुणे में आयोजित होता है और उसकी बहुत मान्यता भी है।

जीवन कितना भी अराजक हो मगर कला में  पंडित भीमसेन जोशी संगीत  के सर्वश्रेष्ठ को तलाशते रहते थे। वहीं सीखने वाली आयु में भीमसेन जोशी ने एक पुराने लांग प्लेइंग यानी एलपी रिकॉर्ड पर उस्ताद अब्दुल करीम खान की ठुमरी पिया बिन नहीं आवत चैन सुनी और शायद यही संगीत की ओर जाने की पहली प्रेरणा थी। 11 साल की उम्र में यानी 1933 में भीमसेन जोशी धारवाड़ छोड़ा और गुरु की तलाश में बीजापुर रवाना हो गए। रास्ते में गाते जा रहे थे और रेल के सहयात्री उन्हें कभी खाने को कुछ देते और कभी आगे का टिकट खरीद देते।

भीमसेन जोशी पहले धारवाड़ पहुंचे और फिर वहां से पुणे चले गए।  उस समय ग्वालियर भारतीय शास्त्रीय  संगीत की राजधानी मानी जाती थी और वहां राज परिवार द्वारा चलाए जा रहे माधव संगीत विद्यालय में प्रवेश ले लिया। सरोद के महान कलाकार अमजद अली खान के पिता उस्ताद हाफिज अली खान भी उनके मददगार बने। संगीत के आलापों में धर्म की खाइया नहीं होती। उस्ताद हाफिज अली खान की मदद से भीमसेन जोशी दिल्ली, कोलकाता, ग्वालियर, लखनऊ, रामपुर में गुरु की तलाश में भटकते रहे और उधर पिता जी उन्हें खोज रहे थे तो उन्होंने आखिरकार जालंधर में बेटे को पकड़ ही लिया मगर तब तक बेटे की सांगीतिक इमारत की नींव पड़ चुकी थी और 1936 में पंडित रामभाऊ कुंडगोलकर – पंडित सवाई गंधर्व का यही असली नाम था- के रूप में भीमसेन जोशी को अपने आदर्श गुरु मिल गए।

भीमसेन जोशी एकदम गुरु शिष्य परंपरा के पालन में सवाई गंधर्व के घर पर छह साल रहे, उनके कपड़े धोए, पांव दबाए और संगीत के सुर सीखे जिन्हें बाद में वे अमर कर देने वाले भीमसेन जोशी 1943 में यानी 21 साल की आयु में वे मुंबई चले गए और आकाशवाणी में गायक के तौर पर उन्हें पहला काम मिला। इसके बाद उनका पहला रिकॉर्ड कन्नड़ और हिंदी में एचएमवी ने जारी किया जब वे सिर्फ 22 साल के थे।  इसके बाद भीमसेन जी की सांगीतिक यात्रा को कौन रोक पाया? संगीत का व्याकरण वे समझते थे लेकिन प्रयोग करने में उन्हें मजा आता था। अपनी गुरु बहन गंगूबाई हंगल को तो उन्होंने खूब चिढ़ाया कि वे व्याकरण के बाहर निकलती ही नहीं हैं। भीमसेन कई फिल्मों के लिए भी गाया लेकिन वह भी भीमसेन जी का अपना संगीत था। किसी और की धुन नही। भीमसेन आलोक तोमरजोशी की एक शादी तो बचपन में ही सुनंदा से हुई थी और दो बेटे और बेटियां इस शादी से हैं। इसके बाद उन्होंने वत्सला मुधवलकर से विवाह किया और श्री निवास जोशी इस शादी की संतान है। वैसे पूरे शास्त्रीय पंडित भीमसेन जी को कार बहुत अच्छी लगती थी। उसमें भी मर्सडीज सबसे प्रिय थी। कई बार खरीदी और उपहार में भी मिली।

लेखक आलोक तोमर देश के जाने-माने पत्रकार हैं.

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Comments on “भीमसेन जोशी : एक अनिर्वाण का निर्वाण

  • kundan sahoo says:

    आलोकजी दुःख हुआ,भीमसेन जोशी के निधन की खबर पढ़कर. लेकिन इस रिपोर्ट को पढ़ कर मज़ा भी आया. इसे एक त्रासदी ही कहा जायगा कि जीतेजी हम क्यूँ नहीं ऐसे लोगों को पढ़ते या जानने की कोशिश करते ? पता नहीं क्यूँ! गुजरने के बाद ही उसे पूरा जान लेने का प्रयास करते है. और तो और ये देख कर तो और भी आश्चर्य हुआ कि किसी की कोई प्रतिक्रिया इस रिपोर्ट के लिए नहीं . हम नौजवानों को ऐसे महाचरित्र को जानना चाहिए कि कोई रातो रात भीमसेन जोशी नहीं बन सकता.

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  • madan kumar tiwary says:

    कुंदन जी सलमान को जानने से फ़ुर्सत मिलेगी तब न जानेंगे भीमसेन को ।

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  • bahut khoob likha hai aapne. sangeet ke is maharathi ke baare me. aise logo ke baare me hum unke duniya se chale jane ke baad hi jaan ne ke koshish karte hai. unke rahte nahi.

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