छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन साहित्य-कला प्रेमी माने जाते हैं और माओवादियों-नक्सलियों से दो-दो हाथ करने वाले भी. कई तरह के संगठनों व लोगों की आलोचना झेलते रहने वाले विश्वरंजन समय-समय पर नक्सलवाद-माओवाद पर अपने विचार प्रकट करते रहते हैं. उन्होंने माओवादियों व उनके समर्थकों पर अपना एक लेख भड़ास4मीडिया के पास भेजा है. इसमें विश्वरंजन वेब वालों से खासे दुखी दिखते हैं, और माओवादियों के समर्थकों से चिढ़े भी. पढ़िए. -एडिटर, भड़ास4मीडिया
सुकुमार माओवादियों के कठोर क़दम!
-विश्वरंजन-

विश्वरंजन
अमूमन ऐसे नाजुक कोमल माओवादी आम जनता, बुद्धिजीवियों, न्यायविदों को गफलत तथा ऊहापोह की स्थिति में ला देता है- अरे यह तो अच्छा आदमी दिखता है, कोमल, नाजुक और सुकुमार! यह कैसे माओवादी हो सकता है? पर माओवादी गोपनीय दस्तावेजों पर जाएं तो ऐसे ही व्यक्तियों की उन्हें अपने “अरबन” या शहरी कामों के लिए जरूरत होती है। यह भी जाहिर है कि ज्यादातर ये कोमल-नाजुक शहरी माओवादी बीहड़ जंगलों में बंदूक उठाकर नहीं चल सकते, परंतु वे वह सब काम करेंगे जिससे गुप्त माओवादी गिरोह धीरे-धीरे जंगल क्षेत्र, ग्रामीण क्षेत्र और शहरी क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करते जाएं और ऐसा करने के लिए उन्हें छोटे-छोटे हथकंडे अपनाने पड़ते हैं। बस।
मसलन कि माओवादी हिंसा पर अमूमन उनका मुंह बंद ही रहेगा। यदि हिंसा इतनी घिनौनी है कि मुंह बंद करना मुश्किल हो जाए तो एक पंक्ति में अपना विरोध जताने के बाद इस बात को समझाने के लिए कि आखिर माओवादी इस तरह की घिनौनी हिंसा करने पर क्यों बाध्य हुए, वे पृष्ठ रंग देंगे? माओवादियों के हिंसात्मक गतिविधियों को रोकने के लिए जो कृतसंकल्प है, उन्हें बार-बार न्यायालयों में खींच कर तब तक ले जाने का उपक्रम ये नाजुक कोमल माओवादी करते रहेंगे जब तक पुलिस के अफसर तंग आकर लड़ना न छोड़ दें और माओवादी धीरे-धीरे भारत के गणतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त कर सत्ता पर काबिज न हो जाएं। नाजुक-कोमल माओवादियों ने दूर देखती रूमानी आंखों और कोमलता से लबरेज चेहरा-मोहरा के बूते पर लोगों को तो गफलत में डाल रखा है। आम व्यक्ति सोचता है, ठीक ही बोल रहे होंगे ये लोग। इतने नाजुक, कोमल और सुकुमार दिखने वाले लोग गलत कैसे हो सकते हैं?
पर एक समस्या और भी है। यदि आपने गलती से उंगली उठा दी एक नाजुक, कोमल और सुकुमार माओवादी पर तो उनके कोमल, नाजुक और सुकुमार माओवादी दोस्त न कोमल, न नाजुक, न सुकुमार रह जाएंगे और असभ्यता की हदें पार कर गाली-गलौच पर उतर आएंगे, मिथ्या प्रचार पर उतर आएंगे और यह वे साइबर-स्पेस के जरिए करेंगे, धरना-प्रदर्शन देकर करेंगे। यदि आप गूगल में मेरे नाम पर क्लिक करेंगे तो पाएंगे कि मेरे फोटो को विकृत कर छापा गया है, मुझे गालियां दी गई हैं।
मुझे कोई खास फर्क नहीं पड़ता पर बहुतों पर असभ्य गाली-गलौच का असर होता है। खास कर यदि साइबर-स्पेस के माध्यम से वह पूरे विश्व में फैलाया जा रहा हो। चुप ही रहना अच्छा है। नाजुक, कोमल माओवादी के साथ सुर मिलाना और भी श्रेयस्कर है और माओवादियों को चाहिए ही क्या? “भूल गलती बैठी है जिरह-बख्तर पहन कर तख्त पर दिल के / चमकते हैं खड़े हथियार उसके / आँखें चिलकती हैं सुनहरी तेज पत्थर सी ..! है सब खामोश / इब्ने सिन्ना, अलबरूनी दढ़ियल सिपहसलार सब ही खामोश हैं। बुद्धिजीवी, न्यायविद, अंग्रेजी मीडिया के लोग सभी तो हैं खामोश।” या फिर सुकुमार, कोमल, नाजुक माओवादी के साथ तो साहब जैसा मुक्तिबोध ने लिखा है हम अक्सर खुदगर्ज समझौते कर लेते हैं और माओवाद को पनपने देते हैं, अपने देश के गणतांत्रिक शरीर में विष की तरह। साथ ही आवाज में आवाज मिलाने लगते हैं।
माओवादी शहरी संगठन के साथ एक और समस्या भी है। यह एक खगोलशास्त्रीय “ब्लैक होल” की तरह होता है। खगोलशास्त्र के अनुसार आप “ब्लैक होल”को देख नहीं सकते। उसमें से रोशनी ही बाहर नहीं निकलती। हां “ब्लैक होल” के आसपास होती हुई गतिविधियों से हम भाँप जाते हैं कि अमुक जगह “ब्लैक होल” है। मसलन कि डायरेक्ट “साक्ष्य” नहीं होता, इनडायरेक्ट या “सरकम्सटैन्शियक” साक्ष्य का ही सहारा लेना पड़ता है। वैसे भी गोपनीय माओवादी दस्तावेज इन लोगों के विषय में कहता है कि ये वो लोग होते हैं जो “दुश्मन” (राज्य) के सामने उघारे नहीं गए हों। यानी कि यह लोग कभी नहीं कहेंगे कि ये माओवादी हैं…।
जरा सोचिए कि यदि माओवादी तानाशाही भारत में स्थापित हो गया तो क्या होगा? हो सकता है आपका लड़का पूरी जन्म जेल में यातनाएँ झेलता रहे और कहीं कोई सुनवाई न हो। चीन का राष्ट्रपति लियोशाओ ची जब माओ का विरोध करने लगा तो उसके बाल नोचे गए और यातनाएँ देकर उसे मारा डाला गया। उसकी पत्नी वांग को पीटा गया, यातनाएँ दी गईं। यह आपके साथ भी हो सकता है एक माओवादी भारत में । जुंग चैंग के पिता माओ के दोस्त थे, परंतु जब माओ से उनका मतभेद हुआ तो न सिर्फ उन्हें यातनाएँ देकर मारा डाला गया परंतु उनके पूरे परिवार को यातनाएँ दी गई। एक अन्य चीनी लेखिका की माँ को यातनाएँ दी गई और उसके बाल नोच डाले गए जब उसने माओ से असहमति दिखाई।
मासूम और कोमल दिखने वाले माओवादी के साथ खड़े बुद्घिजीवियों, न्यायविदों तथा अन्य लोगों को यह समझना चाहिए कि एक माओवादी भारत में उनके साथ भी वैसा ही सलूक हो सकता है, जैसा चीन के लोगों के साथ माओ के जमाने में झेला। मुश्किल यह है कि कोमल, नाजुक, सुकुमार तथा मासूम सा दिखता माओवादी भोली सूरत बना कर कहता रहेगा, वह माओवादी नहीं है और हम ऊहापोह, गफलत और बेचारगी का चश्मा लगा या तो कुछ नहीं करेंगे या उन्हें ही गाली देने लगेंगे जो भारत में गणतांत्रिक व्यवस्था को बचाये रखने के लिए जान पर खेल रहे हैं।
लेखक विश्वरंजन छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.












girish pankaj
February 9, 2011 at 2:16 pm
vishvaranjan ji jo baat maovadiyon ke liye kah rahe hai, vaisaa yatanaapradhan charitr to bharteey pulis bhi dikhatee rahati hai. ise kya kahenge…?
anil Janvijay
February 9, 2011 at 5:10 pm
विश्वरंजन साहित्य-कला प्रेमी हैं । लफ़्फ़ाज़ हैं। पुलिस वाले हैं। लेकिन सुकुमार नहीं हैं । ज़रा उनके हाथ छूकर देखें। उन हाथों में बंदूके उठा-उठा कर गाँठे पड़ गई हैं । वे भी नक्सलियों से लोहा लेने के लिए मैदान में डटते हैं और सुकुमार पुलिसकर्मियों को साहित्यकार बनाकर ‘सृजनगाथा’ जैसे ब्लॉग चलवाते हैं, पत्रिकाएँ निकलवाते हैं, लेखक-शिविर चलाते हैं और विचार-गोष्ठियाँ आयोजित करके लेखकों को ख़रीदने की कोशिश करते हैं…।
ज़रा ये पहलवान डीजीपी ये भी बताएँ कि उन्होंने आख़िरी बार बंदूक कब उठाई थी और किस पर उठाई थी?
बस्तरिया
February 10, 2011 at 11:33 am
अनिल जनविजय घोषित नक्सली हैं । रूस में रहकर कवि होने का का ढोंग करते हैं और भारतीय आदिवासियों के हत्यारे के पक्ष में बौद्धिक वातावरण बनाते रहते हैं । डेमोक्रेसी को ध्वस्त करना उनका मिशन है । देश से भगाये गये तो रूस में रहकर देशविरोधी गतिविधियों को हवा देते रहते हैं । अनिल जनविजय जैसे पागल और हत्यापसंद लोगों को यह भी नहीं पता कि कौन किसको साहित्यकार बना रहा है । साहित्यकार तो अनिल जनविजय जैसे माओवादी भारत भर में तैयार कर रहे हैं । इस मूरख को यह भी नहीं पता कि सृजनगाथा ब्ला़ग नहीं है । पोर्टल है । पत्रिकाएं तो वह भी बड़ी चालाकी से देश भर में निकलवा रहे हैं । खुद कविता कोश के संपादक बन बैठे हैं । लेखक शिविर तो अनिल जनविजय भी चलाता है । लेखक शिविर में उन्हीं के लोग तो आते हैं जो खुद को माओवादी बताते हैं । पुलिस कभी लेखक शिविर नहीं चलाती है । लेखकों को खऱीदती तो अब तक जो हत्यारों के तरफ़ से लिखा जा रहा है वह नहीं लिखा जाता । अनिल जनविजय यह बता दें । आखिर ये माओवादी जिस आदिवासी, गरीब, पिछड़े का पक्ष ले रहे हैं उन अनपराधी जनता को ही क्यों मारे जा रहे हैं । देश का हरामी और किसे और कहा जाये । और गिरीश पंकज जी बिना पैसा के लेख नहीं देते वे क्या बात करेंगे पुलिस के बारे में । जनता के बारे में । ये तो ढ़ोगी परम हैं । आदिवासी और गांधीवादी का बाना धरकर अनर्गल पत्रकारिता करते हैं ।
लक्ष्मी ठाकुर
February 10, 2011 at 4:36 pm
लफ्फाज तो अनिल जनविजे जैसे लोग भी हैं जो बिना बस्तर और बिना युद्ध क्षेत्र को जाने अपनी शेखी बघारते रहते हैं । लफ्फाज कहीं के । शरम करो हमारी हत्या पर पर मजाक करने वाले माओवादी । अधिक लालच के लिए देश छोड़ते हैं और हम गरीबों की बात करते हैं । धूर्त कहीं के ।
rajkumar sahu, janjgir
February 16, 2011 at 10:32 am
nishchit hi maaovaadi galat kar rahe hain, jaisa vishvranjan ji ne kaha ki bharat mein maovaadi taanashaahi havi ho gai to. yahan jaanna jaruri hai ki aam logon ke saath kya police ka ravaiya taanashaahi nahin hota ???
Himanshu Kumar
February 17, 2011 at 1:00 pm
एक ऐसे ही सुकुमार कोमल माओवादी का चित्र आदरणीय विश्वरंजन जी की सेवा में भेज रहा हूँ जिसकी तीन उंगलियाँ निरीह पुलिस ने काट दी थीं ताकि ये बड़ा होकर बन्दूक ना चला सके. हम इस बच्चे का केस सुप्रीम कोर्ट में लड़ रहे हैं.