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बाबू सिंह कुशवाहा खबर प्रकरण : डीएनए ने अपने अंदाज में जटा को दिया जवाब

: जनसंदेश टाइम्स अखबार को पाखंड याद दिलाया : खबरों के तात्कालिक व दीर्घकालिक सच को समझाया : लखनऊ में इन दिनों दो अखबार आपस में भिड़े हुए हैं. बसपा के बाबू सिंह कुशवाहा पर एक्सक्लूसिव खबर डेली न्यूज एक्टिविस्ट (डीएनए) अखबार में प्रकाशित हुई. समाजवादी तेवर वाले इस अखबार की खबर के आधार पर जब न्यूज चैनलों ने बाबू सिंह कुशवाहा को मायावती द्वारा निपटा दिए जाने की खबर चलाई तो बसपा और सरकार में हड़कंप मच गया.

: जनसंदेश टाइम्स अखबार को पाखंड याद दिलाया : खबरों के तात्कालिक व दीर्घकालिक सच को समझाया : लखनऊ में इन दिनों दो अखबार आपस में भिड़े हुए हैं. बसपा के बाबू सिंह कुशवाहा पर एक्सक्लूसिव खबर डेली न्यूज एक्टिविस्ट (डीएनए) अखबार में प्रकाशित हुई. समाजवादी तेवर वाले इस अखबार की खबर के आधार पर जब न्यूज चैनलों ने बाबू सिंह कुशवाहा को मायावती द्वारा निपटा दिए जाने की खबर चलाई तो बसपा और सरकार में हड़कंप मच गया.

कहीं बसपा में फूट न पड़ जाए, इस आशंका को देखते हुए बसपा और सरकार की तरफ से प्रेस रिलीज जारी कर बाबू की बलि न होने की बात कही गई. इसके बाद अगले दिन बसपाई अखबार जनसंदेश टाइम्स (जटा) ने डीएनए व न्यूज चैनलों को निशाना बनाते हुए खबरें छापी. इस प्रकरण को विस्तार से आप भड़ास4मीडिया पर ”यूपी में बाबू सिंह कुशवाहा की खबर पर बसपा-सपा के अखबार आमने-सामने” शीर्षक से प्रकाशित खबर में पढ़ चुके हैं.

ताजी सूचना ये है कि डीएनए ने जनसंदेश टाइम्स की खबर को दिल पर ले लिया है और बसपाई अखबार को पत्रकारिता व सच-झूठ के बारे में उसी दार्शनिक अंदाज में समझाया है, जिस अंदाज में जनसंदेश टाइम्स ने बिना नाम लिए डीएनए को समझाया. अब डीएनए ने बिना नाम लिए जटा के जन्म से जुड़े एक बड़े पाखंड को याद दिलाया है और किसी भी खबर की संश्लिष्ट संरचना में कई परतों के होने के बारे में जटा के पत्रकारों को समझाया है. लीजिए, डीएनए में प्रकाशित हो रही खबर को पढ़िए….

कुशवाहा पर कोहराम और पत्रकारिता की दुहाई

सत्तारूढ़ पार्टी का इनाम पाने की चाह रखने वाले जाहिर है कि सरकार और उसकी पार्टी में ही होंगे

लखनऊ (डीएनएन)। उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार में परिवार कल्याण विभाग के अभूतपूर्व मंत्री रहे बाबू सिंह कुशवाहा को अपने ही विभागीय लखनऊ के दो-दो सीएमओ की एक के बाद एक हत्या के बाद जब कुर्सी से हटाकर भूतपूर्व कर दिया गया और अब तो राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के करोड़ों रुपए की बंदरबांट में बलिदानी बना दिए गए तीसरे डिप्टी सीएमओ के मामले में सीबीआई की जांच शुरू हो गई है, ऐसे में कुशवाहा जी द्वारा सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार को भई गति सांप-छछूंदर केरी कहावत को चरितार्थ करने की हालत में पहुंचा देना कोई अस्वाभाविक बात नहीं है। वास्तव में वे अभूतपूर्व ही हैं कि अपनी ही पार्टी-सरकार के लिए न निगलते बन रहे हैं और न उगलते। बहरहाल, अच्छी बात है कि वे सत्तारूढ़ बसपा में जिस भी पद पर हैं, बने हुए हैं और उनपर पार्टी सुप्रीमो व मुख्यमंत्री की ओर से मिलने-जुलने पर कोई रोक-टोक नहीं है।

