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बिहार चुनाव : पिक्चर अभी बाकी है दोस्तों

अमिताभ ठाकुर“विकास की जय”… “काम का इनाम”… “फलां ने फलां को नेस्तनाबूद कर दिया”… “फलां को अंत”… आज सुबह जो भी अखबार देख रहा था तो इसी तरह की खबरें दिख रही थीं. हिंदी ही नहीं, अंग्रेजी अखबारों में भी और मराठी, पंजाबी के अखबारों में भी. बल्कि कल से ही य बातें सारे टीवी चीख-चीख कर कह रहे हैं और राजनैतिक विश्लेषक भी यही बात कर रहे हैं. इस रूप में मुझे एक बात जो पत्रकारों की विचित्र सी लगती है वह है अंतिम सत्य का उदबोधन.

अमिताभ ठाकुर“विकास की जय”… “काम का इनाम”… “फलां ने फलां को नेस्तनाबूद कर दिया”… “फलां को अंत”… आज सुबह जो भी अखबार देख रहा था तो इसी तरह की खबरें दिख रही थीं. हिंदी ही नहीं, अंग्रेजी अखबारों में भी और मराठी, पंजाबी के अखबारों में भी. बल्कि कल से ही य बातें सारे टीवी चीख-चीख कर कह रहे हैं और राजनैतिक विश्लेषक भी यही बात कर रहे हैं. इस रूप में मुझे एक बात जो पत्रकारों की विचित्र सी लगती है वह है अंतिम सत्य का उदबोधन.

वैसे शायद यह पत्रकारों की ही प्रवृत्ति नहीं होगी बल्कि इंसानी फितरत ही हुआ करती होगी. तभी तो हम बहुधा किसी भी घटना या घटनाक्रम को कुछ इस प्रकार से देखने लगते हैं मानों अब आखिरी सत्य परिभाषित हो गया है. यह बात मैंने कई बार देखी है. इमरजेंसी का समय था और तमाम बड़े-बड़े नामचीन लोग जेल में थे. लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि अब तो बस यही युग रहेगा. फिर इमरजेंसी हटी और चुनाव हुए. जो नतीजे आये वह अब इतिहास का हिस्सा है. एक आंधी ने एक गाँधी को तथाकथिक तौर पर हमेशा-हमेशा के लिए परास्त कर दिया था और सबों ने सस्वर गान किया-“एक युग का अंत” या फिर-“एक नए युग की शुरुआत.” लेकिन दो-ढाई साल नहीं बीते थे कि एक नयी राम-कहानी दुहराई जाने लगी. जो अंत था वह शुरू हो गया और जिसकी शुरुआत की बातें लंबे-चैड़े आलेख के साथ कही जा रही थीं इनका मर्सिया गाया जाने लगा.

यही बातें बाद के समय में भी कई बार दुहराई गयी हैं और शायद आगे भी ऐसी बातें दिखती रहें. मैं इन बातों से कुछ और साबित नहीं कर रहा और ना ही राजनीति का कोई विश्लेषण कर रहा हूँ. यह मेरा क्षेत्र नहीं है और मेरा इस पर कुछ भी कहने का अख्तियार नहीं है. पर एक बात जो मैं सिद्धांत के तौर पर और सामाजिक विश्लेषक के तौर पर निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि शाहरुख खान नामक शख्स द्वारा उनके चर्चित फिल्म “ओम शांति ओम” में कहा गया डायलोग “पिक्चर अभी बाकी है दोस्तों” शायद ऐसे तमाम मामलों में वास्तविक हालातों को ज्यादा सच्चाई से दर्शाता है बजाय एक-पक्षीय विचार-आख्यान के जो एक ही बार में किसी की हमेशा के लिए हार और किसी के युग-प्रवर्तन की बातें करने लगता है. मेरा यह मानना है कि इतनी जल्दी ना तो युग आते हैं और ना ही युग जाया करते हैं. सामजिक संचेतना और मानसिक विचारधारा में परिवर्तन एक अत्यंत वृहद और क्लिष्ट प्रक्रिया है जो कई सारे आतंरिक गतिविधियों से निरंतर चलते रहते हैं और जिनमे एक प्रकार का गतिरोध सा बना रहता है जो सतह पर तो नज़र नहीं आता पर अंदर-खाने छिपा ही रहता है.

