रोहतक में भास्‍कर ने लांच की अपनी नई यूनिट

दैनिक भास्‍कर ने अपनी नई प्रकाशन यूनिट रोहतक में लांच कर दी है. हरियाणा के मुख्‍यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने दैनिक भास्‍कर के रोहतक यूनिट का शुभारंभ नई प्रिंटिंग मशीन का बटन दबाकर किया. इस मौके पर उन्‍होंने प्रकाशित विशेषांक का भी विमोचन किया. इसके साथ ही हरियाणा में भास्‍कर के तीसरी प्रिंटिंग यूनिट स्‍थापित हो गई है. इसके पहले पानीपत तथा हिसार में भास्‍कर की प्रिंटिंग यूनिट स्‍थापित थी.

सीएम हुड्डा ने इस मौके पर कहा कि बदलते दौर में पत्रकारिता व्‍यवसाय में बदलती जा रही है. ऐसे में अखबारों की जिम्‍मेदारी और अधिक बढ़ जाती है. पत्रकारिता का उद्देश्‍य जनता को जागरूक करना है. इसलिए पत्रकारों को आम आदमी को केंद्र बिंदु मानकर काम करना चाहिए. इस मौके पर सांसद शादीलाल बतरा, विधायक भारत भूषण बतरा, आनंद सिंह दांगी, श्रीकृष्‍ण हुड्डा, जगवीर मलिक, शकुंतला खटक समेत काफी लोग मौजूद रहे.

दैनिक भास्‍कर ने रांचीवासियों से झूठ बोला था

13 अक्तूबर को दैनिक भास्कर ने अपने अखबार में पाठकों का आभार व्यक्त करते हुए कहा था कि वह रांची का सबसे बड़ा अखबार है. शहर में इस आशय के होर्डिंग भी लगाये गये थे. इसके पूर्व दैनिक भास्कर ने एक परचा बंटवाया था, जिसमें रांची का नंबर वन अखबार होने का दावा किया गया था.

वह नंबर वन कैसे हैं, इस  सूचना में किसी  स्रोत के बारे में नहीं बताया गया था. प्रभात खबर ने इस बारे में एडवरटाइजिंग काउंसिल ऑफ़ इंडिया (एएससीआइ) के पास शिकायत की थी. एएससीआइ ने प्रभात खबर को लिखित जवाब देकर कहा कि कंज्यूमर कंप्लेन काउंसिल (सीसीसी) ने इस शिकायत पर चर्चा की और शिकायत को सही पाया और कहा कि  यह एएससीआइ के चैप्टर 1.1 का उल्लंघन है.

सीसीसी इस निर्णय पर पहुंची है कि रांची का सबसे बड़ा अखबार होने का दावा किसी मार्केट रिसर्च संस्थान के सर्वे  के आधार पर नहीं किया गया. एएससीआई ने विज्ञापन प्रकाशित करनेवाले अखबार को इस विज्ञापन में संशोधन के लिए कहा है. साभार : प्रभात खबर

भास्‍कर को चाहिए वितरकों से कमाई में हिस्‍सा!

दैनिक भास्‍कर अब कमाई का कोई जरिया छोड़ना नहीं चाहता है. जैसे भी मिले पैसे आने चाहिए. अब अखबार को वितरकों द्वारा अखबार में भरे जाने वाले इंसर्ट और पम्‍पलेट से होने वाली कमाई में भी एक तिहाई हिस्‍सा चाहिए. यह पैसा कंपनी के खाते में जाएगा. जो वितरक यह हिस्‍सा नहीं देंगे उनकी सप्‍लाई बंद कर दी जाएगी.

ऐसा ही एक वाकया आज सुबह भोपाल के ज्‍योति सेंटर पर देखने को मिला. इस सेंटर के वरिष्‍ठ वितरक वीपी सिंह ने कल एक संस्‍थान के पम्‍पलेट सभी अखबारों में भरे थे. आज सुबह दैनिक भास्‍कर के मुलाजिम मुकेश गुप्‍ता ने वीपी सिंह से कल भरे गए पम्‍पलेट की कमाई का एक तिहाई हिस्‍सा मांगा. वीपी सिंह के मना करने पर उनकी सप्‍लाई रोक दी गई. और उनको सप्‍लाई तब तक नहीं दी जब तक कि वीपी सिंह द्वारा उक्‍त राशि जमा नहीं करा दी गई. खास बात यह रही कि वितरक द्वारा रसीद मांगे जाने पर उन्‍हें कोई रसीद भी नहीं दी गई.

उल्‍लेखनीय है कि भास्‍कर के एजेंटों पर इस तरह का नियम पिछले दो माह से लागू है. जिसके बाद एजेंटों ने पम्‍पलेट भरना बंद कर दिया है. इसे लेकर एजेंट अंदरखाने काफी नाराज हैं. एजेंटों का कहना है कि भास्‍कर जैसे जैसे आगे बढ़ता जा रहा है उसकी सोच भी उसी स्‍तर पर छोटी और घटिया होती जा रही है.

दैनिक भास्‍कर से राजेश और लता ने इस्‍तीफा दिया

दैनिक भास्‍कर, बठिंडा से राजेश नेगी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे भास्‍कर में स्‍टाफर थे. उन्‍होंने अपनी नई पारी अमर उजाला, बठिंडा से ही रिपोर्टर के रूप में शुरू की है. राजेश पिछले डेढ़ साल से भास्‍कर के साथ जुड़े हुए थे. इन्‍होंने अपने करियर की शुरुआत दैनिक जागरण, बठिंडा के साथ की थी. अमर उजाला को भी अपनी सेवाएं दीं. जब अमर उजाला ने पंजाब से अपना बोरिया बिस्‍तर समेट लिया तो ये दैनिक अजीत के साथ जुड़ गए.

दैनिक भास्‍कर, बठिंडा से लता मिश्रा ने भी इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर रिपोर्टर थीं. उन्‍होंने अपना इस्‍तीफा प्रबंधन द्वारा शादी के लिए उनकी छुट्टी न स्‍वीकारे जाने से नाराज होकर दिया. फिलहाल शादी के चलते उन्‍होंने कहीं ज्‍वाइन नहीं किया है लेकिन उनके न्‍यूज चैनल डे एंड नाइट से जुड़ने की संभावना है. वे दो सालों से दैनिक भास्‍कर के साथ जुड़ी हुई थीं.

इस दोनों के इस्‍तीफा देने के बाद भास्‍कर, बठिंडा की मुश्किलें बढ़ गई हैं. अब यहां पर ब्‍यूरोचीफ सहित तीन लोग ही बचे हुए हैं. सभी पर काम का अत्‍यधिक दबाव है. प्रबंधन द्वारा नए पत्रकारों की तलाश किए जाने के बावजूद यहां की कार्यप्रणाली और सेलरी को देखते हुए कोई आने को तैयार नहीं दिख रहा है.

कमाई नहीं दिखी तो बस्‍तर से लौट गए भास्‍कर और नवभारत!

यशवंत जी यह सबसे बड़ी सच्चाई है कि आज पत्रकारिता मिशन न हो कर केवल बिजनेस बन कर रह गया है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण छत्तीसगढ के बस्तर संभाग मुख्यालय जगदलपुर में देखा जा सकता है, जहां साल भर पूर्व दैनिक भास्कर और नवभारत दोनों ने अपनी यूनिट डालने की पूरी तैयारी कर ली थी.

