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शाबास संजीव!

जगमोहन फुटेलामैं ब्यूरो देखता था जब सीधा सादा कुछ अनाड़ी सा दिखने वाला एक लड़का आया मेरे पास. उसके पास भाषा नहीं थी, उच्चारण भी गड़बड़. स्ट्रिंगरों के साथ होने वाले शोषण से भी अनजान. उसके कपड़े-जूते, हाथ में एक छोटा सा पुराना (शायद किसी से माँगा हुआ) कैमरा और हालत देख कर तरस भी आ रहा था. शुरुआती बातचीत में ही मैं समझ गया था कि पत्रकार होने की उसकी ललक ने एक बार उसे बेगारी और बेरोज़गारी के दुष्चक्र में फंसाया तो बांह पकड़ के बाहर निकालने वाला भी उसके परिवार में कोई नहीं. तर्क-वितर्क का जोड़-घटाव लगातार कह रहा था कि उसे साहिर साहब के गुमराह वाले शेर की तरह कोई अच्छा सा मोड़ देकर छोड़ दूं. लेकिन दिल था कि दिमाग की मानने को तैयार नहीं था. मुझसे मिल-सी नहीं पा रहीं थीं पर, उसकी उन छोटी छोटी आँखों के भीतर बहुत भीतर तक दिख रहा एक आत्मविश्वास था.

जगमोहन फुटेलामैं ब्यूरो देखता था जब सीधा सादा कुछ अनाड़ी सा दिखने वाला एक लड़का आया मेरे पास. उसके पास भाषा नहीं थी, उच्चारण भी गड़बड़. स्ट्रिंगरों के साथ होने वाले शोषण से भी अनजान. उसके कपड़े-जूते, हाथ में एक छोटा सा पुराना (शायद किसी से माँगा हुआ) कैमरा और हालत देख कर तरस भी आ रहा था. शुरुआती बातचीत में ही मैं समझ गया था कि पत्रकार होने की उसकी ललक ने एक बार उसे बेगारी और बेरोज़गारी के दुष्चक्र में फंसाया तो बांह पकड़ के बाहर निकालने वाला भी उसके परिवार में कोई नहीं. तर्क-वितर्क का जोड़-घटाव लगातार कह रहा था कि उसे साहिर साहब के गुमराह वाले शेर की तरह कोई अच्छा सा मोड़ देकर छोड़ दूं. लेकिन दिल था कि दिमाग की मानने को तैयार नहीं था. मुझसे मिल-सी नहीं पा रहीं थीं पर, उसकी उन छोटी छोटी आँखों के भीतर बहुत भीतर तक दिख रहा एक आत्मविश्वास था.

उसके खिलाफ आ जा रहे सब तर्कों के ऊपर एक दलील दम मारने लगी. वो ये कि चमक और चोंचलों से भरी टीवी की इस दुनिया में मैंने इसका दामन न थामा तो कहीं और किसी दरवाज़े तो शायद पहुँच भी नहीं पायेगा बेचारा. मैंने तय किया कि तजुर्बा ही सही, किया तो जाएगा. दम निकला बच्चे में तो दाम भी मिलने ही लगेगा. था तो वो सिरमौर से. पर, मैंने उसे घुमंतू संवाददाता की तरह हिमाचल से लेकर उत्तराखंड तक विचरने की छूट दी. जो स्टोरीज़ उसने करनी शुरू कीं वो कमाल की थीं. इस अर्थ में कि उसके आईडिया बहुत एक्सक्लूसिव होते थे. शूट, फ्रेम, बाईट और ‘शोट्स जस्टिफाईंग दी स्टोरी’ के मामले में उसका बचपना जल्दी ही जाता रहा. वो अक्सर बात करता, ढेर सारी जिज्ञासा के साथ ढेर सारे सवाल पूछता, बीच में टोकाटाकी के बगैर सुनता और दुबारा कभी टुकाई का मौका नहीं देता. वो हाथ पे भी शूट करता, एक किलोमीटर लम्बा शाट भी मारता तो कैमरे में जर्क नहीं होता था. चेहरे, हाथों, होठों और पलकों के भाव तक वो कैमरे में कैद करने लग गया था.

