यशवंत जी, ये आपका निजी मामला नहीं है

नूतन ठाकुर ये हम सभी जान रहे हैं कि यशवंत जी की मां श्रीमती यमुना सिंह, चाची श्रीमती रीता सिंह और चचेरे भाई की पत्नी श्रीमती सीमा सिंह को दिनांक  12-10-2010 को रात में लगभग नौ बजे गाजीपुर जिले के नंदगंज थाने की पुलिस ने उनके गाँव अलीपुर बनगांवा से जबरन उठा लिया.

अब तक जो बातें आई हैं उनके अनुसार ऐसा खुद गाजीपुर के पुलिस अधीक्षक तथा लखनऊ में प्रदेश पुलिस के अन्य उच्चाधिकारियों के निर्देश पर ऐसा हुआ. कारण यह बताया गया कि उनके गाँव में ही उस दिन शमशेर सिंह की हत्या में नामजद अभियुक्तों की गिरफ्तारी नहीं हो सकने के कारण इन महिलाओं को दवाब बनाने के लिए थाने ले जाना पड़ रहा है. जितने भी सबूत सामने आये हैं उनसे यह साफ है कि इन तीनों महिलाओं को नंदगंज की पुलिस ने रात भर थाने में बंधक बनाए रखा.

शायद यशवंत जी ने भी इस सम्बन्ध में तुरंत लखनऊ व गाजीपुर के मीडिया के अपने वरिष्ठ साथियों और खुद गाजीपुर से ले कर वाराणसी तक के पुलिस अफसरों से संपर्क किया और उनसे अपनी माँ को थाने से मुक्त कराने का निवेदन किया. सभी जगहों पर पुलिस से एक ही जवाब मिला कि हत्या का मामला है, हत्यारोपी का सरेंडर कराओ तो महिलाएं छोड़ दी जाएंगी वरना थाने में ही बंधक बनाकर रखी जाएंगी. नीचे के अधिकारियों ने यह भी कहा कि यह प्रकरण ऊपर से देखा जा रहा है, शासन का बहुत दवाब है और स्वयं पुलिस महानिदेशक इस मामले को देख रहे हैं, इसीलिए उनके स्तर से कोई भी मदद संभव नहीं है. लखनऊ भी बात हुई पर हर जगह मुलजिम गिरफ्तार होने पर ही मदद करने की बात कही गयी.

यशवंत जी ने इसी बीच एक काम जरूर अच्छा किया कि कुछ पत्रकार मित्रों से अनुरोध कर के महिलाओं को थाने में बंधक बनाकर रखे जाने के प्रकरण का वीडियो बनवा लिया और फोटो भी ले लिया ताकि इस मामले में कल के लिए सबूत रहे. अंत में इन लोगों को अगले दिन दोपहर बाद करीब एक या दो बजे तभी छोड़ा गया जब एक आरोपी ने अचानक थाने पहुंचकर सरेंडर कर दिया.

यशवंत जी ने इस बात को अपने स्वयं के मामले के रूप में नहीं पर एक वृहद सामाजिक प्रश्न के रूप में सामने लाने का बीड़ा उठाया. उन्होंने अपने स्वयं और अपने परिवार पर इस प्रकरण के द्वारा होने वाले तमाम खतरों को दरकिनार करते हुए इस सम्बन्ध में एक अभियान सा चलाया और हमारे जैसे न जाने कितने ही लोग उनके इस अभियान के साथी बने. क्योंकि उनका यह अभियान उनके स्वयं का निजी अभियान नहीं था, पूरी व्यवस्था से जुड़ा एक अभियान था, जहां उन्होंने आम आदमी की आवाज को सामने लाने और जान-बूझ कर पुलिस द्वारा गलत और अवैध काम करने पर जिम्मेदारी नियत करने और न्याय करने की बात कही थी.