बताया जाता है कि दोनों समूह ने अपने-अपने प्रोजेक्ट के लिए लाखों-करोड़ों रूपये पानी की तरह बहा दिया, लेकिन जब दोनों को इस बात का एहसास हुआ कि बस्तर में कमाई का कोई जरिया नहीं है तो फिर दोनों ही उल्टे पांव लौट गये. दरअसल बात यह है कि दोनों ही ग्रुप इस उम्मीद में थे कि शायद जल्द ही लोहण्डीगुडा में टाटा का स्टील प्लांट शुरू हो जायेगा या फिर नगरनार में एनएमडीसी का स्टील प्लांट बन कर तैयार हो जायेगा. जब दोनों ने देखा कि अभी फिलहाल दोनों की स्टील प्लांट अस्तित्व में नहीं आने वाले हैं फिर प्रेस यूनिट डालने से क्या फायदा?

छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर में दोनों ही अखबार सबसे बड़े प्रतिस्पर्धी हैं, लेकिन समाचारों को लेकर नहीं बल्कि विज्ञापन और कमाई को लेकर. एक दूसरे से सर्कुलेशन ज्यादा होने का दावा करने वाले इन अखबारों में मैदानी कर्मचारियों को कोई तवज्जो नहीं दी जाती, अलबत्ता जिन मैदानी पत्रकारों की मेहनत के कारण ये अखबार चल रहे हैं, उन्हें दरकिनार कर विज्ञापन और सर्कुलेशन वालों को ज्यादा तवज्जो दी जाती है. क्या यही पत्रकारिता है.

छत्‍तीसगढ़ से एक पत्रकार साथी द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित.

बिहार में भास्‍कर के आहट से जागरण परेशान!

जागरणबिहार में दैनिक भास्‍कर के आहट की खबर से ही यहां जमे जमाए अखबार नई रणनीतियां बनाने में जुट गए हैं. दैनिक भास्‍कर जल्‍द ही बिहार से भी अपने प्रकाशन की तैयारी कर रहा है. इसकी जिम्‍मेदारी भास्‍कर प्रबंधन ने झारखंड में अखबार की लांचिंग कराने वाले डीजीएम प्रोडक्‍शन अजय छाबड़ा को सौंपी है.

बिहार में भास्‍कर के अवतरित होने की खबर से उसका सबसे निकटतम प्रतिद्वंद्वी और अपने को नम्‍बर जागरणएक कहने वाला दैनिक जागरण परेशान है. जागरण ने अपने पाठकों को बांधे रहने तथा जोड़े रहने के लिए मेगा आफर की शुरुआत की है. जो जीता वही सिकंदर नाम के इस मेगा ड्रा में निश्चित उपहार की बात कही गई है. अखबार लिखता है स्‍क्रैच कीजिए और निश्चित इनाम पाइए. जागरण के इस कदम के बाद अन्‍य अखबार भी इस तरह के आफर लेकर बिहार के पाठकों के लिए आ सकते हैं. जो भी हो भास्‍कर के बिहार में कदम रखने से पहले ही लड़ाई की तैयारियां शुरू हो गई हैं.

भास्‍कर को बिहार में भी लांच करायेंगे अजय छाबड़ा

दैनिक भास्‍कर के डीजीएम प्रोडक्‍शन अजय छाबड़ा को प्रबंधन ने फिर एक बड़ी जिम्‍मेदारी सौंप दी है. एक मेल के जरिए सूचना मिली है कि झारखंड के रांची और जमशेदपुर में दैनिक भास्‍कर के सफल लांचिंग के बाद छाबड़ा और उनकी टीम को बिहार में भी भास्‍कर की लांचिंग का जिम्‍मा सौंपा गया है. फिलहाल उनकी टीम भास्‍कर की रोहतक यूनिट की लांचिंग की तैयारियों में लगी हुई है.

अजय छाबड़ा की कार्य कुशलता को देखते हुए ही प्रबंधन ने उन्‍हें बिहार की जिम्‍मेदारी सौंपी है. फिलहाल उनके टीम के विश्‍वसनीय साथी इलेक्ट्रिकल इंजीनियर लखेन्‍द्र साहनी, आईटी मैनेजर उद्धव नायक, मशीन प्‍लानर अशोक कुमार इस समय रोहतक में व्‍यस्‍त हैं. रोहतक से खाली होने के बाद ये पूरी टीम झारखंड में धनबाद यूनिट की लांचिंग करायेगी. इसके बाद अजय एंड कंपनी का नया पड़ाव बिहार में भास्‍कर की लांचिंग होगा.

दैविक भास्कर में तब्दील होने को तैयार दैनिक भास्कर!

करीब एक हफ्ते पहले डीबी कार्प लिमिटेड की तरफ से भोपाल के लिए दैविक भास्कर टाइटल बुक कराया गया है. इसके पहले आप इसी पोर्टल पर पढ़ चुके हैं कि डीबी कार्प वालों ने यूपी व उत्तराखंड में दैनिक भास्कर की जगह दैविक भास्कर के नाम से अखबार प्रकाशित करने का इरादा बना लिया है और इसी कारण यूपी-उत्तराखंड के लिए दैविक भास्कर टाइटल बुक कराया है. सूत्रों के मुताबिक टाइटिल को लेकर खानदान में चल रहे झगड़े से हमेशा के लिए निजात पाने के उद्देश्य से रमेश चंद्र अग्रवाल और उनके बेटे दैनिक भास्कर से दैविक भास्कर पर शिफ्ट करने की तैयारी कर रहे हैं. इसी कारण धीरे-धीरे वे हर उस जगह के लिए दैविक भास्कर टाइटिल बुक करा रहे हैं, जहां से उनका अखबार अभी निकल रहा है या निकलने वाला है.

ताजी सूचना भोपाल से दैविक भास्कर नाम से टाइटिल बुक कराए जाने को लेकर है. आरएनई से मिली सूचना के मुताबिक डीबी कार्प ने करीब हफ्ते भर पहले 15 दिसंबर 2010 को भोपाल से दैविक भास्कर के नाम से टाइटिल रजिस्टर्ड करवाया है. इसका टाइटल कोड MPHIN25414 है. आनर का नाम M/S DB CORP LTD है. पता की जगह लिखा है- 6, DWARKA SADAN, PRESS COMPLEX, M.P. NAGAR ZONE 1, DIST- BHOPAL, M.P.  ज्ञात हो कि यूपी और उत्तराखंड में संजय अग्रवाल के नाम दैनिक भास्कर टाइटिल है. इसलिए इन इलाकों में डीबी कार्प वाले दैनिक भास्कर नाम से अखबार कानूनन नहीं निकाल सकते. रांची से दैनिक भास्कर नाम से अखबार निकालने के पहले रमेश चंद्र अग्रवाल व उनके बेटों और संजय अग्रवाल के बीच लंबी कानूनी लड़ाई चली. माना जा रहा है कि डीबी कार्प समूह इन झगड़ों से ब्रांड नेम व काम पर असर पड़ते देख टाइटिल के झगड़े से पूरी तरह निजात पाना चाहता है इसी कारण दैविक भास्कर नाम से वैकल्पिक टाइटिल की व्यवस्था करके चल रहा है.

पत्रकारों ने अपने ही ब्‍यूरोचीफ को पीटा

: घटना दैनिक भास्‍कर के कोडरमा ब्‍यूरो कार्यालय की : ब्‍यूरोचीफ ने की पुलिस से शिकायत : दैनिक भास्‍कर, कोडरमा के ब्‍यूरोचीफ मनोज कुमार पांडेय को उनके अखबार का ही रिपोर्टर अपने दो अन्‍य साथियों के साथ मिलकर बुरी तरह मारा-पीटा. उनके ऊपर लोहे के राड से हमला किया. उन्‍हें गंभीर चोटें आई हैं. मनोज ने इसकी शिकायत झुमरी तलैया थाने में कर दी है. तीनों आरोपी रिपोर्टर पुलिस की पकड़ से बाहर हैं.