एक दिन मैंने उसे देहरादून में तैनात कर दिया. जो खबरें उसने कीं उनमें शेरों की नाजायज़ नसबंदी और औरतों की खरीद-फरोख्त और वो भी न हो सके तो उसके पैत्रक घर पे ही उसके रखैल की तरह इस्तेमाल जैसी खबरें शामिल थीं. पर ये खबर तो उसने बड़ी मेहनत से बनाई. उसे जाना था. उसके पास पैसे नहीं थे. मुझसे भी नहीं लिए. बताया भी नहीं. चला गया. थका था. शायद भूखा भी. उसकी थकान उसकी शूट से भी दिख रही थी. शाट्स कम थे. जो थे उनमें भी कहीं-कहीं जर्क था. बदकिस्मती से दो चार जगह पिक्सल भी फट रहे थे. उसे बताया तो वो पौंटा साहिब से दुबारा वहां जाने को तैयार था. पर मैंने रोका. स्क्रिप्ट को जितना संक्षिप्त कर सकता था, किया. खुद एडिट पे बैठा. जो कर सकता किया. और फिर जो बना वो आपके सामने है. मेरा आग्रह है कि इस स्टोरी को देखते समय न सही, बाद में संजीव शर्मा को ज़रूर याद रखियेगा. वो जर्नलिस्टकम्यूनिटी.कॉम में आपके परिवार का सदस्य भी है. स्टोरी का वीडियो Buddha नाम से youtube पर उपलब्ध है. उसी वीडियो को नीचे भी दे रहे हैं.

लेखक जगमोहन फुटेला चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

 

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0 Comments

  1. gagan

    November 3, 2010 at 6:38 am

    शानदार आग़ाज़
    अंजाम और भी बेहतर होगा
    कमाल है। सम्मोहित करने वाली कोशिश।
    शुभकामनाएँ

  2. uttarakhand vichar

    November 3, 2010 at 3:46 pm

    बहुत अच्छे संजीव आपकी रिपोर्ट की तारीफ करनी होगी ….और तारीफ करनी होगी जगमोहन जी की जिन्होंने आपको मौका दिया आपको उज्वल भविष्य की शुभकामनायें …………………….teem uttarakhand vichar

  3. SANJEEV SHARMA

    November 3, 2010 at 6:09 pm

    सर्वप्रथम नस्कार सर … आपने जर्नलिस्टकम्यून िटीण्कॉम में जो कुछ भी लिखा , वो सच तो है ही आईने की तरह साफ भी है … हैरानी सिर्फ इस बात की है की मैने आपको ये सारी बाते इस लिए नहीं बताई
    क्योंकि मै आपको परेषान नहीं करना चाहता था । …

    ये भी हकीकत है अगर आप उस दौरान मेरा हाथ नहीं थामते तो दुनियां मुझे रोंद कर आगे निकल जाती मेरी इमानदारी को नोच – नोच कर खा दिया जाता ।

    मेरे अन्दर ख़बर तक पहुंचने का जुनून जरूर था , लेकिन जोष और जज्बा तो आपकी ही देन है और रहेगी भी , टोटल टीवी मै आपके साथ काम करने का जो अनुभव मुझे मिला वो अनमोल था , जिसके बदोलत मैने पांवटा साहिब से चंण्डीगढ़ -षिमला-…दिल्ली- पटियाला -देहरादून तक का रास्ता तय किया ।

    एक रिपोर्टर से न्यूज़ एंकर …प्रोडयूस र…एसआईटी हैड तक जैसे पोस्ट की जिम्मेवारी भी बड़े इमानदारी से निभायी , लेकिन ज़मीन से दूर नहीं हुआ अपने पांव की ज़मीन में ही रखा… आपने मुझ से कभी किसी बात की सफाई नहीं मांगी …मेरे लिये आपका ये भरोसा किसी आर्षीवाद से कम नहीं था ।

    काम अच्छा था या नहीं ये तो मै नहीं जानता फिर भी आपने मरे होसलों को हमेषा उड़ान दी ,मेरे वजह से आप किस – किस से नहीं लड़े मै सब जानता हूं ।

    आज मैने टीवी मीडिया को गुडवाय बोल दिया है … न्यूज रूम में काम करना छोड़ दिया है ।…नौकरी की भी कमी नहीं है … पर पता नहीं आपके इस बच्चे के अन्दर किसी की कठपुतली बनने की आदत नहीं है ।…

