प्रभात खबर ने गया से शुरू किया अपना 10वां संस्‍करण

महातीर्थ गया से प्रभात खबर आज (21 अक्तूबर, 2011) से प्रकाशित होने लगा है. महात्मा बुद्ध की इस धरती, जहां से दुनिया को ज्ञान की रोशनी मिली, यहां से प्रकाशन शुरू करने वाला प्रभात खबर पहला दैनिक अखबार है. इसी के साथ प्रभात खबर बिहार का भी पहला ऐसा दैनिक अखबार हो गया है जो राज्‍य के चार शहरों, पटना, मुजफ्फरपुर, भागलपुर और गया से प्रकाशित हो रहा है.

झारखंड के चार शहरों (रांची, जमशेदपुर, धनबाद व देवघर) से प्रकाशित होने वाला प्रभात खबर अकेला अखबार पहले से है. प्रभात खबर को पूर्वी भारत (बिहार, झारखंड व बंगाल) के सबसे ज्‍यादा 10 शहरों (रांची, पटना, जमशेदपुर, धनबाद, देवघर, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, गया, कोलकाता और सिलीगुड़ी) से प्रकाशित होने का भी गौरव प्राप्त है. इन तीन पूर्वी राज्‍यों के इतने शहरों से कोई दूसरा अखबार प्रकाशित नहीं होता है. इतना ही नहीं, बड़ी पूंजी वाले देश के बड़े घराने अपने प्रसार अभियान के तहत जहां देश के दूसरे हिस्सों में कम पूंजी वाले अखबारों की जमीन हड़प कर उन्हें बंद होने पर मजबूर कर रहे हों या कमजोर कर रहे हों, वहां छोटी पूंजी (अपने प्रतिस्पर्धियों की पूंजी के मुकाबले) के बल फैलने-ब़ढने का श्रेय भी अकेले प्रभात खबर को जाता है. 5000 करोड़ टर्न-ओवर या इससे भी ज्‍यादा बड़ी अखबार कंपनियों, देश के तीन सबसे बड़े अखबारों के मुकाबले देश में सिर्फ प्रभात खबर ही मजबूती से टक्कर ले रहा है. इस प्रतिस्पर्धा के बीच प्रभात खबर के बढ़ने की गति भी तेज हुई और आज वह देश के 10 बड़े हिंदी अखबारों के मुकाबले पाठक संख्या में सबसे तेज वृद्धि दर दर्ज कर रहा है.

पाठक सर्वेक्षण करनेवाली स्वतंत्र संस्था आइआरएस के 2011 की दूसरी तिमाही के सर्वे आंकड़ों के मुताबिक प्रभात खबर ने 2010 की दूसरी तिमाही के मुकाबले 41 फीसदी औसत पाठक जोड़े हैं और कुल पाठक संख्या के लिहाज से प्रभात खबर देश के शीर्ष 10 अखबारों में सातवें पायदान पर पहुंच गया है. आइआरएस के मुताबिक 2011 की दूसरी तिमाही में बिहार में प्रभात खबर की औसत पाठक संख्या में 27 फीसदी और अकेले पटना में 39 फीसदी की वृद्धि पहली तिमाही की तुलना में हुई है. यहां ध्यान देने की बात यह है कि इस आंकड़े में मुजफ्फरपुर और भागलपुर संस्करणों की पाठक संख्या शामिल नहीं है. प्रभात खबर की झारखंड में रोजाना लगभग चार लाख प्रतियां बिक रही हैं. तीनों राज्‍यों में कुल मिला कर प्रभात खबर की इस समय 7.35 लाख से ज्‍यादा प्रतियां रोजाना बिक (स्नेत- ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन जनवरी-जून, 2011 और सीए प्रमाणपत्र) रही हैं. बड़े अखबार, बड़े महानगरों या धनी राज्‍यों से बिहार-झारखंड में आये हैं या आ रहे हैं, लेकिन अविभाजित बिहार के रांची में लगभग 27 साल पहले (14 अगस्त 1984) जन्म लेने वाला प्रप्रभात खबर यहीं की मिट्टी से निकलकर अपने बलबूते तेजी से ब़ढ-फैल रहा है.

ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि प्रभात खबर की पत्रकारिता बाजार और भीड़ की पत्रकारिता नहीं है. प्रप्रभात खबर को अपनी मिट्टी यानी अपनी जन्मभूमि से रागात्मक लगाव है. हमारी पत्रकारिता का उद्देश्य व ध्येय साफ है, हम पारदर्शी तरीके से काम करते हैं. हमारी पत्रकारिता की मूल कसौटी है कि हमारे पाठक या हमारा समाज या राजनीति या राज्‍य, आज ज्ञान और विकास के जिस पायदान या स्तर पर खड़े हैं, वहां से हर दिन आगे ब़ढें. हम लोग विकास की दौड़ में पीछे छूट गये राज्‍य हैं. हम बीमार राज्‍यों में गिने जाते हैं. ये चुनौतियां बड़ी हैं लेकिन यह भी तय है कि हम-आप यानी यहां के नागरिक ही सार्थक पहल और कर्म से अपने समाज, अपने राज्‍य और अपनी दुनिया को बेहतर बना सकते हैं. हम जिस क्षेत्र में (गया-बोधगया और सामान्य तौर पर मगध) रहते हैं, उस जमीन में बिहार का सिरमौर बनने की सभी संभावनाएं मौजूद हैं. दुनिया के मानचित्र पर हमारी जमीन की एक अंतरराष्‍ट्रीय पहचान है. यानी हम खुद को सजग, जिम्मेदार व जवाबदेह बना कर सभी राज्‍यों के बीच बिहार को सिरमौर और बिहार में अपनी धरती, अपने क्षेत्र, अपने शहर को अव्वल बना सकते हैं. कर्म और व्यवहार के स्तर पर हम सब, यहां के हर नागरिक के लिए यह चुनौती है. इसमें हर कदम पर प्रभात खबर आपका सहयात्री और सहभागी है.

हम विद्यार्थी हों, नौकरी-पेशा हों, प्राध्यापक-शिक्षक हों, डॉक्टर हों, राजनीतिक हों, किसान हों, मजदूर हों, व्यापारी हों, गृहिणी हों, उद्यमी हों, सरकारी कर्मचारी हों, पुजारी हों या कुछ और हों, हम हर तबके, हर वर्ग के लोग यानी हर व्यक्ति आज जहां खड़ा है, वहां से आगे ब़ढे – चेतना के स्तर पर, भौतिक स्तर पर और ज्ञान के स्तर पर. इस यात्रा में प्रभात खबर सीढ़ी और सहयोगी का काम करे, हमारी पत्रकारिता का कर्म व धर्म यही है. आज का समय ज्ञान का युग कहा जाता है. यदि आपके पास ज्ञान है, कौशल है और लगन है तो आप दुनिया में कहीं भी जाकर अपनी जगह बना सकते हैं. ज्ञान और कौशल आप तक पहुंचे और इसका माध्यम प्रभात खबर बने, यही हमारी पत्रकारिता का लक्ष्य है. देश और दुनिया का परिवेश तेजी से बदल रहा है और ऐसे में सब कुछ सरकारों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता और सब कुछ सरकारों के भरोसे संभव भी नहीं. हमें खुद अपने क्षेत्र और राजय में नवोन्मेष (इनोवेशन) व उद्यमिता (एंटरप्रेन्योरशिप) की नयी लहर पैदा करनी होगी. ऐसा परिवेश आपके सहयोग और सुझावों से ही संभव है.

अब तक प्रभात खबर गया में पटना से छप कर आता था. इसमें और गया में छपने पर क्या कोई अंतर पड़ेगा? अंतर होगा. अब प्रभात खबर आपको गया की ही नहीं देश-विदेश की देर रात की खबरों, घटनाक्रमों की जानकारी देगा. अब गया संस्करण की रचना गया की ही आबो-हवा में होनी शुरू हो गयी है. परिलक्षित होगा आपकी खबरों, आपके आसपास की खबरों, घटनाक्रमों की रिपोर्टिग में और ज्‍यादा गहराई, और ज्‍यादा पैनेपन के साथ. यानी प्रभात खबर अब आपके बीच रहकर आपकी बात करेगा और आपकी बुलंद आवाज बनेगा. आज गया से प्रकाशित प्रभात खबर का 10वां संस्करण आपके हाथों में सौंपते हुए हम आपसे उम्मीद कर रहे हैं कि हमारी जिस भिन्‍न और सोद्देश्य पत्रकारिता को आप पाठकों ने मान्यता दी है, उस पर पैनी निगाह रखने का काम भी आप करें, जिससे हम अनजाने में भी अपनी पत्रकारिता से डिगने न पायें. आपसे सुझाव और मार्गदर्शन की अपेक्षा है. साभार : प्रभात खबर

NPHL launches Prabhat Khabar in Gaya on 21st October

This Edition launch will be 10th in total extending to 3 states and PK will be the 1st Newspaper to have 4 editions each in Bihar & Jharkhand (2 More than its nearest competitors) and 1st newspaper to Start from Gaya.

NPHL, one of the leading Hindi newspapers of Eastern India, today launched its 10th edition from Gaya. The publication has already been highly popular with its recent launches in Bhagalpur on 10th Feb 2011 where it had become No. 1 in city from the date of the launch.

With this launch, PK has now spread its reach to 4 locations each in Bihar & Jharkhand (Patna, Muzaffarpur, Bhagalpur, Gaya, Ranchi, Jamshedpur, Dhanbad & Deoghar) and 2 locations in West Benga (Kolkata & Silliguri). It is the first newspaper from Gaya and speaking on this occasion, Mr. K K Goenka, Managing Director of NPHL said , “The launch of Prabhat Khabar from Gaya is indeed a feather in the cap as we have worked very hard for the timely launch of this edition. Now we can proudly say that No One Understands and Covers Bihar & Jharkhand Better than Us! We are now present in 8 locations in these 2 states which is 2 more than our nearest competitors, and will be a very important competitive advantage for us. Prabhat Khabar is fast excelling in its journey of becoming the strongest media powerhouse of Eastern India. The ‘religious city of Gaya’ is already very famous in the international map due to Bodhgaya, which has a very rich tradition and history and we firmly believe that given our competitive advantage, Prabhat Khabar will emerge as a powerful vehicle to participate in the region’s progress and soon become the most preferred advertising media for all.”

Mr. R K Dutta, Executive Director of NPHL further added, “The launch of Gaya holds considerable importance to our expansion strategy in Bihar enabling us to further broaden our presence in Bihar & Jharkhand. We are very much optimistic and confident that we will deliver the best mix of content to cater the local taste of the people of this region and will command a market share of 40% in the overall circulation pie of nearly 2 Lac copies in this region. With this launch we now look forward to further consolidate our presence in this region.”

About Gaya : Surrounded by small rocky hills by three sides and river flowing on the fourth side, Gaya is the 2nd largest city of Bihar and proudly bears a spiritual legacy. Documented history of Gaya dates back to enlightenment of Goutam Budha and it is also important in Hinduism from the point of view of salvation to the souls of ancestors. The largest mosque of Bihar is situated here and it truly reflects the “unity in diversity” feeling of Indian culture. Gaya is a hot tourist spot which attracts pilgrims from worldwide and is also a major location for the textile industry.

About the Company : Prabhat Khabar – The people’s voice for the last 27 years has only got stronger and more powerful, relentlessly promoting a pure form of fearless journalism. The movement of mass awakening – Prabhat Khabar has become a symbol of truth and courage in journalism, a fire burning in the hearts and minds of people. With Ten Editions in three States (Jharkhand, Bihar & West Bengal) aggregating a reader family of 61.50 Lac individuals (Source IRS 2011-Q2 TR), is based in 80+ districts of India with a daily circulation of 7.35+ copies (Source: ABC Jan-June’2011 & CA Certificate). It also has FM Radio operations –Radio Dhoom, 104.8 FM in Ranchi & Jamshedpur and a successful Events and Brand Division – Prabhat Buzz. Press Release

सुमन सौरभ प्रभात खबर, देवघर के नए आरई, जमशेदपुर भेजे गए कुमार सौरभ एवं प्रदीप जायसवाल का इस्‍तीफा

: अपडेट : प्रभात खबर, रांची में हलचल है. पिछले काफी समय से जड़वत लोगों को इधर-उधर करके गतिशील बनाने का काम किया जा रहा है. प्रबंधन का निर्णय काफी दिनों से जमे-जमाए लोगों को रास नहीं आ रहा है. पिछले दिनों जमशेदपुर भेजे गए दो लोगों ने इस्‍तीफा देकर अपना बिजनेस चलाने का‍ निर्णय लिया है. इधर, प्रभात खबर, देवघर से सूचना है कि सुमन सौरभ को देवघर का नया आरई बना दिया गया है. पुराने संपादक संजय मिश्र होल्‍ड पर हैं.

रांची में तैनात सुमन सौरभ देवघर एडिशन के स्‍थानीय संपादक बना दिए गए हैं. सुमन काफी समय से रांची में जमे हुए थे. वे अब तक स्‍थानीय संपादक की भूमिका निभा रहे संजय मिश्र के ऊपर भेजे गए हैं. संजय मिश्र का तबादला नहीं किया गया है. बल्कि एक तरह से उन्‍हें होल्‍ड पर रख दिया गया है. दूसरी तरफ पिछले दिनों प्रमोट करके भेजे गए कुमार सौरभ और प्रदीप जायसवाल ने इस्‍तीफा दे दिया है. प्रबंधन ने रांची में डीएनई के पद पर कार्यरत कुमार सौरभ को एनई बनाकर जमशेदपुर भेजा था, परन्‍तु उन्‍होंने वहां जाने से इनकार करते हुए इस्‍तीफा दे दिया. चीफ सब से डीएनई बनाकर जमशेदपुर भेजे गए प्रदीप जायसवाल भी वहां ज्‍वाइन करने की बजाय इस्‍तीफा दे दिया. फिलहाल इन दोनों लोगों ने कहीं ज्‍वाइन नहीं किया है. इस संदर्भ में जब प्रदीप जायसवाल से बात की गई तो उन्‍होंने इस्‍तीफा के संबंध में कुछ भी बताने से इनकार कर दिया.

इसी उथल-पुथल के बीच एक खबर और आ रही है कि प्रभात खबर के एक वरिष्‍ठ संपादकीय सहयोगी दूसरे जगह आशियाना तलाशने की कोशिश में जुटे हुए हैं. अगर सूत्रों की माने तो रविवार को उन्‍होंने एक प्रतिद्वंद्वी अखबार के स्‍टेट हेड के साथ लम्‍बी मुलाकात की है. अब इन लोगों के बीच क्‍या बात हुई है, इसकी जानकारी तो नहीं मिल पाई है, परन्‍तु समझा जा रहा है कि बात बन गई तो अगले कुछ दिनों में ये प्रभात खबर को अलविदा कह सकते हैं. फिलहाल इस मुलाकात को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं.

प्रभात खबर ने किया अपने ई-संस्‍करण में बदलाव

प्रभात खबर ने अपने ई-पेपर को नयी साज-सज्‍जा और बेहतर तकनीक के साथ लांच किया है. पूरी तरह यूनिकोड फांट तकनीक के योग के कारण ई-पेपर अब इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर, फायरफाक्‍स, गूगल कोम आदि सभी ब्राउजर में खोला जा सकेगा. प्रभात खबर की साइट में भी काफी तीव्रता आ गई है. विजिटर चाहे तो किसी भी खबर का यूज पेपर तथा अखबार का मूल ले आउट भी देख सकते हैं.

नई तकनीक के साथ आर्काइव की भी क्षमता बढ़ाई गई है. साइट को ई-पेपर तथा इंटरनेट एडिशन के दो भागों में बांट दिया गया है. हालांकि इस बदलाव के बाद भी ई-पेपर को ठीक से पढ़ने में दिक्‍कत आ रही है. कुछ शब्‍दों के भाव बदल जा रहे हैं तो कहीं कहीं मात्रात्‍क त्रुटियां भी दिख रही हैं. उम्‍मीद है कि यह बदलाव का शुरुआती दौर है इसलिए ये दिक्‍कतें आ रही हैं, जो जल्‍द ही सुधार ली जाएंगी.

प्रभात खबर, भागलपुर के संपादक बने जीवेश रंजन

: कुमार सौरभ एवं प्रदीप जायसवाल प्रमोट कर जमशेदपुर भेजे गए : प्रभात खबर, रांची से सूचना है कि तीन लोगों को प्रमोट करके दूसरे यूनिटों में नई जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. रांची में पिछले चौदह सालों से कार्यरत जीवेश रंजन को भागलपुर का नया संपादक बनाया गया है. जीवेश रांची में स्‍टेट हेड रुरल के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे थे. जीवेश की वरिष्‍ठता एवं कार्यक्षमता को देखते हुए नई जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. जीवेश रंजन पिछले दो दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं.

जीवेश ने करियर की शुरुआत जमशेदपुर से प्रकाशित होने वाले इस्‍पात मेल के साथ की थी. पांच सालों तक यहां सेवाएं देने के बाद वे प्रभात खबर से जुड़ गए थे. इनके अनेक कार्यक्रम दूरदर्शन तथा आकाशवाणी पर भी प्रसारित होते रहते हैं. गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले भागलपुर के संपादक चंदन शर्मा का नाता प्रभात खबर से टूट गया था, जिसके बाद से यह पद खाली चल रहा था.

रांची में डीएनई के रूप में काम संभाल रहे कुमार सौरभ को एनई बनाकर जमशेदपुर भेज दिया गया है. वे भी काफी समय से प्रभात खबर को अपनी सेवाएं दे रहे थे. चीफ सब के पद पर रांची में अखबार को अपनी सेवा दे रहे प्रदीप जायसवाल को भी डीएनई बनाकर जमशेदपुर भेज दिया गया है.

प्रभात खबर में काम करने वाले मौका मिलते ही क्यों छोड़ जाते हैं साथ?

: सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है इस अखबार में : बिहार-झारखंड के लीडिंग न्यूजपेपर प्रभात खबर में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. यहां काम करने वाले परेशान हैं. एक तो सेलरी कम, उपर से काम का जबरदस्त बोझ. तीसरे चरम आंतरिक राजनीति. चौथा नौकरी जाने का भय. इन्हीं सब कारणों से प्रभात खबर के कर्मी मौका मिलते ही संस्थान को छोड़ देने में भलाई समझते हैं.

भागलपुर यूनिट में जो कुछ हो रहा है वह प्रभात खबर प्रबंधन के लिए खतरे की घंटी है. कई झटकों को झेल चुका प्रभात खबर अब जिस बड़ी चुनौती से मुखातिब है, उससे पार पाना उसके लिए अब तक का सबसे बड़ा चैलेंज है. हिंदुस्तान और दैनिक भास्कर जैसे अखबार हर कीमत पर प्रभात खबर को खा जाना चाहते हैं. ज्यादा संसाधन और ज्यादा प्रोफेशनल तौर-तरीकों से लैस ये दोनों अखबार अब प्रभात खबर की कमर पर वार कर रहे हैं. बेहतरीन लोगों को तोड़कर अपने पाले में कर रहे हैं. दुर्भाग्य यह कि प्रभात खबर प्रबंधन अपने यहां काम करने वालों की कीमत नहीं समझ रहा. सबके प्रति एक तटस्थ भाव रखा गया है. प्रत्येक कर्मी की समस्याओं को सुनने-समझने का कोई मैकेनिज्म डेवलप नहीं है. कोरी भाषणबाजी और कोरे आश्वासनों से कब तक काम चलाया जा सकता है.

सूत्रों का कहना है कि प्रभात खबर प्रबंधन अपने प्रत्येक कर्मी, प्रत्येक संपादक, प्रत्येक मैनेजर पर शक करता है. इस कारण कोई भी तनावमुक्त होकर काम नहीं कर पाता. प्रबंधन प्रत्येक आदमी से उच्चतर आदर्शों के पालन की उम्मीद करता है पर खुद वह संसाधन और सुविधा देने के नाम पर न्यूनतम से आगे नहीं बढ़ना चाहता. ऐसा भी नहीं कि प्रभात खबर के पास पैसा नहीं है. प्रभात खबर के पास संसाधन और पैसा पर्याप्त है, हर साल यह अखबार करोड़ों का प्राफिट कमाता है पर प्राफिट का छोटा हिस्सा भी कर्मियों के भले पर खर्च नहीं किया जाता. जो लोग शीर्ष पर लंबे समय से काबिज हैं, उनकी नजर में निचले स्तर पर काम करने वाले कीड़े-मकोड़ों से ज्यादा नहीं है.

भड़ास4मीडिया के पास आई एक हालिया मेल में प्रभात खबर के अंदर की कुछ कहानी का जिक्र किया गया है. इस मेल में उल्लखित प्रमुख बातों पर प्रभात खबर प्रबंधन का पक्ष जानने के लिए उन्हें मेल किया गया पर उधर से मेल का कोई जवाब नहीं आया. मेल इस प्रकार है-

‘प्रभात खबर में अफरा-तफरी : झारखण्ड,  बिहार और बंगाल के प्रमुख अखबार प्रभात खबर में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. लगभग एक वर्ष पहले आये कोर्पोरेट एडिटर राजेंद्र तिवारी ने प्रधान संपादक हरिवंश जी को सुझाव दिया है की यदि अखबार को और आगे ले जाना है तो बड़े पैमाने पर लोगों को बदल दें. और हरिवंश जी ने उनका यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है. राजेंद्र तिवारी और विनय भूषण ने यह सूची बनाई है और उसे हरिवंश जी को सौंप दिया है. खबर है कि इसी बहाने राजेंद्र तिवारी प्रभात खबर में महत्वपूर्ण पदों पर अपने लोगों को बैठाना चाहते हैं. इसी क्रम में भागलपुर से चंदन शर्मा को हटा कर उनके स्थान पर अजीत सिंह को लाना चाहते हैं. अजीत सिंह को राजेंद्र तिवारी ही लेकर आये हैं.  तिवारी इसी काम के लिए अभी भागलपुर में ही हैं. इसके अलावा कई स्थानीय संपादकों को भी बदलने की योजना है. खबर है कि कोलकाता के कौशल किशोर त्रिवेदी भी बदले जा सकते हैं. उनके स्थान पर धनबाद से अनुराग कश्यप को भेजा जा सकता है. अनुराग स्वयं प्रकाश के करीबी माने जाते हैं और स्वयं प्रकाश राजेंद्र तिवारी के रवैये से नाराज चल रहे है. तिवारी एक तीर से दो शिकार करना चाहते हैं. तिवारी यह भी चाहते हैं कि रांची के जमशेदपुर से रणजीत को देवघर और संजय मिश्र को जमशेदपुर भेजा जाए. रांची के स्थानीय संपादक विजय पाठक के स्थान पर ब्रिजेन्द्र दुबे को रांची का स्थानीय संपादक बनाया जाये. ब्रिजेन्द्र दुबे को तिवारी ही हिंदुस्तान से लेकर आये हैं. सिर्फ स्थानीय संपादक के स्तर पर नहीं, निचले स्तर पर भी लोगों को बदलने की योजना है. जमशेदपुर के जयनंदन शर्मा को गया भेजा जा सकता है. रांची में भी डेस्क और रिपोर्टिंग के कई वरीय लोगों को बदला जा सकता है. रांची से जीवेश रंजन सिंह को भी किनारे करने के योजना है. तिवारी चाहते हैं कि उन्हें कोई नया प्रोडक्ट निकाल कर किनारे कर दिया जाये और उनके स्थान पर आलोक सिंह को रुरल का इंचार्ज बना दिया. जो व्यक्ति (आलोक) एक मामूली सब एडिटर बन्नने की याग्यता नहीं रखता, उसे तिवारी उप समाचार संपादक बना कर लाये हैं. इस सूचना पर प्रभात खबर में अफरा-तफरी की स्थिति है. जिन लोगों को बदलने की योजना है, उनमें से कई ऐसे हैं, जिन्होंने प्रतिकूल परिस्थिति में भी प्रभात खबर का साथ नहीं छोड़ा. पर राजेंद्र तिवारी और अब हरिवंश जी के नजर में ऐसे लोग किसी काम के नहीं हैं जो वर्षों से एक ही स्थान पर जमे है. इस प्रस्ताव ने हिंदुस्तान और भास्कर को एक मौका दे दिया है.  झारखण्ड में भास्कर वहां के सबसे मजबूत अखबार प्रभात खबर को तोड़ नहीं पाया था. हरिवंश जी और राजेंद्र तिवारी के फैसले से भास्कर और हिंदुस्तान का काम आसान हो जायेगा. पिछले दिनों सुधीर अग्रवाल रांची आये थे. उन्होंने अपनी टीम पर नाराजगी जताई थी और निर्देश दिया था की दूसरे अखबार से निचले और ऊपर के स्तर पर स्टाफ लायें और यहाँ से बेकार लोगों को हटायें. अब उनकी रह आसान हो गयी लगती है.”

यह तो था भड़ास4मीडिया के पास पहुंचा एक गोपनीय पत्र. हफ्ते भर पहले आए इस पत्र में भागलपुर में जो कुछ अब हो रहा है, उसकी आशंकाएं व्यक्त कर दी गई थीं. इसी तरह के कई फीडबैक भड़ास के पास पहुंचे हैं. अगर आपके पास भी प्रभात खबर में चल रहे अंदरुनी उठापटक को लेकर कोई खबर, जानकारी या चर्चा हो तो हमतक पहुंचाएं, नीचे दिए गए कमेंट बाक्स के जरिए या फिर bhadas4media@gmail.com पर मेले के जरिए. आपके नाम और पहचान को पूरी तरह गोपनीय रखा जाएगा. हमारी कोशिश रहेगी कि हम झारखंड और बिहार में चल रहे अखबारी युद्ध से होने वाले उथल-पुथल की छोटी से छोटी जानकारियां आप तक पहुंचाएं.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

प्रभात खबर, भागलपुर संकट में : संपादक का तबादला, एनई समेत चार का इस्‍तीफा

भागलपुर में प्रभात खबर से मात खाने के बाद हिंदुस्‍तान अब सीधी लड़ाई में उतरता दिख रहा है. हिंदुस्‍तान प्रभात खबर के लोगों को ही तोड़कर अपने साथ जोड़ने में लगा हुआ है. प्रभात खबर में भागमभाग जैसी स्थिति बन गई है. कई लोगों ने अखबार को अलविदा कह दिया है. सबसे बड़ी खबर है कि भागलपुर के स्‍थानीय संपादक चंदन शर्मा का तबादला रांची के लिए कर दिया गया है. फिलहाल उन्‍होंने रांची ज्‍वाइन नहीं किया है. वे छुट्टी पर चल रहे हैं.

समाचार संपादक अजीत सिंह ने भी इस्‍तीफा दे दिया है. अभी उनकी कहीं ज्‍वाइनिंग नहीं हुई है. सिटी चीफ प्रसन्‍न सिंह प्रभात खबर छोड़कर हिंदुस्‍तान चले गए हैं. बांका के जिला प्रभारी संजय सिंह ने भी हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन कर लिया है. डेस्‍क पर तैनात सफदर मोबिन भी यहां से इस्‍तीफा देकर लखनऊ में आई-नेक्‍स्‍ट ज्‍वाइन कर लिया है. खबर है कि कई अन्‍य प्रभात खबरियों के साथ हिंदुस्‍तान प्रबंधन संपर्क में है. कुछ और लोग प्रभात खबर को नमस्‍कार कर सकते हैं.

गौरतलब है कि भागलपुर में प्रभात खबर की लांचिंग के समय राघवेन्‍द्र को स्‍थानीय संपादक बनाया गया था तथा उनको अखबार लांच कराने की जिम्‍मेदारी सौंपी गई थी. लांचिंग से पहले ही राघवेन्‍द्र ने इस्‍तीफा देकर भास्‍कर ज्‍वाइन कर लिया. इसके बाद चंदन शर्मा को प्रभात खबर, भागलपुर का स्‍थानीय संपादक बनाया गया. चंदन शर्मा के नेतृत्‍व में प्रभात खबर की धमाकेदार लांचिंग हुई तथा प्रभात खबर ने जल्‍द ही भागलपुल में हिंदुस्‍तान तथा दैनिक जागरण को पछाड़ते हुए नम्‍बर एक की कुर्सी पर कब्‍जा जमा लिया. इसके बाद हिंदुस्‍तान ने इस टीम को ही तोड़ने की रणनीति तैयार कर ली.

इस संदर्भ में चंदन शर्मा से बात की गई तो उन्‍होंने कोई भी टिप्‍पणी करने से इनकार कर दिया. जब भड़ास की तरफ से प्रभात खबर के कारपोरेट एडिटर राजेन्‍द्र तिवारी से बात की गई तो उन्‍होंने भी कोई कमेंट करने से मना कर दिया.

उदय झा, रजनीश कुमार एवं अनिल कुमार की नई पारी

दैनिक जागरण, भागलपुर से उदय झा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर असिस्‍टेंट मैनेजर थे. उन्‍होंने अपनी नई पारी प्रभात खबर, मुजफ्फरपुर के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां डिप्‍टी मैनेजर बनाया गया है. उदय काफी समय से जागरण को अपनी सेवाएं दे रहे थे.

प्रभात खबर, मुजफ्फरपुर से रजनीश कुमार ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर डिस्‍पैच इंचार्ज थे. इन्‍होंने अपनी नई पारी हिंदुस्‍तान, मुजफ्फरपुर के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां भी वही जिम्‍मेदारी दी गई है. रजनीश इसके पहले भी कई संस्‍थानों में काम कर चुके हैं.

जी न्‍यूज यूपी-उत्‍तराखंड से अनिल कुमार ने इस्‍तीफा दे दिया है. उन्‍होंने अपनी नई पारी न्‍यूज एक्‍सप्रेस के साथ शुरू की है. जागरण से करियर की शुरुआत करने वाले अनिल कुमार, ईटीवी राजस्‍थान, सहारा समय, जी बिजनेस को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

दिल्‍ली में स्‍वयं प्रकाश करा रहे इलाज, बिहार में हिंदुस्‍तान से जुड़ने की अफवाह

वरिष्‍ठ पत्रकार एवं प्रभात खबर, पटना के संपादक स्‍वयं प्रकाश को लेकर पूरे बिहार में कानाफूसी चल रही है. उनके हिंदुस्‍तान के साथ जुड़ने की खबर पूरे बिहार में एक कान से दूसरे कान तक पहुंच रही है. हर कोई इस खबर की सच्‍चाई जानने की कोशिश कर रहा है. कारण है उनका दिल्‍ली में पिछले कुछ दिनों से चल रहा प्रवास. पर सच यह है कि वो दिल्‍ली में अपना इलाज करा रहे हैं.

प्रभात खबर आज बिहार में सभी प्रतिद्वंद्वी अखबारों को कड़ी टक्‍कर दे रहा है तो उसके पीछे कारण हैं स्‍वयं प्रकाश, जो प्रधान संपादक हरिवंश के निर्देशन एवं नेतृत्‍व में दिन-रात एक करके अखबार को आम लोगों का संवाद पत्र बनाया. इस दौरान उन्‍होंने एक दिन की छुट्टी नहीं ली, परन्‍तु वो पिछले कई दिनों से पटना से बाहर दिल्‍ली में जमे हुए हैं तो उनके चाहने और न चाहने वालों को हैरत तो होनी ही है. बिहार में स्‍वयं प्रकाश को लेकर अफवाह और चर्चाओं का दौर चल रहा है. भड़ास को भी लगातार उनके हिंदुस्‍तान से जुड़ने, प्रधान संपादक शशि शेखर से मिलने की खबरें दी जाती रहीं. इन चर्चाओं को इसलिए भी बल मिला कि बिहार का नम्‍बर एक अखबार जिस तरह की विषम परिस्थितियों से गुजर रहा है तथा प्रभात खबर जिस तेजी से उसे टक्‍कर दे रहा है, उसमें स्‍वयं प्रकाश उसके लिए एक मजबूत कड़ी साबित हो सकते हैं.

भड़ास ने जब इस खबर की पुष्टि अपने स्‍तर से करने की कोशिश शुरू की तो पता लगा कि स्‍वयं प्रकाश दिल्‍ली के एक अस्‍पताल में अपने रीढ़ की हड्डी की तकलीफ का इलाज करा रहे हैं. उन्‍हें डाक्‍टर ने पर्याप्‍त बेड रेस्‍ट की सलाह दी है. डाक्‍टरों का मानना है कि लगातार कई घंटे बैठकर काम करने के चलते उन्‍हें यह परेशानी आई है. उनके सेहत की जानकारी लेने उनके प्रधान संपादक हरिवंश भी आ चुके हैं. इस संदर्भ में जब स्‍वयं प्रकाश से बात की गई तो उन्‍हें इसे अफवाह बताते हुए कहा कि उनके दिल्‍ली में रहने के चलते इस तरह की चर्चाएं उठ रही हैं, परन्‍तु अभी वे इतने अनैतिक नहीं हैं कि प्रभात खबर और हरिवंश जी को छोड़ दें. उन्‍होंने कहा कि उनका सपना प्रभात खबर को बिहार में नम्‍बर एक पर पहुंचाना है उसके बाद कुछ सोचा जाएगा. हिंदुस्‍तान से जुड़ने जैसी खबरें बिल्‍कुल गलत हैं.

पत्रकार की पिटाई होती रही, विधायक तमाशबीन बने रहे

बख्तियारपुर :  बिहार में नीतीश शासन की दूसरी पारी में अपराधियों का मनोबल बढ़ता जा रहा है. अपराधी तांडव कर रहे है और पटना पुलिस मसाज पार्लरो और पार्कों में छापामारी कर लडकों लड़कियों को एक दूसरे से करीब आने से रोकने के अभियान में लगी है. इसी पटना जिला के बाढ़ अनुमंडल में अपराधियों का मनोबल कुछ इस कदर बढ़ा हुआ है कि अब पत्रकार भी लगातार निशाने पर हैं.

ताजा मामला बख्तियारपुर के प्रभात खबर संवाददाता सबल कुमार का है,  जिनकी अपराधियों ने हथियार के बल पर जमकर पिटाई कर दी और कैमरा छीन लिया. सारा तांडव बख्तियारपुर के विधायक अनिरुद्ध यादव के सामने हुआ, पत्रकार पिटता रहा और विधायक तमाशा देखते रहे. विधायक के साथ रहे सुरक्षा गार्डों ने भी पत्रकार को बचाने की को‍ई कोशिश नहीं की.  उनके लगुये भगुए भी तमाशबीन बने रहे. तीन की संख्या में रहे अपराधियों ने जब अपनी मनमानी कर ली और पत्रकार सबल कुमार को पीट कर चलते बने तब विधायक हरकत में आये.

सबल कुमार ने इलाके के डीएसपी रामानंद कुमार कौशल को सूचना डी और विधायक ने भी उसी समय डीएसपी रामानंद कुमार कौशल से कार्रवाई की मांग की. विधायक अनिरुद्ध यादव के पैतरे से भन्नाए डीएसपी रामानंद कुमार कौशल ने तत्काल उलाहना दे दी की कार्रवाई उनके गार्डों ने क्यों नहीं की. डीएसपी रामानंद कुमार कौशल ने विधायक अनिरुद्ध यादव से यह भी शिकायत की क्यों नहीं उन्होंने अपने गार्डों को पत्रकार के हमलावरों के पीछे दौड़ाया. सारा घटना क्रम तब हुआ जब विधायक अनिरुद्ध यादव गंगा कटाव का निरिक्षण करने गए थे.

पत्रकार ने पुलिस थाने को लिखित सूचना दे दी है और नामजद प्राथमिकी दर्ज कराई है. बताया जाता है की विधायक अनिरुद्ध यादव इसलिए मौन रहे क्योंकि हमलावर उनके स्वजातीय थे. पत्रकार को उनके अखबार प्रभात खबर ने भी ईनाम दे दिया. यह इनाम है सबल को अखबार की सेवा से हटाये जाने का. ताजा सूचना है कि सात अगस्त को पत्रकार सबल कुमार अपराधियों क़ी गुंडागर्दी के शिकार हुए और शाम में अखबार ने उनको हटाये जाने का फैसला कर दिया. इससे पहले इसी अनुमंडल के बाढ़ थाना इलाके में सहारा समय के संवाददाता कमालुद्दीन को भी बदमाशों ने धमकाया था कि वो बलात्कार क़ी खबर ना चलाएं.

बाढ़ इलाके में तीन दिनों में पत्रकार उत्पीड़न का यह दूसरा मामला है. यहाँ यह बता देना गौरतलब होगा कि सुशासन का नारा देने वाले राज्य सरकार के मुखिया नीतीश कुमार बाढ़ इलाके से लगातार पांच बार सांसद रह चुके है और केंद्र में मंत्री भी. दोनों ही मामले में कोई कारगर कार्रवाई नहीं हुयी है, जिससे पत्रकारों में रोष व्‍याप्‍त है. शिकायत दर्ज कराए जाने के बाद भी पुलिस ने अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है.

पटना से कृष्‍ण कुमार की रिपोर्ट.

प्रभात खबर, बगहा के मोडम प्रभारी बने मनोज राव

उत्तर बिहार के विभिन्न जिलों में हिंदुस्तान व जागरण को करारी मात देने के बाद प्रभात खबर ने बगहा का रूख किया है। हालांकि अब तक बगहा में प्रभात खबर का फैक्स सेंटर था। अब वहां मोडम कार्यालय खुलने वाला है। मोडम के प्रभारी के रूप में हिंदुस्तान, मुजफ्फरपुर में स्टाफर व मोतिहारी के ब्यूरो चीफ रह चुके मनोज राव को प्रभात खबर ने बगहा भेजा है। मनोज खास कर चंपारण के पत्रकारों में काफी सुलझे एवं जुझारू माने जाते हैं।

बता दें कि मनोज को हिंदुस्तान में काफी परेशान किया जा रहा था, जिसके चलते नाराज होकर उन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया था। ऐसे में बगहा में हिंदुस्तान को सबक सिखाने की तैयारी में मनोज जुट गये है। हालांकि जागरण की स्थिति वहां कोई खास अच्छी नहीं है। मनोज के टारगेट में भी हिंदुस्तान ही है। ऐसे में अब देखना है कि मनोज के चुनौती को रोकने के लिए हिंदुस्तान किसको भेजता है। हालांकि अभी बगहा हिंदुस्तान का कार्यालय काफी अस्त-व्‍यस्‍त चल रहा है। उधर, मनोज ने भी इतने छोटे जगह में काम करने की स्वीकृति देकर मीडिया जगत के लोगों को हैरत में डाल दिया है। मनोज राव ने अपने करियर की शुरुआत हिंदुस्‍तान, दिल्‍ली से की थी, इसके बाद इन्‍हें मुजफ्फरपुर भेज दिया गया था। यहां से इस्‍तीफा देने के बाद ये साप्‍ताहिक अखबार चौथी दुनिया से जुड़ गए थे।

हिंदुस्‍तान को झटका, सियाराम एनई बनकर प्रभात खबर पहुंचे, विनय भी जुड़े

प्रभात खबर ने झारखंड में हिंदुस्‍तान का एक और विकेट गिरा दिया है. हिंदुस्‍तान, धनबाद से खबर है कि सियाराम ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर डीएनई थे. अब वे अपनी नई पारी प्रभात खबर, मुजफ्फरपुर के साथ करने जा रहे हैं. उन्‍हें यहां एनई बनाया गया है. सियाराम ने अपने करियर की शुरुआत 96 में प्रभात खबर के साथ ही की थी. इसके बाद ये हिंदुस्‍तान से जुड़ गए थे. मुजफ्फरपुर का प्रभार संभाल रहे प्रभात खबर, पटना के संपादक स्‍वयं प्रकाश ने भी सियाराम के प्रभात खबर से जुड़ने की पुष्टि की.

 

 

खबर है कि हिंदुस्‍तान, धनबाद से विनय कुमार ने भी इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर कम्‍प्‍यूटर ऑपरेटर थे. इन्‍होंने भी अपनी नई पारी प्रभात खबर, मुजफ्फरपुर के साथ शुरू की है. इन्‍हें भी सेम जिम्‍मेदारी दी गई है. माना जा रहा है कि सियाराम इन्‍हें अपने साथ लेकर गए हैं.

शुक्रवार के एसोसिएट एडिटर बने अशोक कुमार, सुमित प्रभात खबर से जुड़े

इंडिया टुडे के डिप्‍टी एडिटर रह चुके अशोक कुमार ने साप्‍ताहिक पत्रिका शुक्रवार ज्‍वाइन किया है. उन्‍हें एसोसिएट एडिटर बनाया गया है. अशोक कुमार कुछ समय पहले ही इंडिया टुडे से रिटायर हुए थे. वे इंडिया टुडे हिंदी के शुरुआती टीम के सदस्‍य थे. मूल रूप से पटना के रहने वाले अशोक कुमार ने करियर की शुरुआत धर्मयुग से की थी. इसके बाद वे जनसत्‍ता से जुड़े, यहां से इस्‍तीफा देने के बाद रिटायरमेंट तक इंडिया टुडे को सेवा देते रहे.

हिंदुस्‍तान, मोतिहारी से सुमित सुमन ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सुपर स्ट्रिंगर थे. इन्‍होंने अपनी नई पारी की शुरुआत प्रभात खबर, मुजफ्फरपुर के साथ की है. इन्‍हें यहां डेस्‍क पर सब एडिटर बनाया गया है. सुमित ने अपने करियर की शुरुआत दो साल पहले हिंदुस्‍तान से ही की थी.

दिवाकर भारद्वाज और देवेंद्र सिंह हिंदुस्‍तान से जुड़े

प्रभात खबर और हिंदुस्‍तान के बीच झारखंड और बिहार में एक दूसरे के पत्रकारों को जोड़ने-तोड़ने का सिलसिला लगातार चल रहा है. नई सूचना है कि प्रभात खबर के सर्कुलेशन मैनेजर दिवाकर भारद्वाज ने इस्‍तीफा दे दिया है. अब वे हिंदुस्‍तान के साथ जुड़ गए हैं. दिवाकर पटना में बैठकर हिंदुस्‍तान संभालेंगे. प्रभात खबर पटना में ही असिस्‍टेंट मैनेजर देवेंद्र सिंह भी हिंदुस्‍तान से जुड़ गए हैं. वे मुजफ्फरपुर में हिंदुस्‍तान को अपनी सेवाएं देंगे.

उल्‍लेखनीय है कि इसके पहले हिंदुस्‍तान, मुजफ्फरपुर से कई लोग इस्‍तीफा देकर प्रभात खबर से जुड़ गए थे.  हिंदुस्‍तान, मुजफ्फरपुर के यूनिट हेड सुरेश चचान बिहार हेड बनकर प्रभात खबर से जुड़े. इनके अलावा सर्कुलेशन मैनेजर पीके कर प्रभात खबर का हिस्‍सा बने, कुशल अग्रवाल बिहार के कामर्शिलय हेड बनकर प्रभात खबर पहुंचे. सत्‍यम कुमार भास्‍कर तथा अमरेश झा भी प्रभात खबर ज्‍वाइन कर लिया था.

बताया जा रहा है कि अगले कुछ समय तक दोनों अखबारों में एक दूसरे के सेनापतियों और सिपाहियों को अपने पाले में करने की कोशिशें जारी हैं. पहली बाजी तो प्रभात खबर के हाथ लगी परन्‍तु अब हिंदुस्‍तान ने भी पलटवार शुरू कर दिया है. आने वाले दिनों में इसके और तेज होने की संभावना जताई जा रही है. बिहार में जारी इस संघर्ष में कुछ लोगों के बल्‍ले बल्‍ले भी हो रहे हैं.

प्रभात खबर से जुड़े अमरेश

हिंदुस्‍तान, मुजफ्फरपुर यूनिट के मोतिहारी ब्‍यूरो को अमरेश नंदन ने बाय बोल दिया है. वे यहां पर स्ट्रिंगर थे. उन्‍होंने अपनी नई पारी मोतिहारी में ही प्रभात खबर के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां सुपर स्ट्रिंगर बनाया गया है. अमरेश ने सात महीने पहले ही हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन किया था. अमरेश ने छह साल पहले अपने करियर की शुरुआत मोतिहारी में ही प्रभात खबर के साथ की थी. प्रभात खबर संग यह उनकी दूसरी पारी है.

रामदेव ने किया प्रभात खबर पर 15 लाख क्षतिपूर्ति का मुकदमा

पूर्वी चम्‍पारण के मोतिहारी जिले के रामदेव गिरी ने प्रभात खबर पर 15 लाख रुपये के क्षतिपूर्ति का दावा किया है. गिरी ने आरोप लगाया है कि प्रभात खबर ने साजिशन गलत विज्ञापन प्रकाशित कर उन्‍हें पंचायत चुनाव में पराजित कराने का काम किया है. कोर्ट ने प्रधान संपादक एवं स्‍थानीय संपादक समेत आठ लोगों को सम्‍मन जारी किया है.

रामदेव गिरी ने कोर्ट में दायर किए गए मुकदमे में आरोप लगाया है वे पूर्वी चम्‍पारण के 29 नम्‍बर पीपरा कोठी सीट से जिला परिषद  सदस्‍य पद के उम्‍मीदवार थे. उनका चुनाव चिन्‍ह टेबुल था, उनके विजयी होने की पूरी सम्‍भावना थी परन्‍तु प्रभात खबर ने अपने 8 मई के अंक में एक विज्ञापन प्रकाशित किया, जिसमें टेबुल की जगह स्‍टूल चुनाव चिन्‍ह छपा था. जिसमें लिखा गया था कि क्रम संख्‍या 14 पर रामदेव गिरी को टेबुल पर मत देकर विजयी बनाइए. वहां चित्र स्‍टूल का छपा हुआ था. जिसके चलते उनके वोट स्‍टूल वाले उम्‍मीदवार को पड़ गए जिसके चलते उनको दूसरे स्‍थान पर रहना पड़ा.

कोर्ट ने रामदेव के मामले को संज्ञान में लेते हुए प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश, स्‍थानीय संपादक स्‍वयं प्रकाश, प्रकाश एवं मुद्रक एसएन पाठक, विज्ञापन प्रबंधक एवं स्‍थानीय कार्यालय प्रभारी राकेश समेत कुछ आठ लोगों को सम्‍मन जारी किया है तथा कोर्ट में अपना पक्ष रखने को कहा है.