पुलिस को दी गई शिकायत में मनोज ने बताया कि 16 दिसम्‍बर को दोपहर में रांची ऑफिस से सब एडिटर आलोक कुमार सिंह ने उन्‍हें बताया कि उन लोगों को लगातार रिपोर्टर अजय की शिकायत मिल रही है. आलोक ने कहा कि जिसके चलते यह निर्णय लिया गया है कि अजय को अगले आदेश तक रिपोर्टिंग न करने दी जाए. पांडेय ने बताया कि जब अजय कार्यालय आया तो मैंने उसे मैनेजमेंट द्वारा लिए गए निर्णय के बारे में बताया और रिपोर्टिंग ना करने को कहा. उस समय कार्यालय में रिपोर्टर नवनीत ओझा और कम्‍प्‍यूटर ऑपरेटर अभिनंदन भी मौजूद थे.

इस खबर को सुनने के बाद अजय कुमार उर्फ मंटन ने दो अन्‍य रिपोर्टर साथी संतोष कुमार और गौतम पाल को बुला लिया. मनोज ने बताया कि तीनों ने अचानक उन पर हमला कर दिया. इससे वे जमीन पर गिर पड़े. इसके बाद तीनों ने लगातार उनपर प्रहार जारी रखा. उन्‍हें लोहे की राड से पीटा गया, जिससे उनके सिर पर एवं आंख के पास चोटें आई हैं. दूसरे रिपोर्टरों ने किसी प्रकार उनको बचाया. उस समय कार्यालय के आसपास काफी संख्‍या में स्‍थानीय लोगों की भीड़ लग गई. कुछ लोगों ने उन्‍हें घायलावस्‍था में इलाज के लिए पास के एक क्‍लीनिक पर पहुंचाया. मनोज पर हमला करने के बाद तीनों रिपोर्टर मौके से फरार हो गए.

इस संबंध में मनोज ने बी4एम को बताया कि पिछले दिनों अजय ने माइनिंग ऑफिसर के बारे में एक खबर छापी थी कि यहां के पत्‍थर व्‍यापारी उनके ट्रांसफर के लिए लाखों रुपये खर्च करने को तैयार हैं. इसके बाद माइनिंग ऑफिसर ने बैठक बुलाकर व्‍यापारियों से पूछा कि आखिर उनके लिए क्‍यों इतना पैसा खर्च किया जा रहा है. इस पर व्‍यापारियों ने इस खबर को पूरी तरह झूठ बताते हुए अजय तथा भास्‍कर की निंदा की. इसकी खबर दूसरे कई अखबारों में भी छपी. उनलोगों ने इस खबर की एक प्रति रांची कार्यालय को भी फैक्‍स कर दी. जिसके बाद अजय को अगले आदेश तक रिपोर्टिंग ना करने देने का निर्देश दिया गया.

उन्‍होंने बताया कि इसकी जानकारी जब मैंने अजय को दी तो वह भास्‍कर में  ही रिपोर्टर अपने भाई संतोष तथा गौतम पाल को बुला लाया और मेरे साथ मारपीट की. उनके आंख के पास कई टांके लगे हैं. उन्‍होंने बताया कि वे इसकी जानकारी रांची में अखबार प्रबंधन के लोगों को दे दी है. पर अभी तक कोई कोडरमा नहीं आया है.

भास्‍कर प्रबंधन द्वारा इस घटना की तरफ से आंख मूंद लिया जाना चर्चा का विषय बना हुआ है. बताया जा रहा है कि इससे नाराज मनोज के गांव वालों ने थाने पर प्रदर्शन भी किया. पुलिस पर लापरवाही बरतने तथा जानबूझकर हीलाहवाली करने का आरोप लगाया.

नागपुर में पाठकों को लुभाने के लिए बांटे जा रहे उपहार

आजकल अपने ‘ब्राण्ड‘ को टिकाए रखने के लिए उद्योगपति या उत्पादक किस तरह की मार्केटिंग का सहारा लेते हैं, इसे टीवी चैनलों, खबरिया चैनलों, रेडियो और समाचार पत्रों में आसानी से देखा-पढा और सुना जा सकता है. मगर प्रचार-प्रसार, विज्ञापनों और मार्केटिग के युग में अब समाचार-पत्र भी पीछे नहीं हैं. उन्हें लगता है कि अगर हम इस स्पर्धा में पिछड़ गए, तो हमारे साथ वर्षों से जुडा पाठक वर्ग कहीं हाथ से निकल न जाए.

इसी लीक पर चलते हुए पिछले कुछ वर्षों में नागपुर में कभी एक रुपए में अखबार बेचने की होड़ चलती है, तो कभी उपहार बांटने या जीतने की परंपरा चलती है. मगर बीते दो माह से संतरानगरी नागपुर में दो बड़े हिन्दी अखबारों ने अपने-अपने पाठकों को रिझाने या टिकाए रखने की गरज से धार्मिक भावनाओं का सहारा लिया. हुआ यूं कि अक्टूबर माह में एक गुरुवार को उपराजधानी के प्रसिद्ध हिन्दी दैनिक नवभारत ने 21000 सिद्ध मोती बांटने का ऐलान किया. यह मोती पाने के लिए उस दिन साईं मंदिर में पाठकों/भक्तों ने लंबी-लंबी कतारें लगाई थीं. 21000 मोती पाने के लिए कम से कम एक लाख लोग जुटे थे, मगर 79000 लोगों को निराशा हुई. नवभारत ने फिर सुहृदयता का परिचय दिखाते हुए अक्टूबर माह में ही नवरात्रोत्सव के दौरान कोराडी देवी परिसर में पुनः 11,111 सिद्ध मोती बांटने का ऐलान किया. भक्तगणों ने फिर भीड़ जुटाई और अपने आपको धन्य कर लिया.

मोती बांटने की सफलता से जहां नवभारत परिवार काफी उत्साहित हुआ, वहीं प्रतिद्वंदी हिन्दी अखबारों के प्रबंधन ने भी दिमाग लगाना शुरू किया. 9 दिसंबर को ‘दैनिक भास्कर’ ने अपनी 8वीं वर्षगांठ मनायी. दैनिक भास्कर ने इससे पूर्व ही जलाराम सत्संग मंडल के साथ क्वेटा कालोनी के जलाराम मंदिर परिसर में 11,111 ‘सिद्ध रुद्राक्ष‘ बांटने का ऐलान कर दिया था. 9 दिसंबर को क्वेटा कालोनी लकड़गंज में हजारों भक्तगण रुद्राक्ष पाने के लिए सुबह से कतारबद्ध खडे थे. कई तो काफी दूर-दूर से आए थे. धर्म का काम भी हो गया और दैनिक भास्कर की ब्रांडिंग भी हो गई. मगर 11,111 रुद्राक्ष बांटने पर शहर के कुछ धर्मप्रेमियों को यह कहते हुए भी सुना गया कि ‘जीवन में कभी भी रुद्राक्ष न मुफ्त में लेना चाहिए, न मुफ्त में देना चाहिए क्योंकि इससे उसका असर खत्म हो जाता है.’ अब पता नहीं सच्चाई क्या है, मगर 11,111 धर्मपरायण जनता ने इन रुद्राक्षों का लाभ उठाया, यह निश्चित है.