    मीडिया को नमस्ते बोलने का एक कारण ये भी रहा की इस देश में आप जैसे और गोपाल सर जैसे लोगो का जन्म ही नहीं हुआ ,अगर हुआ है तो मुझे वो मिले नही ।…

    अब हिमाचल प्रदेश में अपनी जन्म भूमी को कर्म भूमी बनाने की कोशिश में लगा हूं । बहुत बड़ी सोच के साथ एक मीडिया हाउस चला रहा हूं ।

    आज मेरे काम के बदोलत मेरे घर का चुल्हा जल रहा है साथ ही मेरे साथ काम करने वाले दर्जर्नो लोगो का भी

    मै आपको भरोसा दिलाता हूं … जो रास्ता आपने मुझे दिखाया उस रास्ते को कभी नहीं छोडूंगा … ऐसा कोई काम नहीं करूंगा जिससे आपको इस बात का कभी पछतावा हो कि आपने किसी गलत आदमी को चुना था … आपने मुझे जर्नलिस्टकम्यून िटीण्कॉम परिवार का हिस्सा बनने का मौका दिया इसके लिए एक बार फिर से धन्यवाद्
    आपका प्रिय अनुज – संजीव शर्मा
    http://www.voiceofpress.com
    http://www.crimewing.com

    शुक्रिया यशवंत भैया ………. और मीडिया की धड़कन …BHADAS4MEDIA

  4. Jai Prakash Sharma

    November 3, 2010 at 10:14 pm

    Wakai Bahut ACCHHA presentation hai.

  5. Jai Prakash Sharma

    November 3, 2010 at 10:15 pm

    Bahut Hi Behatareen Prastuti hai Sanjeev Apki.

  6. पंकज झा.

    November 4, 2010 at 12:30 am

    संजीव जी का लिखा कुछ पढ़ा है. साथ ही वह एक नए माध्यम में कुछ नया करने को प्रयासरत हैं वह उनसे चैट के माध्यम से कभी-कभार पता चलता रहता है. स्टोरी पढते-पढते ध्यान आया कि ये वही संजीव जी हैं जिनसे अपनी बात होती रहती है. वास्तव में कुछ कर गुजरने की तमन्ना, स्वयं को स्वाभिमान से खड़ा रखने की आदमी जिजीविषा इनमे दिखती है. इसके अलावा कम ही बातचीत में जो मैंने महसूस किया है वह ये कि विनम्रता भी इनमे कूट-कूट कर भरी है. बधाई संजीव जी साथ ही बड़े खुले मन और बड़े दिल से संजीव जी के बारे में लिखने वाले जगमोहन फुटेला जी को भी साधुवाद.
    यह संस्मरण ज्यादा अच्छा इसलिए भी लगा कि आज से दस साल पहले मेरे जैसे लोग भी टीवी की दुनिया में अपना किस्मत आजमाने लिखने थे. लेकिन जल्द ही अपनी अयोग्यता पता चल गयी और समय से पहले ही रुखसत हो कर अपन ने नयी राह तलाश ली.शुभकामना संजीव जी और बधाई फुटेला साहब.

  7. मोहक शर्मा

    November 11, 2010 at 5:37 am

    शाबाश संजीव…..तुमने जो किया है वो सच में काबिलेतारीफ है…वर्ना आज के समय में ऐसे पत्रकार कहाँ होते है…आज तो सब अपना मतलब देखते है बस……तुम्हारी ये कोशिश रंग लाई…
    आगे भी ऐसा काम करते रहो….सब तुम्हारे साथ है….कभी भी सहायता महसूस हो तो ज़रूर बताओ/…मेरी खुशकिस्मती होगी तुम्हारे साथ काम करने में…………..

  8. Arjun Sharma

    November 11, 2010 at 8:23 am

    badhayi ho sanjeev. khuskismat ho, tumhari taareef phutela ji ne kee hai.

  9. Babloo yadav

    January 31, 2011 at 7:39 am

    bahut hi accha kaam kiya hai sanjeev ji ne… bhai waah …. yeh real reporting hai….

  10. tariq ansari

    January 31, 2011 at 7:10 am

    sanjeev sir asliyat me bahut mehanti hain or mehnat karne wale raston se ladkar manzil tak pahunchte hain

    all the best sir

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