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कानाफूसी

आजकल किधर हैं श्रीकांत त्रिपाठी

पर्ल ग्रुप में श्रीकांत त्रिपाठी इन दिनों क्या कर रहे हैं? ये सवाल एक वरिष्ठ पत्रकार ने एक जूनियर लेकिन कयासबाज पत्रकार से पूछा. कानाफूसी करने वाले इस कयासबाज के मुंह से अचानक निकला- अरे हां, बहुत दिनों से श्रीकांत त्रिपाठी की कोई न्यूज नहीं है, वे तो पर्ल ग्रुप का अखबार निकालने वाले थे, क्या हुआ उस प्रोजेक्ट का? वरिष्ठ पत्रकार हंसे और बोल पड़े- सवाल मैंने पूछा था.

पर्ल ग्रुप में श्रीकांत त्रिपाठी इन दिनों क्या कर रहे हैं? ये सवाल एक वरिष्ठ पत्रकार ने एक जूनियर लेकिन कयासबाज पत्रकार से पूछा. कानाफूसी करने वाले इस कयासबाज के मुंह से अचानक निकला- अरे हां, बहुत दिनों से श्रीकांत त्रिपाठी की कोई न्यूज नहीं है, वे तो पर्ल ग्रुप का अखबार निकालने वाले थे, क्या हुआ उस प्रोजेक्ट का? वरिष्ठ पत्रकार हंसे और बोल पड़े- सवाल मैंने पूछा था.

दरअसल सच्चाई ये है कि इसका जवाब किसी के पास नहीं है. पर्ल के चेयरमैन भंगू के कभी बेहद करीबी रहे वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत त्रिपाठी ने इसी करीबी होने के भ्रम में पर्ल के निदेशक और पी7न्यूज, मनी मंत्री आदि को लांच कराने वाले ज्योति नारायण से पंगा ले लिया. खांटी इलाहाबादी और बोली-वाणी से बेहद मीठे ज्योति नारायण ने पंडित श्रीकांत त्रिपाठी को अपने तरीके से जवाब दिया लेकिन इस जवाबी-जवाबा में दोनों के पंख थोड़े-थोड़े डैमेज हो गए. ज्योति को पी7न्यूज व मीडिया के अन्य प्रोजेक्ट्स के रोजाना के कामों से हटाकर पर्ल ग्रुप की दूसरी कंपनियों में ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी दे गई और श्रीकांत त्रिपाठी को बिना लिखत-पढ़त के पेंशन देकर सिर्फ आफिस आने, बैठने व फिर शाम को घर जाने को कह दिया गया.

चर्चा करने वाले कहते हैं कि अखबार का प्रोजेक्ट भंगू ने फिलहाल दबा रखा है, क्योंकि उनका दिमाग पर्ल के कई बड़े विवादों को निपटाने में लगा है. पर्ल पर भी निवेशकों का प्रेत साया मंडरा रहा है. दर्जन भर से ज्यादा बार कंपनी का नाम बदल-बदल जनता से पैसा उगाहने वाले पर्ल के भंगू भाई साहब इन दिनों पर्ल समूह को बचाने की मैराथन दौड़ पर निकले हुए हैं. ऐसे में आने वाले दिनों में पर्ल ग्रुप में मीडिया क्षेत्र में किसी लांचिंग की संभावना नहीं है. पर्ल ग्रुप की तरफ से पोलिटिकल मैग्जीन लांच करने वाले श्रीकांत त्रिपाठी इस मैग्जीन से भी हाथ धो बैठे हैं.

कुछ दिनों तक वे पर्ल मीडिया के नोएडा स्थित आफिस में बैठे लेकिन अब वे वहां भी नहीं दिखते. बताया जाता है कि वे बारहखंभा स्थित मुख्यालय में बैठ रहे हैं. सुबह टाइम से आते हैं. दिन भर बैठते हैं. दो चार चेले-चांटे दरबार लगाने आ जाते हैं और शाम होते होते सभी खयाली पुलाव पकाकर अपने अपने घरों की तरफ निकल जाते हैं. संभव है, जल्द ही श्रीकांत त्रिपाठी के दिन बहुरे लेकिन जो लोग श्रीकांत त्रिपाठी से बुरी तरह आशा लगाए हुए थे, वे खासे निराश हैं और दूसरी नौकरियां तलाश रहे हैं या चुके हैं. उन्हें उम्मीद थी कि श्रीकांत जी अपने दावे अनुसार जल्द ही पर्ल ग्रुप का अखबार लाएंगे और अपने चाहने वाले पत्रकारों को नौकरी लगवाएंगे लेकिन ऐसा कुछ न हो सका.