अब रहा तीसरा बड़ा हिन्दी दैनिक लोकमत समाचार. लोकमत ग्रुप के इस अखबार की 23वीं वर्षगांठ आगामी 14 जनवरी को मनाई जाने वाली है. सूत्रों के अनुसार ‘मोती’ और ‘रुद्राक्ष’ बांटने की तोड़ में इस अखबार का प्रबंधन मोर पंख बांटने की योजना बना रहा है. वैसे ‘मोर पंख’ का धार्मिक महत्व भी मोती और ‘रुद्राक्ष’ की तरह ही है. ये ‘मोरपंख’ हिन्दू धर्म और जैन धर्म की तरह ही इस्लाम धर्म में भी पूरी पवित्रता के साथ स्वीकार किया जाता है. हिन्दुओं में जहां इसे अक्सर भगवान कृष्ण के सिर पर लगा देखा जा सकता है, वहीं जैन धर्म में हमेशा किसी भी जैन मुनि के हाथ में देखा जा सकता है. यह चंवर डुलाने के काम भी आता है. उसी तरह इस्लाम में भी मोरपंख मजारों-मस्जिदों में उपयोगी होता है. तो अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मोती बंटे, रुद्राक्ष बंटे… तो लोकमत समाचार क्या सचमुच 14 जनवरी को ‘मोरपंख‘ बांटेगा? वाकई अगर ऐसा हुआ तो यह उपराजधानी नागपुर की धर्मप्रेमी जनता व पाठकों के लिए सौभाग्य की बात होगी.

नागपुर से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित.

तो ये है इनकी तरक्की का राज

भास्‍करइसे कहते हैं अखबार का सही उपयोग, ऐसे ही नहीं इस अखबार ने दिन दोगुनी रात चौगुनी तरक्की कर ली। जी आप बिल्कुल ठीक समझें, यहां बात दैनिक भास्कर की हो रही है। इस अखबार पर हमेशा से ही प्रशासन से साठ-गांठ कर अपना हित साधने के आरोप लगते रहे हैं।

जिसके भौतिक उदाहरण है- गरीबों की हड़पी हुई जमीन पर अरबों रूपये का डीबी मॉल, आदित्य एवेन्यू जैसे कई पॉश्‍ा कॉलोनियां, नमक, कपडों की फैक्ट्री, एफएम, केबल और ना जाने क्या-क्या? यह सब भी केवल अखबार की दम पर, कैसे? आइए आपको इनकी तरक्की का राज बताते है। यह अखबार अपने सर्कुलेशन को बिल्कुल प्रोफेशनल तरीके से भुनाता है। इसीलिए तो इनके कोई भी काम शासन-प्रशासन में अटकते नहीं।

जब कभी कोई बड़ा प्रोजेक्ट किसी राज्य में शुरू करना हो तो वहां की सरकार को घेरना शुरू कर देते हैं, इसी के चलते उमा भारती ने प्रेस कान्फ्रेन्स बुलाकर खुले तौर पर इस अखबार की ब्लैकमेलिंग उजागर की थी। उमा जी ने तमाम इलेक्‍ट्रॉनिक एवं प्रिन्ट मीडिया के सामने भास्कर पर आरोप लगाया था कि उनके किसी भूमि संबंधी विवाद का चूंकि उमा भारती ने समर्थन नहीं किया इसीलिए अखबार में उनकी झूठी खबरें प्रकाशित की गईं।

ताजा उदाहरण मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का है, एक और जहां अन्य सभी अखबार खजुराहों इन्वेस्टर्स समिट की सराहना कर रहे थे, वहीं इस अखबार ने शुरू से ही समिट को लेकर निगेटिव खबरें प्रकाषित की, गलत आंकड़े प्रस्तुत किए और जब इतने से भी बात नहीं बनी तो दिनांक 28 अक्टूबर के अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पूरे समिट के नतीजों को ही संदेहास्पद बता कर लीड स्टोरी प्रकाशित कर दी।

परन्‍तु कल शिवराज सिंह से हुई संपादक की ‘विषेष अनौपचारिक चर्चा’ के बाद आज ठीक इसके उलट पूरी तरह सकारात्मक खबर प्रकाशित की गई। साथ ही इसके लिए मुख्यमंत्री की प्रशंसा भी की गई। अब इस प्रकार की मेनूपूलेटिव खबरों के साथ इस अखबार के उज्‍ज्‍वल भविष्य का सपना देख रहे इसके आकाओं को गंभीर विचार करना चाहिए, क्योंकि एक समय के बाद आप पाठक को अधिक मूर्ख नहीं बना सकते। दोनों खबरें मय फोटों के आपके सामने है बाकी की टिप्पणी आप खुद ही कीजिए।

भोपाल से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


दैनिक भास्‍कर

भास्‍कर

दैनिक जागरण, सिरसा से तीन का इस्‍तीफा

: शशिकांत ने भास्‍कर, ग्‍वालियर से ली विदाई : दैनिक जागरण, सिरसा में अंदरूनी राजनीति से परेशान तीन पत्रकारों ने संस्‍थान को बॉय बोल दिया है. तीनों सिरसा में अखबार की अंदरूनी राजनीति से परेशान बताये जा रहे थे. खबरों पर विज्ञापन के हावी होने से तीनों परेशान चल रहे थे. दबाव के चलते तीनों ने अपना इस्‍तीफा सौंप दिया.

दैनिक जागरण, सिरसा से इस्‍तीफा देने वाले आनंदमणि ने अपनी नई पारी की शुरुआत दैनिक भास्‍कर, हिसार के साथ की है. आनंद ने अपने करियर का आगाज जागरण, हिसार से की थी. इस्‍तीफा देने वाले दूसरे सदस्‍य अमित धवन ने भी अपनी नई पारी दैनिक भास्‍कर, हिसार के साथ शुरू की है. जागरण से रजनीश ने भी इस्‍तीफा दे दिया है. रजनीश जागरण रोहतक से हिसार आए थे. वे अपनी नई पारी की शुरुआत कहां से कर रहे हैं, इसका पता नहीं चल पाया है.

एक अन्‍य सूचना के अनुसार दैनिक भास्‍कर, ग्‍वालियर के सिटी रिपोर्टर शशिकांत तिवारी ने संस्‍थान को गुड बॉय कह दिया है. शशिकांत के नए डेस्‍टीनेशन का पता नहीं चल पाया है. बताया जा रहा है कि समाचार संपादक भगवान उपाध्‍याय से तालमेल नहीं बन पाने के चलते शशिकांत ने इस्‍तीफा दिया है.

पत्रकार को फुटपाथ पर गुजारनी पड़ी रात

: अमन को चुकानी पड़ी संस्‍थान बदलने की कीमत : मीडिया जगत में ऐसा अक्सर होता रहता है कि एक पत्रकार या डेस्क कर्मी यहां तक कि संपादक तक बढिय़ा मौके व वेतन की तलाश में एक संस्थान से दूसरे संस्थान में चले जाते हैं। लेकिन ऐसा होने के बावजूद भी मीडियाकर्मियों के मन में कोई बदलाव नहीं होता और न ही कोई मनमुटाव। सभी को पता रहता है कि हो सकता है कि आने वाले समय में वह फिर से एक दूसरे के साथ मिलकर काम कर रहे हों, लेकिन बठिंडा में जो हुआ, वह पत्रकार जगत में चलती इस भाईचारे वाली परंपरा के उलट हुआ।

सभी को पता है कि कुछ ही दिनों पहले दैनिक भास्कर द्वारा बठिंडा में अपना नया संस्करण लांच किया गया है और अन्य कई सेंटरों से स्टाफ को यहां ट्रांसफर करके भेजा गया है। कुछेक साथी अपने शहरों से बठिंडा में काम करने से खुश नहीं थे। यही वजह थी कि उन्होंने दूसरे मीडिया हाउसों में अपने शहर की नौकरी तलाशनी शुरू कर दी। इनमें से ही एक हैं अमन चौहान। दैनिक भास्कर जालंधर से कैरियर शुरू करने वाले अमन चौहान को डेस्क कार्य का अच्छा-खासा अनुभव है और इस अंतरमुखी व्यक्तित्तव को बठिंडा शहर पसंद नहीं आया था।

