ये हाल है हिंदी पायनियर के पत्रकारों का!

एडिटर, भड़ास4मीडिया, महोदय, भड़ास इतनी भरी है कि अगर अब न बोला तो शायद मैं मनोरोगी हो जाऊं. मजबूरी ये है कि पहचान उजागर नहीं कर सकता. पर उम्मीद करता हूं कि मैं जो कुछ कहूंगा, उसके तथ्यों को आप अपने स्तर पर पता करने के बाद मेरी भड़ास को जरूर प्रकाशित करें ताकि कई बेचैन आत्माओं को राहत मिल सके. शायद पत्रकारिता ने अपनी दशा और दिशा कुछ तथाकथित भंड़ुए संपादकों के कारण खो दी है.

चाहें बड़े बैनर हों या मंझोले. सबके संपादक कमोबेश मालिकों के एजेंट के रूप में प्रसाद-पर्यंत यूनिट में चरस बोये हुए हैं. कुछ हाईस्‍कूल तक पढ़े हैं तो कुछ इंटरमीडिएट तक. ये भंड़ुए उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त पत्रकारों को अनाप-शनाप निर्देश देते रहते हैं. ज्‍यादा भूमिका न बनाते हुए हम सीधे मुद्दे पर आते हैं. लगभग डेढ़ सौ साल पुराना अंग्रेजी का प्रतिष्ठित अखबार पॉयनियर अपनी गरिमा के अनुरूप अब लखनऊ से नहीं निकल रहा है. बड़ी जोशो-खरोश से इसका हिंदी संस्‍करण विगत महीने पूरे उत्‍तर-प्रदेश में प्रसार के साथ लांच किया गया. विभिन्‍न बड़े अखबारों के पत्रकार इसकी पुरानी ख्‍याति के आधार पर इससे जुड़े. मैनेजमेंट ने इन पत्रकारों से बड़े-बड़े वायदे किये, जो अब पूर्णतया मिथ्‍या और भ्रामक हो गये हैं.

यहां के पत्रकारों के साथ अपनी दो मीटिंग्‍स में पॉयनियर के एडिटर इन चीफ चंदन मित्रा यह बारंबार कहा कि पॉयनियर ग्रुप पत्रकारों की संस्‍था चलाती है इसमें कोई मालिक नहीं है और न ही कोई कर्मचारी. लेकिन, यहां तो बड़ा लंबा खेल रेजीडेंट एडिटर द्वारा खेला जा रहा है. सबसे पहले इन्‍होंने एसोसिएट एडिटर के रूप में पत्रकारिता से कोसों दूर एक मृतप्राय व्‍यक्ति रामसागर को डमी के रूप में बैठा दिया और परदे के पीछे से धन उगाही का खेल शुरू किया. अधिकांश पत्रकारों को न परिचय पत्र दिया और न ही नियुक्ति पत्र. केवल सबको ढकोसले में ही उलझाए रखा. यही नहीं, सबसे तीन महीने पहले बैंक एकाउंट खुलवाने के नाम पर एक-एक हजार रुपये जमा करवा लिए लेकिन आज तक एकाउंट नहीं खुल पाया.

इस संस्‍था में सुविधाएं नाममात्र की भी नहीं हैं। स्‍टाफ के लोगों को अक्‍सर छत पर लगी टंकी से पानी पड़ता है जो कि कभी साफ नहीं की जाती और इसकी वजह यह है कि यहां पर पानी को स्‍टोर करने की कोई उपयुक्‍त व्‍यवस्‍था नहीं है. बैठने के लिए पुरानी काट के चपरासियों के स्‍टूल हैं और काम करने के लिए 1857 मॉडल के कंप्‍यूटर. सिर्फ हिंदी में ही नहीं वरन अंग्रेजी सेक्‍शन में भी यही हाल है. सबके के सब व्‍यथित हैं. जोशो-खरोश के साथ स्‍थापित किये गये रीजनल आफिस में कार्यरत पत्रकार बंधुओं को विगत दो महीने से वेतन भी नहीं दी जा रही है और इस कारण से उनका परिवार भुखमरी की कगार पर पहुंच गया है. सैलरी स्लिप ऐसी दी जाती है जैसे ईंट भट्ठे पर काम करने वाले मजदूरों को दिहाड़ी दी जाने वाली व्‍यवस्‍था हो. यहां हरेक रिपोर्टर को ए‍क दिन में एक पेज भरने लायक खबरें जुटाने का फरमान जारी कर दिया गया है ताकि स्‍टाफ नहीं बढ़ाना पड़े.

