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नागपुर में पाठकों को लुभाने के लिए बांटे जा रहे उपहार

आजकल अपने ‘ब्राण्ड‘ को टिकाए रखने के लिए उद्योगपति या उत्पादक किस तरह की मार्केटिंग का सहारा लेते हैं, इसे टीवी चैनलों, खबरिया चैनलों, रेडियो और समाचार पत्रों में आसानी से देखा-पढा और सुना जा सकता है. मगर प्रचार-प्रसार, विज्ञापनों और मार्केटिग के युग में अब समाचार-पत्र भी पीछे नहीं हैं. उन्हें लगता है कि अगर हम इस स्पर्धा में पिछड़ गए, तो हमारे साथ वर्षों से जुडा पाठक वर्ग कहीं हाथ से निकल न जाए.

आजकल अपने ‘ब्राण्ड‘ को टिकाए रखने के लिए उद्योगपति या उत्पादक किस तरह की मार्केटिंग का सहारा लेते हैं, इसे टीवी चैनलों, खबरिया चैनलों, रेडियो और समाचार पत्रों में आसानी से देखा-पढा और सुना जा सकता है. मगर प्रचार-प्रसार, विज्ञापनों और मार्केटिग के युग में अब समाचार-पत्र भी पीछे नहीं हैं. उन्हें लगता है कि अगर हम इस स्पर्धा में पिछड़ गए, तो हमारे साथ वर्षों से जुडा पाठक वर्ग कहीं हाथ से निकल न जाए.

इसी लीक पर चलते हुए पिछले कुछ वर्षों में नागपुर में कभी एक रुपए में अखबार बेचने की होड़ चलती है, तो कभी उपहार बांटने या जीतने की परंपरा चलती है. मगर बीते दो माह से संतरानगरी नागपुर में दो बड़े हिन्दी अखबारों ने अपने-अपने पाठकों को रिझाने या टिकाए रखने की गरज से धार्मिक भावनाओं का सहारा लिया. हुआ यूं कि अक्टूबर माह में एक गुरुवार को उपराजधानी के प्रसिद्ध हिन्दी दैनिक नवभारत ने 21000 सिद्ध मोती बांटने का ऐलान किया. यह मोती पाने के लिए उस दिन साईं मंदिर में पाठकों/भक्तों ने लंबी-लंबी कतारें लगाई थीं. 21000 मोती पाने के लिए कम से कम एक लाख लोग जुटे थे, मगर 79000 लोगों को निराशा हुई. नवभारत ने फिर सुहृदयता का परिचय दिखाते हुए अक्टूबर माह में ही नवरात्रोत्सव के दौरान कोराडी देवी परिसर में पुनः 11,111 सिद्ध मोती बांटने का ऐलान किया. भक्तगणों ने फिर भीड़ जुटाई और अपने आपको धन्य कर लिया.

मोती बांटने की सफलता से जहां नवभारत परिवार काफी उत्साहित हुआ, वहीं प्रतिद्वंदी हिन्दी अखबारों के प्रबंधन ने भी दिमाग लगाना शुरू किया. 9 दिसंबर को ‘दैनिक भास्कर’ ने अपनी 8वीं वर्षगांठ मनायी. दैनिक भास्कर ने इससे पूर्व ही जलाराम सत्संग मंडल के साथ क्वेटा कालोनी के जलाराम मंदिर परिसर में 11,111 ‘सिद्ध रुद्राक्ष‘ बांटने का ऐलान कर दिया था. 9 दिसंबर को क्वेटा कालोनी लकड़गंज में हजारों भक्तगण रुद्राक्ष पाने के लिए सुबह से कतारबद्ध खडे थे. कई तो काफी दूर-दूर से आए थे. धर्म का काम भी हो गया और दैनिक भास्कर की ब्रांडिंग भी हो गई. मगर 11,111 रुद्राक्ष बांटने पर शहर के कुछ धर्मप्रेमियों को यह कहते हुए भी सुना गया कि ‘जीवन में कभी भी रुद्राक्ष न मुफ्त में लेना चाहिए, न मुफ्त में देना चाहिए क्योंकि इससे उसका असर खत्म हो जाता है.’ अब पता नहीं सच्चाई क्या है, मगर 11,111 धर्मपरायण जनता ने इन रुद्राक्षों का लाभ उठाया, यह निश्चित है.

