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कहानी है छोटी, एक युवक नन्हा पत्रकार…

अमिताभ ठाकुर लखनऊ में पदस्थ आईपीएस अधिकारी हैं. कई जिलों में पुलिस अधीक्षक रह चुके हैं. इन दिनों शोध कार्य कर रहे हैं, और इसी कारण वे पुलिस की नौकरी से अवकाश पर चल रहे हैं. इस अवकाश के दौरान शोध कार्य के बाद बचे समय का सदुपयोग वह कई तरह से कर रहे हैं. विभिन्न मीडिया माध्यमों में जमकर लिखना भी उनका एक काम है. लेकिन अभी तक वह गद्य लिखते थे.

अमिताभ ठाकुर लखनऊ में पदस्थ आईपीएस अधिकारी हैं. कई जिलों में पुलिस अधीक्षक रह चुके हैं. इन दिनों शोध कार्य कर रहे हैं, और इसी कारण वे पुलिस की नौकरी से अवकाश पर चल रहे हैं. इस अवकाश के दौरान शोध कार्य के बाद बचे समय का सदुपयोग वह कई तरह से कर रहे हैं. विभिन्न मीडिया माध्यमों में जमकर लिखना भी उनका एक काम है. लेकिन अभी तक वह गद्य लिखते थे.

आज उन्होंने पद्य लिखा है. उस बच्चा पत्रकार पर जिसने अभी पत्रकारिता की दुनिया में आठ महीने पहले ही कदम रखा है लेकिन उसके सामने एक ऐसी समस्या खड़ी है, ऐसी मुश्किल आन पड़ी है कि उसे नहीं सूझ रहा कि वह क्या करे और क्या ना करे. उस युवा पत्रकार श्रवण कुमार शुक्ला के बारे में पहले भी भड़ास4मीडिया पर एक खबर प्रकाशित हो चुकी है जिसे पढ़ने के लिए आप ”एक पत्रकार साथी को मदद की दरकार” शीर्षक पर क्लिक कर सकते हैं.

अमिताभ ठाकुर ने उस युवा पत्रकार से बातचीत के बाद कल जो महसूस किया, जिस दर्द की अनुभूति की, उसे शब्दों का रूप देने बैठे तो उनका लिखा खुद ब खुद एक कविता में रूपांतरण होने लगा. अमिताभ इस लेखन के बारे में बस इतना कहते हैं- ”यह कविता एक सच्ची घटना पर आधारित है. मैंने यह कविता उस युवक पत्रकार की अनुमति के बिना लिखा है उसे शर्मिंदा करने को नहीं, उसके हौसले और उसकी इमानदारी को दाद देने को कि इन स्थितियों में भी उसके अपना संघर्ष किस शिद्दत और गहन अनुभूति के साथ किया.”

लीजिए, उनकी कविता पढ़िए.

-एडिटर

 


 

रुपये पच्चीस हज़ार

कल जानी मैंने,
एक ऐसी कहानी,
अंदर तक व्यथा,
गहरे दर्द और चुभन,
चीत्कार और कष्ट,
भयावह घुटन,
अकेलापन और त्रासदी,
लज्जा और संस्कार,
लोक, समाज और भय,
भग्न ह्रदय.

कहानी है छोटी,
एक युवक नन्हा पत्रकार,
अभी प्रस्फुटित होता,
देश दुनिया जानने को उद्धत,
मन में कुछ करने की चाहत,
समाज से कुछ बेचैनी,
समसामयिक से अनजान,
आदर्शों की लीक,
शनैः शनैः चलता,
खाता एक झटका,
भयानक, अकथनीय,
तीव्र झंझावात,भीषण प्रवाह,
पुलिस का धावा,
और पुलिस का दावा,
भाई है अपराधी,
गंभीर आरोप,
गैंगस्टर और गुंडा,
कट्टा और कारतूस,
आरोपों के पुलिंदे,
मोटे, खूंखार,
जेल की दीवारें,
कोर्ट और कचहरी,
भागमभाग, लस्त पस्त.

एक सर पर अनेकों मुकदमे,
उनके बीच घिरा दूसरा सर,
वेदना, संचेतना, संघर्ष,
वकील की फीस,
कोर्ट की फटकार,
माँ का चेहरा,
घर की गुहार,
अकेला पत्रकार नया नवेला,
सीमित आमदनी चुटकी भर यार,
अपना सब कुछ दांव पर,
तब जा कर कुछ मनुहार,
लोगों से मिन्नतें, फ़रियाद,
कोर्ट मांगे मुचलका,
कहाँ से लाये मेरे यार,
वो तो कुछ ऐसे भी यशस्वी,
यश के भागी यशवंत,
अनजाने से उस युवक को,
आगे बढ़ कर सहारा और प्यार.

दस महीने का जेल,
झेल रहा एक भाई,
दस महीने की त्रासदी,
दूसरे भाई ने पाई,
पांच महीने बित गए,
जब पाया उसमे मुचलका,
पर दुनिया की बंद आँखें,
और दुनिया के बंद कान,
अपने संघर्षों से लड़ता,
वह हिम्मती अकेली जान.

क्या सोचता होगा वह युवक,
क्या होंगी भावनाएं उसकी,
यही वह जगह है,
जहां नीता का पति मुकेश,
पुख्ता करने को अपना प्यार,
एक साल देता हवाई जहाज,
और अगले साल बँगला विशाल,
यही वह संसार है,
जहां पानी की तरह नोट,
अट्टालिकाएं, प्रासाद, भवन,
उनकी शीतलता  और सौदर्य,
अद्भुत, अतुलनीय, मनभावन,
और यही वह संसार है,
जहां वह युवक पत्रकार,
त्रस्त, परेशान , टूटा हुआ,
मात्र पचीस हज़ार रुपयों के लिए,
माँगता जो वकील,
यदि चाहिए मुचलका,
यदि चाहिए भाई,
जेल के बाहर, घर पर,
घूमने को आजाद सड़कों पर,
यदि चाहिए माँ की आँखों में शान्ति,
तो फिर उसे चाहिए रूपये पचीस हज़ार,
रुपये पचीस हज़ार कीमत उस भगवान की,
जिसने शायद यह दुनिया बनाई,
एक तरफ ताज बनाया,
और एक तरह अँधेरे वे नगर,
जहां जान की कीमत
रुपये पचीस हज़ार.

-अमिताभ ठाकुर

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0 Comments

  1. Ankur Vijaivargiya

    October 17, 2010 at 5:00 pm

    Shandar. Amitabh ji is dard ko samjhane ke liya badhai ke paatr hai.

  2. shravan shukla

    October 17, 2010 at 5:32 pm

    अभी किसी तरह से झेलता रहा हू लेकिन यह पद्य पढकर न जाने कैसी बेचैनी मन में आ रही है..

  3. abhishek

    October 17, 2010 at 10:39 pm

    …बेचैनी मन में आ रही है, …dard ko samjhane ke liya badhai ke paatr hai, इन वाक्यों से पाठक क्या सहनुभूति दिखना चाहते हैं समझ में नहीं आता, और वे आईपीएस अधिकारी कविता लिखकर ईमेल कर के क्या कहना चाहते हैं,
    मुद्दा से लोग भटक जाते हैं, सवाल यह है इन लोगों ने उस लडके को सीधे मदद क्यों नहीं की, और नहीं की तो मजाक हैं, या की तो मुझे अभी तक पता नहीं हैं.

  4. shravan shukla

    October 18, 2010 at 12:37 am

    जब यशवंत जी जैसे लोगो के साथ ऐसा हो सकता है तो मै किस श्रेणी में आता हू?

  5. shailendra parashar

    October 19, 2010 at 8:19 pm

    Dear Yaswant ji
    A kahani to meri hai or Mere jaise jane kitne jile m rahne wale patkar bhai ki hai jo apne such likhane ka anjam bhugat rahe hai?,kahte hai desh swatantr ho gaya lekiann hmara bundelkhand aj bhi in bherast sarkaryo ki chapet main pal pal ghut ghut kar mar raha hai,
    Student of Makhanlal Chaturvedi Rastiye Patakrita Bhopal M.P.

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