कुल मिलाकर, पॉयनियर के सर्वेसर्वा चंदन मित्रा को अंधेरे में रखकर सिंह समेत विजय प्रकाश ने लखनऊ पॉयनियर के पत्रकारों को बुरी तरह छला है और वह समझते हैं कि वे सबसे होशियार हैं जबकि उन्‍हें यह पता नहीं है कि पत्रकार तो पत्रकार होता है कहीं न कहीं बदला जरूर लेगा. अब तो आये दिन विजय प्रकाश की झुंझलाहट साफ दिखायी देती है। दंतविहीन एसोसिएट एडिटर रामसागर के माध्‍यम से वह जिला संवाददाताओं से भीषण धन उगाही करवा रहे हैं. जिला संवाददाताओं में भी भारी आक्रोश व्‍याप्‍त है. सारत: यह कहा जा सकता है कि पॉयनियर ‘एक तो डायन उस पर लुआठ’ की प्रक्रिया में आ गया है.

अधिकांश लोग अपने लिए रास्‍ता तलाशने लगे हैं जो किसी कारण यहां आ गये हैं वे अपने आपको कोस रहे हैं. विजय प्रकाश और आउटडेटेड रामसागर पॉयनियर को ले डूबे. आदरणीय चंदन मित्रा भी इसके लिए कहीं न कहीं से जिम्‍मेदार हैं और उनके वादे भी ढकोसले साबित हुए हैं.

आपका

पॉयनियर के सताये पत्रकार

chotukumar.kumar5@gmail.com

इस भड़ास के प्रतिवाद में अगर कोई कुछ कहना चाहता है तो उसका स्वागत है. दूसरे पक्ष को भी इतनी ही प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया जाएगा. चाहें तो अपनी बात नीचे कमेंट बाक्स के जरिए या bhadas4media@gmail.com के जरिए भी लिख-भेज सकते हैं.

Comments on “ये हाल है हिंदी पायनियर के पत्रकारों का!

  • jai kumar jha says:

    बेहद दुखद अवस्था और इंसानियत को इन भ्रष्ट मंत्रियों और कुकर्मी उद्योगपति माफियाओं द्वारा किस दर्दनाक अवस्था में पहुंचा दिया गया है इसका ज्वलंत उदहारण…….एक तरफ जिस देश में इन पत्रकारों को भी मूलभूत सुविधा उपलब्ध नहीं है और दोसरी तरफ इसी देश का लूटेरा उद्योगपति 6000 करोड़ के घरों में रहता है और हर सदस्य के लिए एक सौ नौकर का प्रयोग करता है…….निश्चय की ऐसे उद्योगपति इंसानियत की दर्दनाक अवस्था के लिए इस देश और समाज के अपराधी हैं……..ऐसे उद्योगपति और उनके दलाल मंत्रियों को सरे आम फांसी पे चढ़ाना चाहिए…….

    Reply
  • shailesh dixit says:

    मैं जो कुछ कहूंगा, उसके तथ्यों को आप अपने स्तर पर पता करने के बाद मेरी भड़ास को जरूर प्रकाशित करें ताकि कई बेचैन आत्माओं को राहत मिल सके. शायद पत्रकारिता ने अपनी दशा और दिशा कुछ तथाकथित भंड़ुए संपादकों के कारण खो दी है.

    चाहें बड़े बैनर हों या मंझोले. सबके संपादक कमोबेश मालिकों के एजेंट के रूप में प्रसाद-पर्यंत यूनिट में चरस बोये हुए हैं. कुछ हाईस्‍कूल तक पढ़े हैं तो कुछ इंटरमीडिएट तक. ये भंड़ुए उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त पत्रकारों को अनाप-शनाप निर्देश देते रहते हैं.
    …………………..

