Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

कहिन

इस बार सच कह रहे थे कमबख्त चैनल वाले!

दिनेश चौधरी: जगजीत सिंह बरास्ते अमिताभ (तीन) : जगजीत साहब के चले जाने की खबर एक चैनल पर देखकर झटका लगा। पर उम्मीद खत्म नहीं हुई थी, यह सोचकर कि ये चैनलवाले तो उल्टी-सीधी सच-झूठ खबरें देते ही रहते हैं, चलो किसी और चैनल पर देखें। चैनल बदल दिया। लेकिन दूसरे-तीसरे हरेक चैनल पर यही खबर। पिछली बार एक मित्र ने कहा था कि जब किसी इंसान के गुजर जाने की झूठी खबर चल जाये तो उसकी उम्र बढ़ जाती है।

दिनेश चौधरी: जगजीत सिंह बरास्ते अमिताभ (तीन) : जगजीत साहब के चले जाने की खबर एक चैनल पर देखकर झटका लगा। पर उम्मीद खत्म नहीं हुई थी, यह सोचकर कि ये चैनलवाले तो उल्टी-सीधी सच-झूठ खबरें देते ही रहते हैं, चलो किसी और चैनल पर देखें। चैनल बदल दिया। लेकिन दूसरे-तीसरे हरेक चैनल पर यही खबर। पिछली बार एक मित्र ने कहा था कि जब किसी इंसान के गुजर जाने की झूठी खबर चल जाये तो उसकी उम्र बढ़ जाती है।

इस बात पर हमने दिल से यकीन किया था और उम्मीद भी की थी कि जगजीत साहब अस्पताल से बाहर आकर फिर से गालिब की ग़ज़लों को गायेंगे। उनके अस्पताल में दाखिल होने के एक दिन पहले ही अखबारों में यह खबर पढ़ी थी कि गालिब की ग़ज़लों के साथ जगजीत व गुलजार साहब की जोड़ी एक बार फिर सामने आ रही है। इसी उम्मीद में मैं ग़ज़लों के पूरे सफरनामे को याद कर रहा था कि जगजीत साहब फिर से अपनी ग़ज़लों की महफिल सजायेंगे, पर अफसोस ऐसा हो न सका क्योंकि इस बार सच बोल रहे थे कमबख्त चैनल वाले! कितने बेरहम होते हैं खबरों पर काम करने वाले कि इधर जगजीत साहब गुजरे नहीं कि वे विकिपीडिया में ‘हैं’ से अपडेट होकर ‘थे’ हो गये।

शुरुआती दौर में जब अपने पास कैसेट प्लेयर की सुविधा नहीं थी, उनकी ग़ज़लों को यहां-वहां सुनने का अवसर बमुश्किल मिलता था। दुर्ग के एक काफी हाउस में उनके दो तीन अलबम हुआ करते थे जिनकी ग़ज़लें मैं बार-बार किसी न किसी बहाने सुना करता था और ऐसा करते हुए एक अपराध बोध भी रहता था जैसे किसी शादी की दावत में बिन बुलाये घुस गये हों। दो-तीन ग़ज़लें इस दौर की खासतौर पर याद आती हैं, मसलन “सरकती जाये है रूख से नकाब आहिस्ता-आहिस्ता” जिसे आज भी सुनने पर वही ताजगी महसूस होती है। यह ग़जल उनके पहले सफल अलबम “द आनफारगेटेबल्स” से है, जिसकी एक नज्म “बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी” भी एक तरह से माइलस्टोन है और सुदर्शन फाकिर की यह नज्म खुद जगजीत साहब को बहुत पसंद थी।

“लाइव एट वेंबली” की ग़ज़लें “देर लगी आने में तुमको” और “उम्र जल्वों में बसर हो” भी खूब सुनी गयीं और आज भी उतनी ही व्यग्रता के साथ सुनी जाती हैं। जगजीत साहब की ग़ज़लें सुन पाना मेरे लिये इसलिये भी मुश्किल था कि उनकी ग़ज़लें तब आकाशवाणी अथवा विविध भारती में नहीं आती थीं। अगर मेरी याददाश्त सही है तो उन्हें दक्षिण अफ्रिका में किसी दौरे के कारण प्रतिबंधित कर दिया गया था। उनकी जो पहली ग़ज़ल मैंने दूरदर्शन पर सुनी थी वो बहुत बाद में किसी नये साल के प्रोग्राम में आयी थी। उन पर प्रतिबंध कब लगाया गया था और कब हटाया गया, यह बता पाना मेरे लिये मुश्किल है, लेकिन यह भी याद आ रहा है कि कैफी साहब के कहने पर उन्होंने “इप्टा” के एक आयोजन की आर्थिक मदद के लिये मुफ्त में एक कंसर्ट किया था और वामपंथियों के एक धड़े ने इस आयोजन का विरोध भी किया था। मुद्राराक्षस ने सारिका के किसी अंक में इस आयोजन के खिलाफ एक कड़ी टिप्पणी लिखी थी।