प्रभात खबर ने प्रतिद्वंद्वी अखबारों का नींद हराम किया

उत्तर बिहार में प्रभात खबर को मिल रही अच्छी सफलता ने हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण की बेचैनी बढ़ा दी है। दोनों अखबारों को लगातार तगड़ा झटका लग रहा है। इनकी प्रसार संख्या में लगातार गिरावट ने सबको हैरत में डाल दिया है। उधर, इस झटके का सामना करने के लिए दैनिक जागरण ने तो अपनी तैयारी शुरू कर दी है, लेकिन हिन्दुस्तान अभी भी नम्बर वन के नशे में चूर है। जबकि सबसे अधिक हिन्दुस्तानी ही प्रभात खबर में गये हैं।

हिन्दुस्तान का यह हाल तब है जब सबसे ज्यादा प्रसार संख्या में गिरावट इसी अखबार का है। सूत्रों के अनुसार, प्रभात खबर की भावी रणनीति को भांपकर दैनिक जागरण अपनी तैयारी में लग गया है। जागरण के प्रबंधन ने फैसला लिया है कि वह फिर से उसी रास्ते को पर चलेगा, जिससे उसने वर्ष 2000 और उसके बाद के साल में सफलता पायी थी। वही टीम और वही रणनीति। इसी के तहत अब जिलों की कमान फिर से उन्हीं लोगों के हाथों में सौंपने की तैयारी हो रही है, जिन लोगों ने जागरण को नम्बर दो पर पहुंचाया था। पुराने प्रभारियों व सेकेंड प्रभारियों को अपने-अपने गृह जिले में तैनात किया जा रहा है। ताकि उनके अनुभवों व कुशल कार्य कैशल से प्रभात खबर के इरादे को ध्वस्त किया जा सके।

जागरण प्रबंधन का इसके पीछे तर्क यह है कि इससे हॉकरों व पाठकों के बीच फैल रहे कनफ्यूजन व निराशा को कम किया जा सकेगा। फिर से एक नया माहौल और जोश का वातावरण बनेगा। मगर हिन्दुस्तान का प्रबंधन व संपादकीय विभाग फिलहाल टेंशन में तो जरूर है, पर किंकर्तव्यविमूढ़। संपादकीय विभाग इस चिंता में डूबा है कि क्या करें और क्या न करें। गौर करें तो हिन्दुस्तान अखबार से सबसे पहले सेल्स के अमरेश झा, पटना के विज्ञापन विभाग के जीएम पुनीत खंडेलिया, कौशल वर्मा, उसके बाद मुजफ्फरपुर के यूनिट मैनेजर सुरेश चचान और चार-पांच रोज पहले मुजफ्फरपुर के सेल्स प्रभारी पीके कार ने प्रभात खबर का दामन थाम लिया। ये सभी लोग यूनिट के स्थापना काल से हिन्दुस्तान के मजे हुए खिलाड़ी रहे हैं।

हाल यह है कि इन दिनों मुजफ्फरपुर यूनिट बगैर मैनेजरों के चल रही है। मुजफ्फरपुर में पिछले दस साल से सफल पारी खेल रहे पीके कार के प्रभात खबर में चले जाने के बाद तो उत्तर बिहार में हिन्दुस्तान की प्रसार संख्या लगातार गिर रही है। कहीं अखबार पहुंच रहा है तो कहीं नहीं। ज्यादा खराब हालत जिलों में हो गई है। खबर यह भी है कि प्रभात खबर में गये ये दिग्गज हिन्दुस्तानी भव्ष्यि में हिन्दुस्तान की परेशानी और बढ़ाने वाले हैं। इसकी तैयारी भी हो रही है। इन लोगों ने प्रभात खबर प्रबंधन को सलाह दी है कि हिन्दुस्तान को उसके पुराने फार्मूले से ही पटखनी देनी है। उसी पुराने कैसेट को फिर से बजाना है, जिसके सहारे हिन्दुस्तान ने उत्तर बिहार में झंडा गाड़ा था।

सूत्रों ने बताया कि प्रभात खबर अब जिलों में तोड़फोड़ करेगा। इन पूर्व हिन्दुस्तानियों ने प्रभात खबर प्रबंधन को बताया है कि जिलों में फिलहाल हिन्दुस्तान की जो कमजोर और अराजक हालत है, उसका फायदा आसानी से मिल सकता है। इसको देखते हुए सेल्स, विज्ञापन और संपादकीय विभाग के लिए वैसे लोगों की सूची बनायी जा रही है, जिन लोगों ने हिन्दुस्तान को इस मुकाम तक पहुंचाया। ताजा खबर के मुताबिक, इसकी शुरुआत चंपारण से होनेवाली है। यहां कभी हिट जोड़ी रही सुजीत-विजय को फिर से एक मंच पर लाने की तैयारी है। इसी जोड़ी ने दैनिक जागरण से मुकाबले के समय हिन्दुस्तान को ऊंचाई दी थी। इस जोड़ी को पूर्वी व पश्चिम चंपारण का संयुक्त प्रभार सौंपने की योजना है। इनमें एक चंपारण में तो दूसरे मुजफ्फरपुर हिन्दुस्तान के संपादकीय विभाग में तैनात हैं।

उत्तर बिहार के मीडिया जगत के जानकारों का कहना है कि प्रभात खबर यदि इस जोड़ी को एक मंच पर ला दिया तो चंपारण में हिन्दुस्तान को कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। कारण कि इस जोड़ी की सेल्स, विज्ञापन व खबरों पर मजबूत पकड़ है। इसके अलावे दूसरे जिलों में भी पुराने हिन्दुस्तानियों को ये तोड़ने में कामयाब हो जायेंगे। हिन्दुस्तान के संपादकीय विभाग को भले ही इसकी चिंता न हो पर सेल्स और विज्ञापन विभाग जरूर चिंतित है। यदि प्रभात खबर की यह योजना सफल हो गई तो इसमें कोई दो राय नहीं कि हिन्दुस्तान को उत्तर बिहार के बाजार में बुरे दिन देखने को मिल सकते हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

प्रभात खबर ने 850 प्रतिभाओं को सम्‍मानित किया

रांची : रांची की प्रतिभाएं रविवार को एक मंच पर जुटी. मौका था प्रभात खबर प्रतिभा सम्मान समारोह का. होटल रेडिशन ब्‍लू में आयोजित समारोह में विभिन्न परीक्षाओं के 850 टॉपरों को प्रभात खबर ने सम्मान दिया. उनका उत्साहवर्द्धन किया और सफल भविष्य के लिए शुभकामनाएं दी. भारी बारिश में भी इन टॉपरों का उत्साह कुछ कम नहीं था और प्रभात खबर भी इन्हें सम्मानित कर गौरवान्वित महसूस कर रहा था. बच्चों के साथ उनके अभिभावक भी आये थे. मौसम खराब होने के बावजूद बड़ी संख्या में वे पहुंचे.

दो शिफ्ट में हुआ समारोह :  सम्मान समारोह दो शिफ्ट में आयोजित किया गया था. पहले शिफ्ट में झारखंड बोर्ड की मैट्रिक, आइए, आइएससी, आइकॉम और सीबीएसइ 12 वीं के स्कूल टॉपर के अलावा एआइइइइ, सीबीएसइ, मेडिकल व आइआइटी के 350 टॉपरों को सम्मानित किया गया. विधानसभा अध्यक्ष सीपी सिंह, आपदा प्रबंधन मंत्री राजा पीटर, आइआइएम के निदेशक एमजे जेवियर, रांची विवि के कुलपति प्रो एए खान और महर्षि निखिलेश सेवा संस्थान के महर्षि ज्योति स्वरूप ने इन बच्चों को प्रतीक चिन्‍ह और प्रमाण पत्र प्रदान किये.

सम्‍मान

दूसरे शिफ्ट में सीबीएसइ 10वीं में सीजीपीए 10 लानेवाले 500 विद्यार्थियों को सम्मान दिया गया. इन्हें  मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. डीके तिवारी, प्रभात खबर के एमडी केके गोयनका,  प्रभात खबर के वरिष्‍ठ संपादक (स्टेट हेड झारखंड) अनुज कुमार सिन्हा, प्रभात खबर के कार्यकारी निदेशक आरके दत्ता और संजीवनी बिल्डकान के निदेशक श्याम किशोर गुप्‍ता के हाथों सम्मान मिला.

चार प्राचार्य भी हुए सम्मानित : प्रभात खबर ने बेहतर परिणाम देनेवाले रांची के चार स्कूलों के प्राचार्यों को भी सम्मानित किया. सम्मान पानेवालों में जेवीएम श्यामली के प्राचार्य डीआर सिंह, संत जेवियर स्कूल डोरंडा के अजित खेस, टॉरियन स्कूल के अतुल भट्ट और संत जॉन्स स्कूल के प्राचार्य फादर फ्लोरेंस कुजूर शामिल हैं.

सम्‍मान

बिहार एवं झारखंड में सबसे ज्‍यादा पाठक जोड़े प्रभात खबर ने

: बिहार में 23.8 एवं झारखंड में 6.61 प्रतिशत पाठक बढ़े : प्रभात खबर झारखंड व बिहार का सबसे तेज बढ़ता हुआ अखबार है. देश के शीर्ष 10 हिंदी अखबारों में प्रभात खबर आठवें स्थान पर रहा और लगातार दूसरी बार औसत पाठक संख्या में सबसे ज्यादा आठ फीसदी की वृद्धि दर्ज की. आइआरएस के ताजा सर्वे (2011 की पहली तिमाही ) के मुताबिक प्रभात खबर ने 2010 की चौथी तिमाही के मुकाबले औसत पाठक संख्या में 7.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की.

झारखंड में प्रभात खबर की औसत पाठक संख्या में 6.61 फीसदी और बिहार में 23.08 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. इसके विपरीत हिंदुस्तान की पाठक संख्या बिहार में मात्र 2.25 और झारखंड में 5 फीसदी ही बढ़ी है. रांची में प्रभात खबर की औसत पाठक संख्या 5.24 फीसदी, धनबाद में 10.26 फीसदी और जमशेदपुर में 4.55 फीसदी बढ़ी है. इस तरह धनराज (धनबाद-रांची-जमशेदपुर) में प्रभात खबर ने 5.69 फीसदी की वृद्धि दर्ज की, जबकि यहां हिंदुस्तान की औसत पाठक संख्या में 1.57 फीसदी की कमी आयी.

रांची और जमशेदपुर में भी इस अखबार की औसत पाठक संख्या घटी है.बिहार में पटना में भी प्रभात खबर ने अपनी औसत पाठक संख्या में 7.55 फीसदी की वृद्धि दर्ज की. जबकि हिंदुस्तान के लिए वृद्धि दर मात्र 0.74 फीसदी ही रही. पüश्चिम बंगाल में भी प्रभात खबर की पाठक संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है. साभार : प्रभात खबर

सुरेश चचान बने प्रभात खबर के स्‍टेट हेड, धर्मेद्र भी जुड़े

हिंदुस्‍तान, मुजफ्फरपुर में भागमभाग मची हुई है. यहां के यूनिट मैनेजर सुरेश चचान ने संस्‍थान को अलविदा कह दिया है. वे प्रभात खबर से जुड़ गए हैं. उन्‍हें प्रभात खबर का स्‍टेट हेड बनाया गया है. वे काफी समय से हिंदुस्‍तान से जुड़े हुए थे. उनका जाना हिंदुस्‍तान के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है.

हिंदुस्‍तान, मुजफ्फरपुर से धर्मेंद्र कुमार ने भी इस्‍तीफा दे दिया है. वे एकाउंट सेक्‍शन में कार्यरत थे. उन्‍होंने भी अपनी नई पारी प्रभात खबर के साथ मुजफ्फरपुर में शुरू की है. उन्‍हें एकाउंटस में ज्‍वाइन कराया गया है. खबर है कि एडिटोरियल को लोग भी हिंदुस्‍तान से भागने का विकल्‍प खोज रहे हैं. यहां काम के दबाव और कम पैसा के चलते पत्रकार परेशान हैं.

कार्यालय नहीं आ रहे आलोक पांडेय, मनीष, उदय एवं राम कुमार का इस्‍तीफा

हिंदुस्‍तान, जमशेदपुर में इन दिनों घमासान मचा हुआ है. आतंरिक परिस्थितियों से नाराज चीफ सब आलोक पांडेय कई दिनों से कार्यालय नहीं आ रहे हैं. सूत्रों का कहना है संपादक के साथ पटरी नहीं बैठ पाने के बाद वे इस्‍तीफा देने का मूड बना चुके हैं. चर्चा है कि उन्‍होंने इस्‍तीफे का नोटिस दे दिया है, हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है. बताया जा रहा है कि जमशेदपुर में स्‍टाफ की कमी के चलते आलोक पांडेय यह कदम उठाने को मजबूर हुए.

 

प्रभात खबर, मुजफ्फरपुर से मनीष शर्मा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सब एडिटर थे. उन्‍होंने अपनी नई पारी दैनिक भास्‍कर, धनबाद के साथ शुरू की है. इन्‍हें यहां भी सब एडिटर बनाया गया है. मनीष ने अपने करियर की शुरुआत प्रभात खबर, पटना से की थी. इसके बाद वे हिंदुस्‍तान के साथ मुजफ्फरपुर में जुड़ गए थे. तीन साल काम करने के बाद प्रभात खबर, मुजफ्फरपुर की लांचिंग टीम के सदस्‍य बन गए थे.

प्रभात खबर, मुजफ्फरपुर से उदय खवाड़े ने भी इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर प्रादेशिक प्रभारी थे. उदय प्रभात खबर के साथ लांचिंग के समय से जुड़े हुए थे. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं, इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है.

प्रभात खबर, पटना को राम कुमार ने बाय बोल दिया है. वे यहां पर सब एडिटर के पद पर कार्यरत थे. वे अपनी नई पारी दैनिक भास्‍कर, धनबाद के साथ शुरू करने जा रहे हैं. उन्‍हें यहां भी सब एडिटर बनाया गया है.

प्रभात खबर, मुजफ्फरपुर के सम्‍पादक नरेंद्र अनिकेत का इस्‍तीफा

: आशुतोष का हिंदुस्‍तान से इस्‍तीफा : प्रभात खबर मुजफ्फरपुर संस्करण के स्थानीय संपादक नरेंद्र अनिकेत ने इस्तीफा दे दिया है. वे एक साल पहले दैनिक भास्कर ग्रुप छोड़कर मुजफ्फरपुर आए थे. उन्हीं के नेतृत्‍व में प्रभात खबर का मुजफ्फरपुर संस्करण लॉंन्च हुआ था. नरेंद्र का तबादला प्रबंधन ने रांची के लिए कर दिया था, जिससे खफा होकर उन्‍होंने अपना इस्तीफा प्रबंधन को सौंप दिया है.

 

सूत्रों के मुताबिक नरेंद्र अनिकेत प्रभात खबर दफ्तर नहीं जा रहे हैं. प्रभात खबर प्रबंधन ने नए संपादक की नियुक्ति नहीं की है. अखबार के प्रिंट लाइन से भी नरेंद्र अनिकेत का नाम हट गया है. स्‍थानीय संपादक के रूप में स्‍वयं प्रकाश का नाम जाने लगा है.

एक अन्य सूचना के मुताबिक हिंदुस्‍तान, बदायूं से आशुतोष वाजपेयी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे स्ट्रिंगर थे. कुछ दिनों पूर्व ही वे बरेली से बदायूं आए थे. बताया जा रहा है कि वे अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए इस नौकरी को बाय बोला है. आशुतोष ने अपने करियर की शुरुआत हिंदुस्‍तान के साथ ही की थी.

”प्रभात खबर से पांच के इस्तीफा देने की खबर पूरी तरह सही नहीं है”

यशवंत जी, आपके भड़ास पर खबर आयी है कि प्रभात खबर गिरिडीह को झटका, पांच पत्रकार भास्कर गए. यह खबर पूरी तरह सही नहीं है. अमरदीप (तीसरी), सतीश जायसवाल (डुमरी), विजय सिन्हा (मधुबन), रामकृष्ण (धनवार) और सुधीर सिन्हा के प्रभात खबर छोड़ने की बात भड़ास में आयी है. सच ये है कि सिर्फ दो लोगों अमरदीप (तीसरी) व सतीश जायसवाल (डुमरी) ने प्रभात खबर छोड़ा है. भास्कर से इन्हे बड़ा ऑफर मिला था.

ये दोनों प्रभात खबर पर बोझ थे. यहाँ एक नाम छूट गया है. प्रभात खबर के देवरी के रिपोर्टर मनोज कुमार भी भास्कर में गए हैं. धनबाद और गिरिडीह में प्रभात खबर का प्रतिद्वंद्वी होकर भास्कर जो कर रहा है, वो शायद प्रभात खबर का कोई दोस्त भी नहीं कर पाये. जी हाँ, प्रभात खबर के कचड़ों की सफाई कर रहा है भास्कर. विजय सिन्हा (मधुबन) व रामकृष्ण (धनवार) अब भी प्रभात खबर में है. इनदोनों को भी भास्कर से बड़ा ऑफर मिला है, मगर इन्होंने ठुकरा दिया. यही नहीं भास्कर के गिरिडीह ऑफिस में काम करनेवाले सोम्ब्रत झा को 4000 मिलते हैं, इन्हे 10000 का ऑफर मिला है, मगर इन्होंने ठुकरा दिया.

और हाँ, प्रभात खबर छोड़ने वालों में एक नाम गलत है- सुधीर सिन्हा. इस नाम का कोई रिपोर्टर प्रभात खबर, गिरिडीह में था ही नहीं. टीम बनाने के चक्कर में भास्कर मैनजमेंट पागल हो गया है. ब्लॉक और मुफ्फसिल के रिपोर्टरों को 5000-8000 का ऑफर दिया जा रहा है. ब्लॉक और मुफ्फसिल के रिपोर्टरों को इतनी बड़ी राशि लम्बे समय तक देना किसी अखबार के लिए संभव नहीं. रिपोर्टर मिल नहीं रहे तो भास्कर मैनजमेंट किसी तरह अखबार निकलने की रणनीति के तहत ये सब कर रहा है. जो रिपोर्टर ये समझ रहे हैं, वो भास्कर का ऑफर ठुकरा रहे हैं.

संजय कुमार

प्रभात खबर, धनबाद.

कोयलांचल के मिजाज को समझ पाने में फेल रहा दैनिक भास्कर धनबाद

17 अप्रैल से धनबाद कोयलांचल के बाजार में पूरे ताम-झाम के साथ दैनिक भास्कर उतरा और पूरी तरह से फ्लॉप हो गया. यह एकदम सही है. इसकी  एक बड़ी वजह यह है कि दैनिक भास्कर धनबाद कोयलांचल के मिजाज को समझ पाने में एकदम फेल रहा. न तो पहले दिन और न ही अंतिम दिन भास्कर की जो टीम बनी है, वह भी एकदम डी ग्रेड की है. हिंदुस्तान और प्रभात खबर से जो लोग भास्कर में गये, वे एक तरह से दोनों अखबारों में रिजेक्‍ट श्रेणी में थे.

बेहतर टीम बनाने की भास्कर की तमाम कोशिशें नाकाम हो गयी. अंतत: भास्कर को जैसे-तैसे टीम बनानी पड़ी. प्रभात खबर ने अपने जिन दो रिपोर्टरों अखिलेश कुमार व अमित रंजन को गलत-तथ्यहीन रिपोर्टिंग और बिना सूचना के अक्‍सर गायब होने की शिकायत को लेकर बर्खास्त कर दिया था, उन्हें भास्कर को अपना स्टार रिपोर्टर बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा. आज निश्चित तौर पर भास्कर को कोयलांचल के पाठकों ने रिजेक्‍ट कर दिया है. हालात यह बने हैं कि मजबूर होकर भास्कर को मुफ्त में अखबार बांटना पड़ रहा है. पिछले दो दिनों से धनबाद में जिन घरों में प्रभात खबर, हिंदुस्तान और जागरण जाता है, वहां मुफ्त में भास्कर की कॉपियां फेंकी जा रही हैं. भास्कर को जितनी खराब स्थिति का सामना धनबाद में करना पड़ रहा है, उतनी खराब स्थिति देश में शायद ही कहीं और झेलनी पड़ी हो.

सिर्फ एक संस्करण ही निकाल पाया भास्कर : यही नहीं धनबाद से निकलने वाले सभी अखबार प्रभात खबर, हिंदुस्तान व दैनिक जागरण की ओर से धनबाद, बोकारो और गिरिडीह तीनों जिलों के लिए तीन अलग-अलग संस्करण निकाले जाते हैं. दैनिक जागरण ने भी वर्ष 2003 में जब धनबाद से प्रकाशन शुरू किया, तब पहले दिन से ही धनबाद, बोकारो और गिरिडीह तीनों जिलों के लिए तीन संस्करण निकाले थे. मगर भास्कर सिर्फ एक संस्करण ही निकाल पाया, वह भी धनबाद जिले के लिए. बोकारो व गिरिडीह में आज तक उसकी टीम नहीं बन पायी है.

हिंदुस्तान नंबर वन है : एक सच यह भी : जब बात पूरे झारखंड की होती है, तो प्रभात खबर नंबर वन है. रांची और जमशेदपुर में प्रभात खबर का प्रसार हिंदुस्तान की तुलना में सीधे दोगुना है. मगर धनबाद में हिंदुस्तान नंबर वन है और प्रभात खबर दूसरे स्थान पर है. इसकी सबसे बड़ी वजह है धनबाद और बोकारो में बड़े पैमाने पर बिहार के लोगों का होना. और बिहार के लोगों के बीच में पिछले ढाई दशक से हिंदुस्तान एक ब्रांड बना रहा है. पटना से नवभारत टाइम्स का प्रकाशन बंद होने के बाद से ही. उस दौर में जब धनबाद और बोकारो में अखबार का मतलब होता था आवाज (एक स्थानीय हिंदी दैनिक), तब भी पटना से छपकर धनबाद के मार्केट में आनेवाला हिंदुस्तान अधिक बिकता था. कारण हिंदुस्तान में बिहार की खबरों के 5-6 पन्ने होते थे.

कुछ और सच : पहला सच : आज हिंदुस्तान धनबाद में अपने अस्तित्व संकट से जूझ रहा है. वजह तेजी से बढ़ता प्रभात खबर. अप्रैल,  2010 जहां धनबाद, बोकारो व गिरिडीह में प्रभात खबर की मुश्किल से 20,000 कॉपियां बिकती थीं, वहीं आज 82,700 कॉपियां हर रोज बिक रही हैं. जून, 2010 में धनबाद समेत पूरे झारखंड में प्रभात खबर, हिंदुस्तान व दैनिक जागरण ने अपने-अपने अखबार की कीमतें घटाकर दो रुपये की. दो रुपये कीमत होने का सबसे ज्यादा लाभ प्रभात खबर को मिला. हिंदुस्तान की भी कुछ कॉपियां बढ़ी हैं, मगर प्रभात खबर जैसी दोगुनी-तीगुनी नहीं.

दूसरा सच : धनबाद में आज हिंदुस्तान का प्रोडक्‍ट बेहद कमजोर है. हिंदुस्तान आज अपने संपादकीय कंटेंट के बूते नहीं, बल्‍िक एजेंट आरएन सिंह के बल  पर बिक रहा है. धनबाद में हिंदुस्तान के एजेंट आरएन सिंह काफी पुराने एजेंट हैं. आरएन सिंह के पास बांग्ला अखबार आनंदोबाजार और अंगरेजी का अखबार द टेलीग्राफ है. कोई हॉकर यदि हिंदुस्तान की एक कॉपी घटाता है, तो उसे आरएन सिंह आनंदोबाजार व टेलीग्राफ देना बंद कर देते हैं. हॉकर मजबूर होते हैं, क्‍योंकि हिंदी भाषी पाठक कोई भी अखबार पढ़ सकते हैं, मगर धनबाद के बांग्ला भाषी 20 हजार पाठक सिर्फ और सिर्फ आनंदोबाजार पढ़ते हैं.

तीसरा सच : धनबाद में हिंदुस्तान का वर्षों पुराना गढ़ अब ध्वस्त होने को है. वजह प्रभात खबर की तेजी से बढ़ती मांग. यहां गौरतलब है कि हाल में एआईआर की रिपोर्ट में धनबाद में प्रभात खबर का सबसे ज्यादा 18 प्रतिशत ग्रोथ बताया गया है.

आपके भड़ास4मीडिया की निम्‍नलिखित पंक्तियां एकदम गलत हैं : हिंदुस्‍तान के संपादक ओमप्रकाश अश्‍क के लंबे समय का गहरा अनुभव और उनके सानिध्‍य में काम कर चुके दैनिक जागरण के संपादक बसंत भारतीय की रणनीति ने भास्‍कर को पहले ही दिन पटकनी दे दी। दोनों ने अपने अपने अखबारों के बेहतरीन कंटेंट जुझारू तेवर का अखबार में नजारा पेश कर भास्‍कर को हर मोर्चे पर चित कर दिया।

सच तो यह है : धनबाद में बीते 17 अप्रैल  को भास्कर के प्रकाशन के दिन न सिर्फ भास्कर फ्लॉप हुआ, बल्कि कंटेंट के मामले में हिंदुस्तान व दैनिक जागरण भी पीछे छूट गये. बेहतर कंटेंट व जुझारू तेवर दिखा, तो सिर्फ प्रभात खबर का. उस दिन का ईपेपर देख सकते हैं.

हिंदुस्तान के पहले पन्ने पर ओमप्रकाश अश्क ने झरिया पर बॉटम लिखा है : हल्की भी हिली धरती, तो जमींदोज होगी झरिया. झरिया की कोयला खदानों में लगी आग और उस कारण हो रहे भू-धंसान की समस्या काफी पुरानी है. रही बात धरती हिलने की, तो दुनिया में कहीं भी धरती हिलेगी, तो वहां का क्‍या होगा, यह बताने की जरूरत नहीं. क्‍या दिल्‍ली और गुजरात में धरती हिलेगी, तो सब कुछ सामान्य रहेगा?

इसी तरह दैनिक जागरण में उस दिन अपने पहले पन्ने पर एक खबर छाप दी है : दांव पर लाखों श्रमिकों की जिंदगी.. इस खबर में खान सुरक्षा महानिदेशालय के महानिदेशक सतीश पुरी का बयान है. महानिदेशक की प्रतिक्रिया आप खुद ही बात करके जान सकते हैं.  महानिदेशक ने कहा है कि उन्होंने अपनी जिंदगी में जागरण जैसा झूठा अखबार नहीं देखा.

प्रभात खबर ने भास्कर के प्रकाशन के दिन किस तरह का कंटेंट दिया और उसके बाद लगातार किस तरह का अभियान चला रहा है, उसका प्रमाण ईपेपर के जरिए देख सकते हैं. यूपी तक कोयला के अवैध धंधेबाजों के खिलाफ अभियान शुरू है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

बिहार में आए बदलाव से खुश दिखे प्रभात खबर के अतिथि संपादक अभिषेक

: पटना कार्यालय में बैठे प्रभात खबर के अतिथि संपादक : बॉलीवुड स्‍टार अभिषेक बच्‍चन कल प्रभात खबर के अतिथि संपादक थे. वे रविवार को प्रभात खबर के पटना कार्यालय में अतिथि संपादक के रूप में बैठे. प्रभात खबर की टीम के साथ कई मुद्दों और खबरों पर चर्चा की. अखबार छपने की प्रक्रिया को समझा. उन्‍होंने अतिथि संपादक के रूप में युवाओं की तारीफ की. युवाओं को भारत का भविष्‍य बताया. प्रभात खबर में अतिथि संपादक के रूप प्रकाशित लेख.


बेहतर भविष्य के शिल्पी हैं युवा : अभिषेक बच्चन

आज के युवाओं से बुजुर्ग या अधेड़ उम्र के बहुतेरे लोग खासे नाराज रहते हैं. वे उन्हें मतलबी मानते हैं, जो बस खाने-पीने,मौज-मस्ती में डूबा है. उसे अपने समाज व देश की चिंता नहीं है. वे सौरभ गांगुली या धौनी को नहीं देख पाते, जिन्होंने भारतीय क्रिकेट की परिभाषा बदल दी.

वे मुजफ्फरपुर के सुधीर के उस जुनून को भी नहीं देख पाते, जो मैच देखने साइकिल से बांग्लादेश पहुंच जाता है. सिर्फ क्रिकेट ही क्यों, आज का युवा शिक्षा, उद्यमिता, कृषि, व्यवसाय-सभी क्षेत्रों में नये कीर्तिमान स्थापित कर रहा है. यही युवा राष्ट्रीय चुनौतियों का भी शानदार ढंग से मुकाबला कर रहा है. पिछले दिनों भ्रष्टाचार तेजी से फैला. इसने संसद सहित देश की सभी प्रमुख संस्थाओं की प्रतिष्ठा खतरे में डाल दी. इसके बाद जो हुआ, उसे पूरी दुनिया ने देखा.

अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ भूख हड़ताल शुरू की व पूरे देश के युवा उनके पीछे चल दिये. केंद्र सरकार ने समय रहते अन्ना की मांग मंजूर कर ली. जो काम 40 वर्षो से रुका था, वह आंधी की तरह उठी युवा शक्‍ति के कारण सिर्फ चार दिनों में हो गया.

अब लोकपाल बिल दो महीने बाद ही संसद में पेश होगा. यह बात भी तय है कि सिर्फ लोकपाल बिल आने से ही भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो जायेगा, बल्कि इसके लिए नागरिक समाज को सक्रियता दिखानी होगी. यहां भी निराश होने जैसी कोई बात नहीं है. सिटीजन जर्नलिस्ट अवार्ड वितरण के दौरान मैं मंच पर था. मैंने देखा, किस तरह लोग सूचना के अधिकार कानून का इस्तेमाल कर रहे थे. गांवों व छोटे शहरों के लोग असाधारण साहस का परिचय देते हुए सिस्टम को चुनौती दे रहे थे.

एक लड़की ने आरटीआइ के जरिये पूछा था कि उसके स्कूल के बगल में कूड़ा घर क्यों बना दिया गया है. भ्रष्टाचार ही नहीं, देश के हर सवाल पर उसकी नजर है. सवालों को हल करने के लिए उसके पास अपनी दृष्टि है. वह बेहतर समाज, खुशहाल राष्ट्र व विश्व बंधुत्व के लिए समर्पित है.


अगली बार ऐश के साथ आऊंगा

बॉलीवुड स्टार व युवा आइकॉन अभिषेक बच्चन रविवार को नये रूप में दिखे. वह प्रभात खबर, पटना के दफ्तर में अतिथि संपादक के बतौर बैठे. प्रभात खबर की टीम के साथ सभी खबरों पर चर्चा की.

उन्होंने नासा से जुड़ी खबर में विशेष रुचि दिखायी. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये प्रभात खबर की अन्य यूनिटों के साथ भी खबरों पर चर्चा की. बिहार में आये बदलाव को लेकर खासे उत्साहित दिखे. उन्होंने वादा किया कि अगली बार पूरे परिवार के साथ बिहार आऊंगा. साभार प्रभात खबर

गांधीवादी पत्रकार अजीत बाबू!

हरिवंश
हरिवंश
जिन श्रेष्ठ पत्रकारों ने रास्ता दिखाया, स्नेह दिया और हर अंधेरे में ताकत दी, उनमें से एक-एक कर गुजर रहे हैं. शिरोमणि पत्रकार अजीत भट्टाचार्य का निधन एक ऐसे ही प्रकाश स्तंभ का बुझना है. प्रभाष जी के अप्रत्याशित और अचानक निधन के बाद अजीत बाबू का जाना, एक दौर का अवसान है.

वह दौर जिसने पत्रकारिता को बदलाव का माध्यम माना. अपने समय, देश और काल की परिस्थितियों में हस्तक्षेप का माध्यम बनाया. अपने पारदर्शी और प्रामाणिक कामकाज से हालात में बदलाव की कोशिश की. तब हम विद्यार्थी थे. सन 1976-77 की बात है. जेपी (इवरीमैन और प्रजानीति) साप्ताहिक प्रकाशन शुरू कर रहे थे.बदलाव की ताकतों और आंदोलन की बात कहने के लिए.तब पढ़ा कि मुंबई टाइम्स ऑफ इंडिया से वरिष्ठ पत्रकार अजीत बाबू नौकरी छोड़ कर इसके संपादन में लगेंगे.

उनके प्रति, उनसे मिले बगैर पहली श्रद्धा की यह शुरुआत थी. विद्रोह और बगावत का रास्ता चुनना, कितना कठिन होता है, यह बाद में जाना. पर तब इतना ही समझ सका कि श्रेष्ठ अंगरेजी दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया, जो वेतन और सुविधाओं की दृष्टि से भी सबसे बेहतर, प्रामाणिक और श्रेष्ठ संस्थान था, छोड़ कर एक आदमी कैसे अनिश्चित डगर पर पांव रखता है.

पत्रकारिता वैसे भी जोखिम भरा पेशा है.तब और था. नौकरी के स्थायित्व और वेतन, सुख-सुविधाओं की दृष्टि से सबसे उपेक्षित.फिर भी टाइम्स ऑफ इंडिया की नौकरी तब सर्व श्रेष्ठ मानी जाती थी. सुरक्षित भी.उसे छोड़ कर अपनी आत्मा की आवाज सुनना और उस पर चलना कठिन था.वह राह अजीत बाबू ने चुनी.इससे भी बड़ा जोखिम का काम था, तत्कालीन सर्वसत्तावादी और एकछत्र सत्ता आतंक के खिलाफ खड़ा होना. इंदिरा गांधी और संजय गांधी के उदय का दौर था.अजीत बाबू का जो पहला लेख पढ़ा था,आज बरबस वह याद आया. 12 जून 1975 को (शायद) इंदिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद हाइकोर्ट का फ़ैसला आया.

उस दिन तीन महत्वपूर्ण घटनाएं एक साथ हुई थीं, जिन्होंने देश की राजनीति पर असर डाला. अजीत बाबू ने उस लेख में लिखा था कि उस दिन वह जेपी के साथ गर्म और तपती धूप-लू में आरा (शायद) की यात्रा पर थे. एक पत्रकार कैसे अपने कन्विक्शन (आस्था) को तरजीह देता है, सब कुछ छोड़ कर, इस राह के वह अगुवा लोगों में थे.संयोग से कुछेक वर्ष बाद ही टाइम्स ऑफ इंडिया मुंबई में ट्रेनी जर्नलिस्ट के रूप में (हिंदी) चुना गया. वहां बड़े-बड़े पत्रकार-संपादक पढ़ाने आते थे.

एक दिन अपने कोर्स डायरेक्टर पतंजलि सेठी से अनुरोध किया कि क्या वह अजीत बाबू को हम छात्रों से बातचीत के लिए आमंत्रित करेंगे?यह थी हम युवा पत्रकारों पर अजीत बाबू की छाप. फिर उनसे लंबा संपर्क बना, उनके साथ कई यात्राएं की. शिविर में रहे. वह, प्रभाष जी और न्यायमूर्ति पीवी सावंत (अवकाशप्राप्त सुप्रीम कोर्ट के जज और प्रेस कौंसिल के पूर्व चेयरमैन) कई बार प्रभात खबर के निमंत्रण पर रांची आये. जेपी के गांव में हमने उन्हें जेपी मेमोरियल लेक्चर देने के लिए आमंत्रित किया.

वे गांव आये, असुविधाओं के बीच रहे, गांधीवादी पत्रकार, नितांत सादा रहन-सहन, खान-पान, पर अत्यंत सजग और सावधान दृष्टि. जेपी की प्रामाणिक जीवनी लिखनेवालों में से वे एक थे. शेख अब्दुल्ला और कश्मीर पर अत्यंत प्रामाणिक काम उन्होंने किया था. उनकी शिक्षा-दीक्षा, विद्यार्थी जीवन की शुरुआत तत्कालीन पश्चिम भारत (अब पाकिस्तान) में हुई.वह जब प्रेस इंस्टीटय़ूट ऑफ इंडिया के डायरेक्टर बनें, तो ग्रासरूट की पत्रकारिता प्रशिक्षित और मजबूत बनाने का अभियान चलाया.

हिंदी विदुरा (पत्रकारिता विधा की एक मात्र प्रामाणिक पत्रिका) के हिंदी संस्करण के संपादन का दायित्व मुङो दिया. यह जानते हुए भी कि मैं दिल्ली से दूर हूं. मेरी सीमा है. पर उनका तर्क था कि पत्रकारिता को मांजने, संवारने और बेहतर करने का काम ग्रामीण इलाकों से ही किया जाना चाहिए. ग्रामीण क्षेत्र ही असली भारत है. देश दिल्ली में नहीं बसता.उनका पैशन था कि ग्रामीण पत्रकार को कैसे श्रेष्ठ ट्रेनिंग दी जाये.इस सिलसिले में वे कई बार  प्रभात खबर आये और पत्रकारों के प्रशिक्षण में भाग लिया.एक बार वह आये, तब बुंडू में एक व्यक्ति नरेगा स्कीम के तहत समय से मजदूरी न मिलने के कारण आत्महत्या कर चुका था.उन्हें खबर की जानकारी मिली. उन्होंने कहा, अगली सुबह मैं अकेले उस गांव में जाना चाहूंगा.

साथ में केवल एक क्षेत्रीय संवाददाता रहेगा. वह अच्छी तरह हिंदी नहीं जानते थे. फिर भी वह गांव गये, तब उनकी उम्र 75 से ऊपर रही होगी. प्रभात खबर के लोगों को आकर बताया कि ऐसे विषयों की रिपोर्ट कैसे की जानी चाहिए. वह अच्छी तरह हिंदी नहीं बोल पाते थे, पर उनमें क्षेत्रीय पत्रकारिता के स्तर को सुधारने को लेकर अद्भुत संकल्प था. उधर अंगरेजी अखबारों में उन्होंने नयी बहस शुरू की. पेज तीन की पत्रकारिता पर. इसके बाद एक  अंगरेजी अखबार (दिल्ली से प्रकाशित) ने 1998 से 2002 के बीच पेज तीन की पत्रकारिता पर बीसियों लेख लिखे. उनकी पहल पर.प्रेस कौंसिल के मंच या अन्य समानधर्मा संस्थाओं के साथ मिल कर, वह और प्रभाष जी देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर, पेज तीन की पत्रकारिता और मौजूदा  हालात के बारे में बोलते थे.

पत्रकारों की गोष्ठियों में, सेमिनारों में जाते थे.ग्रामीण पत्रकारों की गोष्ठियां आयोजित करवाते और सार्वजनिक व्याख्यान में भाग लेते थे.आज मामूली अखबार में लाखों रुपयों के तनख्वाह पर काम करनेवाले अनेक पत्रकार हैं.जब अजीत बाबू जैसे लोग पत्रकारिता में सक्रिय थे, तब 10-15 हजार पानेवाले देश में चंद लोग ही थे.आज तो करोड़ों में पानेवाले देश की पत्रकारिता में अनगिनत हैं. वैध तरीके से, तनख्वाह के रूप मे. अवैध या राडिया संस्कृति की राह न अपनानेवाले की भी बड़ी जमात है, जो करोड़ों में कमा रही है.तनख्वाह के रूप में.

पर पत्रकारिता का जो सत्व, पहचान और असर अजीत बाबू के युग में थी, आज उसके पासंग में भी नहीं है.देश के सबसे बड़े अंगरेजी अखबार के संपादक रह कर भी, वह विशिष्ट नहीं बने, सामान्य ही रहे.मामूली खबरें या किसी मॉडल द्वारा क्रिकेट में भारत के विश्वविजयी बनने पर नंगा होकर दौड़ने की बातों को आज अखबारों में बड़ी जगह मिल रही है. तब अजीत बाबू के गुजरने की चर्चा अखबारों में महज कुछ  पंक्तियों में हो, तो इससे कोई आश्चर्य नहीं होता. पर आज ही के अखबार में यह भी खबर है कि अन्ना हजारे जैसे लोग अब अपना जीवन दावं पर लगा रहे हैं.

किन सवालों के लिए? जो देश के बुनियादी मुद्दे हैं.मसलन भ्रष्टाचार.तब एक ऐसे आदमी का गुजर जाना, जो राजस्थान के गांव (तिलौनिया) जाकर सूचना अधिकार आंदोलन के लिए अपने जीवन को भी दावं पर लगा देता था, एक बड़ी क्षति है. उनकी स्मृति को प्रणाम.प्रभात खबर को हमेशा जिन लोगों ने हर संकट में मनोबल बढ़ा कर भिन्न पत्रकारिता करने की सूझ और ऊर्जा दी, उनमें से एक सबसे बड़े स्तंभ अजीत बाबू के न रहने पर प्रभात खबर की उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि.

लेखक हरिवंश बिहार-झारखंड के प्रमुख हिंदी अखबार प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लिखा प्रभात खबर में प्रकाशित हो चुका है और वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

आज प्रभात खबर के अतिथि संपादक होंगे अभिषेक बच्‍चन

सिने स्टार अभिषेक बच्चन की ‘दम मारो दम’  बड़े परदे पर 22 अप्रैल को प्रदर्शित होनेवाली है. वह इसके प्रोमो के  लिए रविवार को पटना आ रहे हैं. प्रभात खबर के साथ उनके  दादा हरिवंश राय बच्चन का गहरा लगाव था. इस अखबार के प्रति उनके पौत्र की मुहब्बत भी कोई कम नहीं है. वह आज के  प्रभात खबर के अतिथि संपादक होंगे.

समाज के अलग-अलग क्षेत्रों में विशिष्ट योगदान देनेवाली शख्सियतों को प्रभात खबर पहले भी अतिथि संपादक बनाता रहा है. श्री श्री रवि शंकर, बाबा रामदेव, तनुश्री दत्ता, महेंद्र सिंह धौनी, अवतार तुलसी तथागत, चेतन भगत सहित कई खास लोग अब तक पाठकों के लिए यह भूमिका निभा चुके हैं. साभार : प्रभात खबर

नरेंद्र सिंह बने प्रभात खबर, सिलीगुड़ी के प्रभारी, अंकुर की नई पारी

प्रभात खबर, आसनसोल के प्रभारी रहे नरेंद्र सिंह का तबादला कर दिया गया है. उन्‍हें प्रभात खबर, सिलीगुड़ी का प्रभारी  बना दिया गया है. माना जा रहा है कि सिलीगुड़ी में अखबार को मजबूती देने के लिए नरेंद्र को वहां भेजा गया है. नरेंद्र प्रभात खबर के पुराने साथी हैं. वे प्रभात खबर के साथ सन 2000 में जुड़े थे तथा धनबाद, कोलकाता, रांची, पटना, आसनसोल में अपनी सेवाएं दीं. बीच में वे 2007 में प्रभात खबर छोड़कर एक लोकल न्‍यूज चैनल का संचालन भी किया. 2009 में वे फिर प्रभात खबर से आसनसोल प्रभारी के रूप में जुड़ गए थे. उल्‍लेखनीय है कि प्रभात खबर ने आसनसोल में हिंदुस्‍तान के पूर्व प्रभारी प्रदीप सुमन को प्रभारी बनाया है.

अमर उजाला, लखनऊ से अंकुर जायसवाल ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. उन्‍होंने अपनी नई पारी आई-नेक्‍स्‍ट, कानपुर के साथ शुरू की है. वे काफी समय से उजाला को अपनी सेवाएं दे रहे थे.

प्रदीप सुमन ने प्रभात खबर ज्‍वाइन किया, नरेंद्र का तबादला

हिंदुस्‍तान, आसनसोल के प्रभारी रह चुके प्रदीप सुमन ने अपनी नई पारी प्रभात खबर के साथ शुरू की है. उन्‍हें आसनसोल का प्रभारी बनाया गया है. उनके ज्‍वाइन करने के बाद यहां के प्रभात खबर के प्रभारी नरेंद्र कुमार को रांची बुला लिया गया है. प्रदीप हिंदुस्‍तान, आसनसोल से जुड़े हुए थे लेकिन पिछले दिनों इस ब्‍यूरो के बंद होने के बाद वे खाली हो गए थे. वे हिंदुस्‍तान के साथ लगभग दो दशक तक जुड़े रहे.

प्रभात खबर सबसे तेज बढ़ने वाला हिंदी अखबार

रांची : देश में हिंदी के 10 सबसे बड़े अखबारों में प्रभात खबर सबसे तेजी से बढ़नेवाला अखबार है. आइआरएस 2010 की चौथी तिमाही के रिजल्ट में इस बात की जानकारी दी गयी है. एवरेज इश्यू रीडरशिप (एआइआर) में प्रभात खबर अपने सभी संस्करणों के साथ सबसे ज्यादा15 फ़ीसदी की वृद्धि दर्ज करते हुए देश में हिंदी के शीर्ष अखबारों में आठवें पायदान पर पहुंच गया है.

आइआरएस के अनुसार झारखंड में प्रभात खबर के एवरेज इश्यू रीडरशिप (एआइआर) चौथी तिमाही में 14 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जबकि प्रतिद्वंद्वी अखबारों की वृद्धि दर प्रभात खबर से काफ़ी कम रही.

रांची में प्रभात खबर ने 3 फ़ीसदी, जमशेदपुर में 5 और धनबाद में 18 फ़ीसदी वृद्धि के साथ झारखंड में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है. झारखंड के तीन महत्वपूर्ण शहर धनराज (धनबाद, रांची, जमशेदपुर) में प्रभात खबर ने 6 फ़ीसदी की वृद्धि दर्ज की है.

बिहार में भी प्रभात खबर ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 28 फ़ीसदी की वृद्धि दर्ज की है. प्रभात खबर के लिए बिहार में यह एक बड़ी उपलब्धि है. पटना में प्रभात खबर ने 23 फ़ीसदी की वृद्धि दर्ज की है. पश्चिम बंगाल में भी प्रभात खबर ने 3 फ़ीसदी की वृद्धि दर्ज की है. साभार : प्रभात खबर

दैनिक भास्‍कर से जुड़े राकेश, अमित, अजय एवं अखिलेश

दैनिक भास्‍कर, धनबाद की लांचिंग अप्रैल में होने वाली है. इसके लिए नई नियुक्तियां शुरू हो गई हैं. चार लोगों ने भास्‍कर से अपनी नई पारी शुरू की है. चारों लोग इसके पहले प्रभात खबर से जुड़े हुए थे. भास्‍कर से जुड़ने वालों में राकेश पाठक, अमित रंजन, अजय कुमार और अखिलेश कुमार शामिल हैं.

राकेश पाठक प्रभात खबर में डिप्‍टी न्‍यूज कोआर्डिनेटर के पद पर थे. उन्‍होंने दैनिक भास्‍कर में न्‍यूज कोआर्डिनेटर के पोस्‍ट पर ज्‍वाइन किया है. राकेश ने अपने करियर की शुरुआत 97 में आवाज दैनिक के साथ शुरू की थी. इसके बाद बिहार आबजर्बर से जुड़ गए थे. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद प्रभात खबर आ गए थे. कई वर्षों तक इन्‍होंने प्रभात खबर को अपनी सेवाएं दीं.

अमित रंजन ने दैनिक भास्‍कर में रिपोर्टर के रूप में ज्‍वाइन किया है. प्रभात खबर में उनका पद न्‍यूज राइटर का था. अमित ने अपने करियर की शुरुआत छह साल पहले बिहार आबजर्बर के साथ की थी. इसके बाद आज और दैनिक जागरण को भी अपनी सेवाएं दीं. जागरण से इस्‍तीफा देने के बाद प्रभात खबर से जुड़ गए थे.

प्रभात खबर के फोटोग्राफर अजय ने सेम पोस्‍ट पर दैनिक भास्‍कर का दामन थामा है. वे पिछले आठ सालों से प्रभात खबर से जुड़े हुए थे. अजय ने अपने करियर की शुरुआत बारह साल पहले रांची एक्‍सप्रेस के साथ की थी. इसके बाद वे आज चले आए. इन्‍होंने एनडीटीवी तथा स्‍टार न्‍यूज के लिए भी काम किया. इसके बाद ये प्रभात खबर से जुड़ गए थे.

प्रभात खबर से इस्‍तीफा देकर अखिलेश कुमार ने भी दैनिक भास्‍कर ज्‍वाइन कर लिया है. अखिलेश भी कई अखबारों में काम कर चुके हैं.

दीपक, केके, आशीष एवं लखन ने हिंदुस्‍तान से नई पारी शुरू की

प्रभात खबर, धनबाद से इस्‍तीफा देकर चार लोगों ने हिंदुस्‍तान के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. इस्‍तीफा देने वालों में दीपक कुमार सिन्‍हा, केके सुनील, आशीष अम्‍बष्‍ट और लखन कुमार शामिल हैं. चारों ने धनबाद में ही ज्‍वाइन किया है.

दीपक कुमार सिन्‍हा प्रभात खबर में चीफ कॉपी राइटर थे. हिंदुस्‍तान में इन्‍हें सीनियर कॉपी राइटर बनाया गया है. हिंदुस्‍तान के साथ इनकी दूसरी पारी है. इन्‍होंने अपने करियर की शुरुआत 2001 में जागरण से की थी. यहां से हिंदुस्‍तान चले गए थे. इसके बाद प्रभात खबर ज्‍वाइन कर लिया था.

केके सुनील प्रभात खबर में कॉपी राइटर के पद पर थे. इन्‍हें हिंदुस्‍तान में भी वही जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. इन्‍होंने अपने करियर की शुरुआत 2001 में रांची एक्‍सप्रेस के साथ की थी. इसके बाद लोकायत, सीनियर इंडिया, बिहार खबर एवं राष्‍ट्रीय सहारा को झारखंड तथा बिहार में अपनी सेवाएं दीं. प्रभात खबर ज्‍वाइन करने से पहले वे नवभारत, जबलपुर के साथ जुड़े हुए थे.

आशीष अम्‍बष्‍ट ने भी इस्‍तीफा दे दिया है. वे प्रभात खबर में स्ट्रिंगर थे. इन्‍हें हिंदुस्‍तान में सुपर स्ट्रिंगर बनाया गया है. इन्‍होंने अपने करियर की शुरुआत 2000 में जागरण के साथ की थी. इसके बाद हिंदुस्‍तान चले गए थे. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद प्रभात खबर से जुड़ गए थे. हिंदुस्‍तान संग यह इनकी दूसरी पारी है.

प्रभात खबर से इस्‍तीफा देने वाले लखन कुमार स्ट्रिंगर थे. हिंदुस्‍तान में भी इन्‍होंने सेम पोस्‍ट पर ज्‍वाइन किया है. लखन ने अपने करियर की शुरुआत 2007 में धनबाद के स्‍थानीय चैनल आई व्‍यू के साथ की थी. इसके बाद प्रभात खबर से जुड़ गए थे.

नीरज पत्रिका तथा अवधूत व नदीम प्रभात खबर से जुड़े

हरिभूमि, रायपुर से इस्‍तीफा देने वाले नीरज शर्मा ने अपनी नई पारी शुरू कर दी है. वो पिछले एक साल से हरिभूमि से जुड़े हुए थे तथा भिलाई ब्‍यूरो में रिपोर्टर के रूप में सेवा दे रहे थे. नीरज पत्रिका जबलपुर में सब एडिटर के रूप में ज्‍वाइन किया है. नीरज ने अपना करियर स्‍थानीय न्‍यूज पेपर से शुरू किया था.

प्रभात खबर, पटना में दो लोगों ने ट्रेनी रूप में ज्‍वाइन किया है. अवधूत कुमार एवं नदीम अनवर ने पटना में ट्रेनी बनाए गए हैं. इन लोगों ने कुछ दिन रांची में भी अपनी सेवाएं दी थी.

दिग्‍गजों ने किया प्रभात खबर के ‘झारखंड डेवलपमेंट रिपोर्ट 2011’ का विमोचन

राजभवन के दरबार हॉल में राज्यपाल समेत सत्ता पक्ष, विपक्ष, नेता, अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता, व्‍यवसायी, चिकित्सक से लेकर सभी वर्ग से जाने-माने लोग जुटे थे. वक्ताओं ने खुद स्वीकार किया कि झारखंड को आज जहां होना चाहिए था, नहीं है. खनिज संपदा से भरपूर इस राज्य में आज भी काफी संख्या में लोग गरीब और असहाय हैं. राज्‍य के विकास की राह में कई अड़चनें हैं. कामकाज में खामियां हैं, जिसके चलते सरकारी योजनाओं का समुचित लाभ यहां के आम नागरिकों, खासकर गरीबों को नहीं मिल पा रहा है.

सबने राजनीति से ऊपर उठ कर झारखंड के विकास के लिए साथ काम करने का भरोसा दिलाया. अपनी मंशा भी जतायी. मौका था प्रभात खबर द्वारा प्रकाशित पुस्‍तक ‘झारखंड डेवलपमेंट रिपोर्ट 2011’ के विमोचन का. किताब का विमोचन राज्‍यपाल एमओएच फारुख, मुख्‍यमंत्री अर्जुन मुंडा, उप मुख्‍यमंत्री हेमंत सोरेन, केन्‍द्रीय पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय, विधानसभा स्‍पीकर सीपी सिंह और झारखंड के पूर्व मुख्‍यमंत्री शिबू सोरेन ने संयुक्‍त रूप से किया. इन लोगों ने माना कि विकास को धरातल पर लाने के लिए जरूरी है कि सरकार में डिलेवरी मैकेनिज्म मजबूत हो.

प्रभात खबर

पंचायत चुनाव संपन्न कराकर और राष्‍ट्रीय खेल आयोजित कर राज्‍य ने इसे साबित भी किया है. इन लोगों ने विकास के मुद्दे पर साथ मिलकर काम करने की आवश्‍यकता पर बल दिया. अर्जुन मुंडा ने माना कि राज्‍य के खनन क्षेत्र में पनपता आर्थिक उपनिवेशवाद चिंता का विषय है. जहां का संसाधन इस्‍तेमाल हो रहा है कम से कम उस क्षेत्र के लोगों के विकास पर उपयोगकर्ताओं को चिंता होनी चाहिए.

लक्ष्‍मीकांत और रीता दास ने प्रभात खबर से नई पारी शुरू की

दैनिक जागरण, सिलीगुड़ी से इस्‍तीफा देने वाले लक्ष्‍मीकांत दुबे अब प्रभात खबर, भागलपुर से जुड़ गए हैं. अगले एक दो दिन में वे अखबार ज्‍वाइन कर लेंगे. इन्‍हें सीनियर सब एडिटर बनाया गया है. लक्ष्‍मीकांत जागरण, सिलीगुड़ी में प्रादेशिक डेस्‍क इंचार्ज थे. लक्ष्‍मीकांत ने अपने करियर की शुरुआत सन 2000 में युनाइटेड भारत, गोरखपुर के साथ की थी. इसके बाद पांच सालों तक हिंदुस्‍तान को भी अपनी सेवाएं दीं. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद वे दैनिक जागरण, सिलीगुड़ी से जुड़ गए थे.

दैनिक जागरण, सिलीगुड़ी से इस्‍तीफा देने वाली रीता दास ने अपनी नई पारी शुरू कर दी है. वे जागरण में रिपोर्टर के पद पर कार्यरत थीं. उन्‍होंने अपनी नई पारी प्रभात खबर, सिलीगुड़ी के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां भी रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी दी गई है. रीता ने अपने करियर की शुरुआत जागरण से ही की थी.

श्रेष्‍ठ पत्रकारिता के लिए जेएन प्रसाद को सम्‍मानित किया गया

कैडिंड कम्युनिकेशन व केकेएन ग्रुप ने 20 फरवरी 2011 को कोलकाता के पार्क होटल में और दक्षिण चौबीस परगना जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने कोलकाता के रोटरी सदन प्रेक्षागृह में 22 फरवरी 2011 को जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार जयनारायण प्रसाद को बेहतरीन पत्रकारिता के लिए सम्मानित किया है। कैडिंड कम्युनिकेशन व केकेएन ग्रुप ने जनरल न्यूज (हिंदी) श्रेणी में जयनारायण प्रसाद (जनसत्ता) और संतोष सिंह (सन्मार्ग) को संयुक्त रूप से बेस्ट जर्नलिस्ट अवार्ड से सम्मानित किया, जबकि दक्षिण चौबीस परगना जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने जयनारायण प्रसाद को एक्सीलेंस अवार्ड इन मीडिया के पुरस्कार से नवाजा है। दक्षिण चौबीस परगना जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने कोलकाता प्रेस क्लब के अध्यक्ष प्रेमानंद घोष समेत 30 से ज्यादा पत्रकारों को सम्मानित किया।

जयनारायण प्रसाद ने विगत 22 सालों से गंगासागर मेले की कवरेज की है। वहां 1995 में हुए सबसे बड़े व भयावह लांच हादसे को बड़ी संजीदगी से कवर किया था। तब से मेले का कवरेज लगातार करते आ रहे हैं और इन दिनों गंगासागर मेले पर एक खोजपरक पुस्तक लिख रहे हैं। मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, असम और झारखंड में पत्रकारिता करने के बाद वे जनसत्ता, कोलकाता से 1991 से जुड़े हुए हैं। इन्होंने सिनेमा के क्षेत्र में दक्षता से लेखन किया है और पांच लघु फिल्मों का भी निर्देशन किया है। उन्होंने साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, दिनमान, पराग और अवकाश जैसी उस समय की प्रतिष्ठित हिंदी पत्रिकाओं में भी लेखन किया है। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिंदी से एमए के बाद सिनेमा-निर्देशन में भी डिप्लोमा हासिल किया है।

कैडिंड कम्युनिकेशन के जिस कार्यक्रम में जयनारायण प्रसाद को सम्मानित किया गया उसी प्रोग्राम में हिंदी, बांग्ला और अंग्रेजी के अन्य पत्रकारों, छायाकारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े लोगों को भी सम्मानित किया गया। इस मौके पर इंडियन एक्सप्रेस और द स्टेट्समैन के पूर्व संपादक एस. निहाल सिंह को उनके जीवनभर के पत्रकारीय योगदान के लिए ‘लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। सिंह को यह सम्मान देश के ख्यात छायाकार रघु राय ने दिया। इसमें फीचर श्रेणी (हिंदी) में अजय विद्यार्थी (प्रभात खबर) को सम्मानित किया गया। टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार शभ्रु नियोगी, छायाकार सुदीप्तो दास और खेल पत्रकार नीलेश भट्टाचार्य को भी सम्मानित किया गया। बांग्ला में एबीपी ग्रुप के गौतम भट्टाचार्य को दो श्रेणियों में सम्मानित किया गया। छायाकारों में हिंदुस्तान टाइम्स के शुभंकर चक्रवर्ती (न्यूज) और पीटीआई के अशोक भौमिक (खेल) में पुरस्कृत किया गया। हिंदुस्तान टाइम्स के ही शुभेंदु घोष (लाइफस्टाइल श्रेणी) को सम्मानित किया गया। बिजनेस श्रेणी में बिजनेस स्टैंडर्ड की पत्रकार नम्रता आचार्य और एबीपी के देवप्रिय सेनगुप्ता को संयुक्त रूप से सम्मानित किया गया। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया श्रेणी में सीएनएन-आईबीएन के सौगत मुखोपाध्याय को बेस्ट जर्नलिस्ट और न्यूज टाइम्स के आशीष राय को बेस्ट कैमरामैन का अवार्ड मिला। इस तरह, कुल 19 विभिन्न श्रेणियों में मीडिया जगत से जुड़े लोगों को सम्मानित किया गया। समारोह में वरिष्ठ पत्रकार जयंत सरकार, मनोजीत मित्र और छायाकार सुब्रत पात्रनबीश के अलावा केकेएन ग्रुप के प्रमुख कौशिक नाथ खास तौर पर उपस्थित थे।

राज्यपाल का नाम गलत छाप रहा है प्रभात खबर

देश के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर एवं पत्रकार हरिवंश जी की अगुवाई में चलने वाला झारखंड प्रदेश का नंबर 1 हिन्दी दैनिक प्रभात खबर लगातार दो दिनों से झारखंड प्रदेश के महामहिम राज्यपाल के नाम के साथ खिलवाड़ कर रहा है. बड़ा सवाल यह है कि क्या नंबर एक अखबार के पत्रकारों को प्रदेश के राज्यपाल के सर्वविदित नाम ”एमओएच फारूख” की जानकारी नहीं है या फिर साजिशन नाम को बिगाड़कर छापा जा रहा है.

राज्यपाल का नाम प्रभात खबर में ”एमएचओ फारूख” लिखा जा रहा है, जो गलत है. सही है ‘एमओएच फारूख’. देखने में तो यह गलती छोटी है पर इतने बड़े अखबार में किसी आम व्यक्ति का नाम गलत छप जाए तो उसे माफ किया जा सकता है, लेकिन जब बात प्रदेश के महामहिम राज्यपाल के नाम से जुड़ी हो तो वह मामला खास हो जाता है. ऐसे मामलों में विशेष एहतियात बरतने की खास जरूरत होती हैं. लेकिन जिस प्रकार से जमशेदपुर के दो दिवसीय प्रवास में आये सूबे के राज्यपाल एमओएच फारूख से संबधित समाचारों में राज्यपाल के नाम को प्रभात खबर द्वारा लगातार दो दिन तक गलत प्रकाशित किया गया,  वह आश्चर्यजनक है.

उम्मीद है प्रभात खबर के लोग इस तरफ ध्यान देंगे और भविष्य में ऐसी गड़बड़ी करने से बाज आएंगे.

Dharmendra Mishra

“Bharat Mitra”  DailyNews Paper

09234600484

प्रभात खबर के अजय समेत उन्‍नीस पत्रकार सम्‍मानित

: वरि‍ष्‍ठ पत्रकार एस निहाल सिंह को लाइफ टाइम एचिवमेंट : प्रभात खबर, कोलकाता संस्‍करण के वरिष्‍ठ पत्रकार व न्‍यूज कोआर्डिनेटर अजय कुमार विद्यार्थी को केकेएन समूह और कैंडिड कम्‍युनिकेशंस द्वारा आयोजित पत्रकारिता पुरस्‍कार 2010 में हिंदी की फीचर कैटेगरी में सर्वोत्‍तम पत्रकार के पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया.

पार्क होटल में रविवार की शाम आयोजित कार्यक्रम में प्रसिद्ध फैशन डिजाइनर सरबरी दत्‍ता ने श्री विद्यार्थी को यह पुरस्‍कार प्रदान किया. केकेएन समूह और कैंडिड कम्‍युनिकेशंस द्वारा न्‍यूज, अजयफीचर, बिजनेस, स्‍पोर्टस, मनोरंजन, फोटोग्राफी, टेलीविजन पत्रकारिता व डिस्ट्रिक्‍ट रिपोर्टिंग सहित कुल 19 कैटेगरी में सर्वोत्‍तम पत्रकार का पुरस्‍कार प्रदान किया गया. पत्रकारिता पुरस्‍कारों में प्रभात खबर के खाते में कुल चार नामांकन आए.

इस समारोह में द स्‍टेट्समैन व द इंडियन एक्‍सप्रेस समूह के पूर्व संपादक प्रसिद्ध पत्रकार एस निहाल सिंह को लाइफ टाइम एचिवमेंट अवार्ड प्रदान किया गया. जनरल न्‍यूज हिंदी में सन्‍मार्ग के संतोष सिंह तथा जनसत्‍ता के जय नारायण प्रसाद को संयुक्‍त रूप से सर्वोत्‍तम पत्रकार पुरस्‍कार प्रदान किया गया. उल्‍लेखनीय है कि पुरस्‍कारों में हिंदी में जनरल न्‍यूज व फीचर दो ही कैटेगरी थी. इस अवसर पर प्रसिद्ध फोटोग्राफर रघु राय व कोलकाता पुलिस आयुक्‍त गौतम मोहन चक्रवर्ती सहित विभिन्‍न क्षेत्रों की वरिष्‍ठ हस्तियां उपस्थित थीं.

भागलपुर में प्रभात खबर से डरे हिंदुस्तान-दैनिक जागरण ने दाम आधा किया

भागलपुर में प्रभात खबर के आगे हिंदुस्तान और दैनिक जागरण, दोनों अखबार झुक गए. इन दोनों को भी कम दाम में जनता को अखबार उपलब्ध कराने की घोषणा करनी पड़ी. दरअसल हुआ यूं है कि प्रभात खबर ने बिहार में आकर दूसरे बड़े अखबारों को घुटने के बल बैठने पर मजबूर कर दिया है. अगर ये मजबूरी न होती तो हिंदुस्तान और दैनिक जागरण जैसे जमे जमाए अखबार अपनी खेती उजड़ती देख दाम कम करने के लिए दबाव में न आए होते. भागलपुर में प्रभात खबर करीब दस बारह दिन पहले लांच हुआ.

प्रभात खबर का दाम दो रुपये रखा गया. हिंदुस्तान और दैनिक जागरण यहां पहले से ही चार रुपये में बिकते रहे हैं. हां, प्रभात खबर के आने पर इन दोनों अखबारों ने इतना किया कि हाकरों का कमीशन बढ़ा दिया. पहले कमीशन एक रुपये बीस पैसा हुआ करता था तो प्रभात खबर के आने के बाद कमीशन बढ़ाकर दो रुपये कर दिया. लेकिन पाठकों की मांग के आगे हाकरों की सदिच्छा काम न आई. दस-ग्यारह दिनों में स्थिति ऐसी आ गई कि प्रभात खबर की जितनी बिक्री होती, उतनी बिक्री दैनिक जागरण और हिंदुस्तान की मिलाकर होती. पांच-पांच हजार से ज्यादा कापियां गिर गईं तो दैनिक जागरण और हिंदुस्तान के बड़े अधिकारी जागे.

हालांकि शुरुआत में इन दोनों अखबारों के अधिकारियों ने यह रिपोर्ट अपने बासेज को दी थी कि प्रभात खबर के आने से कुछ खास असर नहीं पड़ेगा लेकिन जब ग्यारह दिन में ही भयानक असर दिख गया तो सबके पसीने छूटने लगे. तब दैनिक जागरण और हिंदुस्तान ने भी दो रुपये में अखबार देने की घोषणा कर दी. दाम घटाए जाने को बिहार में प्राइस वार शुरू होने का लक्षण माना जा रहा है. यह कम लोगों को पता होगा कि हिंदी इलाके में बिहार ही है जहां के पाठक सबसे ज्यादा पैसे देकर अखबार पढ़ पाते हैं. यहां आमतौर पर चार रुपये में अखबार बेचने की परंपरा रही है जो अब भागलपुर से टूट चुकी है. इसका फायदा बिहार के पाठकों को मिलेगा.

रिचिक का भास्‍कर और संजय का प्रभात खबर संग नई पारी

पत्रिका ग्रुप के डेली न्‍यूज से रिचिक मिश्रा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सब एडिटर थे. इन्‍होंने अपनी नई पारी दैनिक भास्‍कर, जयपुर के साथ की है. इन्‍हें सीनियर सब एडिटर बनाया गया है. रिचिक एजेंसी डेस्‍क देखेंगे. मूल रूप से उत्‍तर प्रदेश के अयोध्‍या के रहने वाले रिचिक माखनलाल से पास आउट छात्र हैं. इन्‍होंने करियर की शुरुआत लोकमत टाइम्‍स औरंगाबाद से की थी. लोकमत को मुंबई में भी अपनी सेवाएं दीं. इसके बाद डीएलए एएम, आगरा से जुड़ गए. पिछले ढाई साल से ये डेली न्‍यूज को अपनी सेवाएं दे रहे थे.

दैनिक जागरण, सोनीपत से संजय निधि ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर रिपोर्टर थे. इन्‍होंने अपनी नई पारी प्रभात खबर, भागलपुर के साथ शुरू की है. इन्‍हें यहां भी रिपोर्टर बनाया गया है. मूल रूप से बिहार के रहने वाले संजय जागरण को जालंधर में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. वे दैनिक भास्‍कर के साथ पानीपत में भी काम कर चुके हैं.

प्रभात खबर, बोकारो के ब्‍यूरोचीफ बने धनंजय, अशोक का तबादला

: कृष्‍ण्‍ाकांत, अक्षय, अलका, राजीव अखबार से जुड़े : प्रभात खबर, बोकारो को मजबूती प्रदान करने के लिए कई फेरबदल किए गए हैं. बोकारो के ब्‍यूरोचीफ रहे अशोक अकेला को रांची बुला लिया गया है. वे पिछले दो दशक से प्रभात खबर से जुड़े हुए हैं. उनकी जगह धनंजय प्रताप को बोकारो का नया ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. बोकारो को टीम मजबूत करने के लिए कुछ नए लोगों को भी जोड़ा गया है.

प्रभात खबर बोकारो की टीम मजबूत करने की कवायद में अशोक अकेला को रांची बुला लिया है. अशोक अकेला की सेलरी भी बढ़ाया गया है. हालांकि सूत्रों का यह कहना है कि प्रबंधन को अकेला के बारे में काफी शिकायतें मिली थी, जिसके बाद प्रबंधन ने उनकी सेवाओं को देखते हुए उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने के बजाय हेड ऑफिस से जोड़ दिया. उनकी जगह बोकारो में अपनी पहचान रखने वाले धनंजय प्रताप को ब्‍यूरोचीफ बनाकर प्रभात खबर से जोड़ा गया है. धनंजय इसके पहले खुद का साप्‍ताहिक अखबार बोकारो टुडे का प्रकाशन कर रहे थे. वे पिछले बीस सालों से पत्रकारिता में हैं. वे देश पहल, प्रोग्रेसिव यंग इंडिया तथा आवाज को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उनकी टीम में नई दुनिया, इंदौर से आए कृष्‍णकांत सिंह, जीटीवी में सेवा दे चुके अक्षय झा, अलका मिश्रा तथा राजीव नंदन को भी जोड़ा गया है. हेमंत और राजकुमार को भी फोटोग्राफर के रूप में जोड़ा गया है.

खबर है कि अपने तबादले से नाराज अशोक अकेला रांची में ज्‍वाइनिंग करने के बाद से ऑफिस नहीं आ रहे हैं. वहीं बोकारो में कुछ संवादसूत्रों ने काम करने से इनकार कर दिया है. उनका कहना है कि बाहर से लोगों को लाने के बजाय उनका ही प्रमोशन किया जाए और सेलरी बढ़ाई जाए. इनलोगों में से हिमांशु कुमार, प्रकाश मिश्रा, कमलेश कमल, कुमार अंकुश, सुरेंद्र सावंत को प्रबंधन ने बाहर का रास्‍ता दिखा दिया है. इसमें कुछ ऐसे लोग भी शामिल हैं, जिन्‍हें अशोक अकेला ने अपने आश्‍वासन पर अखबार से जोड़ रखा था. अब अखबार पूरी तरह बोकारो में छा जाने की रणनीति पर काम कर रहा है. बोकारो में अखबार की लगभग बीस हजार कॉपियां बुक हो चुकी हैं.

जब पत्रकार ने कहा, ‘आप मंत्री बनने लायक नहीं हैं’

आंध्रप्रदेश के हथकरघा मंत्री पी शंकर राव की गुंटूर में एक संवाददाता सम्मेलन में एक पत्रकार से तकरार हो गई और मंत्री ने आपा खोते हुए पत्रकार से कहा कि वह पत्रकारिता के लायक नहीं हैं. बदले में पत्रकार ने मंत्री से कह दिया कि वह मंत्री बनने के लायक नहीं हैं.

एक टीवी चैनल के पत्रकार ने मंत्री से पूछा था कि जब जगनमोहन रेड्डी के समर्थक वारंगल के विधायक कोंडा सुरेखा ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को आडे़ हाथ लिया तब तो उन्होंने विधायक की आलोचना की थी लेकिन जब पार्टी के एक अन्य वरिष्ठ नेता ने सोनिया की राष्ट्रीयता पर सवाल उठाए और उन्हें पार्टी नेता होने के लिये अयोग्य बताया तो मंत्री ने कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी.

राव के जवाब से संतुष्ट नहीं होने पर पत्रकार ने सवाल दोहराया. इस पर राव नाराज हो गए और पत्रकार से कहा कि वह पत्रकारिता करने के लायक नहीं हैं. इस पर पत्रकार ने कहा ‘‘आप भी मंत्री बनने के लायक नहीं हैं.’’ साभार : प्रभात खबर

हम पत्रकार भी एक अदभुत अहं ग्रंथि से पीड़ित रहते हैं

हरिवंश: सपने, संघर्ष और चुनौतियां (अंतिम) : प्रभात खबर आकर हमने बृजकिशोर झंवर (लाली बाबू) से मैनेजमेंट की बारीकियां सीखीं, तत्कालीन चेयरमैन बसंत कुमार झंवर के विजन-प्रोत्साहन ने प्रभात खबर को हमेशा नयी ताकत दी, युवा चेयरमैन प्रशांत झंवर और युवा एम.डी राजीव झंवर का पग-पग पर सुझाव, सहयोग और विजन ‘प्रभात खबर‘ समूह की सबसे बड़ी ताकत है, प्रभात खबर के निदेशक समीर लोहिया के प्रैक्टि‍कल सुझाव हमारी ताकत हैं :

: हमने सही राह चुनी : ठीक 20 वर्ष पहले प्रायः एक बंद, अचर्चित सुविधाविहीन, देश के सबसे पिछड़े इलाके से निकलनेवाले अखबार प्रभात खबर ने एक नयी राह चुनी. इस पेज थ्री की पत्रकारिता के विकल्प में चल कर. इसी अखबार के विकल्प ने सबसे पहले पशुपालन भ्रष्टाचार को उजागर किया. आज भी इसे सामने लानेवाले पत्रकार किसलय उसी जीवनशैली में हैं. वैसे ही प्रतिबद्ध हैं, जैसे तब थे. फ़िर कुशासन के प्रसंगों को सामने लाने तथा झारखंड राज्य बनाने में भूमिका से लेकर नये राज्य बनने के बाद, हर सरकार पर अंकुश रखने की पत्रकारिता. मधु कोड़ा प्रसंग को सामने लाने तक की पत्रकारिता की राह कम-से-कम 20 वर्ष पहले ही प्रभात खबर ने चुनी. हम यह आत्मसंतोष कर सकते हैं कि हमने सही राह चुनी. समय ही सबसे बड़ा गवाह होता है. समय फ़िसलता है. आज एक और वर्ष गुजरा. क्या हम चाहें, तो यह समय ठहर सकता है? नहीं. यह मान लें कि ईश्वर ने अवतार लिया, तो वह भी इस सृष्टि को काल से नहीं बचा पाये.

: काल की गति : अर्जुन का एक किस्सा मशहूर है. जब भीलों ने द्वारिका से उनके साथ आ रही महिलाओं का अपहरण कर लिया, तब का प्रसंग है. वही अर्जुन, वही गांडीव, वही तीर, पर कुछ नहीं कर सके. लोगों ने महर्षि व्यास से पूछा – आप तो ईश्वरावतार हैं. क्या होने जा रहा है? महाभारत के पहले. उन्होंने कहा. दोनों हाथ उठा कर चिल्ला रहा हूं, सर्वविनाश, पर कोई सुनता नहीं. यह है काल की गति और महिमा. यह सिर्फ़ पूर्वी सभ्यता की बात नहीं है. पश्चिमी सभ्यता के महान नायकों में माने जाते हैं नेपोलियन, जिस इनसान ने कहा था -इंपासिबल (असंभव) शब्द मेरी डिक्शनरी (शब्दकोश) में नहीं है. यह वाक्य आज दुनिया के कोने-कोने में लोग कोट करते हैं. लोगों को मोटिवेट करने के लिए, पॉजीटिव थिंकिंग के रास्ते पर डालने के लिए. पर वही महान नेपोलियन जब हेलेना द्वीप पर बंदी बन गया, तो वह कहता रहा, मेरे दिन बदल गये. मैं परिस्थितियों का दास हूं. हालात का बंदी. समय बदल गया. बड़ा ही रोचक प्रसंग है. सीखने और स्मरणयोग्य. ब्रिटिश पत्रकार पाल ब्रंटन की मशहूर पुस्तक ‘गुप्त भारत की खोज‘ में. पाल ब्रंटन 20 वीं सदी के आरंभिक दौर में नीरव जंगलों में, हिमालय की तराइयों में, उत्तर से दक्षिण के छोटे-छोटे शहरों में आध्यात्मिक भारत का चेहरा देखने के लिए भटके. उन्हीं की पुस्तक का यह अंश हैं. ‘चकित जगत के सामने बड़ी दिलेरी के साथ आल्प्स पर्वत को अपनी सेना के साथ लांघ जाने पर, नेपोलियन ने जो बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही थी, वही आज मुझे याद आयी, असंभव, मेरे कोष में ऐसा शब्द नहीं है. लेकिन मैंने उनके सारे जीवन की सारी बातों का बार-बार अध्ययन किया है. हेलेना के टापू पर अपने पूर्व कार्यों की समीक्षा करते हुए उस महान बुद्धिशाली ने जिन चंद बातों को लिखा था, सो मेरे स्मृति पटल पर चमक जाती है. मैं हमेशा नियतिवाद का कायल था. विधि का बदा, एकदम बदा ही..मेरे सितारे मंद पड़ गये, मेरे हाथों से बागडोर फ़िसलती दिखायी दी, तब भी मेरा वश नहीं था.‘ याद रखिए ये वाक्य नेपोलियन द ग्रेट के बारे में एक अत्यंत पढ़े-लिखे ब्रिटिश पत्रकार के हैं. यह काल है.

: ब्रह्मांड में मनुष्य की हैसियत : दशकों पहले एक बार रात में चंद्रशेखर जी के साथ दिल्ली में जा रहा था. सड़क की बगल में मुगल सल्तनत के एक बादशाह का मकबरा था. देख कर कहा, देखते हो, दिल्ली में बड़े बादशाहों के अनेक मकबरे हैं. उनके क्या हाल हैं? किन्हें याद हैं ये? दरअसल, इस सृष्टि, संसार या ब्रह्मांड में मनुष्य की क्या हैसियत है? गांधी जैसे महान लोग, जब मानव इतिहास में कामा, फ़ुलस्टाप जैसे हैं, तो हमलोग क्या हैं? इन मकबरों को देख कर भी दिल्ली के शासक नहीं देखते कि हमारी हैसियत क्या है? हम अपने को अमर और संसार का अंतिम सच मानने लगते हैं. चंद्रशेखर जी में अद्भुत इतिहास बोध था. यह बोध हर इनसान में होना चाहिए. एक बार मैंने कोशिश की, महान लोगों के जीवन का उत्तरार्ध पढ़ा. गांधी, लेनिन, माओ, स्टालिन वगैरह के अंतिम दिनों को पलटा. यकीन मानिए, उनकी विवशता देख कर, उनके भी मानव होने का एहसास हुआ. खुद भारत के पंडित जवाहरलाल नेहरू के जीवन का एक प्रसंग हमेशा याद रहता है. कुछ वर्षो पहले एक पश्चिमी ने पुनर्जन्म पर अध्ययन किया था. उन्होंने पंडित नेहरू के बारे में बताया था कि वह पूर्व जन्म में कोई महान बौद्ध भिक्षु थे. पुनर्जन्म का रहस्य नहीं मालूम, पर पंडित नेहरू का जीवन सचमुच कुछ ऐसा ही था. वह भारत के महान लोगों में से एक थे.

: पंडित जी का करिश्मा : बचपन से ही कुछेक बड़े नेताओं की छाप हम बच्चों पर पड़ी. उनमें पंडित जी भी थे. प्राइमरी स्कूल की आरंभिक कक्षाओं में रहा होगा, तब पंडित जी की मौत हुई थी. बस से पिताजी के साथ ननिहाल जा रहा था. हर आदमी पंडित जी की बात कर रहा था. पढ़ा-बिना पढ़ा सब. यह था, उनके व्यक्तित्व का करिश्मा. जब बड़ा हुआ, विश्वविद्यालय में पढ़ने गया, अंगरेजी बहुत समझ में नहीं आती थी, पर पंडित जी की पुस्तक ’डिस्कवरी आफ़ इंडिया’ खरीदने की स्मृति अब भी है. जुलाई का महीना था. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में छात्रों की संख्या बढ़ने लगी थी. नया सत्र शुरू हो रहा था. विश्वविद्यालय के सुंदर हरे-भरे मैदानों में ’वॉलीबॉल’ खेलना और राजनीति पर बहस, ये हमारे मुख्य काम थे. उसी महीने की एक बरसाती शाम को छात्रावास से पैदल बाजार (लंका) गये और यूनिवर्सल बुक डिपो से वह पुस्तक खरीद लाये. शायद 15 या 18 रुपये में. बचा-खुचा पैसा यही था. फ़िर पंडित जी पर और किताबें पढ़ने की धुन सवार हुई. आज विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी की स्मृति एक ज्योतिपुंज की तरह उभरती है. देर रात तक बिल्कुल शांत माहौल में पढ़ते छात्र. वहीं हमने पूर्व सांसद और पूर्व आइसीएस एचवी कामत का पंडित जी पर संस्मरण पढ़ा. साम्यवादी और अत्यंत प्रखर वक्ता प्रोफ़ेसर हीरेन मुखर्जी का पंडित नेहरू के बारे में संस्मरण पढ़ा. बाद में चौधरी चरण सिंह ने भारत की आर्थि‍क नीति पर एक पुस्तक लिखी, उसमें भी पंडित जी के उतार (उम्र ढलने) के दिनों के संस्मरण हैं. उन तीनों संस्मरणों को पढ़ कर लगा कि पंडित नेहरू के व्यक्तित्व में भी एक वीतरागी धारा थी. पंडित नेहरू के इस व्यक्ति‍त्व ने हम युवाओं पर गहराई से छाप छोड़ी. इसका असर अब भी है.

: अहं ग्रंथि से पीड़ित : हम पत्रकार भी एक अदभुत अहं ग्रंथि से पीड़ित रहते हैं. अहंकार का, दंभ का, कुछ विशिष्ट होने का, सत्ता के पास होने का, सत्तामद. यह सब भ्रम है. माया है. कम-से-कम तीन दशकों के पत्रकारीय जीवन में इस प्रसंग में मेरे मन में कोई अस्पष्टता नहीं रही. कम-से-कम वर्ष के अंत में, नये वर्ष की दहलीज पर खड़े होकर इन चीजों को याद रखने से नयी ताकत, ऊर्जा और दृष्टि मिलती है, इसलिए यह सब आपसे शेयर कर रहा हूं. प्रभात खबर को पुख्ता करने के कुछ नये काम क्या हो सकते हैं, उन्हें मैं सोच रहा हूं. अपनी भूमिका संपादकीय निगरानी के अलावा उन्हीं चीजों में लगाना चाहता हूं. छात्र दिनों में अंगरेजी में एक कविता पढ़ी थी शायद कीट्स की थी. आज भी उसकी ये पंक्ति‍यां उत्साह भरती हैं. आइ वाज एवर ए फ़ाइटर, सो वंस फ़ाइट मोर, द वेस्ट एंड द लास्ट.

: कुप्रचार और षडयंत्र से मुकाबला : क्या नया सृजनात्मक संघर्ष हो सकता है? संपादकीय निगरानी के अलावा? यह विषय मेरे मस्तिष्क में घूम रहा है. संभव है, कोई विषय न सूझे. प्रयास विफ़ल हो, पर फ़िलहाल यही सवाल मस्तिष्क में है. बड़े घरानों-बड़े महानगरों की पत्रकारिता की चकाचौंध छोड़ कर जंगल (तब रांची को महानगरों के साथी यही कहते थे) में प्रायः बंद अखबार में आया. अच्छे विकल्प छोड़ कर. यह जीवन में प्रयोग की एक कड़ी थी. इसके बाद लगातार बड़े घरानों की बड़ी पूंजी, अनेक संस्करण वाले अखबारों से हम प्रतिस्पर्धा में रहे. रोज हर पल कंपटीशन में. लगातार संघर्ष. इनोवेशन. अब तीन सबसे बड़े अखबारों से स्पर्धा, उनके छल, छद्म, कुप्रचार और षडयंत्र से मुकाबला. उनकी बड़ी पूंजी से पूंजीविहीन होकर लड़ना. तकरीबन 51, 47, 40, संस्करणों वाले अनेक राज्यों में फ़ैले अखबारों से 8-9 संस्करणों के बल लड़ना? क्या पहले की स्थिति में रह कर हम सब इस नयी स्थिति से जूझ सकते हैं या नया विकल्प ढूंढ़ना होगा? दूसरी राणनीति क्या होगी? यह सोचने की रणनीति पर फ़ोकस करना होगा. रोज-रोज का काम जिम्मेदार हाथों-टीमों को सौंप दिया है. नरेंद्रपाल जी, राजेंद्र जी, अनुज, स्वयंप्रकाश, विनय की टीम. विजय पाठक, रंजीत, अनुराग, संजय, जीवेश, नरेंद्र, माधव वगैरह युवा साथियों की टीम. यह टीम मुझसे बेहतर काम कर रही है, शर्त है, मिल कर काम करे. निजी अहं किसी में हो, तो इंफ़ोसिस के आदर्शों से प्रेरित होकर ‘अखबार‘ को सबसे आगे रख कर यह टीम निर्णय करे. एकजुट हो कर. आप परिणाम देखेंगे. उसी तरह विज्ञापन, सर्कुलेशन, प्रोडक्शन, इवेंट, रेडियो, इंटरनेट हर विभाग में नयी टीम अपना दायित्व समझे और संभाले. इनोवेशन के अलावा हमारा ‘सस्टेनेबुल मॉडल‘ क्या हो सकता है, मैं और प्रभात खबर के अन्य वरिष्ठ साथी इसमें समय लगाना चाहते हैं.

: समय व संयोग बार-बार नहीं मिलता : मैं कहना यह चाहता हूं कि समय का महत्व हम समझें. समय और परिस्थितियों ने हमें एक मंच दिया है. प्रभात खबर में 23 वर्ष पहले हम अभाव में थे. आज मजबूत हैं. आज देश के तीन सबसे बड़े घरानों से हमारा मुकाबला है. यह परिस्थितियों और समय की देन है. हमारी भूमिका ही आगे का रास्ता तय करेगी कि हम किधर जायेंगे? समय ने हमको एक अवसर दिया है, कुछ कर दिखाने का. बार-बार यह समय और संयोग किसी को नहीं मिलता. समय गुजर जाने के बाद, हाथ से बालू की तरह चीजें फ़िसल या निकल और बिखर जाती हैं. आइए हम चीजों को बिखरने न दें. और समय को न गंवा कर एक दीर्घजीवी संस्था की नींव डालें, जिससे हमारा निजी भला भी हो और समाज का हित भी सधे.

: हमारी ताकत : सबसे महत्वपूर्ण बात मैं अंत में कहना चाहता हूं. हमारे प्रबंधन का सहयोग और मार्गदर्शन नहीं रहता, तो हम यहां नहीं पहुंचते. मैं तो शुद्ध संपादकीय का आदमी रहा. टाइम्स ग्रुप और आनंद बाजार पत्रिका में कार्य करते हुए, अन्य विभागों से संपादकीय का संपर्क नहीं रहता था. वह संपादकीय श्रेष्ठता से उपजा अहं बोध का दौर था. तब ‘90 के दशक में पत्रकारों का यही मानस था. पर प्रभात खबर आकर हमने बृजकिशोर झंवर (लाली बाबू) से मैनेजमेंट की बारीकियां सीखीं अपने तत्कालीन चेयरमैन बसंत कुमार झंवर के विजन-प्रोत्साहन और दृष्टि ने प्रभात खबर को हमेशा नयी ताकत दी. हमारे युवा चेयरमैन प्रशांत झंवर और युवा एम.डी राजीव झंवर का पग-पग पर सुझाव, सहयोग और विजन ‘प्रभात खबर‘ समूह की सबसे बड़ी ताकत है. प्रभात खबर के निदेशक समीर लोहिया के प्रैक्टि‍कल सुझाव हमारी ताकत हैं. मैं क्यों यह सब बता रहा हूं, क्योंकि कोई संस्था, इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी खड़ी हुई, तो हमारे पीछे अनेक लोगों का सामूहिक प्रयास, पहल और भागीदारी है. इसी तरह हम अपना मस्तिष्क खुला रख कर सबके सुझावों से सीखें, तो हमारे सामने हमेशा एक बेहतर संसार मौजूद रहेगा. मीडिया इंडस्ट्री में विशेषज्ञ मानते हैं कि मामूली संसाधनों के बल प्रभात खबर का टिकना, बढ़ना और फ़ैलना एक प्रबंधकीय चमत्कार है. अगर यह चमत्कार है, तो इसका श्रेय ’झंवर परिवार’ द्वारा प्रभात खबर को मिले प्रबंधन दिशा-निर्देश को है. इस परिवार के हर सदस्य ने नये-नये आइडिया देकर हमें हमेशा प्रोत्साहित किया.

: आभार : सबसे अंतिम पंक्ति में सबसे पहले जिनके प्रति ऋण व्यक्त करना है, उनका उल्लेख करना चाहूंगा. अंत में इसलिए, ताकि यह भविष्य में सबसे महत्वपूर्ण ढंग से स्मरण रहे. झारखंड -बिहार-बंगाल के हिंदी पाठकों ने, जिन्होंने हमें बचाये-बनाये रखने में सबसे कारगर काम किया, वे हमारे पूज्य हैं. प्रेरणास्रोत हैं और वे ही हमारी असली ताकत हैं.

….समाप्त….

”सपने, संघर्ष और चुनौतियां” शीर्षक से हरिवंश द्वारा लिखा यह लेख धारावाहिक रूप में प्रभात खबर में प्रकाशित किया गया है. हरिवंश समकालीन भारतीय मीडिया के बड़े नाम हैं. ईमानदार व जनपक्षधर पत्रकारिता के प्रतीक हैं. समय-समय पर वे अपने दिल, दिमाग और व्यवहार के मंथन-अनुभवों को पूरी साफगोई के साथ बोल-लिख कर बयान करते रहते हैं.

इसके पहले के सभी तीन भागों को पढ़ने के लिए इन शीर्षकों पर एक-एक कर क्लिक करें–

तब मैं, केके गोयनका और आरके दत्ता ड्राइविंग सीट पर थे

प्रभात खबर बंद कराने को बड़े घरानों ने साजिश रची थी

राडिया प्रकरण ने दिखाया- पत्रकारिता पतन में भी सबसे आगे

राडियाकांड ने दिखाया- पत्रकारिता पतन में भी सबसे आगे

हरिवंश: सपने, संघर्ष और चुनौतियां (3) : प्रभात खबर में जब चुनौतियों के दिन शीर्ष पर थे, तो हर बार बैठक में कहता था कि जिन्हें सुरक्षित भविष्य चाहिए, अच्छा पैसा चाहिए, वे वैकल्पिक रास्ता तलाश सकते हैं, क्योंकि यहां भविष्य अनिश्चित है, संघर्ष है, परिस्थितियां विपरीत हैं : हमारी अपनी आचार-संहिता है, शराब पीकर कोई दफ्तर आये, स्वीकार्य नहीं है :

: बदलाव की शुरुआत खुद से हो : पिछले दिनों, लगभग तीन सप्ताह पहले, बाहर से एक मित्र का फ़ोन आया कि किसी वेबसाइट पर यह खबर आनेवाली है कि प्रभात खबर से आप विदा हो रहे हैं. ऐसी बहुत सारी चीजें चलती रहती हैं. न मैं ऐसी चीजों पर गौर करता हूं और न ही ऐसी चीजों के बारे में चर्चा. न मुझे किसी को यह सफ़ाई देनी है, न पक्ष रखना है. मैं मानता हूं कि मेरे प्रभात खबर के साथियों को भी पता है कि हमें क्या करना है? और किस रास्ते जाना है? मैं पुन: अपने साथियों से कहना चाहूंगा कि प्रभात खबर का भविष्य छोटी-छोटी चीजों से तय होगा. ये छोटी-छोटी चीजें हमारे हद-पहुंच में हैं. आज भी देखता हूं, दफ्तर में कहीं कोई मौजूद नहीं है, पर पूरी बिजली जल रही है. कहीं कुरसी का पांव टूटा है और वह महीनों से वहीं पड़ी है. कोई ठीक करानेवाला नहीं. यानी छोटी चीजें भी आप उम्मीद रखते हैं कि वरिष्ठ लोग आ कर करेंगे. हमारा कोई फ़र्ज नहीं है. किसी खास जगह पान की पीक या गुटखा वगैरह के पैकेट पड़े रहते हैं. इस्तेमाल के बाद बाथ में साफ़ नहीं किया जाता. ऐसी अनेक चीजें हैं. इन चीजों को देख कर लगता है कि हमारे मानस में है कि साफ़ रखने का काम कोई बाहर से आ कर करेगा. या साफ़ जगह को गंदा करना हमारा संवैधानिक हक है. जीवन में इन छोटी-छोटी चीजों के प्रति अगर हम और आप सजग होंगे, तो स्वभावत अपने काम में भी हम इसी एप्रोच को अपनायेंगे. इसलिए स्पष्ट रहिए. हम ठीक होंगे, हमारी कार्यसंस्कृति बेहतर होगी. हमारा मानस पॉजिटिव होगा, तो अखबार भी ठीक होगा.

: संपादन एक कला है और पत्रकारिता बौद्धिक काम : बाहर में प्रभात खबर के बारे में धारणा है कि काम न करते हुए भी आप समय काट सकते हैं. इसका एक कारण है कि शुरू से हम सब ने मिल कर यह कोशिश की है कि यहां एक मित्रवत माहौल रहे. ऑफ़िस का आतंक नहीं. संपादन काम एक कला है. पत्रकारिता बौद्धिक काम है. यहां डिस्कशन-डिबेट का माहौल होना चाहिए. अपशब्द, गाली-गलौज, मानसिक दबाव या टेंशन का माहौल नहीं. हमारी अपनी आचार-संहिता है. शराब पीकर कोई दफ्तर आये, स्वीकार्य नहीं है. किसी से गलत आचरण मान्य नहीं है. वरिष्ठ पदों पर बैठे लोगों का सम्मान हमारी शिष्टता है. इसलिए हम एक बेहतर, स्वअनुशासित और बौद्धिक माहौल चाहते हैं, क्योंकि हम परिवार के मुकाबले, आपस में, दफ्तर में ज्यादा समय साथ गुजारते-बिताते हैं. जब जीवन का बड़ा हिस्सा साथ गुजारते हैं, तो बेहतर और सुखद माहौल में रहें, तनाव में नहीं. यह माहौल सोच-समझ कर हम सब ने बनाने की कोशिश की है, पर आज की दुनिया में और इस प्रतिस्पर्धा में अब आपको ध्यान रखना होगा कि हर जिम्मेदार आदमी खुद निर्णायक हो. जबावदेह बने, क्योंकि अब कोई बैठ कर, बोझ बन कर चलेगा, तो संस्था का भविष्य नहीं रहेगा. यह सरकारी कार्यालय नहीं है. न चैरिटी संस्थान है. हर आदमी पहले खुद से पूछे कि वह कंपनी से जितना ले रहा है, उससे कई गुना रिटर्न अपने बेहतर काम के रूप में कंपनी को दे रहा है? हमारे लिए यही मानक और कसौटी है. जैसे हम घर चलाते हैं, वैसे ही जहां से रोजी-रोटी चलती है, उसके बारे में सोचें, तो किसी भी स्पर्धा में हम टिके रहेंगे. समय की चुनौतियों के अनुसार हम बदलते रहें. अगर यह सकारात्मक मानस प्रभात खबर की टीम में रहा, तो हम किसी से भी मुकाबला कर सकते हैं. स्पर्धा चुनौतीपूर्ण है. तीन बड़े घरानों के खिलाफ़. ऐसी स्पर्धा के बारे में वर्ष 1991 से ही मैं अपने साथियों-सहकर्मियों से कहता रहा हूं. साफ़-साफ़. बेबाक तरीके से. तब भी आधा दर्जन स्थापित व पुराने अखबारों से मुकाबला था.

: कभी किसी को रोका नहीं : हर साल होनेवाली प्रभात खबर की ऐसी सार्वजनिक बैठक में मैं अपनी प्रिय पुस्तक समरगाथा (अनुवाद-अमृत राय) के अंश सुनाता था. उस पुस्तक का एक अंश जो बार-बार आपको सुनाया है, यह है. अगर आपका घर अब तक खड़ा है, तो आप वापस उसमें चले जाइए. मैं सिर्फ़ ऐसे लोगों को अपने साथ लेना चाहता हूं, जिनके पास गंवाने के लिए अपनी जंजीरों को छोड़ कर दूसरा कुछ नहीं है. अगर आपके पास अशर्फ़ियों का ढेर है, तो जाइए उसे संभाल कर रखिए, हमारे साथ मत आइए. अगर आप अपनी आजादी से ज्यादा अपने बच्चों को प्यार करते हैं, तो चले जाइए और कोई इसके लिए आप पर उंगली नहीं उठा सकेगा और अगर आपकी मंगनी हो गयी है, तो आप अपनी मंगेतर के पास चले जाइए-क्योंकि हमारी मंगेतर तो आजादी है, लेकिन अगर आप लोगों के बीच एक आदमी भी ऐसा है, बस एक, जो आजादी के लिए अपनी जान दे सकता है – और देखिए, पक्की बात है, मैं जो कुछ करने जा रहा हूं, उसमें मौत के सिवा कुछ नहीं है – तो वह आदमी इसके बाद मेरे तंबू में आकर मुझसे मिले. मुझे एक आदमी की जरूरत है, सिर्फ़ एक आदमी की. बार-बार प्राय: तीन-चार बैठकों में पुस्तक का यह अंश सुनाने के पीछे मकसद रहा है. साथियों-सहकर्मियों को बताना कि हम विपरीत परिस्थितियों में कार्यरत हैं. इस कारण गिनती के कुछेक लोगों को छोड़ कर कभी किसी को रोका नहीं, कोई कल जाने की बात करता था, मेरा जवाब होता कि आज और अभी जाना बेहतर है, क्योंकि एक बार अलगाव का मानस बन जाने के बाद आप भावनात्मक रूप से यहां नहीं होंगे. इसलिए तत्काल अलग होना ज्यादा बेहतर है. आपसी व्यवहार में बिलकुल स्पष्टता और साफ़गोई जीवन में अनिवार्य मानता रहा हूं. इन पर अमल भी करता रहा हूं.

: लोगों को न छोड़ें, भले ही लोग छोड़ दें : प्रभात खबर में जब चुनौतियों के दिन शीर्ष पर थे, तो हर बार प्रभात खबर की सामूहिक बैठक होती थी, उसमें साफ़-साफ़ कहता था कि जिन्हें सुरक्षित भविष्य चाहिए, अच्छा पैसा चाहिए, वे वैकल्पिक रास्ता तलाश सकते हैं, क्योंकि यहां भविष्य अनिश्चित है. संघर्ष है. परिस्थितियां विपरीत हैं. जिनके पास दूसरे अखबारों से प्रस्ताव आते थे, उनमें से आरंभिक दौर में जानेवाले कुछेक को छोड़ कर सब मिले थे. अपनी आर्थिक विवशता बताते. मै उन्हें जाने को प्रोत्साहित करता. कहता था कि आप कम पैसे पर अगर यहां काम करेंगे या निश्चित भविष्य छोड़ कर अनिश्चित भविष्य में हमारे साथ रहेंगे और अगर यह अखबार नहीं चला, तो मेरे ऊपर आपका मानसिक-नैतिक बोझ होगा. मेरी अंतरात्मा मुङो परेशान करेगी. इसलिए आप अवसर न छोड़ें. पर जो जोखिम चाहते हैं, कुछ करना चाहते हैं, वे रहें. यह भी साथियों से अनुरोध करता था. लोग बाहरी आकर्षण छोड़ कर रहे भी. उम्मीद से अधिक लोग साथ आये और कारवां बनता गया. आज सैकड़ों लोग हैं, जो आकर्षक प्रस्ताव ठुकरा कर यहां कार्यरत हैं. समरगाथा पुस्तक के अंश बांच कर यह भी कहता था कि जो आत्मगौरव चाहते हैं, कुछ करने का आत्मसंतोष चाहते हैं, ऐसे लोगों का साथ चाहिए. कभी किसी साथी को भ्रम में नहीं रखा. किसी को बढ़ा-चढ़ा कर सुरक्षित भविष्य बता कर नहीं बरगलाया. बुलाने के पहले पैकेज कुछ और कहा और आने पर हाथ में कुछ और मिला, प्रभात खबर में यह नहीं हुआ. अभाव में, संघर्ष में, अनिश्चितता में चलनेवाले साथियों को जरूर न्योता. आज फक्र के साथ हम सब कह सकते हैं कि मामूली पदों से लेकर बड़े पदों पर बैठे अनेक ऐसे लोग हैं, जिन्होंने अभाव, संघर्ष और अनिश्चितता की राह चुनी. मुङो जब-जब बड़ा न्योता मिला, सबसे पहले मेरे मस्तिष्क में यही चेहरे उभरे. उन्हें हम क्या मुंह दिखायेंगे? लोकलाज और नैतिक भय. यह बोध भी कि भले कोई हमें धोखा दे, पर हम अपनी ओर से कुछ भी ऐसा न करें. एक जगह से यह भी प्रस्ताव था कि जितने लोगों को साथ ला सकते हैं, लाइए. पर हमारा मकसद अलग था. हम लोगों को न छोड़ें, भले ही लोग छोड़ें. यही जीवन का सुंदर पक्ष है. हम दूसरे की राह कैसे बदल सकते हैं? पर अपनी राह तो चुन ही सकते हैं.

: पत्रकारिता का फ़ोकस सामान्य आदमी : एक और संदर्भ में वर्ष 2010 हमारे लिए बड़ा लेशन (सबक) है. वर्ष 2010 में राडिया प्रकरण ने दिखा दिया कि पत्रकारिता कहां पहुंच गयी है? पतन में भी सबसे आगे. पर इस प्रकरण में अंगरेजी के महारथी पत्रकारों, बड़े अखबार, संस्थानों और मीडिया हाउसों की चर्चा तो हो ही रही है. पर हिंदी के जो दिग्गज घराने इसमें शरीक हैं, वे चर्चा केंद्र से बाहर हैं. दरअसल, यह रातोंरात नहीं हुआ है. इसकी शुरुआत भी वर्ष 90-91 में ही हो गयी. प्रभात खबर के पुनर्जन्म के दिन (वर्ष 1990) पहला संपादकीय लिखा था धारा के विरुद्ध. अपनी भविष्य की पत्रकारिता का स्वरूप और रूपरेखा रेखांकित करते हुए. इसमें साफ़ था कि हम गवर्नेस की बात करेंगे, भ्रष्टाचार की बात करेंगे, बीमा  हिंदी पट्टी के गंभीर सवाल हमारे विषय होंगे, आदिवासी, पिछड़े, अशिक्षा के सवालों पर गहराई से विचार करेंगे. पत्रकारिता का फ़ोकस विशिष्ट जन से उठा कर सामान्य आदमी को बनायेंगे. अपने बूते लकीर खींचनेवाले संघर्षशील नायकों को सामने लायेंगे. समाज में हो रही अच्छी चीजों-बदलावों को फ़ोकस करेंगे.

: लाइफ़स्टाइल की पत्रकारिता : उन्हीं दिनों देश की पत्रकारिता में बड़ा बदलाव आया. लाइफ़स्टाइल की पत्रकारिता की शुरुआत. माना गया कि अखबारों का काम सूचना देना और इंटरटेन करना भर है. अंगरेजी अखबारों में धारावाहिक बहस चली कि पत्रकारिता में पेज थ्री की संस्कृति कैसे जायज है? पेज थ्री एक मुहावरा बन गया था, जिसके तहत लाइफ़स्टाइल, उपभोक्तावादी जीवन, फ़ैशन, अप मार्केट की चीजें छापना ही अखबारनवीसी माना गया. इसी पेज थ्री की पत्रकारिता का क्लाइमेक्स है राडिया प्रकरण. पत्रकारिता के पतन की यह शैली भी 1991 से शुरू हुई. आर्थिक उदारीकरण के साथ. यह फ़िसलन 2010 में शिखर पर है. सबके सामने है. सार्वजनिक है. क्या पार्टियों की खबरें-तसवीरें पैसे देकर बड़े अखबारों में छपवाने की शुरुआत 1992-93 से नहीं हुई? हिंदी-अंगरेजी के बड़े अखबारों द्वारा निजी प्राइवेट कंपनियों के शेयर-स्टेक लेकर उन्हें खबरों के रूप में प्रमोट करने का काम बहुत पहले शु  नहीं किया? इसके बाद शु  हुआ चुनावों में पेड न्यूज का सिलसिला? कौन नहीं जानता, पेड न्यूज का सिलसिला 1995 के आस-पास हुए मध्यप्रदेश के चुनावों से शुरू हुआ. फ़िर मध्यप्रदेश के अगले चुनाव, राजस्थान के चुनावों में यह फ़ला-फ़ूला. अखबारवाले खूब संपन्न हुए. हरियाणा, पंजाब के चुनावों में पहुंच कर, यह एक नये दौर में पहुंच गया. करोड़ों-करोड़ के खेल में. फ़िर दिल्ली में हुए चुनावों में यह परवान चढ़ा. उत्तर प्रदेश के पिछले चुनावों में इसकी धूम मची. शरद यादव ने प्रेस-कॉन्फ्रेंस कर इस मामले को सार्वजनिक किया. शायद प्रेस काउंसिल में शिकायत भी की थी. पर 2009 के लोकसभा चुनावों में जब यह बिहार और झारखंड पहुंचा, तो ही यह राष्ट्रीय मुद्दा बना. यह उल्लेखनीय तथ्य है. झारखंड और बिहार के अखबार चाहे जितने भी गलत हों, पर जो धंधा 1991 और 1995 के बाद पूरे देश में फ़ल-फ़ूल रहा था. उफ़ान पर था, वह राष्ट्रीय मुद्दा तभी बना, जब बिहार और झारखंड में पहुंचा. इसका श्रेय किसे मिले, इस बहस में मैं नहीं पड़ रहा, पर यह दर्ज और स्थापित तथ्य तो है ही कि झारखंड और बिहार के लोकसभा चुनावों के बाद ही यह मुद्दा राष्ट्रीय बन पाया.

….जारी….

”सपने, संघर्ष और चुनौतियां” शीर्षक से हरिवंश द्वारा लिखा यह लेख धारावाहिक रूप में प्रभात खबर में प्रकाशित हो रहा है. हरिवंश समकालीन भारतीय मीडिया के बड़े नाम हैं. ईमानदार व जनपक्षधर पत्रकारिता के प्रतीक हैं. समय-समय पर वे अपने दिल, दिमाग और व्यवहार के मंथन-अनुभवों को पूरी साफगोई के साथ बोल-लिख कर बयान करते रहते हैं.

इसके पहले के दो भागों को पढ़ने के लिए क्लिक करें….

तब मैं, केके गोयनका और आरके दत्ता ड्राइविंग सीट पर थे

प्रभात खबर बंद कराने को बड़े घरानों ने साजिश रची थी

प्रभात खबर बंद कराने को बड़े घरानों ने साजिश रची थी

हरिवंश: सपने, संघर्ष और चुनौतियां (2)आनंद बाजार पत्रिका छोड़ कर कुछेक हजार की नौकरी पर यहां आया, कंपनी द्वारा दी गयी थर्ड हैंड मारुति वैन + किराये का घर, यही तब पाता था, आज प्रभात खबर में वरिष्ठ होने के कारण सबसे अधिक तनख्वाह मैं पा रहा हूं. इससे काफ़ी अधिक के प्रस्ताव भी आये : इस गरीब इलाके में पत्रकारिता करने की प्रेरणा हमें यहां खींच लायी:

: चले थे अकेले कारवां बनता गया : हम और हमारे साथ अनेक साथी युवा दिनों में प्रभात खबर से बंधे. माओ की सांस्कृतिक क्रांति के नारे ने भी हमारी पीढ़ी पर असर डाला. हालांकि बाद में चीनी समाज के साहित्य को पढ़ते हुए हमने पाया कि सांस्कृतिक क्रांति के दौरान माओ का यह नारा हजारों फ़ूलों को एक साथ खिलने दो, अपनी निजी गद्दी मजबूत करने के लिए, अपने कद के बराबर या समकक्ष प्रतिभाशाली नेताओं को अपने रास्ते से हटाने के लिए था. यह खुले और बंद समाज का भी फ़र्क है. खुले समाज में निजी जड़ें मजबूत करने के लिए, सार्वजनिक जीवन में लोक-लुभावन नारे देकर बच निकलना कठिन है. पर विचार के आधार पर, प्रेरणा के आधार पर, हजारों फ़ूलों (प्रतिभाओं) को एक साथ खिलने दो, क्रांतिकारी अवधारणा है. हजारों-हजार प्रतिभाएं साथ निखरें, तो कोई भी संस्था-समाज या देश बढ़ेगा. प्रभात खबर में भी यह जरूरी है कि अनेक युवा प्रतिभाएं एक साथ, कई क्षेत्रों में उभरें, ताकि संस्था मजबूत हो.

: विचार और आचरण में प्रतिस्पर्धियों से काफ़ी अलग : एक संतोष की बात बताऊं. 2000 में जब बड़े घरानों ने प्रभात खबर को बंद कराने की साजिश रची, तब कुछेक लोग थे, जो किसी कीमत पर प्रभात खबर से नहीं डिगे. आज प्रभात खबर (सभी संस्करणों को मिला कर) में सैकड़ों हैं, जो बड़े घरानों के लगातार लुभावने प्रस्तावों को ठुकरा कर यहां हैं. वह कहावत है न कि चले थे अकेले, कारवां बनता गया. बड़े घरानों के शीर्ष लोग, हमारे ऐसे साथियों के घर जा कर, महीनों-वर्षो उन्हें चेज (पीछा) कर, अपने साथ मिलाने की कोशिश करते रहे हैं. कर रहे हैं. अपरोक्ष यह धमकी भी देते हैं कि आपके सब लोगों को हम उठा ले जायेंगे, तब आप क्या करेंगे? पूंजी की गरमी? यह उन्हें कौन बताये कि गुजरे दस वर्षो में वे सैंकड़ों से अधिक लोगों को तोड़ ले गये. एक-एक कर, फ़िर भी प्रभात खबर उनके लिए चुनौती बना ही हुआ है. हम छोटे हैं, सीमित संसाधन के हैं, पर गरिमा, मर्यादा, विचार और आचरण में अपने प्रतिस्पर्धियों से अलग हैं. इन स्पर्धी अखबारों का कोई व्यक्ति शायद ही कहे कि आज तक मैंने किसी अखबार में किसी को अचानक तोड़ने या समूह तोड़ कर साजिश के तहत उन्हें नुकसान पहुंचाने की कोशिश की या किसी को फ़ोन किया, घर गया, तिकड़म रचा, अंगरेजी में कहें, तो बिलो द बेल्ट (कमर के नीचे चोट पहुंचाना) हिट किया, ताकि प्रतिस्पर्धी अखबारों को नुकसान हो. ऐसा भी नहीं है कि यह कर नहीं सकता था. ऐसी स्थिति या पद पर हूं कि कर सकता हूं. यह भी नहीं है कि किसी को उपकृत करने के लिए हमने यह आचरण किया. यह जन्मजात संस्कार है. निजी आत्मगरिमा है. स्वनिर्धारित सीमा के विपरीत आचरण कर (किन्हीं भी परिस्थितियों में) हमें लगता है कि हम अपने स्तर से फ़िसल रहे हैं. गिरे हैं. हर इनसान का एक स्तर होता है. निजी डिगनिटी होती है. स्वत बनायी या इवाल्व की हुई. इस गलाकाट प्रतियोगिता के पूरे दशक में हमने आज तक अपनी गरिमा या लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन नहीं किया. क्या यह कम संतोष की बात है? इस आचरण या फ़िसलन के लिए बाहर से सर्टिफ़िकेट नहीं चाहिए. इस रास्ते पर चलने पर दुनिया को बाद में पता चलता है, आपके अंदर से पहली आवाज आती-उठती है. यदि अपनी आवाज सुनना आपने बंद नहीं किया हो. लोभ के इस युग में जहां कुछेक लोग अपने जीवन के उर्वर दिनों में, संघर्ष और तप के दिनों में, पग-पग पर अस्तित्व की लड़ाई लड़ने के दिनों में साथ हैं, यह क्या कम सुख की बात है?

: निराशा के वे पुराने क्षण : आज 2010 का अंत है. सोच रहा था कि क्या प्रभात खबर में गुजारे संघर्ष के, तप के, निराशा के वे पुराने क्षण एक पल भी वापस मिल सकते हैं? तब हम साथियों को प्रभात खबर के अलावा कुछ सूझता नहीं था. न घर, न परिवार, न भविष्य की सुरक्षा, एक जुनून था, क्या वह लौट सकता है? मकसद था, संस्था बचाना-बढ़ाना. एक जिद. इस जिद के पीछे कोई आर्थिक आग्रह था? निजी-स्वार्थ लोभ था? यह होता तो हम सब फ़ेंस (सीमा) के उस पार होते. औरों की तरह बड़े महानगरों-बड़े प्रकाशनों में. सुख-सुविधा के संसार में क्या इस रास्ते पर चलने के लिए आज हम उभरती संस्था में कोई युवा टीम न उभरने दें? तब उन युवा साथियों के लिए भविष्य का मार्ग प्रशस्त करने का काम कौन करेगा? वरिष्ठ होने के कारण हम हीं न ! आज प्रभात खबर में ऐसे सैकड़ों लोग हैं, जो प्रतिस्पर्धी बड़े अखबारों से अधिक पैसा, महत्वपूर्ण पद और भौतिक सुख ठुकरा कर टिके हैं.

: आप सही हैं, तो मददगार मिलते हैं : मेरी गुजारिश है, नये वर्ष में कामना है कि किसी भी सूरत में न डिगनेवाले ऐसे लोगों की यह संख्या इस संस्था में अब सैक ड़ों से बढ़ कर, कई सौ में तब्दील हो. यह कौन करेगा? आप युवा टीम ही न. अब आप नयी लकीर खींचें, हर आदमी अपने आसपास से चाहे जिस भी क्षेत्र में हो (संपादकीय, विज्ञापन, प्रसार वगैरह) अपने तहत की प्रतिभाओं को अवसर दे. उन्हें योग्य लीडर के  रूप में विकसित करे. फ़िर ऐसा रास्ता हम आपके लिए ऊपर से ही बना रहे हैं. हम उन साथियों को भी आज विशेष याद करना चाहेंगे, जो सीधे या नियमित प्रभात खबर से जुड़े नहीं रहें, पर हमारे संघर्ष के दिनों में उनकी निर्णायक मदद रही. हमारा अस्तित्व बचाये रखने-बढ़ाने में. हम उनके भी णी हैं, जो लंबे समय तक साथ रहे, पर आज कहीं और हैं. कुछेक को अच्छे अवसर मिले, तो हमने उन्हें जाने के लिए प्रोत्साहित किया. नयी शुरुआत के लिए. बाहर से, अंदर से, साथ रह कर फ़ैसल अनुराग, दयामनी बारला और वासवी वगैरह ने इसे बनाने-बचाने में जो मदद की थी, वह बता नहीं सकता. अगर आप सही रास्ते हैं, तो मददगार मिलते हैं.

: नारायण मूर्ति ने हमेशा प्रेरित किया : जो पुराने साथी हैं, उन्हें याद होगा. पहले फ़र्स्ट फ्लोर खुला था. बाद में एसबेस्टस की छत बनी. उसी छत पर खुले आसमान के नीचे हम बैठते थे. सामूहिक रूप से. प्रभात खबर के सभी लोग. अपनी चुनौतियों और कठिनाइयों पर बोलने-बतियाने-संवाद करने, फ़िर रणनीति बनाने. घर के सुख-दुख बांटने और भविष्य के लिए रास्ता बनाने जैसे. तब से मैं अपनी बातों में इंफ़ोसिस के नारायण मूर्ति का उल्लेख करता रहा हूं. उस व्यक्ति ने हमें प्रेरित किया है. किस तरह कुछेक लोगों ने पत्नियों के गहने गिरवी रख कर 10-20 हजार से कंपनी शुरू की. हर विपरीत स्थिति देखी-ङोली. तब इंफ़ोसिस दुनिया की इतनी प्रतिष्ठित, सम्मानित व बड़ी कंपनी बनी. हम सफ़लता देखते हैं, उसकी बाह्य काया परखते हैं, पर उसके पीछे का तपना, जलना और आत्माहुति नहीं जानते. जब इंफ़ोसिस कंपनी संपन्न हुई, तब अपने यहां काम करनेवालों को हिस्सा या स्टॉक ऑप्शन देकर अपने यहां कार्यरत पुराने लोगों को करोड़पति-अरबपति बनाया. प्रभात खबर में जब हमने शुरुआत की, तब 240 लोग थे. और कुल वेतन ढाई लाख के लगभग. आज प्रति माह वेतन पर लगभग दो करोड़ प्रभात खबर में औसत खर्च है. अभी कुछेक रोज पहले खूंटी के एजेंट आये थे. 25 वर्षो से प्रभात खबर बेचने का ही काम कर रहे हैं. साधु इनसान हैं. बता रहे थे कि आज वहां एक-एक हॉकर 12 से 16 हजार प्रभात खबर बेच कर कमा रहा है प्रतिमाह. प्रभात खबर की सामाजिक भूमिका (जो मुख्य चीज है) छोड़ दीजिए, तो भौतिक रूप से भी, अपना काम करते हुए प्रभात खबर ने हमारे जीवन में यह असर डाला है.

: इंफ़ोसिस ने नयी लकीर खींची : आनंद बाजार पत्रिका छोड़ कर कुछेक हजार की नौकरी पर यहां आया. कंपनी द्वारा दी गयी थर्ड हैंड मारुति वैन + किराये का घर, यही तब पाता था. आज प्रभात खबर में वरिष्ठ होने के कारण सबसे अधिक तनख्वाह मैं पा रहा हूं. इससे काफ़ी अधिक के प्रस्ताव भी आये. पर मन के अनुरूप काम और ठीक-ठाक वेतन सुविधाएं, इसका संयोग कहीं और नहीं पाया. इसलिए हमने यहां काम करना चुना. इस गरीब इलाके में पत्रकारिता करने की प्रेरणा हमें यहां खींच लायी. ऐसा ही काम बड़े पैमाने पर इंफ़ोसिस में हुआ. ईमानदार तरीके से. भारतीय परंपरा में अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चार लक्ष्य हैं. अर्थ का नकार नहीं है. पर अर्थ ईमानदारी से, श्रम से, किसी से याचना या हाथ पसार कर नहीं. घूस या ब्लैकमेल से नहीं. इस रास्ते चल कर इंफ़ोसिस ने नयी लकीर खींची है. नये युग की कई कंपनियां ऐसा कर रही हैं. आज जो युवा कैंपस से ही लाखों-करोड़ों की तनख्वाह पर जा रहे हैं, वे ईमानदारी से खट कर उपार्जन कर रहे हैं. यह अलग बात है कि इतने उपार्जन के बावजूद वह जीवन नहीं जी पा रहे, क्योंकि कंपनियां उन्हें 20-22 घंटे काम करा कर निचोड़ लेती हैं. बहरहाल, हम बात कर रहे थे कि कैसे 1989 में स्थापित एक कंपनी को एक इनसान नारायण मूर्ति ने उसूलों-सिद्धांतों पर खड़ा किया. टीम के बल ही, अकेले नहीं. उस कंपनी पर एक पुस्तक आयी है, ’लीडरशीप इंफ़ोसिस’. संपादित मैट बार्ने, पीएच-डी द्वारा. उसकी भूमिका की कुछ चीजें आपको सुनाता हूं.

: गलतियों से तुरंत सबक लिया : यह पृष्ठभूमि याद रखिए कि नारायण मूर्ति कंपनी के एमडी पद से हटे. अपने साथियों को मौका दिया. अब एक-एक कर वहां नये-नये लोग नये सक्षम लीडर के रूप में सामने आ रहे हैं. कंपनी को संभाल रहे हैं. आगे ले जा रहे हैं. इस पुस्तक की भूमिका में नारायण मूर्ति कहते हैं कि इंफ़ोसिस की रहनुमाई हमारे जीवन का काम (लाइफ़ वर्क) है. शुरू में, हमारे अंदर सपने थे. साझा मूल्य थे, हम एक-दूसरे के पूरक थे. हुनर, काम वगैरह में कंपनी के बड़े हितों या उसके लाभ के लिए हमने निजी हितों की कुरबानी दी. हमने मिल कर वे चीजें हासिल कीं, जो हम अलग-अलग रह कर अकेले नहीं कर पाते. इस दशक में अपनी ’लीडरशीप टीम’ के बल हमने लगातार अपनी कंपनी को बदला. सिर्फ़ 11 वर्ष पहले 1999 में इंफ़ोसिस में कुल 3000 इंप्लाइज थे. अब लगभग 1.22 लाख से अधिक हैं.  नारायण मूर्ति कहते हैं कि हम हर समय बिल्कुल सही ही नहीं रहे, पर जब-जब कोई गलती हुई, तुरंत सबक लेकर हम पुन और ऊर्जा के साथ सही राह पर लौटे. हमें कंपनी को अगर 200 वर्षो तक बनाये रखने का विजन (दृष्टि) विकसित करना है, तो इसके लिए प्रभावी नेतृत्व चाहिए, हर स्तर पर. लीडरशिप का अर्थ है कि कंपनी की जरूरतें-सपने पहले, निजी चीजें बाद में. वह आगे बताते हैं कि हमने हमेशा वह भूमिका निभायी, जिसकी कंपनी को जरूरत थी, तब हमने कंपनी के बड़े और सार्वजनिक हित के हक में निजी पसंद-नापंसद को पीछे रखा.

: भविष्य आपके हाथ में है : कुछेक पंक्तियां ही मैंने उक्त पुस्तक की भूमिका से आपको सुनायी. कितनी प्रेरक हैं. सफ़ल होने का राज बताती हैं ये लाइनें. आज आप पूछिए कि हम जिस कंपनी में हैं, उसका भविष्य क्या है? शायद इसका कोई उत्तर न दे पाये. 1991 के बाद बार-बार आपके बीच यह बात दोहराता रहा हूं कि भविष्य आपके-हमारे हाथों में है. तब 91 में भी यह सवाल हम साथी आपस में करते थे. 1991 में जब समाचार उद्योग के एक एक्सपर्ट ने प्रभात खबर के भविष्य पर अपनी रपट दी, तब से यह बात मैं सारे कलिग्स (सहयोगियों) को सार्वजनिक बैठक में बताता रहा हूं. कोई दूसरी कंपनी होती, तो यह रिपोर्ट कानफ़िडेंशियल (गोपनीय) रहती. पर तब से ही साथ में यह भी दोहराता रहा हूं कि कंपनी का भविष्य आपके-हमारे हाथों में है. हम अपनी तय भूमिका अच्छी तरह निभाएंगे, तो आगे जायेंगे. कोई टाटा, बिड़ला, अंबानी हमारे लिए कुबेर का खजाना या दरवाजा खोल दे, पर हमारे अंदर टीम स्पिरिट, दृष्टि, अनुशासन नहीं, तो हम डुबो देंगे. बड़े-बड़े घरानों के दर्जनों उदाहरण दे कर मैं आपको यह बता सकता हूं. पर देखिए कि एक विजन, सपने और स्वअनुशासन से इंफ़ोसिस ने क्या किया? हमें यही माडल दीर्घजीवी बना सकता है. जो जहां है, अपने-अपने स्तर पर अपनी भूमिका का सही निष्पादन करे. अखबार के हित में, कंपनी के हक में. हम सबने मिल कर प्रभात खबर में शुरू से एक भिन्न संस्कृति अपनायी.

: एक स्वभाव है बिहारी मानस : शुरू से ही प्रभात खबर में एक अलग कार्यसंस्कृति विकसित करने की कोशिश हुई. हरेक बैठक में विशेष रूप से मैं इसकी चर्चा करता रहा कि टिपिकल बिहारी मानस से उबरना होगा. बिहारी मानस एक विशेषण के तौर पर देखता हूं. यह एक प्रवृत्ति है. स्वभाव है. यह कहीं भी हो सकता है, पर हिंदी इलाकों में यह स्वभाव या रुझान या यह प्रवृति आमतौर से है. उसके अपवाद भी बहुत मिलते हैं. मेरी नजर में बिहारी मानस क्या है? हिंदी राज्यों में परनिंदा, परचर्चा जीवन का अंग है. परमसुख गप्पें मारना, पीठ पीछे दूसरों की शिकायत करना, किसी अच्छे काम को गौर कर प्रशंसा न करना. कोई अच्छा करे, तो उसे तबाह-बदनाम करने में लगना. हर बात और काम में निगेटिव एप्रोच. ये हमारी आदतें हैं. हमने कोशिश की कि मेरे पास कोई दूसरे की शिकायत लेकर न आये. अगर कोई शिकायत है, तो जिसके संबंध में शिकायत है, जब तक वह मौजूद न हो, तब तक उसकी चर्चा नहीं हो. जिसके खिलाफ़ शिकायत है, उसके सामने बात हो. इसका परिणाम हुआ कि मेरे पास कोई अनर्गल बात या किसी की शिकायत लेकर नहीं आता. हमलोगों ने यह माहौल बनाने की कोशिश की कि दफ्तरों में पीठ पीछे रस लेकर अनर्गल चर्चाएं होती हैं, उन्हें कम-से-कम वरिष्ठ लेवल पर इंटरटेन न किया जाये. यह खत्म होना असंभव है, क्योंकि यह हमारी रगों में है. स्वभाव का हिस्सा है. फ़िर भी हम यह मान सकते हैं कि प्रभात खबर में हमलोगों ने इस प्रवृत्ति को नियंत्रित करने की कोशिश की. इसी कारण कई बार प्रभात खबर के अंदर की चीजें मुझे बाहर से पता चलती हैं. उसे आप मेरी कमी कह सकते हैं. आधुनिक प्रबंधन शैली भी इसे सही नहीं ठहराता, पर यहां मेरे कारण यह कमी है.

.…जारी….

”सपने, संघर्ष और चुनौतियां” शीर्षक से हरिवंश द्वारा लिखा यह लेख धारावाहिक रूप में प्रभात खबर में प्रकाशित हो रहा है. हरिवंश समकालीन भारतीय मीडिया के बड़े नाम हैं. ईमानदार व जनपक्षधर पत्रकारिता के प्रतीक हैं. समय-समय पर वे अपने दिल, दिमाग और व्यवहार के मंथन-अनुभवों को पूरी साफगोई के साथ बोल-लिख कर बयान करते रहते हैं.

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तब मैं, केके गोयनका और आरके दत्ता ड्राइविंग सीट पर थे

हरिवंश: सपने, संघर्ष और चुनौतियां (1) : प्रभात खबर को नया इंस्टीट्यूशनल रूप देने के लिए शुरुआत हमने ऊपर से की. पहल कर मैं हटा. केके गोयनका एमडी बने. आरके दत्ता एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर. ये दोनों वे लोग हैं, जिन्होंने जीवन के सर्वश्रेष्ठ वर्ष चुपचाप प्रभात खबर को बनाने में दिये हैं. यह बदलाव यहीं नहीं रुका. पूरे झारखंड को संभालने के लिए दूसरी पंक्ति की एक निर्णायक टीम खड़ी की गयी… :

एक वर्ष और गुजरा. प्रभात खबर में इस वर्ष के अंत में मैं 23वें वर्ष में प्रवेश करूंगा. आप में से भी कोई एक साल पूरा किया होगा, कोई पांच, दस या पंद्रह या बीस या बाईस वर्ष. या बिलकुल नया या कुछ महीनों पुराना होगा. तात्पर्य यह है कि दुनिया की सबसे गतिशील चीज है समय. यह कभी नहीं ठहरता. बड़े संदर्भ में कहें, तो यही काल है. यह अजीब है. अगर आज हम यहां गुजरा अतीत लौटाना चाहें, तो क्या ये पिछले 22-23 वर्ष लौट सकते हैं? एक पल भी या एक क्षण भी वापस मिल सकता है? यह सोचता हूं, तो पाता हूं कि जीवन के लिए इसमें एक संदेश है. जो गया, सो गया. नहीं लौटनेवाला. इसलिए क्यों नहीं सामूहिक रूप से सब संकल्प लें कि हम एक पल भी ऐसा नहीं गुजारेंगे, व्यर्थ नहीं गंवायेंगे कि अफ़सोस हो कि हमने अतीत में यह गंवाया. जब से चेतना या सुधि, तब से ही आयी यह सजगता. पीछे के व्यर्थ गुजरे क्षणों- वर्षों पर पश्चाताप से भी कुछ नहीं हासिल होनेवाला. भविष्य के लिए, बीते वर्ष 2010 के अवसर पर यह संदेश है हम सब के लिए. किसका? काल का. समय का.

: बंदी के कगार पर पहुंच कर संभला : बचपन में ही सुना था समय होत बलवान. इस तरह समय परिस्थितियों को धार, मोड़ और पहचान देता है. इस चुनौती के मुकाबले इनसान को खड़ा होना पड़ता है. इस रूप में प्रभात खबर के जीवनकाल में (1984 में स्थापना के बाद से ही) लगातार चुनौतियां आयीं. कुछेक संघर्ष के यादगार वर्ष हमलोगों की स्मृति में टंके हैं. मसलन 1984 में इसका जन्मना. 1987-88 आते-आते बंदी के कगार पर पहुंचना. चार/पांच सौ प्रतियों में सिमट जाना. कुल छह पेज का अखबार बन जाना. इसके बाद 1989 के अंत में नये प्रबंधन का पदार्पण. 1991 में अखबार उद्योग के एक शीर्ष एक्सपर्ट का लिखित सुझाव आना कि इसे जितना जल्द बंद कर दिया जाये, उतना ही अच्छा, क्योंकि इस समाचार पत्र का भविष्य नहीं है. यहां पहले  से ही स्थापित कई धुरंधर और संपन्न अखबार हैं. देश का यह सबसे पिछड़ा इलाका है. विज्ञापन का कोई स्कोप नहीं है. विज्ञापन, आर्थिक विकास का बाइ प्रोडक्ट है, यहां आर्थिक विकास देश में सबसे कम है. देश के सबसे अधिक अशिक्षित यहां हैं. क्या ये गरीब और अशिक्षित लोग कई अखबार पढ़ेंगे? 1991 में मीडिया के एक एक्सपर्ट ने प्रभात खबर की वायबिलिटी और भविष्य पर अध्ययन कर अपनी रपट में ये तर्क दिये थे. ये तर्क या कारण हमारी नजरों में भी सही थे. फ़िर भी इन तर्कों के विपरीत प्रबंधन चला कर देखना चाहता था.

: कारपोरेट ताकत की पहली धमक : इसके कुछेक वर्ष बाद ही उन्हीं दिनों, आर्थिक उद्योग जगत में भारी मंदी आयी. बड़े अखबार घराने भी अछूते न रहे. अंबानी, थापर, डालमिया और सिंघानिया जैसे बड़े समूहों से निकले अखबार असमय काल के गाल में चले गये. उन्हीं दिनों आर्थिक संकट के दौर में हमें भी बताया गया कि आइदर सिंक आर स्विम ऑन योर ओन. अपने बूते या तो तैरिए या डूबिए. वे दिन, वे वर्ष भी प्रभात खबर की स्मृति में हैं. यह 1995-96 का दौर था. इसके बाद आये दिल्ली और बाहर के अखबार. उनके पास थे पैसे, साधन और नेटवर्क. हैव और हैव नाट्स की प्रतियोगिता शुरू हुई. संपन्न और सर्वहारा के बीच. पहली कोशिश हुई कि हर विभाग के की-पर्सन (सबसे महत्वपूर्ण और क्रिटिकल आदमी) को तोड़ लो, ताकि अगले दिन से अखबार निकले ही नहीं. जंगल और आदिवासी इलाके में यह कॉरपोरेट ताकत या वार की पहली धमक थी. प्रभात खबर से अचानक, सुनियोजित षडयंत्र के तहत जून, 2000 में 33 लोग गये, एक साथ. बिना नोटिस पीरियड सर्व किये या मोहलत दिये. तत्काल प्रभाव से. यह सब एक रणनीति के तहत था, ताकि पूंजीसंपन्न के आगे सर्वहारा टिके ही नहीं और अगली सुबह अखबार न निकले.

: पत्रकारिता में आक्रामक पूंजीवाद : फ़िर आया 2002 का दौर. बाजार की भाषा में कहें, तो झारखंड में एक और बड़े प्लेयर का आगमन. एक ही साथ तीन संस्करणों की धमाकेदार शुरुआत. पाठकों के लिए अत्यंत आकर्षक और लुभावने स्कीम. हॉकरों को तरह-तरह के प्रलोभन. एजेंटों को अपने पक्ष में कर लेने की होड़. अखबार विक्रय केंदों पर अवांछित और असामाजिक तत्वों की स्पर्धा. यह आक्रामक पत्रकारिता नहीं, आक्रामक और आतंक के बल अखबार के वितरण पर कब्जा कर, पाठकों तक पहुंचने की शुरुआत थी. इसी दौर से पाठक बेबस होते गये. लोभ से उन्हें लुभाने की होड़ शुरू हुई. अखबारों की भीड़ से सर्वश्रेष्ठ या अपने बौद्धिक पसंद का अखबार पाठक खुद चुनें, यह खत्म हो गया. पाठकों को अखबार घरानों ने अपनी पूंजी के बल पर प्रभावित करना शुरू किया. प्रचार से, स्कीम से, घर पहुंचा कर, अन्य लाभ देकर, पाठकों को अन्य वजहों से प्रभावित कर. मनोवैज्ञानिक ढंग से उन्हें अपने फ़ंदे में फ़ांस कर, पाठकों पर अखबार थोपने की शुरुआत. इसके साथ ही पूंजीविहीन, पर विचार संपन्न अखबारों के खत्म होने का सिलसिला भी शुरू हो गया. बहुदलीय लोकतंत्र में, विचारों की बहुलता भी ज री है, पर पूंजी के बल एकाधिकार बना कर छोटी पूंजीवालों को बंद कराने की शुरुआत हुई. पत्रकारिता में आक्रामक पूंजीवाद के प्रवेश की धमक. आवारापूंजी, क्रोनी कैपिटलिज्म और काले धन का मीडिया में पदार्पण. विदेशी पूंजी, इक्विटी और शेयर बाजार से मीडिया में निवेश का दौर. इसका सकारात्मक पक्ष रहा कि अखबारों में नौकरियों की शर्ते बेहतर हुईं. पर समाज की सफ़ाई के लिए निकले अखबार, बाजार और विज्ञापन पर एकाधिकार कायम करने के लिए हर वह काम करने में माहिर हुए, जुट गये, जिनके खिलाफ़ वे अपने पन्ने भरा करते हैं.

: राष्ट्रीय महारथियों से घिरा प्रभात खबर : इसी बदलते दौर में प्रभात खबर ने वर्ष 2004 में 20 वर्ष पूरे किये. फ़िर 2006 में लगा कि प्रबंधन जेनुइनली इससे अलगाव चाहता है, पर प्रभात खबर के लोगों की भावनाओं को देख कर प्रबंधन ने निर्णय बदला. प्रभात खबर को पटरी पर लौटने में समय लगा. तरह-तरह की अफ़वाहें – चर्चा वर्षों तक पीछा करती रहीं. ये सब चीजें जब तक थिराएं, ठहरें या वहीं पर विराम लगे, तब तक नयी स्पर्धा आरंभ. देश के दूसरे बड़े प्रतियोगी का आगमन. हिंदी संसार में अपने को नंबर वन मानने वाले, हिंदी पाठकों के बीच नंबर दो का खिताब या शोहरत विज्ञापित करने वाले और हिंदी के नंबर तीन का दावा करनेवाले, सभी एक साथ, एक जगह और एक-दूसरे के सामने देश में कहीं खड़े हुए, तो सबसे पहले झारखंड में. ये तीनों अखबार देश के बड़े अखबारों (पाठकों की दृष्टि में) की सूची में नंबर 1,2,3 हैं. हिंदी, अंगरेजी, समेत सभी क्षेत्रीय भाषाओं में. इस तरह एक क्षेत्रीय अखबार प्रभात खबर, तीन राष्ट्रीय महारथियों और दिग्गजों से घिरा. यह वर्ष 2010 में हुआ. इस अर्थ में 2010 भी प्रभात खबर के लिए यादगार वर्ष है.

: प्राइसवार में पहल : हिंदी अखबारों में प्रतियोगिता के लिए मानक बन जानेवाले, अपनी आक्रामक मार्केटिंग से आतंक का पर्याय बन जानेवाले घरानों से भी 2010 में मुकाबला. प्रभात खबर के प्रतियोगी तीनों बड़े घराने स्टॉक मार्केट की लिस्टेड कंपनियों में हैं. कोई 5000 करोड़ का घराना है, तो कोई इससे भी अधिक का है. इन ताकतवर और धनी घरानों के मुकाबले प्रभात खबर को बाजार में उतरने का गौरव मिला, यह भी 2010 का बड़ा लैंडमार्क है, हमारे लिए. हमने प्रतियोगिता का हरसंभव चेहरा और सबसे बड़ी चुनौती देखी. प्राइस वार (अखबार की कीमत घटाना) में हम भी उतरे. सबसे पहले. यह स्पर्धियों को उम्मीद नहीं थी. सिर्फ़ झारखंड में आज प्रभात खबर की तीन लाख साठ हजार से अधिक प्रतियां रोज बिक रहीं हैं. अयोध्या निर्णय प्रसंग पर उस दिन सिर्फ़ झारखंड में पांच लाख से अधिक प्रतियां बिकीं.

: ओछी प्रतिस्पर्धा से अलग : अपने जन्म के 3-4 माह बाद देश के दूसरे नंबर के सबसे बड़े अखबार ने रांची में एक सर्वे टीम से सर्वे करा कर छापा और पाया कि प्रभात खबर कैसे झारखंड का सर्वाधिक प्रसारित अखबार है? हालांकि अपने पैसे से कराये गये इस सर्वेक्षण के पीछे भी राजनीति है. कुछ ही दिन बाद ऐसे अखबार किसी और मार्केटिंग सर्वे टीम को भारी पैसे देकर खुद घोषित करा लेंगे कि हम सबसे बड़े अखबार हो गये हैं. इन अखबारों की निल्र्लजता की पराकाष्ठा देखने को मिली, जब एक दिन रांची में अनेक होर्डिग लगा कर कहा, आभार  हम रांची के सर्वाधिक पढ़े जानेवाले अखबार हैं. बिना कोई आधार, सर्वे या प्रमाण के. अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना. फ़िर एक मार्केटिंग एजेंसी को पैसे देकर सर्वे कराया, दावा किया कि समाज के एक वर्ग (पैसेवालों) में हम नंबर एक हो गये हैं, पर झारखंड का सबसे बड़ा अखबार प्रभात खबर है. इस अखबार के शुरू के दावे (होर्डिग में आभार व्यक्त करने वाले) पर एडवरटाइजिंग काउंसिल ऑफ़ इंडिया में लोगों ने शिकायत की कि किस आधार पर यह अखबार नंबर एक होने की होर्डिग लगा रहा है, विज्ञापन छाप रहा है, तो एडवरटाइजिंग काउंसिल ने सख्त टिप्पणी की और भविष्य में ऐसे विज्ञापन देने से मना किया. पर सच, समता और समाज की सफ़ाई का ढोंग रचनेवाले अखबार खुद गोबल्स के सिद्धांत पर चलते हैं कि एक झूठ को सौ बार बोलो, ताकि सच लगे. प्रभात खबर शु  से ही इस ओछी प्रतिस्पर्धा से बाहर रहा है. हम पाठकों के विवेक और समाज में स्थापित मापदंडों पर चलते रहे हैं. चलेंगे. इसी वर्ष प्रभात खबर हिंदी के सबसे बड़े दस अखबारों (देश के) में आइआरएस के अनुसार आठवें स्थान पर पहुंचा.

: काम और दायित्व का विकेंद्रीकरण : वर्ष 2010 का सबसे महत्वपूर्ण बदलाव. सोची-समझी रणनीति के तहत. 2009 तक यह संस्था कुछेक लोगों (इंडिविजुअल) के नेतृत्व में चली. घर के माहौल में. वर्ष 2010 में पहली बार इसे इंस्टीट्यूशनल (संस्थागत) रूप देने की सायास कोशिश हुई. तब मैं, के.के. गोयनका और आर.के. दत्ता ड्राइविंग सीट पर थे. हमने महसूस किया कि बड़े सपने देखने के लिए बड़ी टीम होनी चाहिए. इस तरह संस्था को सही रूप देने के लिए इंस्टीट्यूशनल शक्ल देने के लिए काम और दायित्व का विकेंद्रीकरण जरूरी लगा. अगुआ मैं था. तय किया कि नयी शुरुआत ऊपर से हो. महीनों लगे, मुङो अपने वरिष्ठ साथियों को राजी करने और फ़िर कई महीने गुजरे प्रबंधन को सहमत कराने में, समझाने में. प्रभात खबर को नया इंस्टीट्यूशनल रूप देने के लिए शुरुआत हमने ऊपर से की. पहल कर मैं हटा. केके गोयनका एमडी बने. आरके दत्ता एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर. ये दोनों वे लोग हैं, जिन्होंने जीवन के सर्वश्रेष्ठ वर्ष चुपचाप प्रभात खबर को बनाने में दिये हैं. यह बदलाव यहीं नहीं रुका. पूरे झारखंड को संभालने के लिए दूसरी पंक्ति की एक निर्णायक टीम खड़ी की गयी, जो रोज-रोज के महत्वपूर्ण मसलों पर निर्णय ले. दीर्घकालीन रणनीति के तहत संपादकीय में हमने टॉप टीम के बीच स्पष्ट कार्य-विभाजन किया, ताकि कहीं किसी के कार्यक्षेत्र में अस्पष्टता न रहे. फ़िर हर प्रकाशन केंद्र में स्थानीय संपादकों ने अपनी-अपनी यूनिट का ऑरगेनाइजेशन चार्ट बनाया. ऊपर से नीचे तक एक-एक का काम साफ़-साफ़ बांट कर. पहले भी ऐसा था, पर इसको और स्पष्ट व साफ़ किया गया, ताकि काम का बंटवारा ऊपर से नीचे तक साफ़ रहे. कोई कन्फ्यूजन न रहे. इसके पीछे जवाबदेही तय करने का मकसद है. अन्य विभागों में भी काम का विभाजन, बंटवारा और पावर डेलिगेट करने की यह प्रक्रिया चल रही है. संभव है कि इसमें और स्पष्टता आने में थोड़ा समय लगे. पर प्रभात खबर के संपादकीय क्षेत्र में यह एक बड़े परिवर्तन की कोशिश है. समझ-बूझ कर की गयी पहल है. नया परिवर्तन है.

: संक्रमण का दौर : प्रभात खबर के लिए ट्रांजिशन (संक्रमण) का फ़ेज (दौर). अचानक छोटे से बड़ा बनना है. साथ ही इस इंडस्ट्री के सबसे बड़े और स्थापित तीन घरानों से एक ही साथ मुकाबला है. दो-दो मोरचों पर एक साथ जूझना. इस बड़ी लड़ाई के लिए बदलाव-परिवर्तन जरूरी था. यह हमने किया. 2010 के आरंभ में इसकी योजना हम वरिष्ठ साथियों के दिमाग में आयी. हमने इसकी पहल की, क्योंकि हम पुराने स्वरूप और पांच-छह संस्करणों के बल कैसे उन महारथियों से लड़ सकते थे?

: यह परिवर्तन क्या है? : सत्ता का विकेंद्रीकरण. पदों के अनुसार काम का साफ़-साफ़ बंटवारा, ताकि लगातार चौकस मानिटरिंग हो सके. कोई अपनी जवाबदेही से न बचे. वर्ष 2010 के पहले प्रभात खबर, अंगरेजी में कहें तो पर्सनालिटी बेस्ड ऑरगेनाइजेशन (व्यक्ति आधारित संस्था) था. इंडिविजुअल रन ऑरगेनाइजेशन. किसी एक व्यक्ति या दो या तीन लोगों पर आधारित संस्था का भविष्य उज्जवल नहीं होता. संस्थाएं हमेशा व्यक्तियों या व्यक्ति के समूहों से बड़ी होती हैं. टीम से ही लड़ाई जीती जाती है. इससे पहले तक प्रभात खबर में हर कामकाज या समारोह में, मंच पर, हम कुछेक चेहरे ही दिखते थे. कहें, तो जूता सिलाई से चंडी पाठ की भूमिका में कुछेक ही थे. संस्था के दीर्घजीवी होने के लिए यह मिथ तोड़ना जरूरी था. इसलिए प्रभात खबर द्वारा आयोजित बड़े समारोहों, आयोजनों में वर्ष 2010 से जाना मैंने कम किया या बंद किया. गोयनका जी से कहा, शीर्ष मार्केटिंग बैठक में भी नहीं रहूंगा. क्योंकि अगर हर बैठक और हर मोरचे पर मैं या हम कुछेक चेहरे ही रहेंगे, तो फ़िर नये नेतृत्व नहीं पैदा होंगे. नया नेतृत्व पैदा करने के लिए पहली शर्त है – अधिकार या पद देकर काम करने की आजादी देना. नये लोगों से गलतियां होंगी, पर वे गलतियां ही विकास की सीढ़ी बनेंगी. नये नेतृत्व विकसित करने का यही स्थापित फ़ार्मूला है दुनिया में. कामकाज के विकेंद्रीकरण या नये ढांचे को बनाने के ये काम अभी प्रभात खबर में बिहार और बंगाल संस्करणों में होने बाकी हैं.

: एक अलग और मौलिक पहल : संभव है, पावर डिसेंट्रलाइजेशन या शीर्ष पर नयी टीम खड़ा करने के इस प्रयास को लोगों ने अलग-अलग समझा हो. उनके समझने के अपने तर्क या कारण हो सकते हैं. बुनियादी तौर पर आज के समाज के मौजूदा मानस में यह भूख और लस्ट है कि हम पद पायें, तो छोड़ें ही नहीं. शरीर छूटे, पर पद नहीं. कुरसी पकड़ या जकड़ कर बैठ जायें. भौतिक चीजों के प्रति यह वासना, मोह आज हमारे समाज में चरम पर है. जहां यह मानस है, वहां लोग इस पहल और प्रयास के पीछे की सही भावना समङों, यह संभव नहीं. जहां चीजों को पकड़ कर बैठ जाने का मानस या मनोवृत्ति हो, वहां स्वत पहल कर अपना दायित्व अपने कनिष्ठ साथियों को सौंपना, एक अलग और मौलिक पहल है.

: हमने यह पहल क्यों की? : प्रभात खबर को इंस्टीट्यूशन का रूप देने के लिए जरूरी था कि हर क्षेत्र में और युवा साथी सामने आएं. नयी भूमिकाओं और महत्वपूर्ण पदों पर नये लोग आयें, ताकि टीम का आधार या फ़लक बड़ा और विस्तृत हो. हमारे अंदर यह कोशिश रही है कि यह संस्था दीर्घजीवी बने. वरना यहां बैठे वरिष्ठ साथी जानते हैं कि वर्ष 2006 में यह संस्था बिकने के क्रम में थी, तब मैनेजमेंट ने ईमानदार दायित्व के तहत कहा था कि जिन लोगों ने इस संस्था को गढ़ने में-बनाने में शुरू से कोशिश की है, उन्हें इसमें हिस्सा मिलेगा. इस तरह मुङो जो हिस्सा मिलता, वह आप कल्पना नहीं कर सकते. मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था. आज मैं लाखों पाता हूं. इतने ही पैसों की नौकरी कई जन्मों तक करता, तब भी उतने पैसे एकमुश्त नहीं मिलते. ये पैसे हमारे श्रम के जायज अर्निंग (कमाई) थे. कहीं कोई गलत कमाई नहीं. मुङो याद है एमजे अकबर ने अपने प्रयास से एशियन एज खड़ा किया, जिस दिन उस अखबार में डेकन क्रॉनिकल ने स्टेक (हिस्सा) लिया, तो उनका जवाब था कि यह मेरे लिए प्रसन्नता की घड़ी है. कारण यह उनके श्रम से, ईमानदारी से अर्जित आय थी. उसी तरह प्रभात खबर में हम वरिष्ठ साथियों को यह मौका था. पर हम सब ने प्रबंधन से अनुरोध किया कि नहीं, हम इसे चलाने की गंभीर कोशिश करना चाहते हैं. महज एक सुरक्षित जिंदगी नहीं चाहते. तब हमारे निजी जीवन के हित में था कि उक्त प्रस्ताव के तहत अपना हिस्सा लेकर हम निश्चिंत होकर बैंकों में यह राशि रख कर, सूद के बल सुखपूर्वक रहते. एक कमजोर मध्यवर्ग की पृष्ठभूमि से आये हम लोगों के लिए यह द्वंद्व का समय था. पर अंतत हमने चुना कि नहीं संस्था की लांगिविटी (दीर्घ जीवन) के लिए हम सामूहिक पहल करें. टीम साथ हो. समूह में नयी कोशिश हो. उसी लांगिविटी के कांसेप्ट (विचार) को आगे बढ़ाने के क्रम में, वर्ष 2010 में, यह दूसरी बड़ी पहल थी कि संस्था को ‘पर्सनालिटी बेस्ड ऑरगेनाइजेशन‘ से निकाल कर, उसे संस्थागत पहचान देना. टीम की पहचान. सामूहिकता की पहचान. जहां सारे काम करने वालों की पहचान मिल कर एकाकार हो जाये. इस मानस के पीछे दो लोगों की प्रेरणा रही है. गुजरे लोगों में डॉ लोहिया की. जीवित लोगों में इंफ़ोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति की.

: बढ़ रही है भोग व लालसा : मेरा एक बड़ा प्रिय निबंध है, ”निराशा के कर्तव्य”. डॉ. राममनोहर लोहिया द्वारा लिखित. ठीक 50 वर्ष पहले लिखा गया. अक्सर अपने लेखों या भाषणों में इसका उल्लेख भी करता हूं. यह प्रेरक निबंध है. इसके कुछ अंश तो अद्भुत हैं. हर भारतीय को इसे याद रखना चाहिए. जीवन के लिए संदेश से भरा. एक पंक्ति में कहूं, तो यह सीख देता है कि जीवन में निराशा रहे और काम करें. यह फ़लसफ़ा है. जीवन दर्शन है. वह एक जगह इस निबंध में कहते हैं कि भारत में आदमी अपनी चीज के लिए, स्वतंत्रता भी जिसका एक अंग है, अपनेपन, अपने अस्तित्व के लिए मारने-मिटने के लिए ज्यादा तैयार नहीं रहता. वह झुक जाता है और उसमें स्थिरता के लिए भी बड़ी इच्छा पैदा हो जाती है. चाहे जितना गरीब हो. शरीर चाहे सड़ रहा हो, लेकिन फ़िर भी जान के लिए कितना जबरदस्त प्रेम, आप अपने देश में पाओगे. कोई भी काम करते हुए हमारे लोग घबराते हैं कि जान चली जायेगी. चाहे जितने गरीब हैं हमलोग. लेकिन फ़िर भी एक-एक, दो-दो कौड़ी से मोह है. मुङो कुछ ऐसा लगता है कि आदमी जितना ज्यादा गरीब होता है, उसका पैसे के प्रति मोह उतना ही ज्यादा हो जाया करता है. एक विचित्र-सी अव्यवस्था हो गयी है कि शरीर खराब, जेब खराब, लेकिन फ़िर भी पैसे और जान के लिए इतनी जबरदस्त ममता और अनुराग हो गया है कि आदमी कोई भी जोखिम उठाने को तैयार नहीं रहता. आज देश में यही हाल है. डॉ. लोहिया के इस निबंध को पढ़ कर देश के मानस को समझने में मदद मिलती है. हम ऐसे क्यों है? भ्रष्टाचार के अनेक गंभीर मामलों के विस्फ़ोट के बाद हाल में एक विदेशी अखबार (वालस्ट्रीट.) में पढ़ा. एक विशेषज्ञ के अनुसार हमारे खून में ही दोष है. हम स्वाभिमान-आत्मसम्मान रहित ऐसे ही लोग हैं. आजादी के 60 वषों के बाद यह भोग व लालसा और बढ़ गयी है. बढ़ता लोभ-बाजारवाद और उपभोक्तावाद इस आग में घी का काम कर रहे हैं. आज पद पा जाने के बाद, कोई छोड़ना नहीं चाहता. सत्ता से लेकर हर जगह कोई स्वत पहल कर, अपने साथियों-सहकर्मियों के लिए जगह नहीं बनाता. रोज ही हम-आप देख रहे हैं कि राजनीतिज्ञों के पांव कब्र में हैं, पर सत्ता से चिपके हैं. लोग कुरसी से बांह पकड़ कर उठाते-बैठाते हैं, शरीर-इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रहा, पर हमारा-आपका भाग्य तय कर रहे हैं. सार्वजनिक पदों पर बैठ कर देश की किस्मत लिख रहे हैं. पर राजनीतिज्ञ ही क्यों? रिटायर्ड ब्यूरोक्रेटों के भी यही हाल हैं. डॉक्टर, प्रोफ़ेसर रोज ही रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने के लिए हड़ताल करते रहते हैं. कहीं 60 से 62, तो कहीं 62 से 65 की उम्र में रिटायरमेंट चाहते हैं. यह वासना है. वासना की यह आग कभी तृप्त होती नहीं दिखती. क्या यही जीवन है? यही हमारा सार्वजनिक-निजी एप्रोच होना चाहिए? क्या जीवन में एक वीतराग बोध या भाव नहीं होना चाहिए? अनासक्ति का अंश? हमारे यहां यह भी दर्शन चलता है कि आसपास किसी को पनपने न दो, ताकि अपनी गद्दी सुरक्षित रहे. कितना छोटापन या संकीर्ण सोच! क्या इस रास्ते कोई संस्था, समाज या मुल्क दीर्घजीवी या मजबूत होंगे? हम समाज की दृष्टि से बहुत छोटी इकाई हैं. नगण्य. अस्तित्वविहीन. कोई भ्रम नहीं है कि मेरा निजी वजूद क्या है? इस सृष्टि-ब्रह्मांड में तिनका से भी कमजोर. पर मेरे सोच-विचार और जीवन दर्शन में यह बात रही है कि अपने स्तर पर हम जैसा सोचते हैं, बनने की कोशिश करें. संभव सीमा तक. अपनी हजारों-लाखों कमियों के साथ. यह कहने-बताने में कोई अहंकार या प्रगल्भता नहीं है. यह बू आये, तो माफ़ करेंगे.

: मानसिक शांति सबसे जरूरी : रांची में योगदा मठ है. ‘ऑटोबायोग्राफ़ी आफ़ योगी‘ के लेखक और 20वीं सदी के महान योगी परमहंस योगानंद द्वारा स्थापित. वहां मेरा जाना होता है. वर्ष में एक बार वे शरद संगम का आयोजन करते हैं. भारत के कोने-कोने से और लगभग 40 देशों के साधक आते हैं. एक से एक लोग. वैज्ञानिक, विद्वान, फ़िल्म से जुड़े, साहित्य से जुड़े. श्रेष्ठ मस्तिष्क के लोग. वर्ष 1996 (नवंबर) में मैं पहली बार इसमें शरीक हुआ. यहां वैज्ञानिक सीवी रमण के परिवार से आये एक साधक हैं. पहुंचे हुए. उनके विचार (टॉक) सुन रहा था. वह जीवन की सफ़लता पर बोल रहे थे. कहा – सीवी रमण की आत्मकथा पढ़ें. रिटायर होने के बाद वह अशांत और परेशान रहने लगे. वैज्ञानिक मान्यताओं पर उनके मन में बुनियादी सवाल उठने लगे. जीवन के मौलिक सवाल बेचैन करने लगे. घर के आगे बोर्ड लगवा दिया ‘ विजिटर्स टू कीप ऑफ़ नाट टू डिस्टर्ब‘ (अतिथि आकर परेशान न करें). वह कहने लगे ‘माई लाइफ़ हैज बीन ए अटर फ़ेलियर (मेरा जीवन नितांत विफ़ल रहा है). यह भी माना कि मैंने जो काम किया, वह पश्चिमी वैज्ञानिक मान्यताओं के तहत था. हमारे देश के विज्ञान-परंपराओं के तहत मैं कुछ नहीं कर सका. फ़िर उन्होंने नोबेल पुरस्कार पाये वैज्ञानिक चंद्रशेखर के जीवन के प्रसंग सुनाये. चंद्रशेखर जब शीर्ष पर थे, तो पूछा गया-क्या आपका निजी जीवन सुखी है? उनका उत्तर था, किसी वैज्ञानिक का निजी जीवन नहीं होता. अब प्राय: मैं सोचता-परखता हूं कि जो किया, वह कितना उपयोगी था? जीवन के अंतिम पहर में उन्होंने अपने एक और इंटरव्यू में कहा कि जीवन पुन मिला, तो वह हिमालय में जा बैठेंगे. ऋषियों की राह पर चलेंगे. यह भी उन्होंने माना कि सब कुछ पा लेने के बाद भी ‘पीस आफ़ माइंड‘ (मानसिक शांति) नहीं है. एक और वैज्ञानिक (शायद लार्ड कैल्विन) का उन्होंने (साधक संत) उल्लेख किया. वह 55 वर्ष तक वैज्ञानिक रहे. महान वैज्ञानिकों में से एक. एक शब्द में उन्होंने अपने लंबे वैज्ञानिक जीवन का निचोड़ सुनाया ‘फ़ेलियर‘ (विफ़ल).

: जीवन में नवीनता जरूरी है : योगदा के उन साधक संत ने कहा – यह सब मैं क्यों सुना या कह रहा हूं, क्योंकि जीवन में संतुलन होना चाहिए. मैं अत्यंत मामूली इनसान हूं. मुङो अपने बारे में भ्रम नहीं है. मैं देश की 111 करोड़ की भीड़ का एक हिस्सा भर हूं. हम सबका परिचय इतना, इतिहास यहीं उमड़ी कल थी, मिट आज चली की तरह है. मैं ऐसा इसलिए हूं कि ऐसे ही तथ्यों से मुङो जीवन के बारे में निखरने-जानने की प्रेरणा मिलती रही है. समझ विकसित होती नहीं है. इस दृष्टि से ही एक निस्संगता का भाव पैदा होता रहा है. इसलिए जीवन के बड़े निर्णय करते समय ऐसे शाश्वत सच मेरे मन-मस्तिष्क में रहते हैं. यह बोध और भाव नहीं रहता, तो दो बड़े घरानों (टाइम्स ऑफ़ इंडिया और आनंद बाजार पत्रिका), महानगरों की पत्रकारिता, ग्लैमर-सत्ता के सोहबत की पत्रकारिता छोड़ कर यहां आना नहीं होता. धर्मयुग, रविवार जैसी पत्रिकाओं में काम, हिंदी पत्रकारों के बीच से अकेले पीएमओ में रह लेने और उसके बाद लगातार बड़े ऑफ़रों को छोड़ कर मुसीबतों-संघर्षो का जीवन नहीं चुनता. पर एक ही रोल (भूमिका) में रहने से-अटकने से क्या जीवन में नवीनता रहेगी?

: अनैतिक है प्रतिभाओं को बढ़ने से रोकना : डॉ. लोहिया के इस निबंध-विचार ने युवा दिनों से ही प्रेरित किया कि चीजों से चिपकना या लगातार बंध कर दूसरों को आगे आने की जगह न देना, नीचे के नेतृत्व को या साथ की प्रतिभाओं को फ़लने-फ़ूलने या बढ़ने का मौका नहीं देना अनैतिक है. लगभग 22 वर्ष ड्राइविंग सीट पर रहना, सबसे कठिन दिनों में रहना, क्या यह कम है? क्या पद पुश्तैनी होने चाहिए? राजनीति में बढ़ते वंशवाद की तरह. लाभ और लस्ट (लालसा) के इस दौर में हमें भी वैसा ही होना चाहिए, जैसा दूसरे हैं? पांव कब्र में, पर पद किसी कीमत पर चाहिए. हिंदी के कवि श्रीकांत वर्मा ने काशी में अपने एक रिश्तेदार का संस्मरण लिखा है. अत्यंत शिक्षाप्रद. उनके एक रिश्तेदार मृत्युशय्या पर थे. बोल नहीं पाते थे. रसगुल्ले के शौकीन थे. जब दिल्ली से श्रीकांतजी काशी आये. यह मिठाई लेकर गये, आवाज दी, तो गले से घरघराने की आवाज आने लगी. लगातार कौमा में थे. सुन्न पड़े थे. पर मनपसंद मिठाई का नाम सुन कर भाव उभरा. इंद्रियां हिली-डुलीं. संसार से इतना बंधना भी क्या सही है?

: बिहार में नयी पहल : वर्ष 2010 में ही हमने प्रभात खबर का विस्तार भी देखा. मुजफ्फ़रपुर गये, पटना में नयी कोशिश शुरू हुई. आज बिहार में एक लाख पचास हजार के आसपास हम बिक रहे हैं. रोजाना. भागलपुर जल्द ही शुरू  होना है. (भागलपुर संस्करण की शुरुआत हो चुकी है) कोलकाता में नयी शुरुआत होनी है. दिल्ली कार्यालय को हमने नया रूप दिया है. अनुभवी लोगों की टीम बनी है. स्पर्धियों को पछाड़ कर एफ़एम रेडियो ने रांची और जमशेदपुर में नयी पहचान बनायी है. प्रभात खबर इंस्टीट्यूट ऑफ़ मीडिया स्टडीज (पीकेआइएमएस) को नये ढंग से बढ़ाने की शुरुआत हुई. इसी वर्ष पर्सनल डिपार्टमेंट को अलग पहचान मिली. इवेंट्स विभाग की सक्रियता बढ़ी. इस तरह वर्ष 2010 में लैंडमार्क की तरह प्रभात खबर में अनेक महत्वपूर्ण पड़ाव दिखे.

”सपने, संघर्ष और चुनौतियां” शीर्षक से हरिवंश द्वारा लिखा यह लेख धारावाहिक रूप में प्रभात खबर में प्रकाशित हो रहा है. हरिवंश समकालीन भारतीय मीडिया के बड़े नाम हैं. ईमानदार व जनपक्षधर पत्रकारिता के प्रतीक हैं. समय-समय पर वे अपने दिल, दिमाग और व्यवहार के मंथन-अनुभवों को पूरी साफगोई के साथ बोल-लिख कर बयान करते रहते हैं.

हरेराम प्रभात खबर एवं मुकेश कशिश न्‍यूज से जुड़े

दैनिक भास्‍कर, जयपुर से हरेराम ठाकुर ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सीनियर सब एडिटर थे. इन्‍होंने अपनी नई पारी प्रभात खबर, भागलपुर के साथ शुरू की है. इनके ऊपर खबरों के संपादन का जिम्‍मा रहेगा. इन्‍हें चीफ सब एडिटर बनाया गया है. हरेराम ने अपने करियर की शुरुआत दैनिक पूर्वोदय गोहाटी से शुरू की थी. इसके बाद श्रीगंगानगर में भास्‍कर के जुड़ गए. अमर उजाला, चंडीगढ़ को भी अपनी सेवाएं दीं. वहां से इस्‍तीफा देने के बाद भास्‍कर के साथ जुड़ गए थे.

मुकेश कुमार ने अपनी नई पारी कशिश न्‍यूज, रांची के साथ की है. इन्‍हें कॉपी राइटर बनाया गया है. मुकेश ने अपने करियर की शुरुआत मुजफ्फरपुर से एक स्‍थानीय न्‍यूज पेपर के साथ की थी. हिन्‍दुस्‍तान को भी अपनी सेवाएं दीं. इंदौर में एक सांध्‍य दैनिक में भी काम किया. इंदौर से प्रकाशित पत्रिका धर्मयुद्ध के बिहार ब्‍यूरो प्रमुख रहे. इसके अलावा भी कई एजेंसिंयों एवं पत्रपत्रिकाओं को अपनी सेवाएं दीं.

विजय ने पीपुल्‍स समाचार, सत्‍यप्रकाश ने प्रभात खबर ज्‍वाइन किया

राज एक्‍सप्रेस, इंदौर से विजय श्रीवास्‍तव ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर एजीएम मार्केटिंग थे. उन्‍होंने अपनी नई पारी पीपुल्‍स समाचार, इंदौर के साथ की है. उन्‍होंने सेम पोस्‍ट पर ज्‍वाइन किया है. उनके जिम्‍मे इंदौर सिटी की मार्केटिंग की जिम्‍मेदारी रहेगी. वे इसके पहले भी कई अखबारों में काम कर चुके हैं.

दैनिक भास्‍कर, रांची से सत्‍यप्रकाश ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे डिप्‍टी न्‍यूज एडिटर के पोस्‍ट पर कार्यरत थे. इन्‍होंने अपनी नई पारी प्रभात खबर, रांची के साथ शुरू की है. इन्‍हें समाचार संपादक बनाया गया है. सत्‍यप्रकाश ने अपने करियर की शुरुआत हिन्‍दुस्‍तान से की थी.

प्रभात खबर ज्‍वाइन करेंगे बृजेंद्र दुबे

हिन्‍दुस्‍तान, रांची से न्‍यूज एडिटर बृजेंद दुबे अपनी नई पारी प्रभात खबर के साथ शुरू करने वाले हैं. वे रांची में ही प्रभात खबर में सीनियर न्‍यूज एडिटर के पोस्‍ट पर ज्‍वाइन करने वाले हैं. उन्‍होंने हिन्‍दुस्‍तान प्रबंधन को इस्‍तीफे का नोटिस दे दिया है.

मूल रूप से उत्‍तर प्रदेश के फैजाबाद के रहने वाले बृजेंद्र ने अपने करियर की शुरुआत दैनिक जागरण, लखनऊ के साथ की थी. उसके बाद अमर उजाला पहुंचे. फिर हिन्‍दुस्‍तान, रांची चले आए थे.

रांची में ‘गुलाम अली के साथ एक शाम’ बनी शानदार

: प्रभात खबर का आयोजन : संगीत से आत्मा का संबंध जोड़ने वालों की यह महफिल थी. संगीत सुनने के साथ-साथ इसे समझने की समझ रखने वालों की भी. रांची जिमखाना क्‍लब में करीब सात हजार ऐसे ही सयाने लोगों के बीच दुनिया के मशहूर गजल गायक गुलाम अली ने अपने फन का जलवा दिखाया. कंप्‍यूटर कंट्रोल्‍ड 12 हजार वाट साउंड सिस्टम के साथ श्रोताओं ने तीन घंटे पूरे मन से उन्हें सुना.

सरहद पार से आये गुलाम साहब ने कार्यक्रम का आगाज रुखसार पर तिल का मतलब समझाने से किया…. अब मैं समझा तेरे रुखसार पर तिल का मतलब, दौलत-ए-हुस्न पर दरबान बैठा रखा है….इस शेर के बाद उन्होंने पहली गजल सुनायी- मैं नजर से पी रहा हूं… इसके बाद फिल्म निकाह की गजल- चुपके-चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है…. से पहले उन्होंने सुनाया लगता है कई रात तक जागा था मुस्सवीर, तस्‍वीर की आंखों में थकन झांक रही थी… दूसरा शेर था- दिल गया था तो कोई ये आंखें भी ले जाता, मैं फकत एक ही तसवीर वहां तक देखूं….दिल में एक लहर सी उठी है अभी, कोई ताजा हवा चली है अभी… इसके बाद बारी थी मशहूर गजल- हम तेरे शहर में आये हैं मुसाफिर की तरह… के साथ यह मुसाफिर तालियां बटोरता रहा. एक दादरा बरसन लागी सावन पिया आ जा…तेरे बिन लागे ना जियरा…..के बाद कार्यक्रम के अंत में उन्होंने 1981 में दूरदर्शन पर पेश उनकी गजल- हंगामा है क्‍यों बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है…. सुनायी.

इससे पहले मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने गुलाम साहब का खैर मकदम किया, उन्हें स्मृति चिन्‍ह प्रदान किये. कार्यक्रम के सह प्रायोजकों रिलायंस ग्रुप, अभिजीत ग्रुप, टॉरियन वर्ल्‍ड स्कूल, वेद-ए-कैफे, इलेक्‍ट्रो स्टील, कशिश चैनल व संजीवनी बिल्डकॉन को भी श्री मुंडा ने मोमेंटो दिये. प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश ने उपस्थित श्रोताओं का स्वागत किया व उम्मीद जतायी कि यह आयोजन हिंदी क्षेत्र में सांस्कृतिक चेतना पैदा करेगा. कार्यक्रम का संचालन कर रही थीं मीनाक्षी शर्मा. मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के अलावा संगीत की इस शाम में विधानसभा अध्यक्ष सीपी सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, राज्यसभा सांसद परिमल नाथवाणी, मुख्यमंत्री के सलाहकार डीएन गौतम, मुख्य सचिव एके सिंह, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव डीके तिवारी, राज्यपाल के प्रधान सचिव सुधीर त्रिपाठी व कई आईएएस, आईपीएस, आईएफएस व स्कूलों के प्राचार्य उपस्थित थे.

प्रभात खबर, भागलपुर से जुड़े एनपी सिंह और विक्रांत

दैनिक जागरण, सिलीगुड़ी से इस्‍तीफा देने वाले विज्ञापन मैनेजर एनपी सिंह ने अपनी नई पारी शुरू कर दी है. उन्‍होंने विज्ञापन मैनेजर के पोस्‍ट पर प्रभात खबर, भागलपुर ज्‍वाइन कर लिया है. मूल रूप से भागलपुर के रहने वाले एनपी सिंह 2001 में अपने करियर की शुरुआत दैनिक जागरण के साथ की थी. इसके बाद से वे लगातार दैनिक जागरण के साथ उसके कई यूनिटों में काम किया. कुछ समय पूर्व उनका तबादला सिलीगुड़ी किया गया था.

दैनिक जागरण, सिलीगुड़ी के जनरल डेस्‍क से इस्‍तीफा देने वाले विक्रांत घोष भी प्रभात खबर, भागलपुर से जुड़ गए हैं. उन्‍हें सब एडिटर बनाया गया है. विक्रांत भागलपुर के ही रहने वाले हैं. इन्‍होंने अपने करियर की शुरुआत हिन्‍दुस्‍तान, भागलपुर के साथ शुरू की थी. इसके बाद दैनिक जागरण के साथ जुड़ गए थे.

प्रभात खबर की तरफ से ‘गुलाम अली के साथ एक शाम’

: रांची, जमशेदपुर और पटना में होगा आयोजन : प्रभात खबर के द्वारा गुलाम अली के साथ एक शाम कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है. कार्यक्रम का आयोजन रांची, जमशेदपुर तथा पटना में किया जाएगा. गणतंत्र दिवस के अवसर पर शाम-ए-गजल श्रृंखला का आयोजन भारत-पाक के बीच शांति, उन्‍नति तथा समृद्धि को ध्‍यान में रखकर किया गया है. पटियाला घराने के सुप्रसिद्ध पाकिस्‍तानी गजल गायक गुलाम अली को दोनों देशों के बीच मैत्री का स्पिरिट माना जाता है. गुलाम अली यहां न केवर अपने मधुर गजलों के साथ आ रहे हैं, बल्कि अपने साथ पाकिस्‍तान से प्रख्‍यात संगीतकारों का एक समूह भी ला रहे हैं.

पांच दिनों के इस आयोजन का पहला चरण रांची में होगा. 26 जनवरी, 2011 को कार्यक्रम का आयोजन स्‍थानीय जिमखाना क्‍लब में किया जा रहा है. जिसमें लगभग 5000 लोग गुलाम अली के गजलों का लुत्‍फ उठायेंगे. इसके बाद 27 जनवरी, 2011 को शाम-ए-गजल कार्यक्रम का आयोजन इस्‍पात नगरी जमशेदपुर के सिद्धगोड़ा टाउनहाल में होगा. यहां लगभग 2000 लोग कार्यक्रम का आनंद लेंगे. तीसरे चरण का आयोजन पटना के श्रीकृष्‍ण मेमोरियल हॉल में किया जाएगा. यहां भी लगभग 2000 श्रोता गजल का आनंद उठायेंगे. इस आयोजन में अनेकों कॉरपोरेट प्रायोजक प्रभात खबर का सहयोग कर रहे हैं.

झारखंड, बिहार तथा पश्चिम बंगाल में प्रभात खबर अपने 9 संस्‍करणों के साथ देश का आठवां सबसे ज्‍यादा पढ़ा जाने वाला अखबार है(आईआरए – 2010- क्‍यू3 टीआर के अनुसार). अखबार का 10वां संस्‍करण फरवरी में भागलपुर से प्रारम्‍भ होने जा रहा है. प्रभात खबर समूह का एफएम रेडियो (104.8 रेडिया धूम) है,  जिसका प्रसारण रांची तथा जमशेदपुर से होता है. इसके इवेंट तथा आउटडोर डिविजन प्रभात बज के द्वारा विविध प्रकार के गतिविधियों का आयोजन किया जाता है.

प्रभात खबर अपने पाठकों के लिए पिछले कई वर्षों से बहुत ही प्रभावशाली रोड शो का आयोजन सफलतापूर्वक करता आ रहा है. इनमें घरौंदा (हाउसिंग इंडस्‍ट्री फेयर), करियर फेयर, प्रतिभा सम्‍मान, झंकार (डांस प्रतियोगिता), श्रेष्‍ठ दुर्गा पूजा (श्रेष्‍ठ दुर्गा पूजा पंडाल को सम्‍मानित करना) तथा कंज्‍यूमर फेस्‍ट जैसे अनेकों आयोजन सम्मिलित हैं. इसके अलावा अखबार के द्वारा साप्‍ताहिक रोड शो कार्यक्रम मोहल्‍ला इवेंट का भी आयोजन प्रत्‍येक सप्‍ताह किया जाता है, जिसमें मोहल्‍ला तथा कॉलोनी के लोग बढ़ चढ कर भाग लेते हैं. प्रेस विज्ञप्ति

खून देकर सम्‍मानित हुआ प्रभात खबर

प्रभात खबरराष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर रेडक्रास सोसाइटी व झारखंड एड्स कंट्रोल सोसाइटी ने एक कैंप लगाकर संथाल परगना में सबसे अधिक 55 यूनिट रक्तदान के लिए प्रभात खबर, देवघर को सम्मानित किया. रेडक्रास के चेयरमैन सह उपायुक्त, देवघर मस्तराम मीणा ने एक शील्ड व प्रशस्ति पत्र यूनिट हेड पंकज कुमार व पूरी टीम को दिया.

रक्तदान का आयोजन अध्योध्या फैसला आने से ठीक एक दिन पहले 29 सितंबर 2010 को किया गया था. इस रक्तदान शिविर की खासियत यह थी कि वर्क स्टेशन पर पत्रकार साथियों ने रक्तदान किया था. इस शिविर में झारखंड विकास मोरचा के नेता व विधायक प्रदीप यादव ने भी रक्तदान किया था.

प्रभात खबर ने शुरू किया पानी बचाओ अभियान

पानीप्रभात खबर ने पानी बचाओ अभियान शुरू किया है. जनसरोकार की पत्रकारिता करने के लिए पहचाने जाने वाला यह अखबार लोगों को पानी बचाने के लिए प्रोत्‍साहित कर रहा है. अखबार लोगों से पानी बचाने के सुझाव और टिप्‍पणी भेजने की अपील भी कर रहा है. इसके परिणाम भी मिल रहे हैं अनेक प्रकार के सुझाव लोगों द्वारा दिए जा रहे हैं.

अखबार ने अपने वेबसाइट पर एक फार्म बना रखा है. जिसके माध्‍यम से कोई भी अपना ई मेल, नाम, पता, नम्‍बर और फोटो के साथ अपना सुझाव भेज सकता है. अखबार इन टि‍प्‍पणियों को अपने संस्‍करणों में भी प्रकाशित कर रहा है. अखबार सुझावों के साथ ऐसी तस्‍वीरों को भी उपलब्‍ध कराने की अपील की है जो लोगों के दिल को छू जाए. जो पानी की कीमत न समझने वालों को सीख दे सके. पानी बचाने की इस मुहिम में कोई अपना सुझाव दे सकता है. गौरतलब है कि कम बरसात, सूखते जल स्रोत एवं ग्‍लोबल वार्मिंग के चलते कई क्षेत्रों में पानी की लगातार कमी होती जा रही है. पानी का जलस्‍तर भी लगातार नीचे जा रहा है.

पत्रकार जब भी जागें, प्राणायाम जरूर करें : रामदेव

संथाल परगना के अपने चार दिवसीय दौरे के आखिरी दिन बाबा रामदेव देवघर से प्रकाशित होने वाले प्रभात खबर के दफ्तर पहुंचे. प्रभात खबर के स्थानीय संपादक संजय मिश्र ने उनका स्वागत किया. इसके बाद योग व स्वाभिमान यात्रा से जुड़े सवालों का जवाब देते हुए बाबा रामदेव ने कहा कि प्रभात खबर ने युवा पत्रकारों की टीम बनायी है.

रामदेवयुवा पत्रकारों के कारण ही प्रभात खबर मात्र अखबार नहीं आंदोलन का नाम है. देर रात तक जागने और सुबह देर तक सोने वाले पत्रकार आखिर कैसे स्वस्थ रहें, इस सवाल के जवाब में बाबा ने कहा कि जब जागें तभी सवेरा. पत्रकार सुबह जब भी जागते हों, उन्हे नित्य क्रिया से निवृत होने के बाद प्रणायाम करना चाहिये. अच्छी पत्रकारिता कैसे हो सकती है? इसके जवाब में बाबा ने बताया कि आत्मा की सुनो. समाज व देश के कल्याण के लिए लिखने से कभी नहीं हिचकों. इससे पहले बाबा दैनिक प्रभात खबर के प्रिटिंग प्लांट गये व अखबार छपाई की बारीकियों से अवगत हुये.

जागरण, धनबाद से जुड़े प्राणेश, अनिल और गुंजन

प्रभात खबर, पटना को तीन लोगों ने अलविदा कह दिया है. जबकि तीन और लोगों के शीघ्र ही अखबार छोड़ने की बात कही जा रही है. इस्‍तीफा देने वालों में प्राणेश कुमार, अनिल कुमार एवं गुंजन गांगुली शामिल हैं. इन तीनों ने अपनी नई पारी दैनिक जागरण, धनबाद के साथ शुरू कर दी है.

प्राणेश ने अपने करियर की शुरुआत आज, मुजफ्फरपुर के साथ की थी. उसके बाद प्रभात खबर, रांची के साथ जुड़ गए. बाद में पटना यूनिट में उनका ट्रांसफर कर दिया गया था. अनिल कुमार मूल रूप से बांका के रहने वाले हैं. उन्‍होंने अपने करियर की शुरुआत हिन्‍दुस्‍तान, पटना के साथ की थी. इसके बाद वे आज से जुड़े. गुंजन गांगुली ने अपने करियर की शुरुआत प्रभात खबर पटना के साथ ही की थी.

बताया जा रहा है कि कार्यालय में अंदरूनी राजनीति ने काम करने वालों को परेशान कर रखा है. जिसके चलते एक के बाद एक लोग प्रभात खबर का दामन छोड़ते जा रहे हैं. इन लोगों का आरोप है कि संपादक का रवैया पत्रकारों के प्रति ठीक नहीं रहता है. जिससे लोग एक के बाद एक संस्‍थान को छोड़ते जा रहे हैं.

‘ग्रेट स्टोरीज आफ चेंज’ में प्रभात खबर और हरिवंश पर एक अध्याय

”ग्रेट स्टोरीज आफ चेंज, इन्नोवेटिव इंडियन्स” नामक एक किताब आई है. इसका संपादन रीता और उमेश आनंद ने किया है. इस किताब में एक अध्याय हरिवंश और प्रभात खबर पर है. इस आलेख को नीचे प्रकाशित कर रहे हैं. अगर किसी को पढ़ने में दिक्कत आ रही हो तो संबंधित पेज पर क्लिक करने पर वह पेज बड़े साइज में अलग से खुल जाएगा जिससे पढ़ने में आसानी होगी.

Ranchi’s media war : Prabhat Khabar proves content, credibility are good business

Ranchi : A new confidence suffuses the offices of Prabhat Khabar in Ranchi. Circulation has crossed half a million daily. Advertisement revenues have surged. Its eighth edition, in colour, has rolled out. The newspaper has never known such success though it has been number one in Jharkhand for quite a while. What makes these gains even sweeter is that barely two years ago Prabhat Khabar feared being crushed by big Hindi newspapers out to capture the Jharkhand market. At stake currently is an estimated Rs 100 crore in advertising rising 20 per cent each year.

Now, not only has competition been stopped in its tracks, but Prabhat Khabar has also made serious forays into the larger surrounding market of Bihar and strengthened its presence in West Bengal. A homegrown team of journalists and managers have shown uncommon savvy. They have been nurturing Prabhat Khabar since 1989 and have strong local reputations. But getting the better of three powerful national dailies – Hindustan, Dainik Jagran and most recently Dainik Bhaskar – puts them in a super league.

The interest in Jharkhand is defined by Ranchi. It has gone from being a small town to the bustling capital city of the new mineral-rich state of Jharkhand which was carved out of Bihar nine years ago. Shopping malls, global brands, young people in jeans thronging coffee shops, the opening of educational institutions are intimations of a valuable market in the making. This is especially so when Jharkhand is coupled with Bihar which has been experiencing a newfound prosperity under Chief Minister Nitish Kumar.

But there is more to Jharkhand than Ranchi. The state has lots of catching up to do. In its rural areas and forests, people are extremely poor. There is no administration, no justice system to speak of. Jharkhand is one of the states in India hit by rampant Naxalism. The middle class in Ranchi enjoy their prosperity, but they also crave for better infrastructure, less corruption and greater accountability in the political class. Prabhat Khabar’s success has been in being able to bridge these two worlds which have similar core needs, but different aspirations and priorities….

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अतीत की दूरी और प्रभात खबर, मुजफ्फरपुर

हरिवंश 09.10.2010 से प्रभात खबर मुजफ्फरपुर से छप रहा है. चर्चिल ने विश्वयुद्ध के समय कहा था. अतीत को जितनी दूर तक पीछे देख सकते हों, देखें. इससे भविष्य के लिए संदेश मिलता है. रास्ता भी. आज मुजफ्फरपुर प्रभात खबर कार्यालय में अपने साथियों के साथ बातचीत में यह प्रसंग याद आया. बाबा आमटे भी याद आये.1985 के आसपास उनके आश्रम गया था. रविवार पत्रिका में रिपोर्ट करने के लिए. बाबा से पूछा, आनंद वन (कुष्ठ रोगियों के लिए आश्रम) कैसे बना? बाबा और ताई (उनकी पत्नी) ने बताया. एक लंगड़ी गाय, वह भी बिसूखी (जो दूध नहीं देती) हुई. जमा पूंजी छह आने नकद पैसे. दो-चार कुष्ठ रोगी. कुल यही मानव संपदा, पशु संपदा व पूंजी संपदा से हमारी शुरुआत हुई. चंद्रपुर (नागपुर के पास) की निर्जीव पहाड़ियों व बंजर जमीन में आनंद वन बना, इसी संपदा व ताकत के बल पर.

अक्‍टूबर, 1989 में प्रभात खबर के पुनर्जीवन के प्रयास में जब हम साथी लगे, तो बाबा की कही बात याद आयी. हम और हमारी टीम को सतत प्रेरित करनेवाली बात. प्रसंग. आज मुजफ्फरपुर से संस्करण शुरुआत के दिन चर्चिल का कथन भी याद आया. प्रभात खबर के पुराने प्रयास व काम भी. हालांकि, इस अखबार की शुरुआत 1984 में तत्कालीन बिहार के रांची से हुई, पर 1989 आते-आते यह लड़खड़ाने लगा. बमुश्किल 400 प्रतियां बिकती थीं.

तब दिग्गज व स्थापित अखबार सामने थे. रांची में रांची एक्सप्रेस का साम्राज्य था. जमशेदपुर में उदित वाणी का बोलबाला था. धनबाद की आवाज था, वहां से छपनेवाला आवाज. इसके अलावा भी कई छोटे-मोटे अखबार थे. आज रांची, जमशेदपुर व धनबाद तीनों जगहों से छपता था. खूब बिकता था. वे दिन अयोध्या उन्माद के दिन थे. पटना से कई अखबार तत्कालीन दक्षिण बिहार पहुंच कर शीर्ष पर थे.

इन कठिन चुनौतियों के बीच प्रभात खबर को पुनर्जीवित करने की कोशिश हुई, एक प्रतिबद्ध टीम से. संपादकीय, गैर संपादकीय हर विभाग में यह टीम थी. कोलकाता, दिल्ली व अन्य जगहों से बड़े संस्थान छोड़ कर कुछ साथी आये. पत्रकारिता में एक नये प्रयोग के लिए. यह आजमाने के लिए कि क्या पत्रकारिता समाज पर असर डाल सकती है? तब इस टीम के पास सिर्फ सपने थे. साधन नहीं, पूंजी नहीं, बैठने की पर्याप्त जगह नहीं, छपाई की दृष्टि से आउटडेटेड या स्क्रैप हो चुकी आठ पेज छापनेवाली बंधु मशीन.

मैन पावर जरत से कई गुणा ज्यादा. दूसरे अखबारों से कटिंग-पेस्टिंग कर, यह अखबार अगले दिन की रोशनी देखता था. न कोई सप्लीमेंट, न विशेष सामग्री. यह वही दौर था, जब देश करवट ले रहा था. दो मोरचों पर. एक ओर अयोध्या की आग का ताप फैल रहा था. दूसरी ओर, आजादी के बाद की अर्थनीतियों ने देश को कंगाल बना दिया था, लगभग दिवालिया. उन्हीं दिनों दुनिया नये कगार पर थी. टेक्नोलॉजिकल रिवोल्यूशन के. जिसके गर्भ से ग्लोबलाइजेशन, उदारीकरण, सूचना क्रांति व नॉलेज एरा का उदय हुआ. मोबाइल क्रांति दूर देशों में आहट दे रही थी. टीवी चैनलों की आवाजें दस्तक देने लगी थीं, पर फुलफॉर्म में नहीं. पूंजी निर्णायक भूमिका में थी. विचार और वाद ढलान पर थे.

उन्हीं दिनों पत्रकारिता के साथी कहते कि पत्रकारिता का मर्म तो महानगरों में है. सत्ता के पास रहने में है. इस विद्या के ग्लैमर से खुद को जोड़ने में है. तब शुरुआत हुई थी, पत्रकारिता को मंच बना कर राज्यसभा या सत्ता गलियारे में पहुंचने की या इस माध्यम को लॉबिंग में इस्तेमाल करने की.

महानगरों की तुलना में जंगल

तभी प्रबंधन से लेकर संपादकीय में कुछ साथियों ने जंगल (तब महानगरों की तुलना में रांची जंगल ही कहा जाता था) से धारा के खिलाफ प्रभात खबर में प्राण डालने व नयी जान फूंकने का विकल्प चुना. आज भी उनमें से कई साथी साथ हैं, हर विभाग में, हर बड़े प्रस्ताव या प्रलोभन के बावजूद. कुछ अन्यत्र हैं. अच्छी जगहों पर. इन सबके सामूहिक प्रयास ने यह नयी कोशिश की. तब जाने-माने पत्रकार पूछते या व्यंग्य करते कि अखबारों की सूची में सबसे नीचे के पायदान पर जड़ जमा चुका प्रभात खबर कहां ठौर पायेगा? अखबारी दुनिया के एक जाने-माने प्रबंधन विशेषज्ञ से, इस अखबार ने अपने भविष्य का आंकलन चाहा.

1991 में उनकी रिपोर्ट आयी, जितना जल्द यह बंद कर दिया जाये, उतना ही बेहतर. वे सही थे, क्योंकि अखबारों की तत्कालीन प्रतिस्पर्धा में प्रभात खबर कहीं था ही नहीं. न थी सुविधाएं या आवश्यक पूंजी. सारे लॉजिक इस अखबार के चलने और इसके बुनियादी अस्तित्व के खिलाफ थे. दूर-दूर तक भविष्य में कहीं रोशनी नहीं. पर एक टीम थी, जो नयी व भिन्न पत्रकारिता चाहती थी. मुद्दों के इर्द-गिर्द. ऐसी ही युवा व समर्पित टीम थी प्रबंधन में (विज्ञापन, सर्कुलेशन, प्रोडक्शन, वगैरह) जो अकल्पनीय  मुसीबतों और अभाव में भी कुछ कर दिखाने के लिए तत्पर थी.

तब बिहार, विकास की दृष्टि से सबसे पिछड़ा राज्य था. और उन दिनों छोटानागपुर बिहार का सबसे पीछे छूटा हिस्सा. अखबार, विज्ञापन से चलते हैं. विज्ञापन के बारे में तथ्य है कि यह डेवलपमेंट का बाइप्रोडक्ट है. इसलिए जहां विज्ञापन नहीं, वहां अखबार की गुंजाइश नहीं. पर, इस टीम ने एक ही संकल्प लिया-हमें भिन्न अखबार बनना है, अलग पहचान के साथ. हमने दूसरे बड़े महारथियों से अपनी तुलना छोड़ दी. हम सब डूब गये अपने संसार में. सीमित साधनों में ही, क्या राह होगी? कैसे हम अपने ही मापदंड पर एक्सीलेंस (श्रेष्टता) हासिल कर सकते हैं. अपना मुकाबला खुद से. हां, प्रभात खबर ने खुद को जोड़ा समाज के मूल सवालों से.

बीमारू राज्य का संदर्भ और हम

हमने माना कि 80 के दशक में डेमोग्राफर इन चीफ प्रो. आशीष बोस ने हिंदी इलाकों को बीमार कहा, तो हमारी भूमिका क्या हो सकती है? भ्रष्टाचार, गवर्नेस, मूल्यहीनता की राजनीति के बीच हम क्या कर सकते हैं. याद रखिए, उन्हीं दिनों उदारीकरण का दौर आया. और उसके साथ आयी पत्रकारिता की नयी विद्या, पेज-3 की पत्रकारिता. यानी, रियूमर (अफवाह), गॉसिप, लाइफ स्टाइल, महानगरों में होने वाली भोग-विलास की पार्टियों की खबरें, संपन्न घरानों की चर्चित शादियां और राजनीतिक गलियारों की अफवाहें.

गांधी हमारे आदर्श थे. हमारा काम बोले, हम नहीं. हमारा पाथेय था. आज मार्केटिंग एक्सपर्ट या ब्रांडिंग के माहिर लोग इसे प्रभात खबर का ऋण पक्ष मानते हैं. इस दौर में आत्म प्रचार या चर्चा ब्रांडिंग के लिए अपरिहार्य कदम माना जाता है. बहरहाल तब प्रभात खबर के एक-एक साथी, चाहे वे जिस विभाग में हों दूसरे विभाग का काम सीखने को उत्सुक, बिना श्रेय लिये या बताये. मल्टी स्किलिंग क्षमता विकसित करने की कोशिश. अज्ञेय की एक पंक्ति याद रहती थी, जब विकल्प न हो, तब जीवन कितना आसान हो जाता है.

अभावों का संसार था. इसलिए बीच-बीच में काम बंद कर देने वाली मशीन पर कंपोजिंग या पुराने यंत्रों-मशीनों पर ही काम होना था. विकल्पहीन स्थिति. इसी कार्य संस्कृति का परिणाम है कि अखबार के विशेषज्ञों ने जिस अखबार की आयु दो-एक महीने बतायी या कुछ अखबार घरानों के विशेषज्ञों ने उदार होकर वर्ष भर का समय दिया, आज वह जन्म के 26वें साल में है. और उत्तर बिहार की सांस्कृतिक राजधानी मुजफ्फरपुर से आरंभ हो रहा है. इसका श्रेय सिर्फ और सिर्फ पाठकों को है.

यह अखबार इस मिट्टी का अखबार है. रांची से निकल कर जमशेदपुर गया. उसी टूटी-फूटी और स्क्रैप प्रिंटिंग मशीन (बंधु) को लेकर. उसी मशीन से धनबाद में शुरुआत हुई, क्योंकि वह अभाव की दुनिया थी. संसाधनों के सपने हम नहीं पाल सकते थे. इसी तरह, देवघर में भी हैदराबाद से लाकर अत्यंत पुरानी व जर्जर मशीन से हमने शुरुआत की. और शुरू होने के कुछ ही दिनों के अंदर हम सबसे आगे पहुंचे.

महज इस वजह से कि प्रभात खबर ने समाज के जीवन व धड़कन से खुद को जोड़ा. पेज-3 की पत्रकारिता संस्कृति के विकल्प में ग्रास रूट पत्रकारिता की राह चुनी. इस राह ने, लोक मुद्दों की ताकत ने प्रभात खबर को आगे पहुंचाया. इसलिए प्रभात खबर के फैलाव का श्रेय भी समाज के ज्वलंत मुद्दों को जाता है. उन मुद्दों से जुड़ कर ही प्रभात खबर टिक पाया. सबसे बड़े, शीर्ष और ताकतवर अखबार घरानों के सामने. इसलिए, यह श्रेय या उपलब्धि भी समाज के ज्वलंत मुद्दों को है. इन मुद्दों से प्रभात खबर आज भटक जाये, तो फिर वह पुरानी स्थिति में ही होगा. अपने अस्तित्व के लिए जूझता.

आक्रामक मार्केटिंग का दौर

वर्ष 2000 आते-आते अखबारों के स्पर्धा की दुनिया बदल गयी. छोटे अखबार तेजी से बंद होने लगे. बड़े अखबारों के आक्रमण, मार्केटिंग रणनीति और पूंजी बल के कारण. तब विदेशी पूंजी (एफडीआई), इक्‍वीटी और शेयर बाजार की पूंजी लेकर अखबारों की दुनिया में भी देशी मल्टी नेशनल कंपनियां उभर आयीं. वे सीधे-सीधे पहले से जमे पुराने अखबारों को आर्थिक रूप से ध्वस्त करने लगीं. इस तरह, गुजरे 20 वर्षो में न जाने कितने स्थानीय व छोटे अखबार बंद हो गये. या कहने को जीवित हैं. अधिकाधिक अखबारों का होना, लोकतंत्र के चरित्र के अनुरूप है. आवाज या दृष्टिकोण की बहुलता ही लोकतंत्र को ऊर्जा देती है. पर देश में यह नुकसान हो चुका है.

पत्रकारिता के इस नये दौर की मार भी प्रभात खबर पर पड़ी, खूब. उसे बांधने और गुम करने की हर कोशिश हुई, पर प्रभात खबर की समर्पित टीम, इस आक्रामक पूंजी की लहर का भी अपनी सृजन क्षमता से मुकाबला करने में लगी है. देश के तीन सबसे बड़े घरानों (तीनों शेयर बाजार की लिस्टेड कंपनियां) के मुकाबले स्पर्धा में उतरा एक अकेला क्षेत्रीय अखबार. पाठकों के बल. अपनी समर्पित टीम के बल.

शुरूआत रांची (14 अगस्त,1984) से. फिर जमशेदपुर (आठ सितंबर, 1995), फिर धनबाद (15 जुलाई, 1999), पटना (सात अप्रैल, 1996), फिर कोलकाता (31 अक्‍टूबर, 2000), देवघर (29 जुलाई, 2004), पुन सिल्लीगुड़ी (10 मार्च्, 2006) और अब मुजफ्फरपुर (10 अक्‍टूबर, 2010).

आमतौर से प्रभात खबर आत्म चर्चा से बचता है. पर यह आत्म प्रचार नहीं है. सिर्फ यह बताना और कहना है कि अभाव की इस धरती से जनम कर भी कोई अखबार पनप और फैल सकता है. लगातार संघर्ष करता हुआ. कठिन-से-कठिन स्पर्धा में. मैनेजमेंट एक्सपर्ट के बल नहीं. लोकल और देशज प्रतिभा के बल. कुछ मूल्यों व उसूलों के बल. आज अखबारों के एक-एक संस्करण की लांचिंग में 30-40 करोड़ लगते हैं. कुछेक लोग अरबों लगाते हैं. तब बाबा आमटे की लंगड़ी व बिसूखी गाय से प्रेरित होकर प्रभात खबर की टीम ने स्क्रैप हो चुकी मशीनों से अपने कई संस्करणों की यात्रा शुरू की. टेंट में मशीन लगा कर. किसी तरह कहीं बैठने का जुगाड़ कर. पर यह कोई इतिहास नहीं है. यह तो एक मामूली प्रसंग है.

ऐसे अनंत प्रसंग जब मिलते हैं, तब समाज, मुल्क, राज्य या देश का कायापलट होता है. वर्षो पहले सिंगापुर शहर में म्यूजियम देख रहा था. ली यूआन क्यू ने कैसे अपना मुल्क व शहर बदला. वह मछुआरों का गांव था. बदबूदार. दुनिया भर के छंटे और गलत धंधों में लगे लोगों का समुद्री पड़ाव. उसे मरे-निर्जीव शहर और देश को ली ने कैसे दुनिया का अलभ्य शहर बना दिया? उस म्यूजियम में प्रधानमंत्री के रूप में ली की वह मशहूर तसवीर देखी. जब झाड़ू उठा कर खुद ही सड़क साफ करते थे. वह ऑक्सफोर्ड से पढ़-लिख कर लौटे थे. उनमें जज्बा था. अपने मुल्क को दुनिया का सर्वश्रेष्ट मुल्क बनायेंगे. दो खंडों में उनकी आत्मकथा है. हर भारतीय को पढ़ना चाहिए.

हर स्कूल के पाठ्यक्रम में ऐसी पुस्तक अनिवार्य होनी चाहिए. ली ने लिखा है, जब अपने देश के पुनर्निर्माण का संकल्प उनके मन में जगा, तो उन्होंने भारत को देखा. गांधी और नेहरू की आभा में अपने मुल्क को गढ़ना चाहा. पर यहां आ कर कामकाजी संस्कृति देख कर निराश हुए. सिंगापुर के राष्ट्राध्यक्ष के रूप में जब वह भारत आकर राष्ट्रपति भवन में ठहरे, तो भारतीयों को कैसा पाया? आला नौकरशाह कैसे सिंगापुर दूतावास से उम्दा शराब बोतलों की चाहत रखते थे. इसी तरह जब चीन में शेंङोन की धरती पर हमने पांव रखा, तो जाना मनुष्य के अंदर कितनी बड़ी संभावनाएं हैं. वहीं से, 1980 में चीन को पलट देने वाले देंग शियाओ पेंग ने दुनिया के सर्वश्रेष्ट औद्योगिक हब की नींव डाली. वह भी बदबूदार जंगल था. दलदल जमीन, समुद्री झाड़ियां और मछुआरों का धंधा, न सपना, न संकल्प.

आज 30 वर्ष बाद दुनिया के विशेषज्ञ मानते हैं कि शेंङोन चीन का ग्रोथ एक्सक्लोजन (हैरत में डालने वाला विकास) का कारण बना. अब चीन वैसा ही और एक सेंटर खड़ा कर रहा है. कोरिया के पोहांग स्टील प्लांट की भी यही कथा है. रेत पर खड़ा स्टील प्लांट. न उसके पास आयरन ओर हैं और न अन्य प्राकृतिक संपदा. पर पोहांग स्टील प्लांट हॉर्वर्ड मैनेजमेंट स्कूल का केस स्टडी है. जिन लोगों ने इसे बनाने का सपना देखा, वे दुनिया के हर कोने में दर-दर भटके. विश्व बैंक ने कहा, यह परियोजना ही अनवायबल हैं. इसे फाइनेंस करने के लिए दुनिया में कोई तैयार नहीं होगा.

पर जहां सात्विक जिद है, वहां सपने साकार होते हैं. हॉर्वर्ड ने माना कि जिन बैंकरों ने भी पोहांग स्टील प्लांट के प्रपोजल को अनवायबल पाया. वे सही थे. पर वे भूल गये कि मनुष्य की दुनिया में असंभव को संभव करने की क्षमता भी है. हिंदी इलाकों में हम बीमा हालात से निकल कर बेहतर व श्रेष्ट बन जायें, यह पूरी संभावना है. चाहिए समाज के हर क्षेत्र में श्रेष्ट व युवा नेतृत्व. आज जरूरत है कि बिहार अपने सुदूर अतीत को देखे. चर्चिल के सुझाव के तहत, ताकि दूर भविष्य के लिए सबक मिल सके. क्या थे, क्या हो गये हम, कि चर्चा बिहार के चुनावों में होनी चाहिए. मिथिला को ही लें, गंगा, कोसी, गंडक से घिरी धरती.

700 वर्षो बाद भी विद्यापति की रचनाओं से सराबोर और भींगी धरती. रामवृक्ष बेनीपुरी जी की बातों को याद करें, तो वैदिक काल की त्रिभुति (तिरहुत). पौराणिक काल के जनकों की धरती. ऐतिहासिक काल के विदेहों और लिच्छवियों के प्रजातंत्र की क्रीड़ा भूमि. महावीर, गौतम बुद्ध के सघन प्रचार की जगह. इसी तरह पूरे बिहार के बारे में अमर्त्य सेन को याद करें, तो भारत को राष्ट्रीयता का सूत्र देने वाला प्रदेश.

दार्शनिक, मौलिक चिंतक और समाजवादी किशन पटनायक के शब्दों में-अभी तक लिखे गये इतिहास के अनुसार बिहार लंबे समय तक भारतीय राष्ट्र के ऐतिहासिक अभ्युदय के केंद्र में रहा. ऐसी क्रांतियों व विद्रोहों का उद्गम यहां से हुआ, जिनका लक्ष्य मनुष्य समाज को उदात्त व मानव कल्याणकारी बनाना था.

महावीर जैन व गौतम बुद्ध के सघन प्रचार का यह क्षेत्र रहा, बाद में दुनिया का सर्वश्रेष्‍ठ सम्राट भी यहीं से हुए. चंद्रगुप्त मौर्य से अशोक मौर्य तक का काल भारतीय इतिहास का एक ऐसा कीर्तिमान रहा, जो बिहार राज्य का हमेशा आदर्श बना रहना चाहिए. पर, इसके बाद बिहार कहीं फिसल गया. मध्यकाल या आजादी के दौरान या बाद में बिहार की विरासत नहीं बन सकी. पुनर्जागरण का कोई बड़ा आंदोलन नहीं हुआ. समाज सुधार का अभियान नहीं चला. रामकृष्ण या विवेकानंद के आध्यात्मिक विरासत की तेज बिहार तक नहीं पहुंची. आजादी की लड़ाई के दौरान बिहार की धरती चंपारण से ही एक नयी आवाज गूंजीं. जिसने अपने समय के सबसे बड़े सम्राज्य को, जिसके राज्य मे सूर्यास्त नहीं होता था, अस्त कर दिया. अहिंसक रास्ते.

सात्विक संकल्प और कर्मठता से. बिहार अपना भविष्य तय करने जा रहा है. उसे तय करना है कि वह इतिहास बनाने वालों में से होगा या फिर हास्यास्पद या इतिहास की पाद टिप्पणियों में जगह पायेगा. बिहार में हो रहे इन भविष्य निर्धारक चुनाव में कहां है, सामूहिक संकल्प जगाने का अभियान? बड़े सपनों की बात? फिर भारत को नयी दिशा देने और नया इतिहास बनाने का जज्बा? नेताओं की सारी चिंता परिवार है. बेटा, बेटी, नाते-रिश्तेदार. बदबू आ रही है, इस राजनीति से. बिहारी पहचानें, अपने अतीत से ताकत और ऊर्जा लेकर.

कैसे हों श्रेष्ट शासक

आज पूरी दुनिया में बहस चल रही है कि श्रेष्ट शासक (इनलाइटेंड लर्स) कैसे हों? उनमें क्या मूल्य हों? उनके जीवन दर्शन क्या हों? किशन पटनायक ने भी लिखा है चंद्रगुप्त के दरबार में चाणक्य था, चापलूसों की जमात नहीं. चंद्रगुप्त महान योद्धा था, जिसने अपना शेष जीवन जैन सन्यासी की तरह बिताया (जैन साहित्य के अनुसार). अशोक ने युद्ध से मुंह मोड़ लिया और बौद्ध होकर धम्म का संवाहक बना. यानी दो महान दार्शनिक आदर्शो को लोक जीवन में उतारने का काम इस वंश के राजाओं ने किया.

अपने समय की सीमाओं में भारत का सर्वश्रेष्ट ब्राह्मण नेता चाणक्य था. वह भारत का प्रथम राष्ट्रनेता था, राजा न होते हुए. फिर, आगे किशन जी लिखते हैं चंद्रगुप्त कोई सामान्य सूझबूझ का आदमी नहीं था, अगर सामान्य सूझबूझ का होता, तो एक बार स्थापित हो जाने के बाद संकीर्ण स्वास्थ्य से या चापलूसों की कुमंत्रणा के वश में आकर उसने चाणक्य को मरवा दिया होता या भगा दिया होता. फिर वह (चंद्रगुप्त) बिहार का निर्माता न होता. यह है बिहार की विरासत की पहली कड़ी.

कहां है इन चुनावों में बिहार की विरासत को स्थापित करने की गूंज? एक-एक राजनेता से जनता हिसाब ले. जब राजनेता धर्म, जाति, समुदाय, क्षेत्र की बात करें, तो जनता उनसे विरासत का हिसाब मांगे. क्या आपको या हमें पता है कि आज दुनिया के बड़े चिंतक व विचारक कह और मान रहे हैं कि सिकंदर व उसके पिता फिलिप (मकदुनिया) लुटेरे थे. वे दुनिया के आदर्श नहीं हो सकते. यह पश्चिम का ताजा चिंतन है. अशोक अब तक ज्ञात दुनिया के सबसे इनलाइटेन लर्स (सर्वश्रेष्ट, प्रबुद्ध शासक) माने जा रहे हैं. अब पश्चिम को अफसोस है कि उसके छात्र अशोक के बारे में कम जानते हैं. अमर्त्य सेन ने अशोक पर जरूर लिखा है.

दुनिया के एक जाने-माने लेखक मैट रिडले ने किताब लिखी है द रेसनल ऑप्टिमिस्ट (हार्पर कॉलिंस 2010). रिडले मनुष्य के विकासवादी चिंतन के खास अद्येता हैं. उन्होंने लिखा है कि अशोक ने कैसे मौर्य काल की भारतीय अर्थव्यवस्था को उदार बनाया. दुनिया के लिए खोला. श्रेष्ट कर प्रणाली विकसित की. राजसत्ता के ठोस बुनियादी संरचना की नींव डाली, ताकि श्रेष्ट ढंग से कारोबार, व्यापार हो. रिडले ग्लोबलाइजेशन के या ओपेन मार्केट के पक्षधर विचारकों में से हैं. पर, 2008 में ब्रूस रिच ने एक किताब लिखी टू अपहोल्ड द वर्ल्ड. उनकी नयी किताब 2010 में आयी है ए कॉल फॉर ए न्यू ग्लोबल इथिक फ्रॉम एनसिएंट इंडिया. इसे बेकन पब्लिसर ने छापा है. यह सिर्फ अशोक के बारे में है. ब्रूस पर्यावरणविद हैं. ग्लोबलाइजेशन के आलोचक, वामपंथी विचारक.

यानी दुनिया में वाम से लेकर दक्षिण विचारों वाले चिंतक अशोक के गीत गा रहे हैं. दुनिया कैसे मूल्यों से जुड़े, नैतिक बने, श्रेष्ट बने, इसके लिए. पर बिहार अपना भाग्य लिखने जा रहा है. और बिहारी नेता, जो बिहार का भविष्य तय करेंगे, वे किसके गीत गा रहे हैं? क्या हमारे रहनुमा हमारे समाज को या बिहारियों को नये सपने और संकल्प दिखायेंगे?

मुजफ्फरपुर से निकला प्रभात खबर उसी समृद्ध विरासत का मंच बनना चाहेगा, जो हिंदी इलाकों को पुन सर्वश्रेष्ट बनाये. हर चीज में. शासन में. राजनीति में. स्वस्थ मूल्यों में. श्रेष्ट शिक्षण माहौल बनाने में. रचना व सृजन की नयी भूख जगाने में. पर यह काम आप पाठकों की सक्रिय साझेदारी और हिस्सेदारी से ही संभव है.

प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश का यह लेख प्रभात खबर में प्रकाशित हो चुका है और वहीं से साभार लेकर छापा जा रहा है.

प्रभात खबर, मुजफ्फरपुर की शानदार लांचिंग

प्रभात खबर का अब मुजफ्फरपुर से भी प्रकाशन शुरू हो गया. इसके साथ प्रभात खबर का आठवां एडिशन भी शुरू हो गया. अखबार  की शानदार लांचिंग की गई. इस एडिशन के लांचिंग की तैयारी पिछले काफी समय से चल रही थी. यूनिट हेड सुधीर कुमार चौबे की देखरेख में कई लोग इस एडिशन को लांच करवाने में दिन रात एक किए हुए थे. दस अक्‍टूबर को हुए लांचिंग समारोह में मैनेजिंग डाइरेक्‍टर केके गोयनका भी मौजूद रहे.

गौरतलब है कि प्रभात खबर का मुजफ्फरपुर से मुद्रण 25 सितम्‍बर से शुरू कर दिया गया था. इस एडिशन को प्रधान संपादक हरिवंश के दिशा निर्देशन में यूनिट हेड सुधीर कुमार चौबे के साथ सत्‍यम कुमार भास्‍कर भी जुटे हुए थे. लांचिंग के पहले ही दिन अखबार का प्रिंट आर्डर तीस हजार पास पहुंच गया. लांचिंग के मौके पर हॉकरों को उपहार बांटा गया. मुजफ्फरपुर की टीम की कप्तानी नरेन्‍द्र अनिकेत कर रहे हैं. इस प्रोजेक्‍ट का काम खतम होने के बाद सत्‍यम कुमार भास्‍कर को स्‍टोर एवं परचेज का हेड बना दिया गया है.  सर्कुलेशन हेड अमरीश झा हैं. मुजफ्फरपुर की लांचिंग पूरी होने के बाद अब प्रभात खबर की अगली तैयारी भागलपुर एडिशन के लिए शुरू हो गया है.

गोयनका एमडी और दत्ता ईडी बने

(अपडेटेड खबर) जमशेदपुर के स्थानीय संपादक अनुज सिन्हा को झारखंड का प्रभारी बनाया गया : प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश ने आज प्रभात खबर के सभी संस्करणों के वरिष्ठ लोगों से वीडियो कांफ्रेंसिंग से संवाद किया. फिर रांची के वरिष्ठ लोगों की बैठक बुलाकर संबोधित किया. उन्होंने कहा कि आज का दिन प्रभात खबर के लिए महत्वपूर्ण दिन है.

भविष्य में प्रभात खबर को आगे ले जाने की दृष्टि से कुछ महत्वपूर्ण फैसले हम सब ने मिलकर किये हैं. उन्होंने बताया कि नवंबर 2009 में प्रभात खबर के बोर्ड का पुनर्गठन हुआ था. तब उन्हें प्रधान संपादक के साथ-साथ प्रबंध निदेशक का भी पद सौंपा गया था. उसी समय उन्होंने आग्रह किया था कि प्रबंध निदेशक के पद पर ऐसा व्यक्ति होना चाहिए, जिसे फाइनेंस, मार्केटिंग, स्ट्रेटजी वगैरह की गहरी समझ हो. पर उस समय तत्काल बोर्ड की नयी व्यवस्था को सक्रिय करना था, इसलिए वह कुछेक माह के लिए पद पर बने रहने को सहमत हुए. लेकिन उनका आग्रह प्रबंधन से बना रहा कि इस जगह किसी ऐसे साथी को रखा जाये जिसकी इन विषयों पर पकड़ हो. उन्होंने प्रबंधन से यह भी कहा कि हमें जीवन में दो जगहों से अधिक प्रेरणा मिली है. पहला, इंफोसिस के नारायणमूर्ति से, जहां उन्होंने सक्रिय रहते हुए, अपने साथ के लोगों को आगे लाने का काम किया. खुद अलग होकर साथियों को महत्वपूर्ण दायित्व सौंपे. इसी तरह रिखिया आश्रम की परंपरा है, जहां स्वामी सत्यानंदजी ने 20 वर्ष एक दायित्व निभाने के बाद अपने दूसरे युवा साथी को कार्य सौंपा.

हरिवंश ने अपने प्रभात खबर के वरिष्ठ साथियों को कहा कि केके गोयनका एवं आरके दत्ता के बारे में एक ही पंक्ति कहना पर्याप्त होगा कि ये दोनों नहीं होते तो यह अखबार आज नहीं होता. बड़े-बड़े प्रस्ताव ठुकरा कर इन दोनों ने भी कठिनाई से भरी राह चुनी. प्रभात खबर में ऐसे अनेक साथी अन्य विभागों में भी हैं, जिन्होंने जब ऐसे विकल्प आये, तब संघर्ष और कठिनाई के बीच काम करना चुना. ऐसे लोगों को प्रभात खबर आगे लाना चाहता है. नेतृत्व सौंपना चाहता है. हरिवंश ने यह भी कहा कि प्रभात खबर में लगातार विकेंद्रीकरण का प्रयोग हम सब करते रहे हैं. इसी क्रम में जमशेदपुर के स्थानीय संपादक अनुज सिन्हा को झारखंड का प्रभारी बनाया गया. इसी तरह हर विभाग में नये नेतृत्व को उभारना और उन्हें पद और दायित्व सौंपना हमारे जीवन में होना चाहिए, तभी समाज, देश या संस्थाएं आगे बढ सकतीं हैं.

54 वर्षीय हरिवंश ने कहा कि जो विकसित देश, सफल संस्थाएं हैं, वहां परंपरा है कि वरिष्ठ लोग सक्रिय रहते हुए अपने साथियों को आगे लाकर दायित्व सौंपते हैं और नेतृत्व करने का मौका देते हैं. हमें प्रभात खबर में भी वैसा ही करना है. इस संबंध में उन्होंने अपने प्रबंधन को भी धन्यवाद दिया कि प्रबंधन यहां से निकले लोगों को ही आगे ले जाने की नीति को प्रोत्साहित करता है. इसी कड़ी में गोयनका अब प्रभात खबर के नये प्रबंध निदेशक (एमडी) होंगे. आरके दत्ता, एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर होंगे.

हरिवंश ने कहा कि वह संपादकीय को अधिक समय देंगे. उन्होंने यह भी कहा कि अब तक दो बडे अखबारों से प्रभात खबर जैसे छोटे अखबार का मुकाबला था. अब तीसरा बड़ा अखबार आ रहा है. इसी तरह इस अंचल में देश के एक, दो, तीन नंबर के तीन बड़े अखबार होंगे. ये सभी लिस्टेड कंपनियों द्वारा संचालित-प्रकाशित हैं. सभी संसाधनों से समृद्ध तीनों अखबार. हरिवंश ने कहा, हर कठिनाई में एक छुपा अवसर भी होता है. दस वर्ष पहले जब एक-एक कर देश के दो बड़े अखबार इस अंचल में आये, तो प्रभात खबर के सामने अनिश्चितता थी. संसाधनों की दृष्टि से अत्यंत कमजोर, पिछड़े थे हम. देश में जहां-जहां भी ऐसे बड़े अखबार गये, वहां स्थानीय छोटे अखबार नहीं टिक पाये. पर दस वर्षों के अनुभव व संघर्ष ने प्रभात खबर की जड़ों को और मजबूत किया है. यह काम प्रभात खबर की पूरी टीम ने मिलकर किया. यही हमारी ताकत है. संसाधनों के मुकाबले टीम की प्रतिबद्धता ही हमें आगे ले जायेगी.

के के गोयनका ने भी अपने वरिष्ठ साथियों से बात की और कहा कि यह अत्यंत चुनौती भरा काम है. प्रभात खबर को संभालना कांटों के हार पहनने जैसा है, क्योंकि मुकाबले में देश के नंबर एक, दो, तीन अखबार हैं. पर हम अपने संकल्प और मनोबल से एक-एक आदमी के सहयोग से आगे बढेंगे. उन्होंने प्रबंधन का आभार व्यक्त किया कि प्रबंधन ने उन पर विश्वास कर यह दायित्व सौंपा. आरके दत्ता ने बताया कि अतीत के अनुभवों ने हमें बहुत कुछ सिखाया है. उन्हें आधार बनाकर हम आगे बढेंगे. झारखंड संपादक अनुज सिन्हा और चीफ मैनेजर आलोक कुमार ने भी अपने अनुभव बांटे. प्रभात खबर के सभी साथियों ने केके गोयनका को बधाई दी.

हरिवंश ने एमडी का पद छोड़ा

(प्राथमिक खबर) : प्रभात खबर से एक बड़ी खबर है कि इस अखबार के मैनेजिंग डायरेक्टर और एडिटर इन चीफ हरिवंश ने मैनेजिंग डायरेक्टर का पद छोड़ दिया है. वाइस प्रेसीडेंट केके गोयनका को नया मैनेजिंग डायरेक्टर बना दिया गया है. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार ये फेरबदल प्रभात खबर के बेहतर संचालन और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए किया गया है.

बताया जाता है कि बोर्ड आफ डायरेक्टर्स की पिछले दिनों हुई बैठक में हरिवंश ने खुद मैनेजिंग डायरेक्टर का पद छोड़ने का इच्छा जताई थी ताकि वे अखबार के संपादकीय पक्ष की ओर ज्यादा से ज्यादा ध्यान दे सकें. हरिवंश प्रभात खबर के बोर्ड आफ डायरेक्टर्स में बने रहेंगे. ज्ञात हो कि पिछले साल बोर्ड आफ डायरेक्टर्स का पुनर्गठन कर उसमें हरिवंश, केके गोयनका और आरके दत्ता को शामिल किया गया. हरिवंश संपादकीय देखते हैं तो केके गोयनका फायनेंस, मार्केटिंग, ब्रांडिंग आदि और आरके दत्ता प्रसार, एचआर, परसनल, प्रोडक्शन. ये तीनों शख्स पिछले करीब 20-22 वर्षों से प्रभात खबर के साथ जुटे-डटे हैं. सूत्रों का कहना है कि भास्कर जैसे बड़े अखबार के रांची में आने की तैयारियों को देखते हुए प्रभात खबर प्रबंधन अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुटा हुआ है.

इसे कहते हैं भरोसा

एसपी ने प्रभात खबर की टीम के साथ बैठे बीडीओ को जबरन कस्टडी में लिया तो डरकर रोने लगे थे बीडीओ : झारखंड में माओवादियों ने बीडीओ को रिहा करने के लिए मध्यस्थ के रूप में प्रभात खबर अखबार पर भरोसा जताया. माओवादियों ने प्रभात खबर के झारखंड हेड अनुज कुमार सिन्हा के पास संदेश भिजवाया कि वे सिर्फ प्रभात खबर की टीम के सामने ही बीडीओ को रिहा कर सकते हैं क्योंकि उन्हें प्रभात खबर और उसके लोगों पर भरोसा है. माओवादियों का संदेश स्पष्ट था- बीडीओ प्रशांत को वे रिहा कर सकते हैं, लेकिन सिर्फ प्रभात खबर की टीम के समक्ष.  अनुज कुमार सिन्हा ने यह संदेश सबसे पहले अपने प्रधान संपादक हरिवंश तक पहुंचाया.

बिहार-झारखंड में लगातार दौरे पर रहने के कारण हरिवंश का मोबाइल इन दिनों कवरेज रेंज से भीतर-बाहर होते रहने के कारण आन-आफ होता रहता है. कई घंटों बाद हरिवंश से संपर्क हो सका. अनुज ने जानकारी दी. हरिवंश ने सलाह दी कि राज्य सरकार को भी अगर हम लोगों पर भरोसा हो तो यह काम किया जा सकता है क्योंकि ऐसे अभियानों में सिर्फ एक तरफ के भरोसे से काम नहीं चलता, ताली दोनों हाथों से बजती है. प्रभात खबर के लोगों ने झारखंड सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क किया. उन्हें बताया कि माओवादियों की ओर से ऐसा संकेत आया है. अगर सरकार कहेगी, तो प्रभात खबर की टीम जान जोखिम में डाल कर यह दायित्व निभाने को तैयार हैं. सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने सहमति दी. सरकार के मंत्रियों व अफसरों को तो जैसे इसी का इंतजार हो. उन लोगों ने तुरंत हामी भर दी. स्टेट हेड अनुज कुमार सिन्हा, जो प्रभात खबर के जमशेदपुर एडिशन को भी देखते हैं, यहीं से फोटोग्राफर उमाशंकर दुबे मिशन पर निकलने के लिए तैयार होने लगे. मिशन पर निकले तो रास्ते में प्रभात खबर के तीन ओर साथियों को साथ लिया, जिन्हें स्थानीय इलाके व जंगलों की जानकारी है. इनके नाम हैं परवेज, हरिश्चंद्र सिंह और शिवशंकर साहू. फिर शुरू हुआ अभियान जो काफी जोखिम भरा था.

माओवादियों ने शुक्रवार शाम लगभग छह बजे गुड़ाबांधा के पास जंगल में बीडीओ प्रशांत कुमार लायक को प्रभात खबर की टीम को सही सलामत सौंप दिया. नक्सलियों ने पत्रकारों की सुरक्षा का वादा निभाया. जब तक प्रभात खबर की टीम जंगल में थी, प्रदेश सरकार ने भी अपना वादा निभाते हुए कोई ऐसा काम नहीं किया, जिससे स्थिति बिगड़ती. प्रभात खबर की टीम को माओवादियों द्वारा संदेश दिया गया कि किस जगह पर पहले जाना है. जहां जाना था, वहां जाते ही कहीं और जाने का संदेश मिलता. कई बार जगह बदली गयी. मुसाबनी से डुमरिया होते हुए गुड़ा के रास्ते में सुरक्षाकर्मियों की भरमार थी. इसके बावजूद प्रभात खबर की टीम अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती गयी. टीम के सामने चुनौतियां थीं. एक ओर माओवादी थे, तो दूसरी ओर पुलिसकर्मी. जरा सी चूक से जान जा सकती थी. टीम बढ़ती जा रही थी और उस पर माओवादियों की ओर से नजर भी रखी जा रही थी. निर्धारित जगह पर जब टीम कुछ देर रुकती, तो उसे कुछ देर बाद संदेश मिलता. फिर दूसरी जगह की ओर टीम रवाना होती. कितने लोग हैं, कौन-कौन हैं, सवाल किये जाते.

प्रभात खबर की टीम, रिहा बीडीओ और पुलिस के लोग

एक जगह पर एक कम उम्र का बालक मिला. वह एक जंगल की ओर ले गया. लगभग पौने छह बज रहे थे. वहीं टीम को खड़ा कर दिया गया. वहां करीब 15 मिनट तक इंतजार करने के बाद जंगल की ओर से हलचल हुई. फिर पांच माओवादी बीडीओ प्रशांत को लेकर आए. संगठन के कॉमरेड मंगल अपने चार साथियों के साथ गुड़ाबांदा के बीहड़ से पैदल ही निकले. प्रभात खबर की टीम ने परिचय दिया. माओवादियों ने धालभूमगढ़ के बीडीओ प्रशांत कुमार लायक को शुक्रवार शाम करीब छह बजे मुक्त कर दिया और प्रभात खबर की टीम के हवाले कर दिया. अत्याधुनिक हथियार से लैस माओवादियों में दो लड़कियां भी थीं. सभी ड्रेस में थे. चेहरे ढक रखे थे. उन लोगों ने कहा कि बीडीओ को आप लोगों को सौंपने का आदेश है. माओवादियों ने तसवीरें भी खिंचवाई. बहुत बातचीत नहीं की. सभी माओवादी कम उम्र के थे. बीडीओ खुश थे. उस समय चेहरे पर तनाव भी नहीं था.

बीडीओ ने माओवादियों के सामने ही कहा कि उनके साथ अच्छा व्यवहार किया गया. पैर में चप्पल भी थे. प्रशांत को लेकर प्रभात खबर की टीम पैदल ही रवाना हो गयी. उधर माओवादी भी घने जंगल में चले गये. जहां गाड़ी खड़ी की गयी थी, वहां पहुंचने के बाद बीडीओ प्रशांत को गाड़ी पर बैठाया गया. टीम उन्हें लेकर जंगल से बाहर जा रही थी. अंधेरा था. टीम डुमरिया होते हुए घाटशिला की ओर जानेवाले रास्ते पर थी. गुड़ा के पास अचानक सैकड़ों की संख्या में सुरक्षा बलों ने गाड़ी को घेर लिया. हथियार निकाल लिया. टीम अचंभित थी. खुद एसपी नवीन सिंह भी वहां थे. उन्होंने कड़क आवाज में पूछा- कहां है बीडीओ. इसके पहले कि टीम कुछ समझ पाती, बीडीओ को एसपी ने बाहर खींच लिया. जो बीडीओ प्रभात खबर की टीम के साथ गाड़ी में अपने आप को सुरक्षित महसूस कर रहे थे, वही बीडीओ एसपी की कार्रवाई के बाद रोने लगे. प्रभात खबर की टीम ने उन्हें समझाया. एसपी ने साफ-साफ कहा कि बीडीओ को वे अपनी कस्टडी में लेते हैं.

एसपी नवीन सिंह (बाएं)के साथ बीडीओ प्रशांत (दाएं)

प्रभात खबर के लोगों ने इसका विरोध किया और कहा कि बीडीओ को या तो उनके परिवार को सौंपा जायेगा या फिर घाटशिला में राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष. ऐसा इसलिए, क्योंकि यह प्रभात खबर के विश्वास के साथ जुड़ा मामला है. एसपी नहीं माने. जब प्रभात खबर की टीम ने मुख्यमंत्री शिबू सोरेन या डीजीपी से बात करने की इच्छा जतायी, तो उन्हें मोबाइल का प्रयोग नहीं करने दिया गया. प्रभात खबर की टीम अड़ी रही. अंतत: प्रभात खबर ने अपना विरोध दर्ज कराते हुए बीडीओ प्रशांत को एसपी नवीन सिंह को सौंप दिया. इसकी तसवीर भी ली गयी. गुड़ा के पास जो स्थिति बन गयी थी, अगर कुछ देर पहले ही पुलिस वैसी कार्रवाई कर देती, तो बीडीओ और पत्रकारों की जान भी जा सकती थी. बाद में प्रभात खबर की टीम बगैर बीडीओ के घाटशिला आयी. वहां आइजी समेत अनेक अधिकारी थे. सबों को जानकारी दे दी गयी कि प्रभात खबर ने अपने दायित्व का निर्वाह कर दिया है. फिर घाटशिला में बीडीओ के घर भी टीम गयी. परिजनों से मुलाकात की. बाद में बीडीओ को लेकर खुद एसपी डीबी आये. वहां बाकी मीडिया के सामने अपनी बातें रखीं. जब बीडीओ घर गये और बेटी से मिले, तो वह दृश्य भाव विह्लल करनेवाला था.

(प्रभात खबर टीम के सदस्यों से बातचीत पर आधारित)

रांची में ‘प्रभात खबर झारखंड डेवलपमेंट रिपोर्ट’ का विमोचन

डेवलपमेंट रिपोर्ट का विमोचन समारोह

झारखंड के विकास का आईना है झारखंड डेवलपमेंट रिपोर्ट-2010 : बीते दिनों ‘प्रभात खबर झारखंड डेवलपमेंट रिपोर्ट- 2010’ का विमोचन व लोकार्पण रांची में हुआ. प्रभात खबर द्वारा प्रकाशित झारखंड डेवलपमेंट रिपोर्ट को देश की जानी-मानी संस्था ‘इंडिकस एनालिटिक्स’ ने तैयार किया है. यह रिपोर्ट झारखंड के सम्यक विकास का पूरा दस्तावेज है. रिपोर्ट विकास के हर पहलू का तथ्यपरक विश्लेषण करती है. मसलन, प्रतिव्यक्ति आय, साक्षरता दर, औद्योगिक विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थिति, नागरिक सुविधाओं का हाल आदि.

प्रभात खबर अपने प्रयासों से हर वर्ष झारखंड डेवलपमेंट रिपोर्ट का प्रकाशन पिछले सात वर्षों से करता रहा है. ऐसा करने वाला संभवत: यह देश का पहला अकेला अखबार (वह भी हिंदी का) है. इस रिपोर्ट के मुताबिक अगर विकास की मौजूदा रफ्तार यही बनी रही, तो वर्ष 2020 में झारखंड की स्थिति आज के थाइलैंड जैसी होगी. यानी एक दशक बाद भी झारखंड में बहुत सुधार की गुंजाइश नहीं दिख रही है. रांची के लोक प्रशासनिक संस्थान सभागार में इस रिपोर्ट का विमोचन राज्य के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन व उप मुख्यमंत्री रघुवर दास, सुदेश महतो, सांसद बाबूलाल मरांडी, विधानसभाध्यक्ष सीपी सिंह, नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र सिंह ने संयुक्त रूप से किया. इस अवसर पर राज्य के कई प्रमुख राजनीतिज्ञ, ब्यूरोक्रेट्स, शिक्षाविद व बुद्धिजीवी उपस्थित थे.

विमोचन समारोह में झारखंड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने कहा- ”गांव के 80 फीसदी लोगों की हमें चिंता करनी है. गांव में रहने वाली 80 फीसदी आबादी दुनिया से मतलब नहीं रखती, वह तो मेहनत-मजदूरी कर पेट पालने में व्यस्त है. खेत में 12 महीना पानी हो, तो इन लोगों का दुख दूर हो जायेगा. हमको इन्हीं लोगों की चिंता करनी है. सरकार अपने सलाहकार व अधिकारियों की सहायता से ही काम करती है. यदि अधिकारी ही काम न करें, तो मुश्किल है. थाना का काम था शांति बनाये रखना, लेकिन थाना झगड़ा बढ़ाने का काम करता है. यही मुश्किल है.” राजनीतिज्ञों को काम करने की सलाह पर सीएम ने कहा कि नेता लोगों की चिंता एमएलए-एमपी बनना भर है. झारखंड की जमीन से निकलने वाले खनिज के बदले राज्य को उसका हक नहीं मिलता. यह दुर्भाग्य है. हमारी सरकार मिली-जुली है, लेकिन हम निष्ठा के साथ काम कर रहे हैं.”

सीपी सिंह (विधानसभाध्यक्ष, झारखंड) ने इस मौके पर कहा कि प्रभात खबर ऐसी डेवलपमेंट रिपोर्ट के लगातार प्रकाशन व विकास संबंधी व्याख्यानमालाओं के लिए बधाई का पात्र है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इस रिपोर्ट पर क्रियान्वयन होता है? यह बड़ा सवाल है. हर कोई कहता है कि ऐसा काम होना चाहिए, वैसा काम होना चाहिए, लेकिन करेगा कौन? बाबूलाल मरांडी (पूर्व मुख्यमंत्री व सांसद) का कहना था कि प्रभात खबर अखबार निकालने के साथ-साथ राज्य के प्रति अपने कर्तव्यों का भी निर्वहन करता रहा है. बडी बातें करने से पहले हमें विकास के बुनियादी मुद्दों पर ध्यान देना होगा. ठीक उसी तरह जैसे बगैर एबीसीडी सीखे आगे की पढाई मुश्किल है.

रघुवर दास (उप मुख्यमंत्री) बोले- पाश्चात्य उदारीकरण के डेवलपमेंट मॉडल के बजाय हमें अपना अलग मार्ग बनाना चाहिए. मीडिया से उन्होंने स्वस्थ आलोचना के साथ-साथ सकारात्मक सहयोग की भी मांग की. प्रभात खबर न सिर्फ विकास में भागीदारी निभा रहा है बल्कि समाज के कोढ़ भ्रष्टाचार के बारे जो सक्रियता इसने दिखायी है, उसके लिए भी यह बधाई का पात्र है. सुदेश महतो (उप मुख्यमंत्री) के अनुसार- दूसरे राज्यों से डेवलपमेंट के मुद्दे पर तुलना एक बेहतर प्रयास है. झारखंड डेवलपमेंट रिपोर्ट हमारी सरकार के निर्णय लेने में सहायक होगी. हम प्रभात खबर को एक सहयोगी व मागदर्शक मानते हैं. हम पूरी इच्छा शक्ति से इस छवि को बदलने की कोशिश करेंगे.  राजेंद्र सिंह (नेता प्रतिपक्ष) ने कहा कि अगर हम सब मिलकर प्रभात खबर की इस रिपोर्ट की 20 फीसदी सलाह पर भी अमल हो, तो यह बड़ी बात होगी. प्रभात खबर अपने स्लोगन अखबार नहीं आंदोलन की तरह विकास को भी एक आंदोलन के रूप में ले. अंततः राज्य को ही इसका फायदा मिलेगा.

पत्रकार संजय यादव ने की संपत्ति की घोषणा

प्रभात खबर, रांची के वरीय संवाददाता संजय यादव ने एक मिसाल कायम की है। उन्होंने स्वेच्छा से अपनी संपत्ति की घोषणा की है। पत्रकारिता में शुचिता और नैतिकता के पक्षधर देश के मशहूर पत्रकार और प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश ने पिछले दिनों भड़ास4मीडिया को दिए इंटरव्यू में खुद की संपत्ति का खुलासा करते हुए देश के सभी मीडियाकर्मियों से अपील की थी कि उन्हें अपनी संपत्ति का खुलासा करना चाहिए ताकि पत्रकारों व पत्रकारिता पर लग रहे आरोपों से बचा जा सके और पारदर्शिता की परंपरा का बरकरार रखा जा सके।

हरिवंश के नक्शेकदम पर चलते हुए संजय यादव ने अपनी संपत्ति की घोषणा कर दी है। संजय ने ऐसा निज अंतर्मन की आवाज पर किया है। संजय के इस जज्बे को भड़ास4मीडिया सलाम करता है और एक स्वस्थ परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए साधुवाद देता है। संजय ने अपनी संपत्ति घोषित करने से पहले कुछ बातें कहीं हैं, जिसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है-

‘समाज के दूसरी अंग की तरह पत्रकारिता जगत के भी अपने संकट है। मिशन से प्रोफेशन होते इस पेशे का संक्रमण काल पक्के तौर पर कब शुरू हुआ और यह कब चरम पर होगा, कहना मुश्किल है। मेरी नजर में पत्रकारों का सबसे बड़ा संकट मानसिक तौर पर इस पेशे के लिए तैयार न होना है। बुनियादी नैतिकता के लिए भी नहीं। प्रभात खबर में काम करने वालों का यह सौभाग्य है कि उन्हें बेदाग नेतृत्व मिला है। दरअसल इस नेतृत्व की सराहना तो सब करते हैं, लेकिन इसका अनुसरण ज्यादातर के एजेंडे में नहीं हैं। पत्रकारों व राजनीतिक नेताओं में बोलने व लिखने का ही फर्क बचा है। बाकि आचरण एक होते जा रहे हैं। संपत्ति की घोषणा करके मैंने कोई तीर नहीं मारा है। ईमानदारी से यह खुलासा करना चाहता हूं कि ऐसा करने की मेरी इच्छा बहुत पहले थी। हमारे प्रधान संपादक हरिवंश जी के भड़ास4मीडिया में अपनी संपत्ति की घोषणा व इसके लिए आह्नान के बाद मुझे लगा कि यह काम देर से ही सही, कर देना चाहिए। यह पेशा और ज्यादा गरिमामय, विश्वसनीय व प्रभावी तभी होगा, जब इस पेशे की गरिमा व साख के लिए सुधि पत्रकार आगे आयें। मेरे अपने हाउस में यह सिलसिला बस शुरू ही होने वाला है।’

संजय ने अपनी संपत्ति जो घोषित की है, वह इस प्रकार है-

नाम- संजय यादव (वरीय संवाददाता)

पिता- स्व. रामचंद्र प्र.यादव

वर्तमान पता- इइएफ कॉलोनी, टाटीसिलवे आवास संख्या- बी/11

मोबाइल- 09835167507

1- प्रभात खबर ज्वाइन करते वक्त संपत्ति का व्योरा :

निजी व्यवसास से परिवार का भरण पोषण। कहीं कोई बचत नहीं।

2- दिनांक 21 अगस्त 09 को कुल चल-अचल संपत्ति का व्योरा : 

नगद – स्टेट बैंक आफ इंडिया की कोकर शाखा (सैलरी एकाउंट) मे लगभग सात हजार रुपए, बैंक आफ इंडिया टाटीसिलवे शाखा में पत्नि अनिता प्रसाद के साथ संयुक्त खाते में 1.25 लाख रुपए फिक्सड डिपोजिट (पटना में बिकी पुश्तैनी जमीन से मिली राशि, जो मेरी मां ने जनवरी 09 में मुझे दिये)

जमीन का पट्टा- टाटीसिलवे कैंब्रिज स्कूल के बगल में लगभग 10 डिसमिल जमीन (सन 1973 में मेरे पिता जी ने यहां कुल 88 डिसमिल जमीन खरीदी थी। बाद में कई पारिवारिक जरूरतों पर यह बेची गई। शेष जमीन अभी मेरी मां के नाम से ही है। संभवत: यह मेरे नाम हो सकती है।)

कोई पॉलिसी- कुछ नही, कोई जीवन या गैर जीवन बीमा भी नहीं।

जेवरात- पत्नि अनिता प्रसाद को अपने मां-बाप से मिले गहने, जिसकी वर्तमान कीमत 40 हजार हो सकती है।

वाहन- पत्रकारिता शुरू करने वक्त मोटरसाइकिल (बीआर14एच-7755) मुझे मेरे भाई ने दी थी। यह आज भी उसी (संतोष कुमार) के नाम से है।

3-किसी तरह की कोई अन्य चल-अचल संपत्ति नहीं है।

मै घोषणा करता हूं कि उपरोक्त विवरण मेरी जानकारी में सही व संपूर्ण है।

दिनांक- 21-8-09                           

हस्ताक्षर

संजय यादव

वरीय संवाददाता, प्रभात खबर (रांची)

प्रभात खबर के अनुरोध को एसएन विनोद ने स्वीकारा

एसएन विनोदप्रभात खबर की शुरुआती कहानी एसएन विनोद ने अपने ब्लाग के जरिए प्रभात खबर के कर्मियों को सुनाई : रांची (झारखंड) से दैनिक प्रभात खबर का एक आग्रह पत्र मिला था : ”सेवा में, श्री. एस.एन. विनोद, संस्थापक संपादक,  प्रभात खबर, सर, आपका लगाया पौधा यानी प्रभात खबर अब 25 साल का हो रहा है. मै खुद आपकी खुशी को महसूस कर रहा हूं. 25 साल पूरा होने पर रांची में समारोह का आयोजन किया जा रहा है. 15 अगस्त को रांची क्लब में प्रभात खबर परिवार के तमाम सदस्य इस मौके पर उपस्थित रहेंगे. प्रयास किया जा हा है कि प्रभात खबर के पुराने सदस्य भी इस मौके पर मौजूद रहें. आपकी मौजूदगी के बगैर यह कार्यक्रम अधूरा रहेगा. आपसे विनम्र आग्रह है कि अपने व्यस्त कार्यक्रम से समय निकालकर 15 अगस्त 2009 को रांची मेन रोड स्थित रांची क्लब में शाम में आने का कष्ट करें. प्रभात खबर परिवार के सदस्य आपकी जुबान से उस कहानी को सुनना चाहते हैं कैसे आपने रांची से प्रभात खबर प्रकाशित करने की योजना बनाई थी, फिर बाद में कैसे मूर्त रूप दिया. हम आपके आने तक प्रतीक्षा करेंगे. सादर.

आपका विश्वासी,

अनुज कुमार सिन्हा,

वरिष्ठ संपादक (झारखंड),

प्रभात खबर, रांची”

पत्र पाकर खुशी तो हुई किन्तु साथ ही एक आशंका ने भी जन्म लिया. ‘इतिहास लिखवाए जाने’ के वर्तमान काल में ‘सच’ को सामर्थ्यवानों से मिल रही चुनौतियां अब कोई आश्चर्य पैदा नहीं करती. कड़वा सच यह भी कि ऐसे ‘लिखवाए गये इतिहास’ के समर्थन में स्वार्थियों की एक फौज खड़ी हो जाती है. निज स्वार्थपूर्ति की भूख से प्रेरित होते हैं ये लोग. भूतकाल के सच को वर्तमान के झूठ से ढंकना इनकी मजबूरी होती है. मीडिया जगत पर भी इसकी छाया स्पष्टत: परिलक्षित है. खैर, ‘प्रभात खबर’ परिवार के सदस्य मेरी जुबान से सुनना चाहते थे प्रभात खबर के प्रकाशन की मेरी योजना और फिर उसे मूर्त रूप दिये जाने की गाथा को. किन्ही कारणों सें रूबरू ऐसा संभव नहीं हो पाया. किन्तु आज इतिहास रच रहे प्रभात खबर परिवार के सदस्यों की इच्छा की पूर्ति करना मेरा कर्तव्य है, धर्म भी. इस हेतु अपने ‘ब्लॉग’ का सहारा ले रहा हूं.


14 अगस्त 1984! ठीक ही कहते हैं कि समय के पंख नहीं होते. 25 वर्ष बीत गए. लेकिन लगता है अभी कल ही की बात है जब रांची (झारखंड) से दैनिक प्रभात खबर का प्रकाशन आरंभ किया था. रांची क्लब के प्रांगण में देश के सुख्यात पत्रकार अंग्रेजी दैनिक ‘स्टेट्समेन’ के संपादक (स्व.) एस. सहाय और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री एन.के.पी. साल्वे के हाथों प्रभात खबर का लोकार्पण संपन्न हुआ था. वस्तुत: तब एक पत्रकारीय स्वप्न की पूर्ति की दिशा में प्रभात खबर परिवार ने कदमताल किया था. स्वप्न था, एक ऐसे पाठकीय मंच के निर्माण का जिस पर पाठक और पत्रकार संयुक्त रूप से बगैर किसी पूवाग्रह के निडरतापूर्वक सत्य के पक्ष में चिंतन-मनन-लेखन कर सकें. समाज को सूचना के साथ ही शिक्षित करने के अखबारी दायित्व को हमने चिन्हित किया था. तब मेरे अचेतन में स्वत: कहीं एक स्वप्न सृष्टि का निर्माण हो रहा था. हां, स्वत:! छपाई मशीन की खड़खड़ाहट के बीच जन्म और पत्रकारीय पारिवारिक पार्श्व! पत्रकारीय मूल्य के रक्षार्थ सब कुछ कुर्बान कर देने वालों के साए में पला-बढा़! प्रभात खबर को पूंजी के दबाव से बिल्कुल मुक्त मंच बनाने का स्वप्न हमने देखा था. प्रभात खबर परिवार के सभी सदस्यों ने, अनेक बाधाओं के बावजूद, सफलतापूर्वक इस सोच को अंजाम दिया. प्रकाशन के आरंभिक छ: माह में ही प्रभात खबर ने न केवल दक्षिण बिहार (झारखंड) बल्कि अविभाजित बिहार के प्राय: सभी हिस्सों के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर एक अलग पहचान बना लिया था. कलकत्ता (कोलकत्ता), उत्तर प्रदेश, त्रिवेन्द्रम और दिल्ली में भी प्रभात खबर की मांग लगातार बढ़ने लगी थी, तब पत्रकारिता के प्रकाश स्तंभ नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक (स्व.) राजेंन्द्र माथूर ने टिप्पणी की थी ”….. हिन्दी पत्रकारिता को विनोदजी की यह (प्रभात खबर) एक अमूल्य- क्रांतिकारी देन है.” यह संभव हो पाया था युवा जुझारू पत्रकारों की सपर्पित टीम के कारण. समर्पण ऐसा कि आरंभिक दिनों में संपादकीय सहयोगियों ने ‘हॉकर’ की तरह प्रभात खबर के अंक रांची शहर में बेचे. इस संदर्भ में एक उदाहरण देना चाहूंगा.

हटिया औद्योगिक क्षेत्र में प्रभात खबर की एजेंसी नहीं मिल पा रही थी, ‘रांची एक्सप्रेस’ और दैनिक ‘आज’ ही वहां बिकते थे. एक दिन अल सुबह अखबार छपने के बाद अखबर के बंडल मैंने अपने गाड़ी में लादे. वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी विजय भास्कर, रायतपन भारती और किसलय मेरे साथ गाड़ी में बैठ हटिया क्षेत्र में पहुंचे. एक पेड़ के नीचे गाड़ी को पार्क किया और हम चारों प्रभात खबर की प्रतियां हाथों में लेकर चार अलग-अलग स्थानों पर खड़े हो गए, तब एचईसी की विभिन्न इकाइयों के प्रथम पाली में ड्यूटी के लिए कर्मचारी जा रहे थे. सुबह 5-5:30 बजे! अंधेरा छंट रहा था. जब हम चारों ने हॉकर की तरह प्रभात खबर के अंक बचे. यह सिलसिला लगभग एक सप्ताह चला. पाठकों के बीच प्रभात खबर की मांग बढ़ी और उस क्षेत्र में एजेंसी शुरू हो गई. तपन भारती ने तो सुबह-सुबह रांची रेलवे स्टेशन पर जाकर प्रभात खबर के अंक बेचे. एक अकल्पनीय जुनून सभी संपादकीय सहयोगियों पर सवार था. पाठकों के बीच प्रभात खबर की मांग और लोकप्रियता के आलम की एक रोचक जानकारी उन दिनों बिहार के एक मंत्री शंकरदयाल सिंह ने दी थी. एक दिन सुबह-सुबह छपरा शहर से वह गुजर रहे थे. चौराहे के निकट भीड़ देखकर उन्होंने गाड़ी रुकवाई. ड्राइवर को कारण जानने को भेजा, ड्राइवर ने आकर बताया कि ‘ अरे कुछ नहीं, रांची के प्रभात खबर का बंडल खुल रहा है. ग्राहकों की भीड़ है.’ 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उत्पन्न दंगों के कारण शहर में कर्फ्यू लग गया था. अखबार के वितरण में कठिनाई हो रही थी. तब अखबार छपने के बाद मैं अपने सहयोगियों के साथ अपनी गाड़ी में प्रभात खबर के बंडल को लेकर मुहल्ले-मुहल्ले में जाकर एजेंटों/हॉकरों के घर पर पहुंचा दिया करता था. ‘कर्फ्यू पास’ का भरपूर उपयोग तब मैंने किया था. एजेंट/हॉकर अपने-अपने मुहल्ले में प्रभात खबर का वितरण कर दिया करते थे. जबकि अन्य अखबार इस मामले में पिछड़ गए थे.

ज्ञानरंजन को कांग्रेस पार्टी ने रांची शहर से उम्मीदवार बनाया था. ज्ञानरंजन की उम्मीदवारी का घोर विरोध कांग्रेस पार्टी के अंदर शुरू हो गया था. कांग्रेस के एक अति सक्रिय नेता जगन्नाथ चौधरी विद्रोही उम्मीदवार के रूप में खड़े हो गए. यह दोहराना ही होगा कि चौधरी को रांची में कांग्रेस संगठन का पूरा समर्थन प्राप्त था. मेरे एक घनिष्ट मित्र विजयप्रताप सिंह के छोटे भाई छात्र नेता रंजीत बहादुर सिंह स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में जमे हुए थे. चुनाव में रंजीत की मौजूदगी के कारण ज्ञानरंजन, जगन्नाथ चौधरी और समीपस्त हटिया विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे सुबोधकांत सहाय (संप्रति केन्दीय मंत्री) परेशानी में पड़ गए थे. क्योंकि प्राय: सभी युवा कार्यकर्ता रंजीत के लिए ही काम कर रहे थे. कांग्रेस संगठन का विरोध और विद्रोही जगन्नाथ चौधरी के प्रभाव के कारण ज्ञानरंजन की स्थिति अत्यंत ही नाजुक हो चली थी. मुझ पर दबाव पड़ा कि मैं अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए रंजीत बहादुर सिंह को उम्मीदवारी वापस लेने के लिए तैयार कर दूं. दबाव इतना कि एक दिन पटना से तत्कालीन डीआईजी दिनेश नंदन सहाय (संप्रति राज्यपाल त्रिपुरा) का फोन आया कि रंजीत को बैठाओ नहीं तो ज्ञानरंजन नहीं टिकेंगे. पटना के कुछ पत्रकार मित्र भी इस संबंध में लगातार मुझसे संपर्क में थे. अंतत: अपने संबंधों को दांव पर लगाते हुए, रंजीत के मित्रों-संबंधियों के विरोध के बावजूद चुनाव से हटने के लिए रंजीत को तैयार कर लिया. केंन्द्रीय नेता टी. अंजैया और जी. एल. डोगरा, रंजीत की उम्मीदवारी वापसी के साक्षी बने. रंजीत न केवल चुनावी मैदान से हटे बल्कि ज्ञानरंजन के पक्ष में सक्रिय सहयोग दिया. ज्ञानरंजन चुनाव में विजयी हुए. बता दूं कि ज्ञानरंजन की जीत में निर्णायक भूमिका रंजीत के प्रभाव वाले क्षेत्रों ने निभायी. सुबह 4 बजे चुनाव परिणाम की घोषणा के बाद प्रमाणपत्र हाथों में लिए ज्ञानरंजन की अश्रुयुक्त आंखें बहुत कुछ कह रही थीं. उस दिन से हमारी घनिष्टता बढी. प्राय: प्रतिदिन की मुलाकात के दौरान चर्चा का विषय समाचारपत्र प्रकाशन भी होता था.

केन्द्रीय सत्ता से निकटता का हवाला देते हुए ज्ञानरंजन भरपूर मदद का आश्वासन दिया करते थे. लेकीन मैं आश्वस्त नहीं हो पाता था. इस बीच 1982 के जनवरी माह में मैं समाचार एजेंसी समाचार भारती का संपादक सह क्षेत्रीय प्रबंधक बन कर कलकत्ता चला गया. ज्ञानरंजन अक्सर वहां आया करते थे. एक दिन मेरे मित्र डा. हरी बुधिया की मौजूदगी में ज्ञानरंजन मिलने आए. रांची के प्रतिष्ठित बुधिया परिवार के सदस्य हरी बुधिया से तब मैंने ज्ञानरंजन की औपचारिक मुलाकात करवाई. नियति ने ऐसे संयोग पैदा किए की डा. बुधिया ‘भामा शाह’ की भूमिका में मदद को सामने आ गए. मेरे और ज्ञानरंजन के बीच तय समझौते के आधार पर एक कंपनी ‘विज्ञान प्रकाशन प्रा.लि.’ के नाम से बनाई गई इसमें मैं, मेरी पत्नी शोभा, ज्ञानरंजन और उनकी पत्नी बिभा रंजन साझेदार/निवेशक बने. तय यह पाया कि विज्ञान प्रकाशन के अंतर्गत प्रिटिंग प्रेस की स्थापना की जाएगी और दैनिक अखबार का स्वामित्व मेरा रहेगा. इसी समझौते के अनुरूप दैनिक प्रभात खबर का रजिस्टर्ड कार्यालय हरमूर कॉलोनी स्थित मेरा निवास बना और विज्ञान प्रकाशन का रजिस्टर्ड कार्यालय वर्दवान कंपाउंड स्थित ज्ञानरंजन का आवास बना. बाद में मैंने अपनी और से ज्ञानरंजन को प्रभात खबर में पार्टनर बना लिया. ज्ञानरंजन अपनी और से इसके लिए तैयार नहीं थें किन्तु इस आधार पर कि जब एक साथ उपक्रम को आगे बढ़ाया जा रहा है, मैंने उन्हे तैयार किया.

प्रभात खबर का नामकरण : दिल्ली स्थित प्रेस रजिस्ट्रार के यहां मैंने अनेक टाइटल भेजे थे, लेकिन सभी अस्वीकृत कर दिए गए. एक दिन मैं स्वयं दिल्ली रजिस्ट्रार से मिलने पहुंचा. मैं चाहता था कि टाइटल में ‘समाचार’ शब्द आए लेकिन रजिस्ट्रार इसके लिए तैयार नहीं थे. वे बार-बार जोर दे रहे थे कि अंग्रेजी-हिन्दी का कोई मिश्रण बनाया जाए लंबी माथापच्ची के बाद अचानक मेरे मस्तिष्क में हिन्दी-उर्दू का मिश्रण ‘प्रभात खबर’ कौंधा. रजिस्ट्रार तैयार हो गये. इस प्रकार ‘प्रभात खबर’ का टाइटल लेकर मैं रांची वापस लौटा. मुझे आज भी अ’छी तरह याद है कि प्राय: सभी मित्रों ने प्रभात खबर टाइटल का तब मजाक उडाया था. हिन्दी-उर्दू के मिश्रण की बात उनके गले नहीं उतर रही थी. नाम बदलने के सुझाव भी आए. लेकिन मैं ‘प्रभात खबर’ के नाम पर अडिग रहा. मैं इस मत पर अड़ा रहा कि अंतत: प्रभात खबर लोकप्रिय होगा और एक ट्रेंड सेटर बनेगा. ‘खबरों में आगे-खबरों के पीछे’, ‘अब नगर की हर सुबह, नई खबरों की सुबह’, ‘एक अखबार सारा संसार’ आदि स्लोगन खूब प्रचारित किए गए. संभवत: ‘खबर’ शब्द का भरपूर प्रचलन प्रभात खबर के साथ ही शुरू हुआ. प्रभात खबर के संवाददाताओं को ‘प्रखर संवादक’ के रूप में एक अलग नई पहचान दी गई.

संपादकीय सहयोगी : संपादकीय सहयोगियों की नियुक्ति के लिए रांची, पटना और दिल्ली में साक्षात्कार लिए गए. हर आवेदकों को लिखित परिक्षाओं से गुजरना पड़ा. योग्यता के आधार पर पूरे देश से छांट-छांट कर नियुक्तियां की गई. उल्लेखनीय है कि तब स्थानीय के रूप में सिर्फ दो लोग कल्याण कुमार सिन्हा और अविनाश चंद्र ठाकूर संपादकीय सहयोगी बने थे. अन्य बाद में जुड़े. शेष सभी संपादकीय सहयोगी रांची के बाहर के थे. इसे लेकर स्थानीय पत्रकार नाराज भी हुए. एक जुझारू रचनात्मक टीम तैयार हुई थी. भूख और नींद दोनों को भुला सभी सहयोगियों ने प्रभात खबर की प्रगति में अतुलनीय योगदान दिया. तब मुंबई से प्रकाशित अंग्रेजी साप्ताहिक ‘ब्लिट्स’ के सुख्यात कार्टूनिस्ट लोकमान्य भी ब्लिट्स छोड़कर प्रभात खबर से जुड़े थे. टेक्निकल स्टाफ की टीम में करंट (मुंबई) और टेलीग्राम (कलकत्ता) के सहयोगी जुड़े. उल्लेखनीय है कि प्रभात खबर के प्रकाशन के साथ ही रविवार (कलकत्ता) के संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह, नवभारत टाइम्स (दिल्ली) के दीनानाथ मिश्र और नवभारत टाइम्स (पटना) के अरूण रंजन, अंबिकानंद सहाय (स्टेट्समन), मोहन सहाय (स्टेट्समन), और डा.वी.पी. शरण (पेट्रियॉट) का भरपूर सहयोग मिला. तब हमने पूरे देश में संवाददाताओं का एक नेटवर्क तैयार किया था. सुरेंद्र प्रताप सिंह ने तो प्राय: प्रत्येक राज्यों के अपने प्रतिनिधियों को प्रभात खबर में लिखने के लिए विशेष अनुमति प्रदान कर दी थी. संभवत: प्रभात खबर तब अकेला क्षेत्रीय अखबार था, जिसके संवाददाता पूरे देश में फैले थे. प्रसार और विज्ञापन विभाग में भी प्रतिष्ठित-अनुभवी व्यक्तियों का योगदान मिला.

भवन निर्माण : कोकर इंडस्ट्रियल एरिया में जमीन के आवंटन के बाद हमने अपने आर्किटेक्ट मित्र मयुख विरनवे की मदद ली थी. मित्रों का भरपूर सहयोग मिला. यहां अपने मित्र श्रीहरि मुरारका, विजयप्रताप सिंह और अमरेश वर्मा का उल्लेख नहीं करना अकृतज्ञता होगी. मालूम हो कि मुरारका ने अपने रोलिंग मिल से भवन के लिये पूरे लोहे के छड़ की आपूर्ति की थी. विजयप्रताप सिंह ने अपने भट्टे से ईंट और उनके भाई अशोक सिंह द्वारा रेत की आपूर्ति कराई थी. अमरेश के पास सीमेंट की एजेंसी थी. इन सभी ने सामग्रियों की आपूर्ति बगैर किसी अग्रिम भुगतान के किया था. मुरारका और विजय प्रताप सिंह ने तो छड़, रेत और ईंट के लिए पैसे लिए भी नहीं. कहने का तात्पर्य यह कि उस समय प्रभात खबर के पक्ष में मित्रों ने तन-मन-धन से योगदान दिया था.

स्मृतियां पूर्व निर्धारित और स्वनिर्मित स्थितियों से गुजरती हुई नियति को चिन्हित करती चली जाती हैं. प्रभात खबर के प्रकाशन की कल्पना, उसे आकार दिया जाना और फिर उससे पृथक होने की घटना नियति से जुड़ी एक ऐसी गाथा है जिसे अल्पशब्दों में बांधना कठिन है. आज जब प्रभात खबर प्रकाशन के 25 वर्ष पूरे कर रहा है, तब उन दिनों की अनेक यादें कड़वे, मीठे रूप में सामने है. ‘प्रभात खबर मेरा चौथा बेटा…..’ शीर्षक के अंतर्गत ‘भडास4मीडिया डॉट कॉम’ पर साल के पहले दिन 1 जनवरी 2009 को प्रकाशित मेरे साक्षात्कार में कुछ बातों की चर्चा है. प्रभात खबर के प्रकाशन से लेकर अब तक की अपनी पत्रकारीय यात्रा की गाथा शीघ्र प्रकाशित ”दंश” नामक पुस्तक में मिलेगी. पत्रकारीय मूल्यों की उंचाई और क्षरण से लेकर विश्वसनीयता के वर्तमान के संकट के कारणों की पड़ताल इस पुस्तक में की गई है. आज तो मैंने प्रभात खबर परिवार के सदस्यों के आग्रह को स्वीकार करते हुए इसकी प्रकाशन से जुड़ी गाथा के कुछ अंश ही यहां दे पाया. अवसर विशेष की गरिमा को देखते हुए ऐसा करने पर मजबूर हूं. प्रभात खबर के तमाम सदस्यों व पाठकों को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं. मुझे पूरा विश्वास है कि प्रधान संपादक हरिवंश के नेतृत्व में प्रभात खबर अपने आंदोलन को आगे बढ़ाता हुआ सफलता के नए-नए कीर्तिमान स्थापित करेगा.

शुभकामनाएं.


यह लेख एसएन विनोद के ब्लाग चीरफाड़ से साभार लिया गया है। ब्लाग पर जाने और अपना कमेंट दर्ज कराने के लिए क्लिक करें- प्रभात खबर के 25 वर्ष

एसएन विनोद तक अपनी बात snvinod41@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं।

प्रभात उत्सव : 25 प्रतिभाओं का सम्मान

प्रभात उत्सव का उदघाटन सत्र

प्रभात खबर के रजत जयंती समारोह का रांची में आज विधिवत उदघाटन झारखंड के राज्यपाल के शंकर नारायणन के हाथों दीप प्रज्ज्वलित कर शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम के पहले सत्र में झारखंड की माटी को पहचान दिलाने वाले सांस्कृतिककर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद, लेखक-साहित्यकार, डाक्टर, खिलाड़ी और संस्थाओं को सम्मानित किया गया। समारोह में कुल 25 लोगों को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर कई किताबों का भी विमोचन किया गया।

समारोह में मुख्य अतिथि राज्यपाल के. शंकर नारायणन और अतिथि लोकसभा के उपाध्यक्ष कडिया मुंडा, केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय, पूर्व मुख्यमंत्री व सांसद बाबूलाल मरांडी, पूर्व मुख्यमंत्री व सांसद अर्जुन मुंडा ने संयुक्त रूप से प्रभात खबर की विकास यात्रा से जुड़ी पुस्तक का विमोचन किया।

दूसरे सत्र में झारखंड के विकास पर सार्थक बहस हुई। रांची क्लब में आयोजित समारोह के पहले सत्र में अपने ओजस्वी संबोधन में मुख्य अतिथि राज्यपाल के. शंकर नारायणन ने कहा- ‘प्रभात खबर के रजत जयंती समारोह में शिरकत करते हुए मुझे हार्दिक प्रसन्नता हो रही है। 1984 में शुरू हुआ यह अखबार कभी बंद होने के कगार पर था, आज आईआरएस का सर्वे बताता है कि आम लोगों की समस्याओं को प्रमुखता के साथ उठाते हुए इस अखबार की रीडरशिप लगभग 47 लाख के करीब और प्रसार संख्या 3.59 लाख तक पहुंच गई है। प्रभात खबर सबसे विश्वसनीय अखबार बन गया है। भारत की पत्रकारिता में प्रभात खबर स्थापित नाम है। झारखंड की जनता को शिक्षित करने और सूचनाएं प्रेषित करने में प्रभात खबर की भूमिका महत्वपूर्ण है। जनतंत्र में प्रेस और मीडिया लोगों के अधिकारों व सुरक्षा का कवच है।’

इस अवसर पर राज्यपाल ने सरकार की प्राथमिकता और योजनाएं बताईं।  

दूसरे सत्र में झारखंड के विकास पर कडिया मुंडा, सुबोधकांत सहाय, बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, इंदर सिंह नामधारी ने अपने विचार रखे। बहस का संचालन प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश ने किया। हरिवंश ने अपने संबोधन में प्रभात खबर की विकास यात्रा, प्रभात खबर के जन-जुड़ाव, प्रभात खबर की वैचारिक प्रतिबद्धता का उल्लेख किया। धन्यवाद ज्ञापन प्रभात खबर के वाइस प्रेसीडेंट केके गोयनका ने किया। इस मौके पर बड़ी संख्या में प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षाविद, अधिवक्ता, डाक्टर, सांस्कृतिककर्मी, राजनीतिज्ञ और शहर के गणमान्य लोग जुटे थे।

ज्ञात हो कि प्रभात खबर के 25 वर्ष पूरे होने पर रांची में तीन दिनी ‘प्रभात उत्सव’ का आज पहला दिन था।


दो तस्वीरें : ‘प्रभात उत्सव’ का उदघाटन और प्रधान संपादक हरिवंश का संबोधन….


प्रभात उत्सव का दीप जलाकर उदघाटन करते झारखंड के राज्यपाल के. शंकर नारायणन। सबसे दाएं हैं प्रभात खबर के वाइस प्रेसीडेंट केके गोयनका, उनके बगल में हैं केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय।

प्रभात उत्सव के उदघाटन सत्र को संबोधित करते प्रधान संपादक हरिवंश। मंच पर विराजमान सुबोधकांत सहाय और के. शंकर नारायणन।

25 वर्ष पूरे होने पर 14 से तीन दिनी ‘प्रभात उत्सव’

झारखंड, बिहार और बंगाल से प्रकाशित होने वाला हिंदी दैनिक प्रभात खबर 14 अगस्त को 25 साल पूरा कर रहा है. इस अवसर पर रांची में 14 अगस्त से 16 अगस्त तक ‘प्रभात उत्सव’ आयोजित किया जा रहा है। उत्सव में अनेक कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं. 14 अगस्त 1984 को प्रभात खबर का प्रकाशन रांची से शुरू किया गया था. उसके बाद जमशेदपुर, पटना, धनबाद, कोलकाता, देवघर और सिलिगुडी से भी प्रभात खबर का प्रकाशन शुरू किया गया. प्रधान संपादक हरिवंश के नेतृत्व में अब यह अखबार तीन राज्यों के सात जगहों से निकलता है.

रजत जयंती समारोह का उदघाटन झारखंड के राज्यपाल के शंकर नारायणन 14 अगस्त को रांची क्लब में दिन के सवा दस बजे करेंगे. इसके बाद पिछले 25 साल के दौरान झारखंड में उल्लेखनीय कार्य करने वाले 25 लोगों-संस्थाओं  को प्रभात खबर झारखंड गौरव सम्मान प्रदान करेगा. 14 अगस्त को ही प्रभात खबर से संबंधित पुस्तक का विमोचन राज्यपाल करेंगे.  दोपहर में झारखंड के विकास पर एक परिचर्चा आयोजित की जायेगी, जिसमें लोकसभा के उपाध्यक्ष करिया मुंडा,  केंद्रीय खाद्य एवं प्रसंस्करण मंत्री सुबोधक कांत सहाय, पूर्व वित्त एवं विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा, पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा,  पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन एवं पूर्व विधानसभा अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी भाग लेंगे.

14 अगस्त को सायं साढे पांच बजे से भोपाल के गुंडरेचा बंधु ध्रुपद गायन प्रस्तुत करेंगे. फिर कवि सम्मेलन का आयोजन होगा, जिसमें सुरेंद्र शर्मा समेत कई नामी कवि भाग लेंगे. 15 अगस्त को ध्वजारोहण के बाद प्रभात खबर परिवार के सदस्य मोटरसाइकिल रैली निकालेंगे. दिन भर कई प्रकार की प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया है, जिसमें बच्चों और महिलाओं के कार्यक्रम होंगे. शाम में प्रभात खबर परिवार के सदस्यों का गेट टू गेदर होगा और सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किया जाएगा. 16 अगस्त को कार्यक्रम के अंतिम दिन देश के जाने माने मार्केटिंग एक्सपर्ट रांची आयेंगे. इस दौरान मीडिया से जुडी कई हस्तियां भी होंगी. रांची के प्रमुख लोग भी इस अवसर पर मौजूद रहेंगे. इस अवसर पर सांस्कृतिक  कार्यक्रम का आयोजन होगा, जिसमें प्रमुख गायकव डांसर हिस्सा लेंगे. ये सारे कार्यक्रम रांची क्लब में होंगे. रजत जयंती के अवसर पर रांची में प्रभात खबर कार्यालय को दुल्हन की तरह सजाया गया है.

25 वर्षों की कहानी, प्रभात खबर की जुबानी

हर व्यक्ति का जीवन कई उतार चढ़ावों से बना होता है। जिसमें सुख, दुख, रोमांच, संघर्ष, प्रेम और जुनून आदि के अनमोल मोती बिखरे होते हैं। मेरी इस कहानी में भी आपको यह सब मिलेगा। अब आप सोचेंग फिर इसमें अलग क्या है। फर्क क्या है? यह फर्क है विभिन्न परिस्थितियों में आपके नजरिये का। अपने लिए तो हर कोई जीता है, औरों के लिए जीयें, तो कोई बात है। यही वो बात है जो आपको दूसरों से विशिष्ट बनाती है। यह कहानी है, मेरे जुनून की, मेरी आस्था की, मेरे संघर्ष की।

‘’ दे शिवा वर मोहे ऐसे शुभ करमन से कबहुं न डरूं,’’ यही मेरी जिंदकी का मूल मंत्र रहा। पत्रकारिता मेरा अस्त्र रही, लोगों का प्रेम और विश्वास मेरा कवच।

लोगों को उनके मुद्दों और समस्याओं से मुक्ति दिलाने की जो आग मुझमें थी उसमें तपिश ही नहीं शीतलता भी थी। उनका दुख-सुख मेरा दुख-सुख रहा। जन्म से पांच साल के भीतर कुछ कारणों से मेरा अस्तित्व खतरे में आ गया था लेकिन मेरे भाग्य में अभी बहुत कुछ करना लिखा था। मेरे बन्धुओं ने, मेरा साथियों ने मुझमें नए प्राण डाले और फिर जो मैं उठा, तो पीछे नहीं मुड़कर देखा।

सच पूछिए तो इतना आसान नहीं था यह सब। जब आपके दोस्त हजार होते हैं तो दुश्मन भी बहुत सारे हो जाते हैं। लोगों के लिए लड़ने वालों की ऐसी किस्मत होती है। मुझ पर कई आघात हुए। मुझे कमजोर बनाने के लिए कई प्रयास किए गए, पर देखिए न आज मैं आपके सामने हूं, अपनी कहानी सुना रहा हूं, सशक्त हूं। मुझे कुछ नहीं हुआ, जानते हैं क्यों? क्योंकि मेरे पास आप सबकी दुआएं थी, आपका प्यार और विश्वास था। जन चेतना का जो बेड़ा मैंने उठाया था उसे बुलंदियों पर मैं आज पहुंचा पाया हूं। अपने इस सफर में मुझसे लाखों लोग जुड़े, मैंने कई रूप धरे, तेज भागती दुनिया के संग उड़ान भी भरी और सफलताएं छुईं। इन सब में मेरे साथ कदम दर कदम चले हैं आप भी साथ। इसलिए यह कहानी आपकी भी है। चलिए फिर मिल बैठते हैं हम दोनों यार और साथ जीते हैं अतीत के उन हसीन पलों को।

क्रमशः….

अपनी इस जीवन स्मृति में आपको अपने जीवन के अमूल्य अनुभवों से रू-ब-रू कराने के इस प्रयास के पीछे एक मकसद भी है कि आप लोगों के योगदान को सराह सकूं।


देश के प्रमुख हिंदी दैनिकों में से एक प्रभात खबर के 25 साल पूरे होने पर प्रभात खबर खुद अपनी जुबानी इस पच्चीस वर्षीय यात्रा की दास्तान अपने पाठकों को बता रहा है। इस नायाब अभियान के तहत प्रभात खबर की दास्तान का एक हिस्सा हर रोज अखबार में प्रकाशित किया जा रहा है। अब तक कुल 15 हिस्से प्रकाशित किए जा चुके या होने वाले हैं, जिनमें से उपरोक्त पहला पार्ट हमने बी4एम पर प्रकाशित किया है। इन सभी 15 पार्ट को पढ़ने के लिए क्लिक करें-

  1. आंदोलन की आत्मकथा
  2. जन्मा एक नया तेवर
  3. कारवां चलता रहा, अपने मिलते गए
  4. घर से दूर घर मिला
  5. हर रिश्ते में मिली अनोखी मिठास
  6. तेज रफ्तार थी दुनिया, सो हम भी थे हवा पे सवार
  7. वैष्णव जन तो उन्हें कहिए, पीढ़ पराई जाने जो
  8. सुलग रही थी दिल में एक आग, कैसे बनाऊं बेहतर समाज?
  9. हाथ की रेखाओं को बदलना हमारे हाथ में है
  10. अतिथि देवा भवः
  11. बिना मरे स्वर्ग नहीं मिलता!
  12. चोर की दाढ़ी में तिनका!
  13. मुंह पर तो सब भला बोलते हैं, पीठ पीछे कोई बोले तो कोई बात है!
  14. दिल की बात रहती दिल में अगर तुम ना होते
  15. गिरते हैं शहसवार मैदाने जंग में और जब उठते हैं तो जीत कदमों में होती है

रिटायर होकर चैन से नहीं रह सकता : हरिवंश

हरिवंश

हमारा हीरो – हरिवंश (प्रधान संपादक, प्रभात खबर) : भाग-3 : मुझे और अच्छी अंग्रेजी आती तो मैंने जीवन में और अच्छा किया होता : मैं असंतुष्ट, निराश, बेचैन रहने वाला आदमी हूं : मैं बहुत साफ-साफ, दो टूक बात करता हूं :  एक भी ऐसा काम नहीं किया, जिसके लिए पश्चाताप हुआ हो या कोई ऊंगली उठा सके : मेरे अंदर आक्रोश बहुत है : मेरी नगद बचत क्या है, वह भी अगर आप चाहें तो ब्योरा दे दूं : पत्रकार पहल कर कोई संवैधानिक पीठ बनवाएं, जिससे हर पत्रकार कानूनन अपने और अपने परिवार की संपत्ति का ब्योरा उस संस्था को दे :


हरिवंश-मीडिया में हर किसी के बारे में उल्टे-सीधे कहने का दौर है। लोग आपको भी नहीं बख्शते। कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि हरिवंश जी ने काफी पैसा कमा लिया है। आपके कई शहरो में फ्लैट हैं? इसमें कितनी सच्चाई है?

–अपने बारे में आपसे यह चर्चा पहली बार सुन रहा हूं। मेरी आदत है, न मैं किसी के बारे में बगैर तथ्य कुछ कहता हूं, न अफवाह-गॉशिप किसी के बारे में सुनता हूं या कहता हूं। पर हम पत्रकारों की दुनिया आज अजीब हो गई है। आज जो माहौल है, उसमें किसी के बारे में कुछ भी बोला जा सकता है, कहा जा सकता है, क्योंकि कुछ भी कहने-बोलने में एकाउंटेबिलिटी नहीं है। आपके माध्यम से मैं अपनी कुल संपत्ति का ब्योरा देता हूं। जनसत्ता कोआपरेटिव सोसाइटी (गाजियाबाद) में एक फ्लैट, एक तीन कमरे का फ्लैट रांची में, जिसमें रहता हूं। रांची में फ्लैट के अलावा दुकाननुमा एक छोटा-सा हाल है। बहुत पहले कुछ साथियों ने मिलकर शहर से काफी दूर छोटा घर बनाने के लिए जमीन का छोटा-सा टुकड़ा (20 डिसमिल) लिया था। रांची का कट्ठा काफी छोटा होता है। कुछ वर्षों पहले उसको बेचकर वैसा ही एक टुकड़ा शहर से उतनी ही दूर लिया। उससे थोड़ा अधिक बड़ा। यही कुल मेरी संपत्ति है। गांव पर पुश्तैनी घर है। पुश्तैनी जमीन है। जब हम गांव जाते हैं तो उसी घर में रहते हैं अन्यथा वह बंद रहता है। गांव में जो हमसे जुड़े लोग रह रहे हैं, पीढ़ियों से, उनके माध्यम से कुछ जमीन पर खेती भी कराते हैं।

नौकरी में आने के बाद जब-जब जो-जो चीजें मैंने लीं, उन सबकी सूचनाएं संबंधित संस्थानों को दे दिया है। हालांकि, यह बाध्यकारी नहीं था। मौजूदा संस्था से दो बार बड़ा लोन लिया। दिल्ली में जब जनसत्ता सोसाइटी में फ्लैट लिया तो उसका पूरा ही लोन इसी संस्था से सूद पर लिया, जो अभी ग्यारह वर्षों बाद, इस साल चुका पाया हूं। इसे मुझे वर्ष 2005-06 में ही चुका देना चाहिए था। इसके अलावा रांची में फ्लैट और एक अन्य छोटा दुकाननुमा हाल लेते वक्त दो बड़े बैंकों से बड़ा कर्ज लिया। इन सबका ब्योरा-विवरण कोई देखना चाहे, तो वह उपलब्ध है। मेरे पास अपनी निजी गाड़ी भी नहीं है, आफिस की गाड़ी है।

हरिवंशमैं जिस संस्थान में भी रहा, शुरू से इनकम टैक्स को विवरण देता रहा। मेरे पास एक-एक संपत्ति कब, कहां और कैसे आयी, घर का फर्नीचर तक कब, कहां से आया, इसका एक-एक ब्योरा खुद आयकर को देता हूं। इस संपत्ति के अलावा मेरे पास कोई और संपत्ति की सूचना दे सके, तो मैं उसका जवाब दूं। अगर बत्तीस वर्षों की कई अच्छी नौकरियों, अच्छे संस्थानों में काम करने के बाद मेरेपास कुल यही है, तो आप स्वतः अंदाज कर सकते हैं। मैंने टाइम्स आफ इंडिया से शुरुआत की, बैंक में अधिकारी के रूप में रहा। फिर आनंद बाजार में सहायक संपादक के रूप में रहा। कुछ दिनों के लिए प्राइममिनिस्टर आफिस में अतिरिक्त सूचना सलाहकार (ज्वायंट सेक्रेटरी, भारत सरकार) रहा। आप मानेंगे कि ये सभी संस्थाएं, वेतन और सुविधाएं तो बेहतर देती ही हैं। आज भी जहां हूं, अच्छा वेतन मिलता है। मुझे निजी बातें बताने में अत्यंत क्षोभ होता है। किस संस्थान में किस पद पर रहा, यह सब बताने में आत्मसंकोच होता है। पर आपका प्रश्न ही ऐसा है, जो बताना पड़ रहा है। न मैं होटलों मे जाता हूं, न क्लबों में जाता हूं। न कोई अतिरिक्त खर्च है। मेरे बच्चे भी अच्छे जॉब में गये। बेटे ने विदेश में चार वर्ष काम करने के बाद फिर पढ़ाई शुरू की है। इन सबके बाद भी मेरी नगद बचत क्या है, वह भी अगर आप चाहें तो एक-एक ब्योरा दे दूं। हां, यह कह सकता हूं कि आज चाहूं तो भी इच्छानुसार रिटायर होकर चैन से नहीं रह सकता। मुझे अच्छा लगा कि आपने यह सवाल पूछा। मैं चाहूंगा कि आप अपने फोरम से मेरा यह अनुरोध आगे बढ़ाएं कि पत्रकार पहल कर कोई संवैधानिक पीठ बनवाएं, जिससे हर पत्रकार कानूनन अपने और अपने परिवार कीसंपत्ति का ब्योरा प्रति वर्ष उस संस्था को दे और वह सार्वजनिक हो और अखबारों में छपे।

सवाल तो यह उठना चाहिए कि कौन-से पत्रकार अपने पद का दुरुपयोग कर रहे हैं? मैंने क्या दुरुपयोग किया है? ठेका, तबादला, दलाली में आज पत्रकारों के नाम क्यों आ रहे हैं? इस पर सप्रमाण सवाल उठने चहिए। सवाल इस पर उठे कि जिन पत्रकारों की 2-4 वर्ष पहले कोई हैसियत नहीं थी, न उन्होंने महत्वपूर्ण संस्थानों में काम किया, न उनकी वेतन सुविधाएं अच्छी, फिर भी वे अरबपति कैसे बन बैठे हैं?

हरिवंशपत्रकारिता मेरे लिए नैतिक कर्म है और मुझे संतोष है कि नैतिक पत्रकारिता करने की मैंने कोशिश की है। अनेक भूलें हुई हैं, गलतियां हुई हैं, पर एक भी ऐसा काम नहीं किया, जिसके लिए कभी कोई पश्चाताप हुआ हो या मुझ पर कोई ऊंगली उठा सके। चलते-चलते यह भी जोड़ दूं कि जब ‘प्रभात खबर’ में हम लोगों ने नये सिरे से काम करना शुरू किया तो घोषित तरीके से सार्वजनिक आचार संहिता बनायी। समय-समय पर उसे छापा। यहां तक कि किसी महत्वपूर्ण कार्यक्रम में शामिल होने पर मेरा नाम, बयान शायद ही देखने को मिले। नाम मिल भी गया तो बयान कभी नहीं। तस्वीर कभी नहीं।   

-सुना है,  आप प्रभात खबर के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में भी शामिल हो गए हैं?

–मैं बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में था। मैंने छोड़ दिया। आज से पांच-छह वर्ष पहले की बात है। पुन: मुझसे कहा गया लेकिन मैं पत्रकार के अलावा कुछ हूं नहीं, न रहना चाहता हूं। 

-जबसे झारखंड अलग राज्य बना, आप किसी मंत्री-मुख्यमंत्री से मिलने गए या नहीं?

–आठ वर्षों में तीन बार तीन मुख्यमंत्रियों ने मुझे बुलाया। मैं उनके घर गया। किसी मुख्यमंत्री के दफ्तर आज तक नहीं गया। किसी मंत्री के दफ्तर में तो आठ वर्षों से जाने का सवाल ही नहीं पैदा होता है। विधानसभा में एक बार गया हूं 2002-03 में। सचिवालय मैंने आज तक नहीं देखा। सिर्फ घर से दफ्तर। अगर दफ्तर में ज्यादा समय होता है तो अपने संवाददाताओं से बातचीत करता हूं। वही हमारे आंख-कान हैं। हम उनकी रिपोर्टों पर डिबेट करते हैं, पॉलिसी तय करते हैं। जैसे नक्सल इश्यू है। इसे हमें कैसे उठाना है? स्टेट अगर फेल कर रहा है तो कहां क्या करना है? अखबार में ऐसी वेराइटी है कि अनेक ऐसे मामले लोग दफ्तर पहुंचा जाते हैं, उनको उनकी आवाज और जन-भावना के अनुरूप प्रकाशित हो जाने की व्यवस्थाओं पर नजर रखना हमारी प्राथमिकता रहती है। 

हरिवंश-एक मनुष्य के बतौर आपकी पांच कमजोरियां क्या हैं?

–सबसे पहली कमजोरी यह है कि मैं बहुत कटा, अलग-थलग अकेले रहने वाला आदमी हूं, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। बचपन में ऐसा नहीं था। शायद अपने प्रोफेशन में आते-आते ऐसा हुआ। दूसरे, अपने घर को समय देना चाहिए, जो मैं नहीं दे पाता हूं। तीसरे, मैं मॉडर्न टेक्नोलॉजी- कंप्यूटर, इंटरनेट से दूर रहता हूं। चौथा, अगर मुझे और अच्छी अंग्रेजी आती तो मैंने जीवन में और अच्छा किया होता। प्रभाषजी को बहुत अच्छी अंग्रेजी आती है। पांचवां,  मुझे लगता है कि प्रभाष जी,  एमजे अकबर,  अरूण शौरी जैसे अनेक ऐसे लोग, जिनको नजदीक से देखा,  उतनी गहराई से मेरा अध्यवसाय नहीं हो सका है। एक और निजी कमी मेरे अंदर है, आक्रोश बहुत है। 

-किस बात को लेकर इतना आक्रोश है?

–बहुत सारी चीजों को लेकर। दरअसल, मैं एक प्रकार से असंतुष्ट, निराश, बेचैन रहने वाला आदमी हूं। बहुत-से नए लोगों को जोड़ा। जो कोई नया आदमी मेरे पास आया, अगर मैं मदद कर सकने की स्थिति में था तो मैंने सहयोग किया। इसके पीछे भी एक घटना है। ‘धर्मयुग’ में जब काम करने गया तो मैं यंगेस्ट पत्रकारों में था। धर्मवीर भारती हम लोगों को सिखाते थे। हम गलती करते थे तो लिखकर सही करना, भाषा ठीक करना बताते थे। इसी प्रकार कोई नौजवान हमारे यहां आया कि हम आपके यहां काम करना चाहते हैं, हमने उसे अपनी लिमिटेशन बताई। हम आपको इतना पैसा नहीं दे सकते। आपको क्या-क्या यहां परेशानी होगी। तब भी आप यहां काम करना चाहते हैं, मैंने उन्हें रोका नहीं। मदद की। यहां से निकले लड़के कई जगहों पर हैं। 

-सबसे ज्यादा गुस्सा आपको कब आया?

–जब भी ‘प्रभात खबर’ के साथ कोई ऐसी अनएथिकल कोशिश हुई कि इसको आगे नहीं निकलने देना है। जब हम विद्यार्थी थे, जयप्रकाश नारायण गिरफ्तार हुए थे तो उस समय लगा कि जैसे हमारे घर में कुछ हो गया हो, महीनों तक। निजी जीवन में या घर में, मैं तब अपने को थोड़ा कमजोर आदमी महसूस करता हूं, जब गुस्सा आता है। कई बार काम अगर सही ढंग से नहीं हो रहा हो, चाहे दफ्तर में, या घर में, तो मुझे गुस्सा आता है।  

-आपकी विनम्रता काफी चर्चित है। तो फिर अपने गुस्से को आप कैसे अभिव्यक्त करते हैं?

–मैं बहुत साफ-साफ, दो टूक बात करता हूं। 

… जारी …


अगर आप इस इंटरव्यू पर अपनी कोई प्रतिक्रिया हरिवंशजी तक पहुंचाना चाहते हैं तो उनकी मेल आईडी harivansh@harivansh.net का सहारा ले सकते हैं. 

इस इंटरव्यू का पूर्व का भाग पढ़ने के लिए क्लिक करें-

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खतरनाक खेल खेल रहे अखबार : हरिवंश

हरिवंशहमारा हीरो : हरिवंश (प्रधान संपादक, प्रभात खबर) : भाग-2 : मीडिया ने लोगों का विश्वास अब खो दिया है : मीडिया में गैर-जिम्मेदारी बहुत बढ़ गई है :  लोग समझ गए हैं कि खबरे खरीदी-बेची जाती हैं : ताकतवर हो चुके मीडिया पर नियंत्रण की कोई बॉडी नहीं हैं : ऐसा पोलिटिकल सिस्टम कमजोर होने से हुआ : मीडिया से ज्यादा ब्लैकमेलर पालिटिक्स हो गई है : जिस दिन राजनीति में विचार अहम होंगे, मीडिया भी रास्ते पर आ जाएगा : प्रभात खबर टिका हुआ है तो सिर्फ अपनी साख के दम पर : आज जब आस-पास देखते हैं तो हम सोच नहीं पाते कि किससे प्रेरणा लें : मैं वह व्यवस्था अवश्य देखना चाहता हूं, जिसमें इक्वल डिस्ट्रीब्यूशन हो : हम मशीन की तरह चल रहे हैं और मशीन की तरह खत्म हो रहे हैं

हरिवंश


-पटना संस्करण के बारे में बताइए? आप लोगों ने यहां प्रभात खबर री-लांच किया है। कैसा रिस्पांस है? कंटेंट के लेवल पर किस तरह के प्रयोग किए हैं?

–पटना एडीशन हमने लांच किया 1996 में। उम्मीद थी कि इसके लिए हम थोड़ी-बहुत पूंजी प्रबंधन और बैंक से लोन के रूप में ले आएंगे और अखबार को कंटेंट के लेवल पर बेहतर बना लेंगे, लेकिन हम ऐसा नहीं कर सके। तब तक हिंदुस्तान आ गया झारखंड में। झारखंड हमारा गढ़ है। हम लोग उसको बचाने में लगे रह गए। इस बीच पटना में हमारी एक मामूली उपस्थिति बनी। फरवरी 09 में हम लोगों ने पटना संस्करण को री-लांच किया। पटना में हम लोग हिंदुस्तान और दैनिक जागरण से मुकाबला नहीं कर रहे। हम उनकी पूंजी के सामने कहीं नहीं ठहरते। हमने प्रभात खबर को एक डिफरेंट बेस पर खड़ा किया। बीस पेज का अखबार, सप्ताह में तीन सप्लीमेंट, और उसका कंटेंट बिल्कुल अलग। कंटेंट के लेवल पर हम अनेक स्टोरी ब्रेक करते हैं। दूसरे लोग उसे फॉलो करते हैं।

उदाहरण के तौर पर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा क्यों मिले, इस पर हम कैंपेन चला रहे हैं। ये कैंपेन तथ्यों पर आधारित है। शायद यह पहली बार हो रहा है कि बिहार के साथ क्या भेदभाव हो रहा है, यह हकीकत एक अखबार सामने ला रहा है और बाकी सब इसका फॉलोअप कर रहे हैं। बिहार पहले एक बीमार राज्य के रूप में जाना जाता था। आज बहुत बदल रहा है। बदलने के संकेत क्या हैं, इस पर पहली रिपोर्टिंग हमने कराई। जितनी मोबाइल कंपनियां हैं, इनकी बिहार में प्रत्येक महीने की बिलिंग क्या होती है? जानकर आश्चर्य होगा कि 300 करोड़ रुपये की बिलिंग प्रत्येक महीने यहां से होती है। जहां पर लगभग 3600 करोड़ रुपये सिर्फ टेलीफोन कंपनियों के बिल भुगतान होते हों, आप समझ सकते हैं कि वह राज्य कैसे करवट ले रहा है। यह खबर हम लोगों ने छापी। बडे़ अखबारों ने इसे पेड विज्ञापन के रूप में छापना शुरू किया। इस तरह से एक इंपैक्टफुल अखबार बनाने की कोशिश की गई। हमने अपने अखबार का प्रोफाइल ही बिलकुल अलग कर दिया। जैसा कि आजकल आप देख रहे हैं, लोकलाइजेशन के नाम पर छह-छह पेज छापे जा रहे हैं। इसमें ऐसी भी खबरें होती हैं, जिनका कुछ प्रयोजन नहीं होता। हम दो या तीन पेज ही लोकल खबरें देते हैं। हमें इसमें प्रतियोगिता करनी ही नहीं। बाकी क्या बढ़ाया? इंटरनेशनल, गवर्नेस, विकास और अवसर से जुड़ी खबरें, एजेंडा के नाम से एक पेज। ये नए प्रयोग हमने शुरू किए।

हरिवंशतीन महीने में ही सर्कुलेशन दोगुना हो गया और पटना शहर में तीन गुना। हालांकि, यह बडे़ अखबारों के मुकाबले काफी कम है, लेकिन यह हमारी एक अच्छी कामयाबी है कि तीन महीने में हम एक इंपैक्टफुल अखबार निकाल पा रहे हैं। कोलकाता एडीशन हमने 2000 में शुरू किया। अब प्रभात खबर सात जगहों से छप रहा है- रांची, जमशेदपुर, धनबाद, देवघर, पटना, कलकत्ता और सिलीगुड़ी से। आज हमारा पटना एडीशन दूसरे नंबर का अखबार है।

-चुनाव में आप लोगों ने स्टैंड लिया कि खबरों का सौदा नहीं करेंगे। पर कई बड़े अखबारों ने खबरों का धंधा जमकर किया। मीडिया में ब्लैक मनी खूब आ रही है। प्रचुर पूंजी व बाजार के दबाव से मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी शिथिल हुई है। इस हालत में आप हिंदी पत्रकारिता का भविष्य क्या देखते हैं?

–यशवंत जी, दो चीजें मैं कहना चाहूंगा। एक अपने अनुभव के आधार पर। जैसे प्रभात खबर की एक सबसे बड़ी और गंभीर समस्या आप पूछें तो वह है पूंजी की कमी। पर पूंजी के लिए हम लोग अपने मानदंडों कभी किनारे नहीं रखते। प्रभात खबर के बारे में कोई नीति बनानी होती है तो हम सात-आठ प्रमुख लोग मिल-बैठते हैं, आपस में डिस्कस करते हैं। इसी तरह से हमने हाल के लोकसभा चुनाव में तय किया कि हमें क्या करना है और क्या नहीं करना है। एक-एक चीज तय कर हमने पहले ही अखबार में इसकी घोषणा कर दी और उसको पूरे चुनाव तक निभाया। हमें इस बारे में किसी पाठक का पत्र मिला तो उसे भी छापा। कोई शिकायत मिली, उसे भी अटेंड किया। हमारे थोडा-सा अच्छा कर देने से मीडिया की साख बढ़ी। हम मानते हैं कि प्रभात खबर इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी अगर टिका हुआ है तो अपनी इसी साख के बल पर। अगर हम भी सौदेबाजी करते तो वह अपनी ही साख से खेलना होता। अगर साख खत्म हो जाती तो प्रभात खबर नहीं टिकता। आज देश के दो ताकतवर अखबारों हिंदुस्तान और दैनिक जागरण के मुकाबले बीस महीने तक टिके रहने की हमें उम्मीद नहीं थी। सभी विशेषज्ञ भी प्रभात खबर के अस्त हो जाने के बारे में लिख चुके थे। राजस्थान में दो दिग्गज हैं, राजस्थान पत्रिका और भास्कर। सिर्फ बिहार और झारखंड में ही दो दिग्गजों के बीच एक छोटा अखबार संघर्ष कर रहा है। इसलिए हमें लगा कि अपनी विश्वसनीयता से सौदेबाजी करेंगे तो हम समाप्त हो जाएंगे। प्रभात खबर की पत्रकारिता ही नैतिक आग्रह से संचालित है।

हरिवंशसबसे बड़ी गड़बड़ी हुई है मीडिया के अंदर। अखबार बड़ा खतरनाक खेल खेल रहे हैं। इससे मीडिया लोगों में अपनी साख खो रहा है। जितने सर्वे हो रहे हैं, उनमें लोग कह रहे हैं कि पुलिस, प्रशासन, नेता, मीडिया एक हो चुके हैं। लोग कहते हैं कि अब पुलिस से डर लगता है, मीडिया से भी। ये हालात हैं। दूसरा खतरनाक खेल। इन अखबारों ने अपने संवाददाताओं, अपने लोगों को फोर्स कर बिजनेस में खड़ा कर दिया है। कल को वे दूसरी खबरों पर बिजनेस नहीं करेंगे, इसकी क्या गारंटी है? जब कोई संवाददाता एक नेता से डील करते हुए कहता है कि आप इतने का पैकेज दीजिए, हम आपका इंटरव्यू, आपके समर्थन की खबरें छापेंगे, तो वह पैसे वालों की ही खबरों को प्रमुखता नहीं देगा, ये आप कैसे इन्श्योर करेंगे? ये आप कर नहीं सकते। कोई मैकेनिज्म नहीं है इस वक्त। अब लोग समझ गए हैं कि खबरे खरीदी और बेची जाती हैं। अब मीडिया ने लोगों का विश्वास खो दिया है। ऐसे में मीडिया समाज-परिवर्तन का केंद्र बनना चाहे तो कभी नहीं बन सकता। मीडिया आत्मघाती दिशा में है। इसने अपनी विश्वसनीयता खो दी है। मैं मानता हूं कि मीडिया में गैर-जिम्मेदारी बहुत बढ़ गई है। आज बहुत ताकतवर हो चुके मीडिया पर नियंत्रण की कोई बॉडी नहीं हैं। ऐसा पॉलिटिकल सिस्टम कमजोर होने से हुआ है। हालांकि, इंदिरा गांधी के जमाने में विरोध था, पर ऐसा भी नहीं कि आप जब चाहें, स्टेट को ब्लैकमेल करें। आज ऐसा खूब होने लगा है। वजह? मीडिया से ज्यादा ब्लैकमेलर पॉलिटिक्स हो गई है।

-सर, यह तो बहुत निराश करने वाला परिदृश्य है। आखिर विकल्प क्या है?

–हमेशा दुनिया में वैचारिक आंदोलनों ने ही समाज और सभ्यता की रहनुमाई की है। एक गांधी नाम का व्यक्ति आता है, और देश का सारा गणित बदल देता है। वे तो अपने राजनीतिक प्रचार के लिए किसी अखबार की शरण में नहीं गए। उनका एक ही ध्येय और प्रयास था कि काम बोले। जिस दिन हमारी राजनीति में विचार अहम हो जाएंगे, मीडिया भी रास्ते पर आ जाएगा। आजादी की लड़ाई में, खासकर हिंदी मीडिया की प्रमुख भूमिका रही है। उन दिनों इलाहाबाद में एक स्वराज्य अखबार निकलता था। उसमें नियुक्ति के लिए एक विज्ञापन निकलता था। शर्त होती थी कि जो काले पानी की सजा के लिए तैयार हो, वही पत्रकारिता में आए। आवेदकों की भी लंबी कतार होती थी। उस वक्त के राजनेताओं ने अपने तप, त्याग और चरित्र से दिखाया कि देश, समाज को किस रास्ते ले जाना है। तब नेहरू, गांधी, सुभाष हमारे आदर्श थे। उनकी उस वक्त प्रैक्टिस फीस एक-दो लाख रुपए थे, आज के सौ-दो सौ करोड़ रुपये के बराबर। वे लोग सब-कुछ छोड़कर सड़क पर उतर पड़े। लाख संकट में रहे लेकिन विचार नहीं बदले। आज की राजनीति विचारहीन हो गई है। आजादी की लड़ाई में विचारों की राजनीति थी, सिद्धांतो की राजनीति थी, तप और त्याग की राजनीति थी। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे लोगों की प्रेरणा ने अच्छी पत्रकारिता को जन्म दिया। आज जब हम अपने आस-पास देखते हैं, सोच नहीं हरिवंशपाते कि किससे प्रेरणा लें? मनमोहन सिंह बहुत ईमानदार आदमी हैं, लेकिन निजी ईमानदारी से देश नहीं चलता। वह देश के लिए प्रेरणा स्रोत नहीं हो सकती। जवाहरलाल नेहरू मरे तो दूर-देहात के गांव तक रो पड़े। सन् बासठ के यु़द्ध में अनपढ़ महिलाओं ने भी देश के लिए अपने गहने उतार कर दे दिए। मुझे याद है कि जब शास्त्री जी की मौत हुई थी, तब भी घर-घर लोग रोए थे। जब मैं बनारस पढ़ने गया तो शास्त्री जी का घर देखने गया। तब उनके चाचा जीवित थे। उसी तरह टूटा पड़ा था शास्त्री जी का घर। उनके चाचा, जो देखने में हू-ब-हू शास्त्री जी की तरह थे, जाडे़ में लेवा ओढ़कर पडे़ हुए थे। उन दृश्यों का मेरे मन पर गहरा असर पड़ा। जीवित रहने के लिए हर समाज के पास अपना लीविंग लीजेंड और नायक होना चाहिए। इस समय हमारे समाज में ठहराव जैसी रिक्तता-सी आ गई है तो मीडिया का काम है लोगों के दिलों में ऐसे नायकों को जिंदा करना।

यह कहना ज्यादा सही होगा कि प्रभात खबर को जनता ने बचाया। अगर जनता दूसरा अखबार पढ़ने लगी होती तो हम लोग खत्म हो गए होते। पत्रकारिता में कई नए प्रयोग हमने किए। उनमें ज्यादा योगदान हमारे साथियों का रहा। 1992 में स्कूली बच्चों के बारे में सबसे पहले हम लोगों ने स्टोरी छापनी शुरू की। हमने कहा कि पत्रकारिता को नेताओं के कंधे से उतारकर सामान्य लोगों तक ले जाया जाए। जो बच्चे स्कूलों में बहुत अच्छा करते थे, उनको छापना शुरू किया। आज से 10-12 साल पहले हमने चलाई गुड स्टोरी। यानि अपने समाज में जो लोग बहुत अच्छा कर रहे हैं, उनके बारे में। एक व्यक्ति ने पहाड़ काट डाला था। 1991 में सबसे पहले प्रभात खबर ने उस पर कवर स्टोरी छापी थी। इस तरह अनेक नए प्रयोग किए। विनोद मिश्रा जब ओवरग्राउंड हुए तो सार्वजनिक रूप से सबसे पहले वह प्रभात खबर के मंच से बोले।

-आपकी विचारधारा क्या है? पॉलिटिकल और वैचारिक आग्रह में आपको क्या माना जाना चाहिए, मार्क्सवादी, मानवतावादी या समाजवादी?

हरिवंश–किसी ‘वाद’ की जगह मैं यह कहना चाहूंगा कि जब वयस्क हो रहा था, मुझे पढ़ने की आदत पड़ गई। समाजवादी साहित्य, लोहिया और अन्य समाजवादियों को पढ़ा। उससे समाज को समझने में काफी मदद मिली। कहावत है कि आप युवावस्था में क्रांतिकारी होते हैं, फिर मध्य वय में कैसे धीरे-धीरे व्यावहारिक हो जाते हैं, यह जीवन की एक प्रक्रिया है। उसने काफी प्रभावित किया। फिर नक्सली साहित्य वगैरह पढ़ा। आपको आश्चर्य होगा, नागभूषण पटनायक (बडे़ नक्सली नेता), जो आईपीएफ के संस्थापक थे, मैं उनसे मिलने, उनके गांव गुन्नुपुर गया। वहां न कोई मेरी भाषा समझता, और न मैं उनकी भाषा समझ पाता। वह लोकल तेलुगु बोलते थे। जब एक अनजानी जगह, उनके गांव पहुंचा रात आठ बजे तो पता चला कि वह बहुत बीमार थे। उनको कटक के अस्पताल ले जाया गया है। हम लोग अगले दिन कटक पहुंच गए। उनके साथ जमीन पर सोए। बाद के दिनों में उन्होंने मुझे पत्र भी लिखे थे। वह बहुत ही इंस्पाएरिंग व्यक्ति थे। जब मैंने जयप्रकाश नारायण को आंदोलन में देखा, एक बूढे़ व्यक्ति को लड़ते हुए, उनसे भी बहुत प्रेरणा मिली। बाद में जेल में चंद्रशेखर की डायरी पढ़ी। उस समय के चंद्रशेखर की, जब वह युवा तुर्क थे, इंदिरा गांधी के खिलाफ थे। वैसे ही एके गोपालन, ज्योति बसु, जार्ज फर्नांडिज, मधुलिमये आदि ने उन दिनों बहुत गहराई से प्रभावित किया था। भारतीय चीजों को समझने में समाजवादी साहित्य से मुझे बहुत मदद मिली। मैंने सर्वोदय साहित्य भी खूब पढ़ा। अध्यात्म में भी गहरी रुचि रही। कुल मिलाकर मैं वह व्यवस्था अवश्य देखना चाहता हूं, जिसमें इक्वल डिस्ट्रीब्यूशन हो।

-इतनी व्यस्तताओं के बीच पढ़ने का समय कैसे निकाल पाते हैं?