    bilkul sahi kaha hai bhai main ek aur sansthan ke bare me batata hu ..wo hai kota rajasthan ka danik nav jyoti jaha pichle 2 mahino se ek sanjai nam ke aadmi ko jo ki patrakarita bhi nahi karta hai matra 6000 rupye me use pagenation ….page banwane ke liye rakhha hai…sampadak ki postion vacent hai….kewal vigyaptiyo wa kewal 2 logo par chapta hai ye paper ….jane kya jamana aa gaya hai …bina sampadak ke paer …waise theek hi hai …sarkari vigyapan ke liye chhaap kar fir use store me dump karte hai ab to paper ke pas store room bhi hai ..sal me bechte hai dum hua akhbar..wah wah…

    Reply
  • adarniya yashwant ji,
    kam se kam hindi pioneer me 2 mahine se vetan nahi mila hai, to bhi theek hai, lekin isi lucknow me kayee paper to aise hain jahan ki maalik se lekar unke chaaploos kutte bane incharge log to bina vetan k bhi kahte hain ki pahle akhbaar k liye vigyaapan le k aao. aisa hi waasta mera lucknow k hi hindi akhbar United bharat k office me pada tha. jahan malik mr. gulati aksar aa k patrkaron ko vigyapan target pakdata rahta hai. use akhbaar k star se koyee lena dena nahi rahta. uske samne paltoo kutte ki tarah baith k yehan ka bureau chief s p singh (jisne zindagi me kabhi koyee news nahi likhi hai aur use to likhni bhi nahi atee hai), doosre reporters ko vigyaapan lane ka target pakdaate rahte hain. kewal malik k saamne uski pitthogiri karne wala ye anpadh s p singh kewal yehan tak hi ye harkat nahi karta, balki baad me bhi malik ka aatank dikha kar vigyapan lane ka dabaav banata hai. bahut gaur karne wali cheez yeh hai ki wo khud kabhibhi vigyapan nahi lata hai aur baki logon k laye gaye vigyapan ko malik ko phone karke apna vigyapan bata deta hai. gulati k khule sanrakshan me pal rahe s p singh gulati ko jam k choona bhi lagata hai, lekin bewkoof malik ko kuch bhi pata nahi chalta. kahne ki baat to yeh hai ki pioneer k patrkaar phir bhi lakh saubhagywan hain ki unhe kewal salary nahi mil payee hai, wo bhi do mahine ki, lekin yeha united bharat me to female worker ki izzat per s p singh bhookhe bhediye ki tarah nigaah bhi rakhta hai. jo uska kahna maan ke usko “khush” kar deta hai, us ladki ya mahila ka biodata wo forward kar k allahabad malikon ko bhej deta hai. kayee baar wo apni in ichchhaon ko PR aur NGO ka kaam karne wali ladkiyon wa mahilaon se poori karta hai. iske ewaj me wo unki khabrein khud khade ho k lagwata hai ya phir un pe likhit nirdesh desk ko deta hai ki ye khabar lagni jaroori hai. is tarah wo patrkarita aur samaaj ka ek aisa nasoor hai jo param swarthi maalik ko apne changul me phansa k kewal aish kar raha hai. aaj k hindi pioneer me kayee patrkaar aise hain jo kal tak isi united bharat k daftar me rah k s p singh ki har “zaroorat’ ko poora kiya karte the. we log kam se kam is ghinaune mahaul se nikal gaye, is k liye unhe badhayee. rahi baat is naye tarah k sangharsh ki to wo chandan mitra se khul k kahein ki kam se kam apni saansad nidhi ka thoda bahut paisa (ya uska commision) pioneer me laga dein to ganeemat hai.

    Reply
  • bhai,
    hindi akhbaron ki bahut durdasha hai, pioneer me to phir bhi sahi chhap raha hai. bura haal hai united bharat lucknow ka jahanpatrakaar bandhua mazdoor ban gaye hain aur usko zyada padh liya to hindi sahi likhna bhool jayenge. khuda khair kare…….
    khair khuda kare bhi to kya kya?????

    Reply
  • 🙁 sach kahat ho bhai,,
    hum bhi aise hi sampadak ke sataye huye he,jo patrkaro ko bandhua mazdoor ki tarah samajhte or kam lete hain, kuch papers ne to polici bana li he ke ”reporting+marketing” or sellery sirf ek kam ki jis akhbar m main kam karti hun use lanch huye 4 sal ho gaye he bussiness bhi khub deti hun lakin sampadak kei zaban per sirf ek hi takiya kalam hota h ”mehnat nahi kar rahi ho ”
    ”ek abla nari”

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *