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‘ग्रेट स्टोरीज आफ चेंज’ में प्रभात खबर और हरिवंश पर एक अध्याय

”ग्रेट स्टोरीज आफ चेंज, इन्नोवेटिव इंडियन्स” नामक एक किताब आई है. इसका संपादन रीता और उमेश आनंद ने किया है. इस किताब में एक अध्याय हरिवंश और प्रभात खबर पर है. इस आलेख को नीचे प्रकाशित कर रहे हैं. अगर किसी को पढ़ने में दिक्कत आ रही हो तो संबंधित पेज पर क्लिक करने पर वह पेज बड़े साइज में अलग से खुल जाएगा जिससे पढ़ने में आसानी होगी.

”ग्रेट स्टोरीज आफ चेंज, इन्नोवेटिव इंडियन्स” नामक एक किताब आई है. इसका संपादन रीता और उमेश आनंद ने किया है. इस किताब में एक अध्याय हरिवंश और प्रभात खबर पर है. इस आलेख को नीचे प्रकाशित कर रहे हैं. अगर किसी को पढ़ने में दिक्कत आ रही हो तो संबंधित पेज पर क्लिक करने पर वह पेज बड़े साइज में अलग से खुल जाएगा जिससे पढ़ने में आसानी होगी.

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0 Comments

  1. n. thakur

    November 2, 2010 at 12:01 am

    मैं मुजफ्फरपुर का एक पत्रकार हूँ. पिछले दिनों हमारे शहर के मीडिया जगत में एक अजीब घटना हुई जिसकी कथा मैं भड़ास के माध्यम से पूरी पत्रकार बिरादरी को सुनना चाहता हूँ. हमारे शहर में एक अखबार ने दस्तक दी और इससे पहले हिंदुस्तान और जागरण का मैनेजमेंट सचेत हो पता, हम कोई तयारी कर पते की वह अखबार यहाँ नंबर एक हो गया. अब आप समझ ही गए होंगे की मैं प्रभात खबर की बात करता हूँ, जिस अखबार को झारखण्ड में तो मजबूत समझा जाता है पर बिहार में उसकी स्थिति हमेशा दोयम दर्जे की ही रही है. हमारा मैनेजमेंट अंत तक यही मानता रहा की यह अखबार लौंच भी हो गया तो ज्यादा से ज्यादा नंबर तीन होगा. अगर नंबर २ हो गया तो कमाल कर देगा. लिहाजा उसे रोकने के लिए कोई रणनीति नहीं बनी. फिर यहाँ टीम बनने से लेकर लौन्चिंग की तयारी तक उस ग्रुप में इतने मतभेद हुए की लगा या अखबार शायद ही लौंच हो पाए. हम सुस्त पड़े रहे और अखबार चुपके से नंबर एक हो गया. यह सब मैं इसलिए लिख रहा हूँ की लोग कभी किसी अखबार को छोटा न समझे और किसी मुगालते में न रहे. इस अखबार के संपादक नरेन्द्र अनिकेत ने जब ज्वाइन किया था उस वक़्त यह महज ४०० कॉपी बिकता था. आज लौन्चिंग के महज २० दिन में इसका प्रसार हमारे मैनेजमेंट के मुताबिक ३५ हजार और प्रभात खबर के साथियों के मुताबिक ४२ हजार पहुँच गया है. अभी इसने अपने डाक संस्करण को लौंच नहीं किया है. डाक लौंच होने पर इसका प्रसार ८०-९० हजार होने की उम्मीद है. आप इस अखबार के दफ्तर जायेंगे तो हैरत में पद जायेंगे. महज तीन कमरों में इसकी संपादकीय टीम बैठ कर काम करती हैं. मगर इसकी सफलता ने यहाँ के साथियों की कीमत बढ़ा दी है. हमारे संपादक कहते हैं की वहां से लोगों को तोड़ के लाओ कहो दूना वेतन दूंगा. भई साहब मैंने ये बातें कहानियों में सुनी थी देखा पहली बार. हमारे एक वरिष्ट साथी झारखण्ड में संपादक हैं, वे इस अखबार का संपादक बनने के लिए प्रयासरत हैं. वे भी मुझसे उम्मीद रखते हैं की मैं वहां तोड़ फोड़ में उनका साथ दूं. मुझे आश्चर्य है की इस अखबार का प्रबंधन इस सफलता का प्रचार क्यों नहीं कर रहा. वैसे आपके साईट पर उसका विज्ञापन है. मगर इसकी सफलता की कहानी इतनी रोचक है की आपको इसे विशेष रूप से प्रकाशित करना चाहिए.

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