लेकिन ऐसी खबर सामने आने के बाद दाढ़ी में तिनके की तरह मीडिया के एक खैरख्वाह मंच से अभूतपूर्व मंत्री के बारे में अभूतपूर्व कोहराम सबको आश्चर्य में डालने वाला है। कुशवाहा जी के यथा प्रतिष्ठित बने रहने की हाहाकारी सफाई में पत्रकारिता के ऊंचे मूल्यों और मानदंडों की दुहाई जिस मीडिया मंच से दी गई है, उसकी असलियत यह रही है कि 251 अंकों तक अंडरग्राउंड रहने के बाद 252 वें अंक से वह बहुजन या सर्वजन संदेश देने के लिए लोकार्पित होकर पाठकों के सामने आया। यह प्रारंभ का सार्वजनिक पाखंड नैतिकता और पत्रकारिता के किन मूल्यों और मर्यादाओं का पालन है?

बहरहाल, कुशवाहा पक्ष की इस हाहाकारी सफाई में कुछ दिलचस्प सूचनाएं भी हैं। जैसे यह कि ‘हुकूमत का इनाम हासिल करने की चाह में किसी को गुनहगार साबित करके बदनाम करने की ये साजिश कौन रच रहा है, यह बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल है।’ सत्तारूढ़ पार्टी का इनाम पाने की चाह रखने वाले जाहिर है कि सरकार और उसकी पार्टी में ही होंगे। अपने आप में यह सूचना सत्तारूढ़ बसपा के अंदर चलनेवाली सियासी खींचतान की ओर इशारा है। पता नहीं, कुशवाहा जी इस खींचतान के खिलाड़ी हैं या नहीं? इसी सफाई से दूसरी सूचना यह सामने आई है कि बाबू सिंह कुशवाहा के कथित रूप से हटा दिए जाने की खबर पर बांदा में मिठाइयां बांटी गईं और जब वस्तुस्थिति सामने आई तो मिठाई बांटने-खाने वालों के चेहरे लटक गए। यह सूचना भी बसपा की अंदरूनी खींचतान का ही मुजाहिरा है।

राजनीतिक दलों में अंदरूनी खींचतान होना कोई नई बात नहीं है-हर जगह होती है और राजनीतिक खबरें पार्टियों के अंदरूनी सूत्रों से ही छन कर आती हैं। ऐसी खबरें तात्कालिक सच होती हैं और कई बार दीर्घकालिक सच होती हैं, जो सच निकट-दूर भविष्य में दिखाई देता है। इसका न गोयबल्स के झूठ से लेना-देना होता है और न इसकी वजह से समाजवाद अप्रासंगिक होता है। रोजमर्रा की खबरनवीसी का यह आम पहलू है, जिसे पाठक खूब जानते-समझते हैं और यह भी जानते हैं कि विश्वसनीयता सरकारी जुबान बोलने में है या कि जनता की जुबान बोलने में। गोयबल्स का हवाला गोयबल्सवादी दें, मगर इस मामले में बकौल कबीर यही कहा जा सकता है कि जग का मोजरा लेने के लिए राम झरोखा होना चाहिए, जो 251 अंक छिपाकर नहीं बनाया जा सकता।

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0 Comments

  1. raja

    July 19, 2011 at 7:11 am

    bahut badiyaa bhai sahab profesar nisidh ray ko mera salaam band baja do sale jansandesh times bsp ke akhbaar kee. agar thodi dum dikaho to by line chaap detey bsp ne ek akhbaar nukal diya aur soch lee kee media kharid lee.bsp ne times of india locknow kee bhi ageancies le rakhi hain. jise uska saansaad chalata hain.

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