मैं दो ऐतिहासिक तथ्य इस दृष्टि से प्रस्तुत करूँगा. 1945 में इतिहास के सबसे कुख्यात व्यक्ति के रूप में मशहूर हिटलर नामक व्यक्ति ने आत्महत्या की और उसका साम्राज्य मटियामेट हो गया. दुनिया ने समझा होगा कि इसके साथ हिटलर के विचार भी हमेशा के लिए समाप्त हो गए. पर हिटलर तो आज भी कई लोगों के विचारों में ज़िंदा है और हम इसे पसंद करें या नहीं करें. उसके चाहने वालों की आज भी एक अच्छी-खासी संख्या है. जी हाँ, खुद हमारे भारत में भी. दूसरा उदाहरण स्वयं अपने देश का है. भिंडरवाले ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद मारे गए और लगा कि उनकी बातें अब समाप्त- हमेशा के लिए. पर आज भी क्या हम लोग उनके समर्थन में उठ रही आवाजें नहीं सुन लेते हैं. ये अलग बात है कि वैसी आवाजों को आज उस तरह समर्थन नहीं मिल रहा जैसा उस जमाने में था.

मैं इन उदाहरणों से मात्र इतना कह रहा हूँ कि जो सामने दिखता है, वह जरूरी नहीं कि ऐसा ही अंदरखाने में भी हो. यह इतिहास की सीख भी है और सामजिक विज्ञान की भी. तभी तो पृथ्वीराज चौहान नामक योद्धा जब अपने विपक्षी को करारा शिकस्त देकर आराम-फरमा हो जाते हैं और यह सोचने लगते हैं कि अब तो इसका वक्त हमेशा के लिए गया तो वह धीरे से अपनी कार्य-योजना बना कर पूरे देश का इतिहास हमेशा के लिए बदल देते हैं- आज से करीब हज़ार साल पहले. इसीलिये, मैं पत्रकारिता और विश्लेषण में इस बिंदु के समावेश की पुरजोर वकालत करूँगा कि इस तरह के तमाम जनतांत्रिक नतीजों में अंतिम सत्य परिभाषित करने की जगह “पिक्चर अभी बाकी हो सकती है” की बात भी अपने मन में जरूर रखा करें. यह बात किसी व्यक्ति-विशेष या घटना-विशेष पर लागू नहीं होती, यह तो जीवन का सार्वभौम सत्य है.

लेखक अमिताभ ठाकुर पुलिस अधिकारी हैं. इन दिनों अवकाश लेकर शोध, लेखन और घुमक्कड़ी के काम में व्यस्त हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. naresh arora

    November 25, 2010 at 9:50 am

    बिहार चुनाव के नतीजों ने लालू प्रसाद यादव,राम विलास पासवान और सोनिया गाँधी को तो झटका दिया ही लेकिन साथ ही साथ मीडिया को भी बोहत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया..हालाँकि मीडिया द्वारा किये गए सर्वे काफी हद तक ठीक रहे और नितीश ने फिर सत्ता में वापसी की लेकिन एक व्यक्ति जिसे मीडिया पिछले चार साल से हीरो के तोर पर प्रोजेक्ट कर रहा था वोह बुरे तरीके से फ़ैल हो गया..जी हाँ बात राहुल गाँधी की हो रही है..मीडिया ने विरासत में कांग्रेस महासचिव का पद पाने वाले राहुल गाँधी को कांग्रेस के युवराज के तोर पर प्रोजेक्ट किया लेकिन यह महज इत्तेफाक नहीं है की राहुल गाँधी ने जहाँ जहाँ कांग्रेस के लिए प्रचार किया वहां वहां कांग्रेस की लुटिया डूब गयी …इस चुनाव परिणाम से यह भी साफ़ हो गया की पिछले साल उत्तर प्रदेश में लोक सभा चुनाव में कांग्रेस को मिली जीत को स्थायी नहीं कहा जा सकता और उसमे राहुल का कोई करिश्मा नहीं था बल्कि वह परिस्थितियों के कारण मिली जीत थी …अब बिहार चुनाव के परिणाम के बाद लाख टके का सवाल यह है की क्या मीडिया अब भी राहुल गाँधी को वैसे ही ट्रेक करेगा जैसे पहले कर रहा था ? राहुल किस के घर जाते हैं ..क्या खाना खाते हैं..? क्या राहुल अब सच में इतनी बड़ी खबर हैं ? बिहार की जनता ने उन्हें नकार दिया है तो क्या मीडिया भी बिहार की जनता को अनुसरण करते हुए उन्हें कम तव्वजो देगा या कांग्रेस के मीडिया मेनेजर पहले की तरह राहुल गाँधी के लिए हर चेनेल के लिए मेनेज करते रहेंगे ?
    नरेश अरोड़ा