अब रहा तीसरा बड़ा हिन्दी दैनिक लोकमत समाचार. लोकमत ग्रुप के इस अखबार की 23वीं वर्षगांठ आगामी 14 जनवरी को मनाई जाने वाली है. सूत्रों के अनुसार ‘मोती’ और ‘रुद्राक्ष’ बांटने की तोड़ में इस अखबार का प्रबंधन मोर पंख बांटने की योजना बना रहा है. वैसे ‘मोर पंख’ का धार्मिक महत्व भी मोती और ‘रुद्राक्ष’ की तरह ही है. ये ‘मोरपंख’ हिन्दू धर्म और जैन धर्म की तरह ही इस्लाम धर्म में भी पूरी पवित्रता के साथ स्वीकार किया जाता है. हिन्दुओं में जहां इसे अक्सर भगवान कृष्ण के सिर पर लगा देखा जा सकता है, वहीं जैन धर्म में हमेशा किसी भी जैन मुनि के हाथ में देखा जा सकता है. यह चंवर डुलाने के काम भी आता है. उसी तरह इस्लाम में भी मोरपंख मजारों-मस्जिदों में उपयोगी होता है. तो अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मोती बंटे, रुद्राक्ष बंटे… तो लोकमत समाचार क्या सचमुच 14 जनवरी को ‘मोरपंख‘ बांटेगा? वाकई अगर ऐसा हुआ तो यह उपराजधानी नागपुर की धर्मप्रेमी जनता व पाठकों के लिए सौभाग्य की बात होगी.

नागपुर से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित.

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0 Comments

  1. Updesh Saxena

    December 18, 2010 at 2:15 pm

    वैसे पिछले दिनों केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने एक अधिसूचना के ज़रिये मोरपंख के व्यावसायिक उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है, केवल जैन धर्मावलंबी पिच्छिका में इसका उपयोग कर सकते हैं, शायद लोकमत समाचार के कर्मठ पत्रकारों के संज्ञान में यह खबर हो, आखिर वह विदर्भ का तीसरा बड़ा समाचारपत्र समूह जो है.

  2. कमल शर्मा

    December 18, 2010 at 1:32 pm

    और मोरपंख असली हुए तो कितने मोरो को सताया जाएगा, यह भी बताओ।

  3. kundan sahoo

    December 19, 2010 at 5:19 am

    क्यों जलते हो यारो , every thing is fare in love and war–paper war…….
    पहले अखबार जगत जनता के लिए लड़ा करता था , अब भी जनता के लिए ही लड़ रहा है , बस अब नज़रिए में एक भयंकर अंतराल आ गया है.
    धार्मिक भावनाओं को बढ़ावा देने का सवाल अब संविधान भला क्यों उठाएगा . भाई ! पहरेदार ही ब्लैक टिकट लिए बैठे है.
    लेकिन मैनेजमेंट स्कूल में तैयार होनेवाली फौज की दाद देनी होगी की वो कुछ भी कर सकते है, हमारे यहाँ की बी.कॉम – एम्.कॉम वाली पढाई थोड़ी ही है जो व्यापर में धर्म को बढ़ावा न दें,
    एम्.बी.ए बहुत ही लिबरल विचारधारावालों की पढाई है. पैसेवाले भी तो खुद को बड़े लिबरल बताते हैं, साली ये हिन्दुस्तानी गरीब जनता ही एक संकीर्ण विचारधारा वाली है, कल को कोई दुश्मन मुफ्त में हथगोल भी बंटेगा न तो भी ऐसी ही भीड़ जुटेगी.

  4. GHANSHYAM RAI

    December 20, 2010 at 10:45 am

    chalo bhau ! neta bhashan se to akhabar marketign se janta me dharmik bhawana paida kr rhe h abde chlo >>>>>>>>>>>>>>> esi kanam h janta ko murkh banana.

  5. prakash kumar

    December 25, 2010 at 11:13 am

    akbhar ke sath mil raha hai inam khoob padho dainik bhaskar akbhar

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