किसी खास मित्र के जरिए दैनिक जागरण लुधियाना में नौकरी की सूचना मिली और अपने संपर्क के जरिए इसने भी अप्रोच किया। किस्मत अच्छी थी कि उसे बढ़े हुए वेतन पर जाने का मौका मिल गया। साफ दिल के मालिक अमन चौहान ने इस बारे में दैनिक भास्कर के बठिंडा एडिशन के एडिटर चेतन शारदा को बता दिया। नौकरी से औपचारिक त्याग पत्र भी दे दिया, जिसके बाद वह उस दिन की अपनी ड्यूटी को पूरा करने में जुट गया।

अपना काम निकलवाने के लिए प्यार व पुचकार करने तथा काम निकल जाने पर पहचानने से भी इनकार करने वाली पंजाब केसरी की मानसिकता वाले चेतन शारदा को शायद अमन चौहान की साफगोई बर्दाश्त नहीं हुई, जिस कारण डेस्क का काम खत्म होने तक चेतन शारदा ने अपनी कुंठित मानसिकता को छुपाए रखा और अमन से काम करवाते रहे। लेकिन रात के दो बजते ही चेतन शारदा का क्रूर चेहरा सामने आ गया। काम खत्म होने के कगार पर था और चेतन ने इंसानियत व भाईचारे की भावनाओं को तार-तार करते हुए अमन चौहान को तत्काल अपना बोरिया-बिस्तर उठाने और आफिस से बाहर चले जाने को कह दिया।

आफिस द्वारा उपलब्ध करवाए गए होटल रूम से पहले ही अमन का चेकआउट करवाया जा चुका था। आफिस के बाहर तैनात सिक्योरिटी गार्ड को भी अमन चौहान को अंदर न घुसने देने की ताकीद करके चेतन शारदा द्वारा इस भले मानुष को फुटपाथ पर रात गुजारने के लिए मजबूर करने का इंतजाम किया जा चुका था।न्यूज एडिटर का यह रुख देखकर किसी भी साथी कर्मचारी की हिम्मत नहीं हुई कि वह अपना बैग लेकर फुटपाथ पर बैठे अमन चौहान को भीतर बैठने या अपने साथ कमरे पर चलने को कह सके। अपना काम खत्म कर, एक-एक करके सभी चले गए। चेतन शारदा भी, लेकिन आफिस के बगल में ही फुटपाथ पर बैठे रहे अमन चौहान की हालत पर किसी ने भी तरस नहीं खाया।

बठिंडा से बस सर्विस सुबह साढ़े चार बजे के बाद ही शुरू होती है, इसलिए अमन ने तिरस्कार से भरे तकरीबन ढाई घंटे फुटपाथ पर बैठे-बैठे ही बिताए। ऐसी हरकत एडिटर लेवल के व्यक्ति को तो क्या किसी को भी शोभा नहीं देती। यदि एक व्यक्ति आपके साथ संस्थान में काम कर रहा था और दूसरी जगह जा रहा है तो भी उसका जुड़ाव तो मीडिया से ही रहेगा। चेतन शारदा की इस हरकत से तो ऐसा महसूस होता है कि शायद उन्हें उसी ईष्‍या या दुर्भावना का आभास हुआ होगा, जो एक शोरूम में दो हजार रुपये प्रतिमाह लेकर साफ-सफाई करने वाले को म्यूनिसिपैलिटी में 15 हजार रुपये लेकर सफाई करने वाले से हो सकता है।

भास्कर के दो स्टेट हेड बन गए हैं आरई

डबल रोल के पीछे क्या है? : स्टेट हेड का मतलब पूरे स्टेट के एडिशन्स की जिम्मेदारी। पर दुर्भाग्य या संयोग, जो कह लीजिए, कुछ ऐसा बना है कि भास्कर समूह के दो स्टेट हेड आजकल रेजीडेंट एडिटर की तरह काम कर रहे हैं। भोजपुरी में कहा जाए तो कह सकते हैं कि ‘खट रहे हैं’। दोनों के सिर पर अपने-अपने स्टैट कैपिटल के एडिशन्स की जिम्मेदारी आन पड़ी है।

इन दोनों स्टेट हेडों के नाम हैं अभिलाष खांडेकर और कमलेश सिंह। अभिलाष खांडेकर मध्य प्रदेश के स्टेट हेड हैं तो कमलेश सिंह पंजाब के। भोपाल एडिशन के आरई राजेश उपाध्याय को दो दिन पूर्व पहले से तय जिम्मेदारी के लिए रवाना कर दिया गया। यह जिम्मेदारी उन्होंने कुबूल भी कर ली। सो, भोपाल की अपनी गद्दी खाली कर गए। राजेश दिल्ली में भास्कर के नेट एडिशन्स के संपादक बना दिए गए हैं। भोपाल के लिए नया स्थानीय संपादक अभी भास्कर तय नहीं कर पाया है। सो, स्टेट हेड के सिर पर आरई की जिम्मेदारी आन पड़ी है। स्टेट हेड अभिलाष खांडेकर न्यूज एडिटर मणिकांत सोनी के माध्यम से एडिशन निकलवा रहे हैं। उन्हें मुक्ति तभी मिलेगी जब कोई नया आरई आएगा।

अब पहुंचते हैं कमलेश सिंह के पास। कमलेश के पास पंजाब राज्य समेत हरियाणा और हिमाचल का भी जिम्मा है। जाहिर है, चंडीगढ़ उनके दायरे में होगा ही। भास्कर प्रबंधन प्रभात सिंह को चंडीगढ़ की जिम्मेदारी से मुक्त करने की तैयारी बहुत पहले कर चुका था। इसी बीच प्रभात ने अमर उजाला में माहौल बदला देख अमर प्रबंधन से बातचीत कर अपनी नई पारी पक्की कर ली, सो, उन्होंने भास्कर, चंडीगढ़ को बाय-बाय बोल दिया। उनके अमर उजाला, बरेली में आरई के रूप में ज्वाइन किए काफी टाइम हो गया पर दैनिक भास्कर, चंडीगढ़ में आरई का पद भरा नहीं, अब भी खाली है। प्रभात सिंह का नाम प्रिंट लाइन में दैनिक भास्कर, चंडीगढ़ में अब भी जा रहा है पर एडिशन निकाल रहे हैं कमलेश सिंह। चंडीगढ़ यूनिट वाले लंबे समय से आस लगाए हैं कि नया एडिटर आएगा, नई रोशनी के साथ नए सिद्धांत और तौर-तरीके लाएगा पर नया आरई है कि आ ही नहीं रहा। सो, मजबूरन कमलेश सिंह को चंडीगढ़ का एडिशन संभालना पड़ रहा है। उन्हें भी मुक्ति तभी मिलेगी जब कोई नया आरई आएगा।

पर सोचिए। एक शिगूफे के बारे में सोचिए, जो आजकल भाई लोगों ने छोड़ रखा है। भास्कर को क्या जरूरत पड़ी है भोपाल और चंडीगढ़ में आरई लाने की। अगर मोटी सेलरी उठा रहे अभिलाष खांडेकर और कमलेश सिंह स्टेट हेड रहते हुए ही स्टेट कैपिटल के एडिशन को निकाल ले रहे हैं तो दो आरई रखने और इन पर अच्छी खासी सेलरी खर्च करने की क्या जरूरत है? ये हम नहीं, दैनिक भास्कर में काम कर चुके कुछ पुराने रंगबाज टाइप लोगों का कहना है। हो सकता है ये लोग भास्कर पर अपनी भड़ास निकाल रहे हों पर खर्चा बचाने की बात अगर भास्कर प्रबंधन के दिमाग में है और नुस्खे की यह पुड़िया किसी ने थमा दी हो तो संभव है कि प्रबंधन ने सिर और सामने मौका आया देख आजमा दिया हो, चोरी-चोरी, चुपके-चुपके!