–मुझे पढ़ने की आदत है। हर सप्ताह एक कॉलम अपने अखबार में लिखता हूं शब्द संसार। नई पुस्तकों के बारे में लिखता हूं। उनमें भी ज्यादातर अंग्रेजी पुस्तकें, जिन्हें मैं खुद खरीदता हूं, किसी से मंगाता नहीं। अगर नहीं पढूं तो जो कुछ दुनिया में हो रहा है, उससे कट जाऊंगा। मुझे लगता है कि अगर इस उम्र में भी नौकरी कर पा रहा हूं तो अपने को इस मार्केट में रिलेवेंट बनाए रखने के लिए इस चीज को डेवलप्ड करूं। यह एक प्रोफेशनल जरूरत भी है। ताकि पढ़ने की आदत बनी रहे और नई चीजों की जानकारियां भी मिलती रहें। यात्रा में होता हूं तो भी दो-तीन किताबें साथ रखता हूं। हावर्ड में कोई लेक्चर दिया हो, कोई नया काम हो रहा हो, ओशो की किताब आई हो, सब मेरे पास होता है। यात्रा में कोशिश करता हूं कि सप्ताह में कोई एक मोटी किताब पूरी तरह न पढ़ पाऊं तो कम से कम उसके मुख्य अंश जरूर पढ़ डालूं।

-पत्रकारों को कौन-कौन सी किताबें पढ़नी चाहिए?

हरिवंश–मैं किताबों की बजाय विधा बता रहा हूं। फ्यूचर शॉक एक किताब है एलविन टाफ्लर की । मैं अंग्रेजी बहुत नहीं समझता था, अब भी पढ़कर थोड़ा समझता हूं, बोलचाल नहीं पाता। हम देहात से आए हुए आदमी हैं। हम लोगों के पठन-पाठन के जमाने में अंग्रेजी हटाओ का नारा गूंज रहा था। विश्वविद्यालय में आने के बाद अंग्रेजी बहुत कोशिश से सीखी। दो-तीन कम्युनिस्ट मित्र मिल गए। वे पुस्तकें मंगाकर पढ़ते थे। उन्होंने मुझे अंग्रेजी, ऊर्दू सिखाना शुरू किया। हमारे यहां बहुत डिबेट चलता था। रामकृपाल बीएचयू, मुंबई, रविवार में साथ रहे। हमारी रात-रात भर हमेशा बहसें होती रहती थीं।

-आपके समकालीन लोग इस समय कहां-कहां पर हैं?

–रामकृपाल, नकवी रविवार में हमारे साथ थे। शैलेश, जयशंकर गुप्त, राजकिशोर, अनिल ठाकुर, राजीव शुक्ला, राजेश रपरिया, अजय चौधरी। सब साथ थे। मैं एक बहुत रोचक बात बता रहा था। एलविन टाफलर मूलत: पत्रकार थे। उनकी किताब आई फ्यूचर शॉक। उन दिनों उसकी काफी चर्चा थी। मैंने पढ़ा। उसमें था कि आने वाले 20-25 वर्षों में दुनिया कैसे और कितनी बदल जाएगी। उसने लिखा था कि जैसे अभी संयुक्त परिवार हैं, कुछ देशों में टूटने लगेंगे। सिर्फ पति-पत्नी रह जाएंगे। फिर वे भी टूट जाएंगे। लोग अकेले-अकेले रहने लगेंगे यानि एकल परिवार होंगे। यह टेक्नोलॉजी प्लस हरिवंशसोसियोलॉजी प्लस इकानमी, तीनों को मिलाकर समाज में आने वाले वर्षों में होने वाले चेंज का संकेत था। इसको विदेश में फ्यूचरोलॉजी कहते हैं। इस पर बाद में टाफ्लर ने तीन-चार किताबें लिखीं। उनसे पता चलता गया कि समाज किस ओर तेजी से बदल रहा है। उन लोगों का निष्कर्ष था कि जो दुनिया चार सौ वर्षो में बदली थी, उतनी आगे पांच वर्षों में बदलने जा रही है। देखिए कि मोबाइल ने कैसे पूरा परिदृश्य बदल दिया है। हम लोग जब अपने समय को याद करते हैं तो यकीन नहीं होता। इस ट्रेंड पर बहुत सारी किताबें आ चुकी हैं। देखें कि बेंगलुरू में बिना ब्याहे लड़कियां रह रही हैं। एकल परिवार। लिव इन रिलेशनशिप। ऐसा भारत में भी होने लगा। संयुक्त परिवार खत्म होने लगे हैं। उन्होंने बहुत बढ़िया बताया था कि संयुक्त परिवार का जन्म कृषि से हुआ। यानि आर्थिक व्यवस्था ऐसी थी। उसमें जरूरी था संयुक्त परिवार का होना। फिर औद्योगिक क्रांति के दौरान संयुक्त परिवार टूटने लगे।

हरिवंश-उम्र और अनुभव के इस स्टेज पर आकर आप अध्यात्म के बारे में क्या सोचते हैं?

–1975 में लगता था कि विनोबा के नाम पर हम जैसे अंदर से उबल जाते हों क्योंकि उन्होंने इंदिरा गांधी का साथ दिया था। दुनिया के बडे़ पत्रकारों में हुए पॉल ब्रंटन। वह इंग्लैंड के पत्रकार थे। वह 1930 से 40 के बीच भारत आते रहे। यहां के साधकों, संतों की खोज की। उनकी बीस-इक्कीस किताबें हैं। अदभुत हैं। गुप्त भारत की खोज का हिंदी अनुवाद अभी छपा है। भारत में कैसे एक अंग्रेज गर्मी में, लू में संतों की खोज में जा रहा है। भारत के संत कौन हैं, चमत्कार करने वाले साधु संत नहीं। असल संत हैं क्या? जैसे दक्षिण में रमण महर्षि के आश्रम। हमारे देश में ऐसे साधु, संत और महात्मा हुए, जिन्होंने जीवन को जानने की कोशिश की। परमहंस योगानंद भारत में कुछ समय तक रहे, फिर अमेरिका चले गए। उन्होंने अपनी ऑटाबायोग्रॉफी लिखी है। यह दुनिया की सबसे अधिक बिकने वाली किताबों में से है। शायद ही दुनिया में कोई ऐसी भाषा हो, जिसमें उसका अनुवाद न हुआ हो। आप पढ़िए तो जीवन का रहस्य आपकी समझ में आ जाएगा। पश्चिम में उन पर शोध हो रहे हैं। अनेक प्रामाणिक साहित्य उन पर आ रहे हैं। यहां तो आप देखेंगे कि आज जिसके पास जितना पैसा है, वह उतना बड़ा धार्मिक हो रहा है। यह सब पाखंड है। असल अध्यात्म मनुष्य को संसार के बारे में बताता है। मैं रमण महर्षि के आश्रम गया। वहां रहा। महर्षि अरविंदो। उनके पिता ने पैदा होते ही उन्हें भारत से बाहर कर दिया कि इस देश की छाया तक उन पर न पडे़। वो आदमी ग्रीक, लैटिन और अंग्रेजी ही जानता था। भारतीय भाषाएं नहीं जानता था। आईसीएस बना, टॉपर बना, भारत आया और भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा प्रवक्ता बन गया। वो व्यक्ति जब पांडिचेरी गया तो जानकर मैं दंग रह गया कि तेईस साल तक एक ही कमरे में रहा साधनारत। जब वे जेल में बंद हुए, नीचे सोना पड़ता था और एक मग था उसी से पानी पीना और उसी से शौचना। आज के नेता जब जेल में जाते हैं तो कहते हैं कि हमें ए श्रेणी उपलब्ध कराओ। उनके पास एक तौलिया था, जिससे आठ लोग देह पोछते थे। यही अध्यात्म भारत की पूंजी रहा है। सब तरफ प्रगति हो रही है लेकिन हमारे पास समय नहीं है। हम जीवन को समझ नहीं पाते। हम मशीन की तरह चल रहे हैं और मशीन की तरह खत्म हो रहे हैं। इंग्लैंड, अमेरिका, रूस में लोग मॉडर्न जीवन से हटकर मोबाइल वगैरह फेंक कर खेतों में रह रहे हैं। वे जिंदगी को नए ढंग से, चैन और सुकून से जीना चाहते हैं। आज अध्यात्म को धर्म के साथ जोड़कर वाद-विवाद किया जा रहा है।

हरिवंश-आपने शराब वगैरह को लेकर गाइडलाइन बनाई है। आज शराब पत्रकारिता में फैशन है। एसपी सिंह और उदयन शर्मा, जो पत्रकारिता के रोल मॉडल बताए जाते हैं, वे भी शराब पीते थे। इस पर आपका क्या कहना है?

–मैं और उदयन शर्मा लगभग एक वर्ष तक एक साथ रहे। एसपी सिंह को भी नजदीक से जाना-सुना। वे लोग शराब पीते थे, लेकिन पीकर दफ्तर नहीं आते थे। निजी जीवन का प्रोफेशन पर असर नहीं पड़ना चाहिए। एसपी सिंह शालीन थे। अपने दोस्तों के साथ जरूर पी लेते थे। मुझे याद है, जब हम धर्मयुग में थे, धर्मवीर भारती कोई भी गिफ्ट लौटा देते थे। उसका गहरा असर हम लोगों पर पड़ा। रिव्यू आदि में हमें जो गिफ्ट मिलते, उन्हें आफिस में रख देते थे क्योंकि आने-जाने का खर्चा तो टाइम्स ऑफ इंडिया देता था। इस प्रकार हमें संस्कार वहां से मिले। आग्रह था कि हम निजी जीवन में जो भी हों, उसको प्रोफेशन में न आने दें। आज प्रेसवार्ता में चालीस को बुलाएं, 100 चले आते हैं। गिफ्ट की मांग करते हैं, झगड़ते हैं, शराब के लिए मारपीट करते हैं। यह सब ठीक नहीं। अखबारी जीवन को सार्वजनिक चीजों से अलग रखना चाहिए। यही मेरा आग्रह रहा है।

-आपको खाने में क्या पसंद है?

–हम पैदा ही हुए ऐसे घर में, जहां शाकाहार के अलावा कुछ नहीं बनता था। शादी होने के बाद जब नौकरी के लिए मुंबई गए तो नॉनवेज खाना शुरू किया। आज भी हमारे घर में सब कुछ वेजेटेरियन ही बनता है।

हरिवंश-वह कौन-सा खाना, जो आप रोज खाना चाहेंगे?

–(हंसते हुए) चावल-दाल-चोखा, जो टिपिकल बिहारी खाना है, और लिट्टी।

जारी…..


अगर आप इस इंटरव्यू पर अपनी कोई प्रतिक्रिया हरिवंश जी तक पहुंचाना चाहते हैं तो उनकी मेल आईडी  harivansh@harivansh.net का सहारा ले सकते हैं.  इंटरव्यू का पहला भाग पढ़ने के लिए क्लिक करें- वे 20 माह नहीं दे रहे थे, मैंने 20 साल ले लिया. इंटरव्यू का तीसरा भाग अगले शनिवार को पढ़ें. 

वे 20 माह नहीं दे रहे थे, मैंने 20 साल ले लिया : हरिवंश

इंटरव्यू

हमारा हीरो : हरिवंश (प्रधान संपादक, प्रभात खबर) : भाग एक : 15 अगस्त 2009 को प्रभात खबर की उम्र 25 वर्ष हो जाएगी। किसी अखबार की उम्र 25 साल होने का एक मतलब होता है। लेकिन यह अखबार अगर प्रभात खबर है तो इसके मायने औरों से कुछ अलग है। चोली-दामन का साथ रखने वाले हिंदी समाज और हिंदी पत्रकारिता को अगर इस बाजारू दौर में भी किसी अखबार ने अपनी ओर से बेस्ट देने की असल कोशिश की है तो वह प्रभात खबर है। खबरों के धंधे के इस दौर में प्रभात खबर ने चुनाव से ठीक पहले ऐलान किया कि खबरों का धंधा और लोग करते होंगे, हम कतई नहीं करते, न ही करेंगे और ऐसा करने वाले दूसरे अखबारों-मीडिया हाउसों को हर हाल में गलत कहेंगे। यह नैतिक साहस अगर प्रभात खबर में जिंदा है तो इसके पीछे एक व्यक्ति है। वह हैं हरिवंश।

पत्रकारीय पैमाने, पत्रकारीय कसौटी व पत्रकारीय मानक को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बना चुके सरल-सहज-देसज हरिवंश प्रधान संपादक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में जिस संतुलन के साथ अखबार निकाल रहे हैं,  जिस सामाजिक सरोकार और पत्रकारीय नैतिकता के साथ अखबार का संचालन कर रहे हैं, वह आधुनिक पत्रकारिता के विद्वानों, मीडिया मार्केट के विश्लेषकों व पत्रकारिता के छात्रों के लिए शोध का विषय है। पाठकों के प्रति कर्तव्य और जिम्मेदारी का सौदा किए बगैर कोई अखबार कैसे चल सकता है, बाजार के दबावों की अनदेखी कर कोई अखबार कैसे जिंदा रह सकता है, सिर्फ और सिर्फ पाठकों के भरोसे और सहयोग के बूते कोई अखबार कैसे फल-फूल सकता है- यह सब जानना और समझना है तो हमें-आपको प्रभात खबर और हरिवंश को जानना-समझना होगा। इसी जानने-समझने की प्रक्रिया के तहत भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह पिछले दिनों प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश से मिले और विस्तार से कई दौर में बातचीत की। यह बातचीत दिल्ली में एक कंपनी के गेस्ट हाउस में हुई। दिल्ली से नाता न के बराबर रखने वाले हरिवंश महीनों बाद आफिस के काम से दिल्ली आए तो वादे के अनुरूप फोन करना नहीं भूले। उन्होंने बातचीत करने के लिए वक्त दिया। इस इंटरव्यू में सबसे खास यह है कि इसे बिना किसी संपादन के यहां प्रकाशित किया जा रहा है। इससे कुछ बातों-संस्मरणों-प्रकरणों का दुहराव संभव है। बिना संपादन प्रकाशित करने के कारण इंटरव्यू काफी लंबा हो गया है इसलिए हम इसे कई भाग में प्रकाशित करेंगे।

तो आइए, शुरू करते हैं हरिवंश जी से बातचीत-

-सर, प्रभात खबर के पच्चीस साल पूरे होने पर अग्रिम बधाई! आप इस अखबार से कब जुड़े? पत्रकारिता की शुरुआत कैसे की? आपके बचपन का जीवन कैसा रहा?

–धन्यवाद यशवंत। हम लोगों ने….. मैं जब भी हम ‘लोग कहूं’ तो इसका आशय मेरी पूरी टीम से है, सिर्फ मुझसे नहीं…… मिलजुल कर बाजार के इस कठिन दौर में पाठकों के भरोसे को कायम रखा है और ऐसा करते हुए हम 25 बरस के हो गए, यकीन नहीं होता। जहां तक मेरी बात है तो मैनें 1989 में प्रभात खबर ज्वाइन किया। मुझे इस अखबार में 20 वर्ष पूरे हो रहे हैं। मैं एक प्रयोग के तहत यहां पहुंचा। यह एक संयोग था। मैने पत्रकारिता की शुरुआत ‘धर्मयुग’ से की।

अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बता दूं। मेरा जन्म 30 जून 1956 को गांव में हुआ। नितांत खेतिहर परिवार से हूं। दो नदियों के बीच, जिसे दोआब कहा जाता है, में मेरा गांव है। बाढ़ से लगातार नुकसान के कारण मैंने अपने घर में हमेशा भय का माहौल बचपन से देखा। जमीन थी लेकिन बाढ़ के कारण केवल एक फसल होती थी। यानि आर्थिक संकट बना रहता था। शुरुआती पढ़ाई गांव में ही की। फिर बनारस चला आया। बीएचयू में इकॉनामिक्स में शिक्षा ग्रहण की।

मैं जयप्रकाश नारायण से काफी प्रभावित रहा। मैं जयप्रकाश जी के गांव का हूं। इस नाते उनकी सादगी, उनकी नैतिकता मैंने बचपन से देखी। उसका एक असर था। जब वह आपातकाल में पकड़े गए तो बड़ा खराब लगा। बाद में मुझे लगने लगा कि आदमी को उसी काम में लगना चाहिए जिसमें उसका मन लगे, जिसमें वह अपने मन के भावों का रख सके। इस प्रकार पत्रकारिता में संयोग से आया। हालांकि मेरे पिताजी चाहते थे कि मैं बैंक में काम करू।  बैंक का जॉब उस समय सबसे सुरक्षित माना जाता था। पर मेरा मन कुछ और करने का था। उन दिनों टाइम्स ऑफ इंडिया ट्रेनी के लिए वैकेंसी निकालता था। टीओआई की यह ट्रेनिंग बेस्ट मानी जाती थी। वे इसमें फ्रेसर्स को लेते थे।  उस समय मेरी उम्र 19 वर्ष रही होगी। बीएचयू से दिल्ली पहली बार आया, टेस्ट देने के लिए। यहां एक वर्ष की ट्रेनिंग ली। इस प्रशिक्षण के बाद मुझे ‘धर्मयुग’ में काम करने का अवसर मिला।

‘धर्मयुग’ की उस समय छह-सात लाख प्रतियां बिकती थीं। इसमें काम करते हुए कई बार लगा कि जिस उद्देश्य से मैं आया हूं, वह कर नहीं पा रहे हैं। बंबई में रहते-रहते मन ऊब गया। उन्हीं दिनों दो बड़े सरकारी बैंकों में अधिकारी पद पर मेरा सेलेक्शन हो गया। मैंने एक बैंक में हैदराबाद जाकर ज्वाइन कर लिया। लेकिन बैंक की नौकरी में भी मन नहीं लगा और इसे छोड़कर फिर पत्रकारिता में आ गया। मैंने कलकत्ता में ‘रविवार’ ज्वाइन कर लिया। रिपोर्टिंग के लिए मैं बहुत घूमा करता था- वो चाहे ‘रविवार’ रहा हो या ‘धर्मयुग’। कलकत्ता में रहते-रहते लगने लगा कि दो बड़े घरानों में नौकरी कर चुका हूं, टाइम्स ग्रुप और आनंद बाजार पत्रिका समूह। उस समय की दो सबसे अधिक बिकने वाली पत्रिकाओं,  जिनका समाज में अपना असर था- ‘धर्मयुग’ और ‘रविवार’ में काम करने के बाद लगने लगा कि अब छोटी जगह में पत्रकारिता करके देखना चाहिए। मैं पत्रकारिता में कुछ नया करने के उद्देश्य से आया था।

रविवार बंद होने के लगभग डेढ़ साल पहले मैंने नया प्रयोग करने के बारे में सोचा। रिपोर्टिंग के सिलसिले में दक्षिण बिहार घूमा था। एकाध बार वो जंगल पहाड़ आदिवासी देखकर लगा कि इस इलाके में कुछ करना चाहिए। मुझे एक बंद से हो चले अखबार ‘प्रभात खबर’ में अवसर मिला। प्रभात खबर को शुरू किया था कांग्रेसी नेता ज्ञानरंजन ने, जो शिबू सोरेन के काफी करीबी थे। उनके पिता कांग्रेस के बहुत बड़े नेता होते थे। वे अध्यापक थे और बहुत प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। ये इंदिरा जी के काफी करीबी थे। इन्होंने ही झारखंड मुक्ति मोर्चा को कांग्रेस के साथ 1980 में जोड़ा। इनका नारा था अलग झारखंड राज्य बनाना। इन्होंने अलग झारखंड राज्य के मुखपत्र के रूप में ‘प्रभात खबर’ की कल्पना की थी। 1984 में रांची से शुरू किया गया यह अखबार 1990 आते-आते आपस में झगड़े की वजह से बंद हो गया। मुश्किल से 200-300 कॉपियां छपती थीं। काम करने वालों की संख्या 250 थी। उस वक्त जब यह बंद होने लगा तो मुझे संपर्क किया गया। मैं इस मन:स्थिति में था कि छोटी जगह जाकर पत्रकारिता करूं। बड़े शहरों, महानगरों को देख लिया। महानगर अपनी रुचि और मिजाज को भाते नहीं, जमते नहीं। और इस प्रकार बिलकुल नई जगह पर, जहां एक दो बार घूमने के अलावा मैं गया नहीं, प्रयोग की दृष्टि से चला गया। मेरे साथ तीन-चार लोग इस अखबार में आए थे। मेरे अलावा बाकी लोग मैनेजमेंट के फील्ड के थे। शेष टीम प्रभात खबर की ही थी।

-बंद पड़े अखबार प्रभात खबर को आपने न सिर्फ चलाया-जमाया बल्कि पत्रकारिता का प्रतिमान भी बनाया। यह सब कैसे कर सके?

–आपके जरिए मैं पहली बार बताने जा रहा हूं कि प्रभात खबर को हम लोगों ने किस आधार पर खड़ा करने की कोशिश की। जब मैं रांची पहुंचा और काम करना शुरू किया तो सबसे पहले वहां के अखबारी परिदृश्य को समझा। वहां जमा-जमाया अखबार था ‘रांची एक्सप्रेस’। जमशेदपुर में अखबार निकलता था ‘उदितवाणी’। धनबाद में ‘आवाज’ नामक अखबार स्थापित था। ‘आज’ अखबार एक रुपए में बिकता था और सबसे ज्यादा बिकने वाला अखबार था। ‘आज’ ऐसा अखबार था जिसके कई शहरों से संस्करण निकलते थे। मतलब ‘आज’ मल्टी एडिशन और सबसे ज्याद बिकने वाला अखबार था जो रांची, जमशेदपुर, धनबाद के अलावा पटना से भी निकलता था। यह पूरे अविभाजित बिहार का प्रमुख अखबार था। इसके अलावा जिन तीन अखबारों का नाम बताया वे ऐसे थे जो सिर्फ अपने-अपने शहरों में ही निकलते थे लेकिन वहां खूब बिकते थे। दैनिक हिंदुस्तान चूंकि नार्थ बिहार से संचालित होता था, इसलिए हिंदुस्तान का परंपरागत महत्व था। साउथ बिहार के लोग नार्थ बिहार की खबरें और प्रशासन की खबरें पढ़ने के लिए इस अखबार को लेते थे। तो ये अखबारी परिदृश्य था।

हमारी कसौटी थी कि हम कैसे अच्छा और भिन्न अखबार निकाल सकें। उसके लिए बहुत से नए प्रयोग किए। पहले प्रयास के तहत एक नैतिक आचार संहिता बनाई गई। इस आचार संहिता में लिखा गया कि रिपोर्टर रिपोर्टिंग के लिए जाएं तो क्या करें और क्या न करें। क्या न करें में शराब न पीने की बात साफ तौर पर कही गई। लेकिन इसके बावजूद गड़बड़ियां होती रहीं। हमने कोशिश की साफ-सुथरा और बेहतर माहौल बनाया जा सके। हालांकि हमें इसका प्रतिरोध भी झेलना पड़ा क्योंकि जब आप काम का माहौल सुधारना चाहते हैं तो यथास्थितिवादी लोगों की ओर से परेशानियों का सामना करना पड़ता है। अखबार से पाठकों को जोड़ने के लिए हमने रांची में एक बैठक की। इस बैठक में हम लोग छह घंटे तक पाठकों की गाली सुनते रहे। पाठकों ने अखबार की खामियां गिनाईं और हमने उन सब खामियों को नोट किया। हमने मुहल्लों तक में पाठकों की राय जानने के लिए कैंपेन चलाया। हमने पूछा कि वे अखबार के बारे में क्या राय रखते है। दूसरा काम किया इश्यूज पर स्टैंड लेना। मंडल के मुद्दे पर हमने स्टैंड लिया। मंडल मुद्दे पर उस समय दो ही अखबारों ने स्टैंड लिया था,  जिसमें नवभारत टाइम्स भी शामिल है। प्रभात खबर के ले-आउट पर खास ध्यान दिया गया।

प्रभात खबर का काम संभालने के बाद मैंने सफल क्षेत्रीय अखबारों का अध्ययन किया। मैं 1991 में राजस्थान पत्रिका देखने गया। महाराष्ट्र टाइम्स देखने गया। इसके बाद इनाडु, मलयालम मनोरमा और नई दुनिया को भी देखा। इन अखबारों के कामकाज के तरीके को गहराई से समझा। इस पर एक रिपोर्ट तैयार की। इन अखबारों ने क्या नई चीजें की हैं, इसका विशेष तौर पर उल्लेख किया। हर तरह से जान-समझ कर हम लोगों ने प्रभात खबर के लिए नए प्रयोग शुरू किए। नए फार्मेट में अच्छे लोगों से लिखवाना शुरू किया। लोकल मुद्दों पर स्टैंड लेना शुरू किया। ले-आउट और कंटेंट को रिच किया। रिपोर्टिंग बेहतर तरीके से कराने पर जोर दिया। यह सब कुछ नए सिरे से शुरू हुआ और देखते ही देखते अखबार को पाठकों का प्यार मिलने लगा। सरकुलेशन बढ़ने लगा। प्रभात खबर ने मंडल कमीशन और भागलपुर दंगों समेत कई समलों पर स्पष्ट स्टैंड लिया। लोकल मुद्दों में मुझे याद आ रहा है कि एक लड़की के अबार्शन के मसले पर जनहित में स्टैंड लेकर एक बड़ा आंदोलन को वैचारिक दिशा दी। इस तरह से अनेक प्रयोग हमने अखबार के साथ किए। आदिवासियों के मुद्दों-समस्याओं को सामने लाने की कोशिश की और आदिवासियों के बीच के लोकल लोगों से ही इस पर लिखवाना शुरू किया। इसके कारण अनेक ट्राइबल पत्रकार सामने आए जो प्रभात खबर से जुड़े हुए है। अलग झारखंड राज्य की मांग को भी हमने समर्थन दिया। पशुपालन घोटाले के खुलासे का श्रेय प्रभात खबर को जाता है। यह घोटाला कोई दबी छुपी घटना नहीं थी। इसे सब लोग जानते थे। सारे अखबार जानते थे। लेकिन इसे प्रकाशित करने का साहस केवल हम लोगों ने किया।

प्रभात खबर से जुड़ने के कुछ समय बाद मुझे लगने लगा कि अगर हम लोगों ने अखबार को जनता और मुद्दों से नहीं जोड़ा तो हम लोग खत्म हो जाएंगे। प्रभात खबर जिस ग्रुप का है, उस ग्रुप का इंडस्ट्रियल कारोबार है। 1991 से 1994 के आसपास जितने नुकसान थे, उनकी भरपाई इस ग्रुप ने किया। लेकिन जब इस ग्रुप की खुद की हालत खराब हो गई तो उन्होंने हाथ खींच लिए। तब हमने सोचा कि क्या किया जाए? हमारे पास जो मशीन थी वह केवल आठ पेज छाप सकती थी और उसे स्क्रेप (कबाड़) हरिवंशघोषित किया जा चुका था। हम लोगों ने उसी से काम करना शुरू किया। हमारे जो दो साथी प्रबंधन की तरफ से आए थे, वे भी बड़े उत्साही और नौजवान लोग थे। एक केके गोयनका और दूसरे आरके दत्ता। वे लुधियाना से एक फोर्थ हैंड मशीन डेढ़-दो लाख रुपए में खरीद कर ले आए। उसको हम लोगों ने रांची में लगाया। उससे हम लोग रांची का अखबार छापने लगे। रांची वाली पुरानी स्क्रेप मशीन को उठाकर जमशेदपुर ले गए। वहां छापना शुरू किया। बाद में इसी मशीन को धनबाद ले गए और वहां से अखबार निकालना शुरू किया।

हम लोग जब भी अखबार का नया संस्करण लांच करते तो सबसे पहले एक गेस्ट हाउस लेते थे और इसी गेस्ट हाउस में संपादक से लेकर चपरासी तक एक साथ रहते थे। मतलब, एक-एक नया एडिशन तब शुरू किया जब पूंजी नहीं थी।  सिर्फ हौसला था, पाठकों का भरोसा था, मजबूत और मेहनती टीम थी। कंपनी आर्थिक रूप से सपोर्ट करने की स्थिति में भले नहीं थी लेकिन हम लोगों में आगे बढ़ने का जज्बा था। तो इस प्रकार हम लोगों ने अखबार खड़ा किया। इसके पहले भी एक प्रयोग हमने किया था। प्रभात खबर की फ्रेंचाइजी के लिए लोग आए। 1991 में तो हमने जमशेदपुर और धनबाद में दो लोगों को फ्रेंचाइजी दिया। पर छह-आठ महीने में लगने लगा कि ये दोनों लोग अखबार को अपने रास्ते पर ले जा रहे हैं। बाद में हमने फ्रेंचाइजी वापस ले लिया और बहुत मित्रवत उनसे अलग हो गए। 1996 में एक मशीन लेकर हम पटना पहुंच गए। इस सबके बावजूद हम लोगों को पूंजी का सपोर्ट नहीं मिल सका। बिना पूंजी, सिर्फ मुद्दों और पाठकों के सहारे हम लोग 1998- 99 तक चलते रहे। सन 2000-01 में हिंदुस्तान और जागरण आए। हिंदुस्तान जब रांची आया तो पांच-छह महीनों बाद हम लोगों को झटका देने के लिए एक दिन एक साथ हमारे अखबार से 33 लोगों का इस्तीफा दिलाकर अपने यहां रख लिया। इसमें संपादक से लेकर मशीन चलाने वाले तक शामिल थे। उनकी पूरी योजना थी कि अगली सुबह प्रभात खबर न छप सके। उनकी तैयारी बहुत बड़े स्तर की थी। मैं स्वीकार करता हूं कि उनकी योजना की मुझे एक दिन पहले तक भी जानकारी नहीं थी। मेरे साथ दिक्कत यह है कि मैं अपने कर्मचारियों पर पूरा विश्वास करता हूं। अगर कोई इस्तीफा देने मेरे पास आता है तो मुझे कोई मलाल नहीं होता क्योंकि मेरा स्वभाव ही ऐसा है। तब से अब तक कोई 200-250 लोग प्रभात खबर से जा चुके होंगे। कोई दिक्कत नहीं हुई। पर 33 लोगों का अचानक इस्तीफा देना, बिना नोटिस दिए एकदम से चले जाना, यह स्तब्ध करने वाला था लेकिन हम लोगों ने किसी को रोकने की कोशिश नहीं की। अगले दिन अखबार निकला। नए लोगों को नियुक्त किया, ट्रेंड किया। अखबार चलता रहा।

हमारे सामने सबसे बड़ी दिक्कत पूंजी की रही  नहीं तो बड़े घरानों के अखबारों को झारखंड में स्पेश मिलना मुश्किल होता। हम ठीक प्रकार से विस्तार नहीं कर पाए। हॉकर को गिफ्ट वगैरह नहीं दे पाए। अखबार की कीमत हम नहीं घटा सके। दैनिक जागरण ने तो डेढ़-दो रूपए में अखबार बेचा। हम लोग ज्यादा पेज नहीं दे पा रहे थे। दूसरे अखबार 18-18 पेज के थे जबकि हम लोग 16 पेज से ज्यादा देने की स्थिति में नहीं थे। इसी प्रकार हम उनको उनकी शैली में उत्तर नहीं दे सके। फिर भी हम मार्केट में बने रहे और आगे रहे। हम लोग 2004 के आस-पास प्रबंधन के पास गए और कहा कि बड़े-बड़े अखबार अपनी मार्केटिंग योजनाओं के साथ आ रहे हैं, इसलिए कुछ करना होगा। हम लोगों को भी नियोजित तरीके से आगे बढ़ना होगा। इसके लिए पैसा चाहिए। हमें प्रभात खबर में पैसा लगाने वाले चाहिए। इसके लिए प्रभात खबर का वैल्यूवेशन कराना जरूरी था। यह पता करना जरूरी था कि आखिर हम लोग खड़े कहां हैं। एक बाहरी और प्रोफेशनल कंपनी से प्रभात खबर का आंकलन कराया गया। उस कंपनी ने बताया कि प्रभात खबर का मार्केट वैल्यू 120 करोड़ रुपये है। हमारे लिए भी यह सूचना एक खबर थी। जिस अखबार को बहुत मामूली संसाधनों और मामूली पूंजी से बढ़ाया गया, उसकी कीमत आज इतनी हो गई।

दरअसल मैं अर्थशास्त्र का विद्यार्थी जरूर रहा लेकिन हमारे समय में अर्थशास्त्र का मतलब होता था समाज को आगे ले जा सकने वाला वाद और वादा। इसीलिए हमारे समय में पूंजीवाद और  समाजवाद पर काफी कुछ पढ़ाया-बताया जाता था। शेयर मार्केट क्या होता है, इक्विटी क्या होती है, ये कुछ भी नहीं मालूम था। प्रभात खबर के वैल्यूवेशन के वक्त से मुझे शेयर मार्केट और इक्विटी की गहराई के बारे में पता चलना शुरू हुआ।

हमारे प्रबंधन के दिमाग में आया कि हमें अखबार निकालने के काम से निकल जाना चाहिए। प्रभात खबर को खरीदने के लिए कई बड़े अखबार तैयार थे। कई दौर की बातचीत के बाद कुछ चीजें तय भी हो गई थी पर अचानक प्रबंधन को लगा कि प्रभात खबर को अभी रखना चाहिए। यहां मैं बताना चाहूंगा कि झारखंड में बड़े अखबारों ने हर संभव तरीके से वर्चस्व कायम करने की कोशिश,  लेकिन वो लोग अभी तक वर्चस्व स्थापित नहीं कर सके हैं।

मैं यह जरूर कहना चाहूंगा कि यदि हमारे पास पूंजी होती तो इन बड़े अखबारों की जितनी उपस्थिति इस इलाके में बनी है, शायद इतनी भी न बन पाती। अगर पूंजी होती तो हम लोग टैलेंट को नहीं जाने देते। हम लोग पब्लिसिटी बहुत अच्छी तरह से कर सकते थे। एग्रेसिव मार्केट का जो कांसेप्ट है, उस पर अमल करते। जब हमने प्रभात खबर ज्वाइन किया था तो आमतौर से हमारे सारे मित्र लोग कहते थे कि प्रभात खबर का भविष्य क्या है?  मैं कहता था कि भविष्य हम सब लोगों के हाथ में है। बेहतर काम करेंगे तो इसका भविष्य बनाए रखेंगे। लोगों ने तो मुझे बीस माह का भी समय नहीं दिया। लोग कहते थे कि 20 महीने भी इस अखबार को नहीं चला सकते। इतना खराब हाल था। पर 20 महीने क्या, इस अखबार को आज 20 साल तक चलाकर दिखा दिया। यह अखबार चल रहा है और आगे भी चलेगा।

-बचपन या पढ़ाई-लिखाई के दौरान की कोई ऐसी बात बताइए जिसे आपने कभी किसी से शेयर न किया हो? आप बताना चाहेंगे कि आप पर सबसे गहरा असर किस व्यक्ति का हुआ?

-जिस व्यक्ति का मेरे ऊपर सबसे ज्यादा असर पड़ा या जिस व्यक्ति ने मेरे जीवन को नया मोड़ दिया वह थे एक अध्यापक। वो मेरे स्कूल में नए-नए आए थे। मेरे गांव में आने-जाने का कोई रास्ता नहीं था।  कठिन गांव था। 11-12 किलोमीटर पैदल आना-जाना पड़ता था। इसलिए कोई अध्यापक इस गांव में ठहरता नहीं था। तो वे जो अध्यापक आए थे, वह गणित के बहुत अच्छे अध्यापक थे। वे मुझे पढ़ाते थे। एक दिन वह अस्वस्थ हो गए।  हमारे घर पर आए। पीने के लिए पानी मांगा। मैं पानी लाया तो उन्होंने पूछा कि इस पानी को छान लिया है न?  मैंने झूठ कह दिया कि छान लिया है। जब वह पीने लगे तो उसमें से मेढ़क का एक छोटा बच्चा निकला। अध्यापक ने मुझे मेढ़क का वह बच्चा दिखाया लेकिन कहा कुछ नहीं और न ही डांटा-पीटा। इसका मेरे ऊपर बहुत गहरा असर पड़ा। मैंने सोचा कि अध्यापक ऐसे भी होते हैं जो पीटते-डांटते नहीं हैं। वे अध्यापक ऐसे थे जो खाली समय में गरीब बच्चों को पढ़ाते थे। वह मेरे लिए नैतिक रूप से बहुत प्रेरक रहे है। वे आज भी जीवित हैं। मैं उनसे मिलता हूं तो उनके पैर छूकर प्रणाम करता हूं। मैं मानता हूं, जो मैं कुछ बन सका हूं, उसमें उनका बड़ा हाथ हैं।

मैं अपने गांव और गांव के माहौल के बारे में बताना चाहूंगा। 15 अगस्त और 26 जनवरी को स्कूलों में बहुत से कार्यक्रम होते थे। उस समय के अध्यापक उन विशेष दिनों में खद्दर के कपड़े आदि पहनकर भगत सिंह,  चंद्रशेखर आजाद,  महात्मा गांधी आदि की जय-जयकार करते-कराते थे। हम लोग इन नामों के बारे में जानते नहीं थे कि ये कौन हैं, लेकिन एक उत्सुकता पैदा होती थी कि इनके नामों में क्या जादू है कि लोग इन्हें याद करते हैं। इसी प्रकार जयप्रकाश जी हर साल गांव आते तो उनके साथ बड़े मशहूर लोग आते। देखने की उत्सुकता रहती थी। गांव के लोग जाते थे। मैं भी जाता था। वैसे मैं बच्चा था। देखता था जवाहर जी का नाम आ रहा है। फलां का नाम आ रहा है। लेकिन मैं कुछ समझ नहीं पाता था। जब जवाहर लाल नेहरू की मौत हुई तो देखा कि गांव में लोग किस प्रकार रो रहे हैं। लगता था कि उनके परिवार के किसी सदस्य की ही मौत हो गई है। ऐसे दृश्य देखने से मन में सामाजिक सरोकार पैदा हुए।

…जारी…

पत्रकार बस तिकड़मी बनकर रह गए हैं : हरिवंश

चौथी दुनिया में हरिवंश का इंटरव्यूचौथी दुनिया के सद्यः प्रकाशित विशेषांक में प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश का इंटरव्यू छपा है। इसमें पत्रकारिता की दशा-दिशा पर काफी कुछ बातें हैं। समकालीन विचारवान और सरोकार वाले संपादकों में हरिवंश का नाम जाना-पहचाना है। रांची में रहकर बिहार-झारखंड के प्रमुख वैचारिक हिंदी अखबार प्रभात खबर को नेतृत्व प्रदान करने वाले हरिवंश ने बाजार के मजबूत दबाव के बावजूद विचार से समझौता नहीं किया। चौथी दुनिया में प्रकाशित यह इंटरव्यू यहां साभार दिया जा रहा है।

 –पत्रकारिता की वर्तमान दशा और दिशा को देखकर क्या आपको अफसोस नहीं होता?

–आपके प्रश्न के पहले हिस्से के जवाब में कहना चाहूंगा कि अफसोस जैसी कोई बात मेरे साथ नहीं है. पत्रकारिता कोई अकेली या अछूती विधा नहीं, जहां गिरावट आई है. फिर पत्रकारिता की विधा एक आयामी भी नहीं होती. इसे संदर्भों में देखने की जरूरत है. आप देखिएगा कि पत्रकारिता को खाद हमेशा राजनीति और समाज से ही मिली है. मैं तो यह कहना चाहूंगा कि पत्रकारिता और राजनीतिक विचार एक दूसरे के प्रेरक रहे हैं. आप स्वाधीनता आंदोलन से लेकर जेपी आंदोलन तक देख लीजिए. क्या इन्हीं राजनीतिक विचारों ने पत्रकारों को प्रेरणा नहीं दी, और क्या पत्रकारिता ने इन विचारों के फैलाव और प्रसार में अहमतरीन भूमिका नहीं निभाई? तो, यह चौतरफा गिरावट का दौर है. इसी वजह से मुझे अफसोस तो नहीं, पर चिंता जरूर है.

चौथी दुनिया में हरिवंश का इंटरव्यूहाशिए के लोगों या वंचितों के सरोकारों को पत्रकारिता सामने नहीं ला पा रही है. दूसरे शब्दों में कहें तो यह सत्ता की सहायक हो गई है. पत्रकार बस तिकड़मी बन कर रह गए हैं जो सत्ता के हितों का पोषण करने में लगे हैं. यह समय आत्ममंथन का है, मूल उद्देश्य की तरफ लौटने का है. तभी कुछ हो पाएगा.

–हिंदी पत्रकारिता मौजूदा दौर में वाद न विवाद, केवल अनुवाद बनकर रह गई है और पत्रकार अनुवादक सह टंकक. अधिकतर मीडिया हाउस में अंग्रेजी का ही अनुवाद होता है. यह तस्वीर कैसे बदलेगी?

–आपकी इस धारणा से मैं बुनियादी रूप से असहमत हूं. यह दिल्ली के बड़े मीडिया प्रतिष्ठानों जैसे एचटी और टाइम्स आफ इंडिया के साथ हो सकता है. आप हिंदी पट्टी से निकलने वाले अखबारों को देखिए. समस्या दरअसल दूसरी है. हमें मानव संसाधन को विकसित करने की जरूरत है. पत्रकारों को प्रशिक्षित करने की जरूरत है ताकि वे खबरों की नब्ज़ को पकड़ सकें. भाषाई फैलाव तो बहुत हुआ है, लेकिन उसी अनुपात में खबरें भी असीमित हो गई हैं.

हरिवंश–खबरों की धार और गहराई गायब हो गई है. खबर देने का दावा करने वालों की संख्या जितनी बढ़ी है, खबरें उसी अनुपात में गायब हो गई हैं. आप क्या सोचते हैं?

–इस बात से सहमत हुआ जा सकता है. दरअसल, खबरों या कहें कि पत्रकारिता के मूल चरित्र में ही परिवर्तन हो गया है. पहले के दौर में आम तौर पर यह माना जाता था कि पब्लिक रिलेशन या पीआर से मिलने वाली खबरें तो खबरें हैं ही नहीं. बल्कि जो छुपाया जाता है, वही खबर है. आज शार्टकट के इस दौर में यह चरित्र ही खो गया है. पत्रकार बंधु सूत्रों पर अधिकाधिक निर्भर रहने लगे हैं. सतही तौर पर आकलन करने लगे हैं. वे खबरों की तह तक नहीं जाते. मौजूदा संकट के लिए यही जिम्मेदार है.

–पत्रकारिता में जल, जंगल और जमीन से जुड़े मसले गायब होते जा रहे हैं. हम जो भी देखते या पढ़ते हैं, वह समाज के दो फीसदी हिस्से का ही सच बयान करती है. इस सूरत-हाल को कैसे बदला जाएगा?

–देखिए, यहां भी मसला कुछ दूसरा ही है. थोड़े-बहुत या छिटपुट मामले तो उठते ही रहते हैं, वरना आप ही बताइए कि बीस पन्नों या ज्यादा का अखबार भला भरेगा कैसे. ऐसे में समग्रता का अभाव हो जाता है, दृष्टि की कमी पैदा हो जाती है. इसे बदलने के लिए केवल दिल्ली के बड़े मीडिया प्रतिष्ठानों में वातानुकूलित कमरों में बैठकर बयानबाजी करने से काम नहीं चलेगा. नब्बे के दशक तक विचारधारा को लेकर राजनीति होती रही.

राजनीति मुद्दा आधारित हुआ करती थी. किंतु आज पक्ष और विपक्ष दोनों का ही चाल, चरित्र और चिंतन लगभग एक सा ही है. कहां है वह विजन, कहां वह सोच और कहां है वह दृष्ठि?

–कई पत्रकार साथी पत्रकारिता की मौजूदा दशा से काफी खिन्न हैं. वे जिस उत्साह, जोश और जज्बे से इस क्षेत्र में आए थे, काम शुरू करने के कुछ ही दिनों बाद उनका वह जोश ठंडा पड़ गया. उनके उत्साह को फिर से कैसे जगाया जाए?

–यह आपका बड़ा ही सामान्यीकृत सवाल है. वैसे ही, जैसे देश की दशा बहुत खराब है, क्या करें? देखिए, जब तक मुद्दे और विचार जीवित थे, लोग पत्रकारिता में एक बेचैनी, एक जुनून से आते थे. आज पैशन की वजह से नहीं, मजबूरी से आते हैं. किसी का यूपीएससी में नहीं हुआ, या किसी और जगह वह नहीं जा सका, तो पत्रकारिता में आ गया. ऐसे में कमिटमेंट का, दृष्टि का अभाव होता है. अब लोग खबरिया चैनलों को गाली भी देंगे और अधिक पैसा मिलने पर वही काम भी करेंगे, तो यह तस्वीर कैसे बदलेगी. आप गुणवत्ता बढ़ाइए. हमें आर्थिक आधार को देखना होगा. हिंदी अखबार सबसे अधिक बिकते हैं, पर उनको विज्ञापन नहीं मिलते. आप देखिए कि प्रसार के मामले में शीर्ष 10 अखबारों में शायद ही अंग्रेजी का कोई हो, सिवाय टाइम्स आफ इंडिया के तो, हमें इसको बदलना होगा. संसाधन पैदा करने होंगे. हमें तो केंद्र सरकार पर दबाव बनाना चाहिए, कि आखिर सारे बड़े विज्ञापन अंग्रेजी अखबारों को ही क्यों दिए जाते हैं.

हरिवंश–प्रिंट मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

–अपनी साख और विश्वसनीयता को फिर से बना लेना हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती है.

–हिंदी भाषा के स्वरूप को लेकर रोज नए सुझाव आ रहे हैं. कवायद हो रही है. कुछ अखबार तो बाकायदा हिंग्लिश का अभियान चलाए हुए हैं. ऐसे दौर में हिंदी की वर्तनी और स्वरूप क्या होगा?

–इसके लिए तो हर अखबार को काम करना होगा. मैं किसी भी तरह अंग्रेजी को बढ़ावा देने के पक्ष में नहीं हूं. यह तो न्याय नहीं है. हमें देसज शब्दों के इस्तेमाल पर जोर देना होगा. उनको खोजना होगा. उर्दू और ग्रामीण अंचलों के कई शब्द मर रहे हैं. उनको बचाने की जरूरत है. सहज-भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए, लेकिन उर्दू न फारसी मियां जी बनारसी वाला मामला तो नहीं चलेगा. कुछ अखबारों ने इस दिशा में राह दिखाई थी, पर अब वे भी नेतृत्व नहीं कर पा रहे. कारण चाहें जो भी हों.

–इलेक्ट्रानिक मीडिया के बारे में काफी कुछ कहा जा रहा है. आपकी क्या सोच है, खासकर मुंबई हमलों की कवरेज के संदर्भ में?

–इलेक्ट्रानिक मीडिया बहुत ही ताकतवर माध्यम है. यह तो हथियार चलाने वाले पर निर्भर करता है, न कि हथियार पर कि उसका वार कहां हो रहा है. खबरिया चैनलों को अपनी मर्यादा का पता होना चाहिए. उनको संयम के साथ काम करना चाहिए, जिसका स्पष्ट अभाव इन दिनों दिख रहा है. मुझे लगता है कि खबरों को ब्रेक करने की हड़बड़ी की जगह उसकी तह में जाकर रिपोर्टिंग होनी चाहिए, वरना मामला वैसा ही होगा, जैसा हम आए दिनों देखते हैं. तात्कालिकता के फेर में हम वस्तुनिष्ठता की बलि न दें, तो ही बेहतर होगा.

–सूचना देने का काम करने वाले पत्रकार खुद आधी जानकारियों के सहारे काम करते हैं. जैसे, भारत-परमाणु करार की जय-जयकार में मुख्यधारा का लगभग पूरा मीडिया खड़ा दिखा, जबकि इस मसले के कई और भी पहलू थे. उनकी पूरी तरह से अनदेखी की गई. आपकी क्या राय है?

–मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूं. केवल यही एक मसला नहीं, बल्कि कई और मामले हैं जिन पर आधी-अधूरी या अधकचरा जानकारी परोसी और बांटी गई. इसका मुख्य कारण है, पत्रकारों में समझ, सोच और सबसे बढ़कर प्रशिक्षण और पढ़ाई का अभाव. आप देखिए न, आज के पत्रकार पढ़ते कब हैं?  वह तो बस अपनी जोड़-तोड़ और राजनीतिक तिकड़म में लगे रहते हैं, मुद्दों से बस उनका सतही तौर पर लगाव होता है.