  2. Devashish

    November 25, 2010 at 10:11 am

    आपकी बात सही है. इन नतीजो को किसी की जीत और हार के तौर पर नहीं देखना चाहिए. नहीं एक युग परिवर्तन की तरह. पर ये भी सच है की जिसने जो बोया वाही काटा. पिक्चर (बिहार का विकास) अभी सचमुच बाकि है. पर पगडण्डी तो बन ही गयी है.

  3. om prakash gaur

    November 26, 2010 at 2:57 am

    मात्र तीन फीसदी वोट बढ़े कुल चालीस फीसदी वोट मिले. यानि कुल मतदाताओं के तीस फीसदी उस पर नितीश कुमार इतरा रहे है. लालू-पासवान के छह-छह फीसदी वोट कम हुए है. इससे सीटें पिच्चासी फीसदी दिख रही हैं. फिर अपराधी और करोड़ पति बढ़े है. बस आपने वोट पकड़ने की रणनीति काम कर गयी. कुछ समझे का बचुआ.

  4. sudhanshu kumar

    November 26, 2010 at 4:10 pm

    lalu prasad yadav ka har jana sukhad ghatna bhi nahi kahi jaa sakti kyunki wo akele aese neta the jinhone jatigat janganana aur mahila arakshan ke mudde par pichhre dalit aur alpsankhyako ke liye awaz uthai thi , sarad yadav ki kya takat hai unki party mein ye bhi hamen pata hai khud nitish kumar ne us waqt unka virodh kiya tha. ye ghatnayen shayad kafi hai lalu ji ki jarurat desh ki rajniti mein samajhne ke liye . mein to chahunga ki sahrukh ki film ka dialogue har ke jitne wale ko hi baazigar kehte hai bihar mein duhrayi jayegi chahe waqt paanch saal aur kyon na lage.

  5. मदन कुमार तिवारी

    November 26, 2010 at 7:09 pm

    पहले मीडिया को मैनेज करके यह दर्शाया गया की नीतीश के विकास के कारण बडे बहुमत से उनकी सता में वापसी होगी और वाकई उससे भी ज्यादा हुआ। लेकिन अप्रत्याशित चुनाव परिणाम ने मुझे कुछ और सोचने के लिये मजबुर किया। मतपत्रों के जमाने में बैलेट बाक्स से निकलने वाला जिन्न क्या ई वी एम से भी निकल सकता है। मैं पिछले तीन दिन से लगातार इस पर काम कर रहा था। बहुत सारे आंकडे जुटाये और आज यह कह सकता हुं की ई वी एम में छेडछाड बहुत हीं आसान है। मेरे ब्लाग पर वह विडीयो है जिसको देखकर आप समझ जायेंगें की ई वी एम में तकनीक के सहारे नतीजों को प्रभावित किया जा सकता है। यह विडियो एक रिसर्च टीम के द्वारा तैयार किया गया है।

    http://www.madantiwary.blogspot.com

  6. deepak kumar

    November 27, 2010 at 5:30 am

    laluji ko fir jitna hi hoga . vo akele neta hai jo loksabha mein aur har manch par garibon daliton pichhron aur alpsankhyakon ke liye majbooti se awaz uthate rahe hain.

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