बहरहाल किसी सरकारी माध्यम में मैंने जगजीत साहब की जो पहली ग़ज़ल सुनी थी वो निदा फाजली की सूफियाना मूड वाली एक मशहूर ग़ज़ल थी, “गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला, चिड़ियों को दाने बच्चों को गुड़धानी दे मौला।” बाद में यह ग़ज़ल ‘इनसाइट’ अलबम में आयी थी, जो उन्होंने निदा फाजली के साथ किया था। निदा फाजली कहते हैं कि जगजीत न केवल अच्छे गायक थे बल्कि बहुत अच्छे इंसान थे और हमेशा जरूरतमंद शायरों-गायकों को किसी न किसी रूप में मदद दिया करते थे। फिल्मी गीतों में जिस तरह से आर.डी. बर्मन ने पश्चिमी वाद्यों का बहुत खूबसूरती के साथ उपयोग किया वही काम जगजीत साहब ने ग़ज़लों के साथ किया। लेकिन आगे चलकर मुझे यह महसूस हुआ कि आर्केस्ट्रा जगजीत साहब की ग़ज़लों पर हॉवी हो रहा है। खासतौर पर तब जबकि लंदन के किसी स्टूडियों में उन्होंने डिजीटल तकनीक के साथ “बियॉंन्ड टाइम’” नामक अलबम की रिकार्डिंग की थी।

औरों का नहीं पता, मैने यह स्पष्ट महसूस किया कि तकनीक कला पर हॉवी हो गयी है और जगजीत साहब पर से आस्था कुछ उठती हुई-सी मालूम पड़ी। यह अस्सी के दशक का उत्तरार्द्ध था, जबकि पूवार्द्ध में “प्रेमगीत” में उन्हीं के गाये एक गीत “होठों से छू लो तुम” व “अर्थ” की ग़ज़लों के कारण देश में ग़ज़लों का फैशन-सा चल पड़ा था। जाहिर है कि इस ज्वार के बाद ग़ज़लों के उफान को तो उतरना ही था, लेकिन ‘बियॉन्ड टाइम’ ने मेरे सामने एक प्रश्न खड़ा किया कि क्या जगजीत-चित्रा ने ग़ज़लों की दुनिया को अपना सर्वश्रेष्ठ दे दिया है और अब वे ढलान पर हैं? यहां पर बहुत दुःख के साथ कहना पड़ता है कि कला की नयी उंचाइयों को छूने से पहले जगजीत साहब को व्यक्तिगत तौर पर एक बहुत बड़े सदमें से गुजरना पड़ा।

जगजीत साहब तो खैर उबर भी गये, बाबू (विवेक सिंह, जगजीत चित्रा के इकलौते बेटे) के असमय चले जाने से संगीत की दुनिया से चित्रा सिंह ने अपने आपको पूरी तरह से काट लिया। कैसी विडंबना थी कि जो चित्रा जगजीत के साथ-साथ गाती दिखाई पड़ती थीं, उन्हीं चित्रा को मैंने जगजीत के एक कंसर्ट में गहरी उदासी के साथ उन्हें सुनते हुए देखा था और जगजीत साहब एक ऐसा गाना गा रहे थे, जिसमें एक मां मिट्टी के पुतले से अपने जी को बहला रही है। “समवन समव्हेयर” को चित्रा-जगजीत ने बाबू को समर्पित किया था पर यहां भी आर्केस्ट्रा के स्वर कुछ ज्यादा ही तीव्र हो गये थे। 1991 या 92 की बात है जब लता मंगेशकर के साथ एच.एम.व्ही. ने जगजीत के दो कैसेटों का अलबम ‘सजदा’ जारी किया था और कहना न होगा कि किस तरह से जगजीत सिंह ने अपनी निजी तकलीफ को रचनात्मक उंचाइयों के साथ बेहद मार्मिक कलात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की थी।

जो भी जगजीत को लगातार सुन रहे थे वे समझ रहे थे कि यह किसके लिये कहा जा रहा है: “जाकर जहां से कोई वापस नहीं है आता, वो कौन सी जगह है अल्लाह जानता है” या फिर “दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह, या फिर मुझको दीवाना कर दे या अल्लाह।” इतना ही नहीं, इस अलबम में गालिब की इस ग़ज़ल को रिपीट भी किया गया, “दिल ही तो है न संगो खिश्त दर्द से भर न आये क्यों, रोयेंगे हम हजार बार कोई हमें सताये क्यों।” सजदा जैसे अलबम सदियों में एकाध ही आते हैं। निजी जीवन की त्रासदियों पर शोध करने वाले किसी भी स्कालर के लिये इस सवाल से जूझना बेहद मुश्किल होगा कि किस तरह चित्रा ने अपने दर्द को मौन रखकर साधा और जगजीत ने मुखर होकर। बकौल शायर, “जख्म जब भी कोई जख्मे-दिल पर लगा, जिंदगी की तरफ एक दरीचा खुला / हम भी गोया किसी साज के तार हैं, चोट खाते रहे गुनगुनाते रहे।”

…जारी…

इसके पहले के दोनों पार्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें- पार्ट एक और पार्ट दो

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

0 Comments

  1. दिनेश

    October 10, 2011 at 10:42 am

    पोस्ट के आखिर में जहां “जख्मे – दिल” लिखा है उसे मेहरबानी कर “जेहनो – दिल” पढें। गलती के लिये खेद है।

  2. V.P.Ahuja

    October 10, 2011 at 11:11 am

    चौधरी साहब हर बार चैनल में खुद को तुर्प समझने वाले और चैनलों को बदलने की सिल्वर जुबली बनाने की ओर अग्रसर लोगों की बुध्दि नहीं मारी जाती है। लेकिन अफसोस कि जगजीत सिंहजी नहीं रहे। दुख इस बात का हाईडेफिनेशन कहलाने वाला मुकेश की अगुवाई वाला चैनल न्यूज एक्सप्रेस शायद तहकीकात के चक्कर में फ्यूज ही रहा बाजी दूसरों ने मार ली। जगजीत सिंहजी को विनम्र श्रध्दांजलि।

  3. prashant

    October 10, 2011 at 4:42 pm

    निशब्द हो गया हूं बस..

  4. indianrj

    October 13, 2011 at 9:02 am

    कभी सोचा ही नहीं था की जगजीत जी की ग़ज़लों को सुनकर अपने आसपास एक भरी पूरी (सुखद) तन्हाई का एहसास रहता था और उसमे अपने किसी जान से प्यारे प्रिय का प्रवेश भी वर्जित था, उनके जाने के बाद अब सारी ज़िन्दगी सचमुच की उदासी कैसे झेली जाएगी

  5. indianrj

    October 13, 2011 at 9:05 am

    कभी सोचा ही नहीं था की जगजीत जी की ग़ज़लों को सुनकर अपने आसपास एक भरी पूरी (सुखद) तन्हाई का एहसास रहता था और उसमे अपने किसी जान से प्यारे का प्रवेश भी वर्जित था, उनके जाने के बाद अब सारी ज़िन्दगी सचमुच की उदासी कैसे झेली जाएगी. ये अच्छी बात नहीं है तुम्हे इतनी जल्दी नहीं जाना था जगजीत.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास तक खबर सूचनाएं जानकारियां मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप चैनल से जुड़ें और नवीनतम खबरें पाएं : Bhadas Whatsapp

भड़ास लीगल टीम : किसी किस्म की लीगल हेल्प के लिए संपर्क करें- Bhadas Legal Team

You May Also Like

Uncategorized

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम तक अगर मीडिया जगत की कोई हलचल, सूचना, जानकारी पहुंचाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. इस पोर्टल के लिए भेजी...

Uncategorized

भड़ास4मीडिया का मकसद किसी भी मीडियाकर्मी या मीडिया संस्थान को नुकसान पहुंचाना कतई नहीं है। हम मीडिया के अंदर की गतिविधियों और हलचल-हालचाल को...

हलचल

[caption id="attachment_15260" align="alignleft"]बी4एम की मोबाइल सेवा की शुरुआत करते पत्रकार जरनैल सिंह.[/caption]मीडिया की खबरों का पर्याय बन चुका भड़ास4मीडिया (बी4एम) अब नए चरण में...

Uncategorized

मीडिया से जुड़ी सूचनाओं, खबरों, विश्लेषण, बहस के लिए मीडिया जगत में सबसे विश्वसनीय और चर्चित नाम है भड़ास4मीडिया. कम अवधि में इस पोर्टल...