देखते हैं, अपने अभिलाष भाई और कमलेश जी कब तक डबल रोल में रहते हैं.

इन अखबारों पर थूकें ना तो क्या करें!

दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर जैसे मीडिया हाउसों ने इमान-धर्म बेचा : देवत्व छोड़ दैत्याकार बने : पैसे के लिए बिक गए और बेच डाला : पैसे के लिए पत्रकारीय परंपराओं की हत्या कर दी : हरियाणा विधानसभा चुनाव में दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर जैसे देश के सबसे बड़े अखबारों ने फिर अपने सारे कपड़े उतार दिए हैं। जी हां, बिलकुल नंगे हो गए हैं। पत्रकारिता की आत्मा मरती हो, मरती रहे। खबरें बिकती हों, बिकती रहे। मीडिया की मैया वेश्या बन रही हो, बनती रहे। पर इन दोनों अखबारों के लालाओं उर्फ बनियों उर्फ धंधेबाजों की तिजोरी में भरपूर धन पहुंचना चाहिए। वो पहुंच रहा है। इसलिए जो कुछ हो रहा है, इनकी नजर में सब सही हो रहा है। और इस काम में तन-मन से जुटे हुए हैं पगार के लालच में पत्रकारिता कर रहे ढेर सारे बकचोदी करने वाले पुरोधा, ढेर सारे कलम के ढेर हो चुके सिपाही, संपादकीय विभाग के सैकड़ों कनिष्ठ-वरिष्ठ-गरिष्ठ संपादक।

इनके गले से विरोध की कोई बोली नहीं निकल रही है। कोई उफ तक नहीं कर रहा है। इन्हें कोई अव्यवस्था नहीं दिख रही है। पापी पेट के नाम पर ये ढेर सारे पापों के भागीदार बने हुए हैं। वैसे, बाकी दिनों में ये ही लोग पत्रकारिता पर ढेर सारा भाषण पिलाते नजर आ जाएंगे। कंधे उचकाते और खुद को देश-समाज का प्रहरी दिखाते दिख जाएंगे। व्यवस्था, नैतिकता और नियम-कानून की दुहाई देते हुए सैकड़ों उदाहरण और तर्क-कुतर्क पेश करने में क्षण भर नहीं लगाएंगे। फिलहाल ये चुप हैं, आंखें मूंदे हैं, क्योंकि इनके मालिक का सीजन है, सो इनका भी थोड़ा-बहुत सीजन है ही। शायद, कुत्ते और कुकुरमुत्ते कुछ इसी तरह के होते हैं।

दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर। इन दोनों बड़े अखबारों के हरियाणा संस्करणों पर नजर डालिए।  इनका पैसे लेकर खबरें छापने का खुला खेल दिखने लगा है। दैनिक भास्कर ने एक फर्जी सर्वे के जरिए मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की जय-जयकार की है। पूरी खबर हमने नीचे दे दी है। इस खबर को पढ़ लीजिए। आपको उल्टी हो जाएगी। करोड़ों रुपये लेने के बाद फर्जी, प्लांटेड और पेड खबरों के जरिए किस तरह किसी को मक्खन लगाया जाता है, उपकृत किया जाता है, झूठ लिखा जाता है, यह जानना हो तो नीचे दी गई खबरों को पूरा पढ़िए। एक-एक लाइन पढ़िए। और फिर हंसिए या माथा पीटिए, ये आपकी मर्जी क्योंकि यह लोकतंत्र है, यहां सब कुछ करने की आजादी हर किसी को है। तभी तो मीडिया के नाम पर अखबार निकाल रहे सेठ लोग करोड़ों रुपये में सीधे-सीधे खबरों का सौदा कर दे रहे हैं और उनका कुछ नहीं बिगड़ रहा है। वे देश के महानतम हस्तियों में शुमार हैं। देश के प्रभावशाली लोगों में शुमार हैं। वे देश के भाग्यविधाताओं में गिने जाते हैं। पर हम आप अगर सिर्फ दो-चार झूठ भर बोल दें और पकड़ लिए जाएं तो हम अपराधी, पापी और देश विरोधी घोषित कर दिए जाएंगे। धन्य है अपन का लोकतंत्र, धन्य है अपन लोकतंत्र के चौथे खंभे।

कोई प्रभाष जोशी क्या कर लेगा इन मोटी चमड़ी के बनियों का। कोई ज्यादा चें-पों-चूं-चपड़ करेगा तो ये सारे बनिए मिलकर दे देंगे उसकी सुपारी। पर ये खुद न तो सुधरेंगे और न मानेंगे। इन्हें इतना पैसा कमाना है, इतना पैसा कमाना है, इतना पैसा कमाना है कि…. जाने कितना पैसा कमाना है। कमाओ भइया, खूब कमाओ। पर याद रखना। तुम लोगों का अखबार कभी देश की आजादी व आदर्श का हिस्सा था। यही अखबार अब देश को गुलामी की ओर ढकेलते जाने व आम जनता को पतित करते जाने का माध्यम बनता जा रहा है। जिनका काम झूठ और सच को अलग-अलग करके दिखाना-बताना-समझाना है, वे खुद झूठ के साथ खड़े होकर झूठ को सच की तरह पेश करने में लगे हैं।

यह स्थिति सिर्फ हरियाणा चुनाव में ही नहीं है। संग-संग महाराष्ट्र में हो रहे विधानसभा चुनाव में तो संपादकों के पास करने के लिए कुछ है ही नहीं। मालिकों ने सीधे तौर पर पोलिटिकल पार्टियों और प्रत्याशियों से डील कर लिया है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में किस कदर पैसा बहता है, यह सबको पता है। देश-विदेश की ब्लैकमनी राजनीतिज्ञों के पास है और ये राजनीतिज्ञ अपनी व अपनी पार्टी की जीत सुनिश्चित करने के लिए पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं। महाराष्ट्र के ज्यादातर बड़े अखबारों ने पैकेज डील किया है। स्थानीय और केंद्रीय, दोनों स्तरों पर पैसे लिए गए हैं और बदले में उनकी सभाएं, भाषण, फर्जी विश्लेषण जमकर प्रकाशित किए जा रहे हैं। महाराष्ट्र के एक वरिष्ठ पत्रकार ने आपसी बातचीत के दौरान जानकारी दी कि इस वक्त अखबार अखबार नहीं रह गए हैं बल्कि नेताओं के पोस्टर व पंफलेट बन चुके हैं।

इन अखबारों को नेताओं की खाल खींचनी चाहिए थी। उनकी करतूतों और कमियों को जनता तक पहुंचाना चाहिए था। उनके अच्छे-बुरे को जनता के सामने पेश करना चाहिए था। उनके राज में हुए घपलों-घोटालों का विवरण देना चाहिए था। कागजी विकास और असली विकास पर खोजपरक रिपोर्टें पेश करनी चाहिए थी। इन नेताओं की संपत्तियों और उनकी नीतियों पर सवाल कर उन्हें कठघरे में खड़ा करना चाहिए था। मतलब, एक समुचित चौथे खंभे, समचुति विपक्ष, समुचित विश्लेषक का, समुचित शिक्षक का रोल निभाना चाहिए था। लेकिन ये सब भूल चुके हैं। इनकी आंख पर बाजारवादी व्यवस्था का रुपया-पैसा चढ़ा हुआ है। टर्नओवर बढ़ाते जाना है।

हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान दो बड़े अखबारों में प्रकाशित दो खबरें नमूने के तौर पर पेश हैं। अगर आप पत्रकार हैं या संवेदनशील नागरिक हैं और इन खबरों को पढ़ने के बाद आपको लगे कि इन खबरों के नाम पर अच्छा-खासा पैसा इन अखबारों के मालिकों ने बनाया है और ऐसा करके इन लोगों ने चौथे खंभे के साथ विश्वासघात किया है, जनता के साथ छल किया है, पाठकों के साथ धोखा किया है, तो आप अपनी भड़ास निकालने के लिए इन अखबारों का नाम लेकर अपने अगल-बगल की डस्टबिन में या सड़क पर या वाश बेसिन में या किसी भी उचित जगह जरूर थूक दें।

संभव है, इन थूकों के जरिए हम लोग दूर बैठे-बैठे ही इन अखबारों के मालिकों के पैसे कमाने की खातिर विकृत हो चुके मन का टेलीपैथी के जरिए उपचार कर सकें। कहते हैं न, कई बार कई लोगों के लिए श्राप भी वरदान बन जाता है।

– यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com


बुजुर्गों के मान सम्मान से मिलेगा सबका आशीर्वाद

सर्वे में कांग्रेस से खुश नजर आए बुजुर्ग

 

हरियाणा. देश में हरियाणा के ताऊ की संज्ञा लिए हुए प्रदेश का बुजुर्ग मतदाता इस विधानसभा चुनाव में पेंशन नीति से खुश नजर आ रहा है। इस वजह से उसका झुकाव मौजूदा सरकार की ओर दिख रहा है। सीनियर सिटीजन नीति से सम्मानित महसूस दैनिक भास्कर, चंडीगढ़ में 9 अक्टूबर को पेज दो पर प्रकाशित खबरकर रहे बुजुर्ग महिलाओं और पुरुषों का यह रुझान चुनावी सरगर्मियों के बीच एजेंसियों द्वारा प्रदेश में किए गए सर्वे में सामने आया है। सर्वे एजेंसियों का मुख्य लक्ष्य प्रदेश के गांवों की चौपाल थी। हालांकि यह सर्वे शहरों में बने सीनियर सिटीजन क्लबों व वरिष्ठ नागरिकों के अन्य समूहों में भी किया गया। सर्र्वे में यह बात सामने आई कि बुजुर्ग इस बात से भी खासे उत्साही हैं कि प्रदेश में राहुल फैक्टर और अन्य के कारण युवा कांग्रेस की ओर झुके हैं। इस सर्वे में बजुर्गों से एक परफोर्मा भरवाया गया, जिसमें प्रदेश में रही सभी सरकारों द्वारा बुजुर्गों के सम्मान के लिए कार्यों के बारे में कुछ प्रश्न थे। 90 फीसदी से ज्यादा बुजुर्गों ने कहा कि बुढ़ापा पेंशन शुरू करके स्व. ताऊ देवीलाल ने बुजुर्गों को कुछ सम्मान देने का प्रयास किया था, लेकिन उनकी नीति को उनके ही वारिस भूल गए।

बुजुर्गों ने कहा कि जो सम्मान उन्हें मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के राज में मिला, उतना न तो उन्होंने सोचा था और न ही पहले किसी ने दिया। बुजुर्गों के व्यक्तिगत अनुभव वाले कालम में कुछ ने लिखा कि हुड्डा सरकार से पहले जब वह पुलिस के पास जाते थे तो उनसे पुलिस के अçधकारी व कर्मचारी बिना सिफारिश के बात तक नहीं करते थे लेकिन इस सरकार ने पुलिस विभाग में भी नोडल सेल की तर्ज पर सीनियर सिटीजन सेल बना दिए। एक बुजुर्ग ने बताया कि मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की इस नीति के बाद उन्हें सम्मान का तब अहसास हुआ, जब एक दिन उसके बेटे ने उसे घर से निकाल दिया। किसी दोस्त ने उसे सीनियर सिटीजन सेल का नंबर दिया तो उसने संपर्क किया। इसके बाद पुलिसवालों ने उसे थाने नहीं बुलाया, बल्कि कुछ ही मिनटों में पुलिस की गाड़ी से मृदुभाषी अफसर उतरे और उसे घर ले गए। इसके बाद उसके बेटे ने उसे कभी तंग नहीं किया।

एक कालम में जब बुजुर्गों से विधानसभा चुनाव की हवा के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि यह तो कुछ ही दिनों में सबके सामने स्पष्ट नजर आ जाएगा, लेकिन ऐसा मुख्यमंत्री उन्होंने पहली बार देखा है। बुजुर्गों ने कहा कि जब मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने प्रदेश के हर बुजुर्ग को अपने पिता स्वगीüय रणबीर हुड्डा के समान समझा है तो वह भी उसे इस चुनाव में अपना आशीर्वाद देंगे। उन्होंने कहा कि यह चुनाव हुड्डा नहीं लड़ रहे बल्कि प्रदेश के बुजुर्ग स्वयं लड़ रहे हैं। कई मामलों में उनके युवा पुत्र और पौत्र उनकी बात नहीं मानते, लेकिन चुनाव में कांग्रेस का समर्थन करने की बात पर वह भी उनके साथ एकमत हैं। हालांकि युवा इस बार स्व. प्रधानमंत्री राजीव गांधी की छवि लिए हुए उनके पुत्र राहुल गांधी को ज्यादा पसंद कर रहे हैं। बुजुर्गों ने कहा कि यदि प्रदेश की जनता को यह बात समझ में आ जाए कि मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा को जो लोकप्रियता मिली है, वह उनके काम की बदौलत है और ऐसा काम लगातार होता रहा तो प्रदेश की शक्ल ही बदल जाएगी। यहां से कमाने के लिए विदेश जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि विदेश से लोग यहां पर कमाने के लिए आएंगे। बिजली विभाग से रिटायर्ड एक कार्यकारी अभियंता ने बताया कि प्रदेश में निर्माणाधीन पावर प्लांटों में चीन से काफी मजदूर व अफसर कमाने आ रहे हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि प्रदेश ने कितनी तरक्की कर ली है। सर्वे के अन्य सवालों से यह बात भी सामने आई कि बुजुर्ग न सिर्फ अपने सम्मान से खुश हैं, बल्कि वह कांग्रेस सरकार की हर नीति पर नजर लगाए हुए हैं। एक बुजुर्ग ने कहा कि पहले उन्होंने अपने बेटे को खूब पढ़ाया, लेकिन बीए करने के बाद भी उसे नौकरी नहीं मिली और वह खेती कर रहा है। उनके पौत्र ने इंजीनियरिंग की। हालांकि सरकारी नौकरी तो उसे भी नहीं मिली, लेकिन सरकारी नौकरी में मिलने वाली तनख्वाह से तीन गुणा तनख्वाह पर दिल्ली में नौकरी मिल गई। आज गरीब का लड़का हो या लड़की, इंजीनियरिंग-डॉक्टरी और प्रबंधन में नाम कमा रहे हैं। एक अन्य ने बताया कि पहले उसका बेटा पहलवानी करता था और उसे साथ-साथ खेती भी करनी पड़ती थी, लेकिन आज खेलों में मेडल जीतने पर सरकार इतना इनाम देती है कि खिलाçड़यों को न तो कोई दूसरा काम करने की जरूरत पड़ती है और न ही नौकरी की।

(दैनिक भास्कर, चंडीगढ़ में 9 अक्टूबर को पेज दो पर प्रकाशित खबर. इस खबर में कहीं न तो एडीवीटी लिखा गया है और न इसके विज्ञापन होने का कोई चिन्ह प्रस्तुत किया गया है. जाहिर है, इसे हम लोगों को न्यूज मानने के लिए बाध्य किया गया है. सोचिए, वोट गिरने में जब कुछ दिन बचे हों तो इस तरह की खबर का क्या मतलब होता है?)