हम सब लोग बहुत प्रसन्न थे कि इससे न सिर्फ यशवंत जी के मामले में न्याय होगा बल्कि शासन और प्रशासन इसे एक मिसाल के तौर पर लेते हुए अन्य तमाम मामलों में भी कुछ इस प्रकार के निर्देश जारी करेगी और उनका अनुपालन कराएगी जिससे महिलाओं से संबंधित कानूनों का पूरी तरह वास्तविक अनुपालन सुनिश्चित हो सके. हम सभी जानते हैं कि महिलाओं को किसी भी कीमत में थाने पर अकारण नहीं लाया जा सकता है. उनकी गिरफ्तारी के समय और थाने में रहने के दौरान महिला पुलिसकर्मियों का रहना अनिवार्य है. दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 160 के अनुसार उन्हें पूछताछ तक के लिए थाने नहीं ला सकते.

फिर इस मामले में करना ही क्या था? पूरे साक्ष्य थे- हर तरह के मौखिक और अभिलेखीय साक्ष्य. उन महिलाओं के थाने में रखे जाने के फोटो हैं, वीडियो है, मौखिक यह बात कहने वाले लोग हैं. स्वयं वे महिलायें यह बात कह रही हैं. पर फिर भी कार्रवाई के नाम पर सिफर. लखनऊ में प्रदेश के सारे वरिष्ठ पत्रकारों ने यह बात गृह सचिव और अपर पुलिस महानिदेशक के सामने रखी और उन्होंने कार्यवाही करने का आश्वासन दिया. उम्मीद बढ़ी. फिर दिखाने को कोई पुलिस का अधिकारी जांच करने उस गाँव भी गया था और तब उम्मीद और बढ़ी थी कि अब कुछ न्याय होगा.

पर वो दिन है और आज का दिन है. कुछ भी नहीं किया गया. न्याय का सरे-आम गला घोटने पर कोई कार्रवाई नहीं. गैर-कानूनी काम करने की पूरी छूट और आजादी. यानी कि वास्तव में राम-राज्य.

यशवंत जी ने इस व्यवस्था को देखते हुए और यह सोच कर कि लोग यह न समझ लें कि वे पोर्टल को अपने निजी मामलों के लिए प्रयोग कर रहे हैं इस अभियान को समाप्त कर दिया. उन्होंने लिखा- “यही सच है. बिना न्याय मिले अभियान खत्म. हर दरवाजे खटखटा लिए. सबको मेल भेज दिया. सब तक घटनाक्रम की जानकारी पहुंचा दी. पर हुआ कुछ नहीं.” उन्होंने कारण भी बता दिया- “माया सरकार के नेता कान में तेल डाले मस्त है. सत्ता द्वारा संरक्षित व पोषित अधिकारी विवेकहीन व तानाशाह हो चुके हैं. सो, वे दोषी भी हों तो उनका बाल बांका हो नहीं सकता, और वे अपने दोषी अधीनस्थों का बाल बांका करेंगे नहीं.”

यशवंत जी का दर्द इन बातों में साफ़ झलक रहा है- “मैं मां के अपमान को भूल नहीं सका हूं और न भुलूंगा, सो मुझे कैसे रिएक्ट करना है, क्या करना है, कहां कहां जाना है या नहीं जाना है, ये अब मैं निजी तौर पर तय करूंगा. इसमें अब किसी की सहभागिता नहीं चाहता. जो कुछ गिने-चुने लोग इस प्रकरण को लेकर मेरे साथ सक्रिय हैं, उनके संपर्क में रहते हुए मामले को यह मानते हुए आगे बढ़ाऊंगा कि यह लंबी व थका देने वाली न्याय की लड़ाई है, एक दिन में या एक महीने में कुछ नहीं होना.”

मैंने तब भी कहा था और आज भी यशवंत जी से कहूँगी कि “ये अभियान नहीं रुकेगा, किसी भी कीमत पर नहीं रुकेगा. आप ने अपनी तरफ से रोक भले दिया हो पर हम लोग इसे सही नहीं मान रहे हैं. “ कारण भी बहुत साफ़ है. ये अभियान अब उनका नहीं है, हम सबों का है. यह लड़ाई न्याय के लिए लड़ाई है, लंबी हो सकती है, उबाऊ भी, कठिन भी और शायद खतरनाक भी. हम लोगों को झेलना भी पड़ेगा पर लड़ाई तो अब तभी खत्म होगी जब या तो न्याय होगा या हम लोग उस स्थिति में पहुंच जायेंगे जब हम लोग और अधिक लड़ाई के लायक ही नहीं रहें.