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0 Comments

  1. rajesh

    January 24, 2011 at 2:32 pm

    srikant tripathi jaise ghatia insan ko..samajh lena chahiye ki unhone jyoti narayan se panga lekar apna nuksaan kiya hai..srikant ji ki galtfahmi door ho jaye to behtar hai..because aaj bhi pearl group mai jyoti ji ka koi vikalp nahi hai..matlab ye ki bhangu ji ke liye srikant nahi..jyoti narayan zyada imprortent hai..kesar sing mai yogyata hoti to p7 doobta nahi…srikant vo ghatiya insan hai jisne kesar aur raman ke saath milkar jyoti ko kinare kiya..lekin chanal doob raha hai

    rajesh

  2. vijay

    January 25, 2011 at 6:14 am

    jyoti narayan ke chamche srikant ji jaise seniar patrakar ke bare me bolna ki aap ki aaukat nah hai. jyotinarayan ki chamchgiri kar ke naukari hasil karna chahte ho ka.

  3. vashishth vikram singh

    February 4, 2011 at 11:14 am

    इस तरह की खबरें ऐसी भाषा में न लिखें. आपका ब्लॉग तो मीडिया के लिए है. फिर आप शुद्ध व्यवसायी ज्योति को फेवर क्यों कर रहे हैं. श्रीकांत त्रिपाठी जैसे सच्चे इंसान के रस्ते में ऐसे रोरे तो आते ही रहते हैं. एक मामूली सा पाठक हूँ.
    इतना तो कोई भी समझ सकता है की शुक्रवार और बिंदिया को इस मुकाम पर उन्होंने ही पहुँचाया है.उनके हट्टे ही दोनों लड़खड़ाने लगीं. दोनों का स्तर कितना गिर गया है, यह तो साफ़ दिखाई देता है.
    ज्योति तो सिर्फ अपना चेहरा चमकाने में लगे रहे. श्रीकांत जी ने तो जाने कितनों के दिमाग को दिशा दी. वह तो ज्योति की गन्दी राजनीति के शिकार हो गए हैं.
    धनयवाद,
    वशिष्ठ विक्रम, भोपाल

  4. vashishth vikram singh

    February 4, 2011 at 11:15 am

    इस तरह की खबरें ऐसी भाषा में न लिखें. आपका ब्लॉग तो मीडिया के लिए है. फिर आप शुद्ध व्यवसायी ज्योति को फेवर क्यों कर रहे हैं. श्रीकांत त्रिपाठी जैसे सच्चे इंसान के रस्ते में ऐसे रोरे तो आते ही रहते हैं. एक मामूली सा पाठक हूँ.
    इतना तो कोई भी समझ सकता है की शुक्रवार और बिंदिया को इस मुकाम पर उन्होंने ही पहुँचाया है.उनके हट्टे ही दोनों लड़खड़ाने लगीं. दोनों का स्तर कितना गिर गया है, यह तो साफ़ दिखाई देता है.
    ज्योति तो सिर्फ अपना चेहरा चमकाने में लगे रहे. श्रीकांत जी ने तो जाने कितनों के दिमाग को दिशा दी. वह तो ज्योति की गन्दी राजनीति के शिकार हो गए हैं.
    धनयवाद,
    वशिष्ठ विक्रम, भोपाल

  5. vashishth vikram singh

    February 5, 2011 at 6:02 am

    इस तरह की खबरें ऐसी भाषा में न लिखें. आपका ब्लॉग तो मीडिया के लिए है. फिर आप शुद्ध व्यवसायी ज्योति को फेवर क्यों कर रहे हैं. श्रीकांत त्रिपाठी जैसे सच्चे इंसान के रस्ते में ऐसे रोरे तो आते ही रहते हैं. एक मामूली सा पाठक हूँ.
    इतना तो कोई भी समझ सकता है की शुक्रवार और बिंदिया को इस मुकाम पर उन्होंने ही पहुँचाया है.उनके हट्टे ही दोनों लड़खड़ाने लगीं. दोनों का स्तर कितना गिर गया है, यह तो साफ़ दिखाई देता है.
    ज्योति तो सिर्फ अपना चेहरा चमकाने में लगे रहे. श्रीकांत जी ने तो जाने कितनों के दिमाग को दिशा दी. वह तो ज्योति की गन्दी राजनीति के शिकार हो गए हैं.
    धनयवाद,
    वशिष्ठ विक्रम, भोपाल

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