हुड्डा की शालीनता के विरोधी भी कायल

रोहतक, वरिष्ठ संवाददाता। हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने शालीन राजनेता की पहचान बनाई है। हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जाट बेल्ट में अपनी मीठी जुबान व मिलनसार दैनिक जागरण, चंडीगढ़ के 10 अक्टूबर के अंक में पेज 7 पर प्रकाशित खबर.स्वभाव के कारण उन्होंने खास मुकाम हासिल किया है। विरोधी भी उनके शालीन व सरल स्वभाव के कायल हैं। जो लोग पिछले साढ़े चार के अरसे में कभी मुख्यमंत्री निवास आए हैं वह इस बात की ताकीद ही करेंगे। चंडीगढ़ में उनके सरकारी घर के दरवाजे पर आने वालों के साथ सुरक्षाकर्मी ज्यादा टोकाटाकी नहीं करते, नहीं तो

पूर्व के मुख्यमंत्रियों के शासनकाल दौरान तो करीब आधा दर्जन जगह पर तलाशी देकर ही कोई आदमी वहां पहुंच सकता था। अब सरकारी सुरक्षाकर्मी केवल तय नियम-कायदे मुताबिक ही अब जरूरी पूछताछ या तलाशी लेते हैं। उनके सरकारी आवास पर इसी कारण आगंतुकों की तादाद पहले की अपेक्षा बढ़ी है। मुख्यमंत्री आवास पर तैनात कई कर्मचारी मानते हैं कि पिछले दो-तीन दशक दौरान इतना नरम स्वभाव का कोई मुख्यमंत्री देखने को नहीं मिला जो मिलने आए आदमी का रुतबा नहीं देखता और लोगों से बराबरी का व्यवहार करता हो। कई बार तो मुख्यमंत्री हुड्डा मिलने आए व्यक्ति के साथ बात करते-करते उसके कंधे पर हाथ रख देते हैं। यह अपनेपन का अहसास ही कई लोगों को संतुष्ट कर देता है। कंधे पर हाथ रख कर जब वह किसी से पूछते हैं हां भाई कैसे आए तो कई लोग तो अपना काम तक भूल जाते हैं जिसके लिए वह आए हों। बात सुनने के बाद हुड्डा अपने स्टाफ या सम्बन्धित अधिकारी को तुरंत उस कार्य संबंधी निर्देश देते हैं। एक और खासियत है हुड्डा में कि वह किसी को लटकाऊ जवाब नहीं देते बल्कि जिनका काम संभव नहीं होता, उसे विनम्र शब्दों में इनकार कर देते हैं।

इसी कारण हुड्डा के बारे में आम आदमी की राज्य भर में यह राय बन गई है कि वह अन्य मुख्यमंत्रियों की तरह लटकाऊ या गुस्से में एकदम फट पड़ने वाले सीएम नहीं हैं। अगर कोई मसला गांव के कई लोगों से जुड़ा हो तो पंचायत की बात कर देते हैं जबकि निजी, पारिवारिक या जमीन-जायदाद के मामलों को लेकर वे दूर से ही हाथ जोड़ लेते हैं। अन्य पूर्व मुख्यमंत्री या विपक्षी नेता जहां फोन उठाने के लिए सेवादार साथ रखते हैं वहीं हुड्डा टेलीफोन अक्सर खुद ही उठा कर बात करना पसंद करते हैं। यह उनकी एक अदा है। यहां तक कि आधी रात को भी कोई आम आदमी उनसे टेलीफोन पर बात करके अपनी बात रख देता। सीएम के करीबी अधिकारी बताते हैं कि रात में किसी व्यक्ति द्वारा राज्य के किसी भी हिस्से से फोन पर यह बताने कि डॉक्टर अस्पताल में नहीं आ रहा है या गांव का ट्रांसफार्मर जल गया है तो मुख्यमंत्री पूरी गंभीरता से उसकी बात सुनते हैं और जितनी जल्दी संभव हो सके, उस पर कार्रवाई होती है। मुख्यमंत्री के इस अपनेपन की रोहतक वाले कुछ ज्यादा ही लिफ्ट ले लेते हैं। हमउम्र उन्हें सार्वजनिक तौर पर भूप्पी भाई कहकर पुकारते हैं तो बुजुर्ग केवल भूप्पी कह कर बुलाते हैं।

हुड्डा मानते हैं कि सीधा नाम लेने से लगाव और जुड़ाव का अहसास पैदा होता है। एक खास बात उनके चरित्र में यह है कि संघर्ष के दिनों के अपने साथियों को उन्होंने इतने ऊंचे ओहदे पर पहुंचने के बाद भी भुलाया नहीं है। आज वह मुख्यमंत्री हैं जिन्हें सांस लेने की फुर्सत नहीं, ऊपर से सुरक्षा का अमला। इस सबके बावजूद जब भी मौका मिले वह बलदेव नगर (अंबाला) में सड़क किनारे उस चाय के खोखे पर रुक जाते हैं, जहां कभी पहले वह रुक कर चाय पिया करते थे। अंबाला में ही उन्हें पंडित जी के उस ढाबे के सादा खाने का स्वाद आज भी याद है, जहां पहले कभी उन्होंने भोजन किया था। बहादुरगढ़ से गुजरेंगे तो प्रसिद्ध पकौड़ों की महक उन्हें दुकान तक खींच ले जाती है। इसी सरल स्वभाव व स्वच्छ छवि की विरोधी भी लोहा मानते हैं।

(दैनिक जागरण, चंडीगढ़ के 10 अक्टूबर के अंक में पेज 7 पर प्रकाशित इस रिपोर्ट को तो घोषित तौर पर खबर बताया गया है क्योंकि शुरू में वरिष्ठ संवाददाता लिख दिया गया है. अब आप बताइए, वरिष्ठ संवाददाता ने अपनी वरिष्ठता का लिहाज करते हुए किसके इशारे पर यह सब लिखा होगा?)


आखिर क्यों दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण हुड्डा की तारीफ में खबरें प्रकाशित कर रहे हैं? सिर्फ एक वजह है. वह है सत्ताधारी कांग्रेस सरकार ने इस बार चुनाव में मीडिया पर सबसे ज्यादा पैसा खर्च किया है. विज्ञापन के नाम पर जो खर्च हुआ है वह तो खुला खर्च है लेकिन खबरें प्रकाशित करने के लिए बैकडोर से जो पैसा दिया गया है, वह अरबों में है पर इसका लिखत-पढ़त में कहीं कोई जिक्र नहीं है. अगर अब भी इन अखबारों का नाम लेकर नहीं थूका तो प्लीज, पहले इनका नाम लेकर थूक लीजिए, फिर सोचिए और अपनी बात कहिए.


इस रिपोर्ट पर आपको क्या कहना है? हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में अखबारों के रवैए के बारे में अगर आपको कोई जानकारी देनी है तो हमें लिख भेजिए, bhadas4media@gmail.com के माध्यम से आपका नाम हर हाल में गुप्त रखा जाएगा.