अपने पति के अध्ययन अवकाश की लंबी और थकाने वाली लड़ाई को लड़ने में मैंने उनका साथ दिया और इस बात से खुश हूँ कि हार मानने के स्थान पर उन्होंने लड़ना उचित समझा. अब इसी बात पर पुस्तक भी लिख रही हूँ और हम इस लड़ाई को अंत तक लड़ेंगे.

मेरी निगाहों में ये छोटी-छोटी लड़ाईयां एक व्यक्ति की निजी लड़ाईयां नहीं हैं- ये व्यवस्था से जुड़ी और व्यवस्था को नए राह पर ले जाने की कोशिश के बड़े-बड़े स्तंभ के रूप में हैं. और सब से बढ़ कर यह कि हममें से हर आदमी के लिए जरूरी है कि ऐसी हर लड़ाई लडें जो कहीं ना कहीं अन्याय और मनमानेपन का विरोध करती हों.

मैं जानती हूँ कि यशवंत जी तो माँ के न्याय को बंद नहीं करेंगे पर यह भी चाहूंगी कि उनकी लड़ाई में हम में से हर आदमी अपना उतना ही योगदान दे जितना वो अपने मामले में करता. नहीं तो आज यशवंत जी की तो कल मेरी और आपकी बारी है.

डॉ नूतन ठाकुर

संपादक

पीपु्ल्स फोरम, लखनऊ

Comments on “यशवंत जी, ये आपका निजी मामला नहीं है

  • Dear Madam.

    we will be much greatfull to you if you disclose that what personal vendata DGP and ADGP of uttar pradesh have with yashwant ji.

    Kranti Kishore Mishra

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  • Main ek sujhaav dena chahta hoon.Yeh yashwant par hain, maanen ya na maane, (1) Lucknow ya Delhi ke kisi Indian Express ya Timesof India patrakar ke zariye Delhi me us sharmnaak ghatna ki khabar chhapvayen. (2) Supreme Court ke kisi vakeel ke zariye athva khud video CD ke saath Chief Justice of India ko patra bhej kar fariyaad karen : ki aakhir kis kanoon ke tahat kisi bhi kathit apradhi ko pakadne ke liye ghar ki mahilaon ko thane me 18 ghante baitha kar rakhne ka praavdhan hai. Ye right to dignity aur right to freedom ka sawaal hai. Mujhe vishwas hai ki agar supreme court harkat me aaya, to yeh vardidhaari gunde kanoon ke shikanje me aa sakte hain. Abtak to hamne Pakistan aur Afghanistan me Taliban ko yeh karte suna tha, yahan UP police aisa kar rahi hai. Shame on UP Police!

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  • govind goyal,sriganganagar says:

    aaj padosi ko pitata huya dekh darvaje band karoge to kal aapki ya meri bari hai. aisa hota hai or jab tak log virodh karne kee himmat nahi karte aisa hee hota rahega.

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  • RAJESH VAJPAYEE JANSANDESH UNNAO says:

    adarniya Dr Nutanji
    Saha kaha apnay. ek bhai ki tarah hum sabhi bhai apni MAA k apmaan ko laykar sirf akroshit he nahi balki es ghatna par soobay ki mahila cm ki chuppi say estabdh bhi hai ki wah gazipur k nandgaon thanay ki polish k aloktantrik amanviya aur barbar prayog ko apnay DG, ADG (LO) VA IG SAY Jaan-nay k baad bhi samuche thanay va sp gazipur ko suspend Q ab tak nahi kiya.
    Yashwantji wakai ap es mamlay ka nirnay sirf swam ab nahi lay saktay wah esliye puri vinamrata k saath chunki yeh ab lakho patrakaro ki MAA k samman say juda hai.
    rajesh bajpai jansandesh unnao 09415593777

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