: आरटीआई फोरम की कन्वीनर डॉ. नूतन ठाकुर ने खटखटाया कोर्ट का दरवाजा : कॉमनवेल्थ गेम्स का उदघाटन ब्रिटेन की महारानी से कराने के बजाय भारत के राष्ट्रपति से कराने के लिए एक याचिका दायर की गई है. याचिका में मौलिक अधिकारों के हनन की बात भी कही गई है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के लखनऊ बेंच में आर्टिकल 226 के अंतर्गत दायर रिट याचिका की संख्या 9565/2010 है.
इसमें कहा गया है कि यह खेल ब्रिटिश प्रभुत्व का द्योतक है. इस याचिका को आईआरडीएस की सचिव तथा नेशनल आरटीआई फोरम की कन्वीनर डॉ. नूतन ठाकुर ने दायर किया है. इस याचिका में भारत सरकार के कैबिनेट सचिव, सचिव, युवा व खेल मामले व विदेश सचिव एवं कॉमन वेल्थ गेम्स आयोजन समिति के सेक्रेटरी जेनरल को प्रतिवादी बनाया गया हैं. याची डा. ठाकुर ने याचिका में निवेदन किया है कि प्रतिवादियों को यह आदेशित किया जाए कि वे भारत के राष्ट्रपति को कॉमनवेल्थ खेलों के उदघाटन के लिए आमंत्रित करें. सरकार को यह आदेश दिया जाये कि यह कॉमनवेल्थ जैसे असमानता के आधार पर बने संस्था से खुद को तत्काल अलग करे. याचिका में यह भी मांग की गई है कि भारत भविष्य में कभी भी कॉमनवेल्थ खेलों तथा कॉमनवेल्थ के दूसरे आयोजनों में हिस्सा न ले तथा भारत के प्रतिनिधि के लिए जो दो प्रकार की नामावली प्रयुक्त होती है- कॉमनवेल्थ देशों में उच्चायुक्त तथा अन्य देशों में राजदूत उसे भी समाप्त किया जाए.
याचिका में अंतरिम राहत यह मांगी गयी है कि नई दिल्ली में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स का उद्घाटन ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ के पुत्र राजकुमार चार्ल्स को करने से रोका जाए. इस खेल का उद्घाटन भारत के राष्ट्रपति द्वारा कराने के आदेश दिए जाएं. डॉ ठाकुर ने अपनी याचिका में कहा है कि भारत के संविधान की प्रस्तावना में साफ अंकित है- “हम भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न, लोकतांत्रिक प्रजातंत्र बनायेंगे” पर कॉमनवेल्थ जिसे पहले ब्रिटिश कॉमनवेल्थ कहते थे और जिसका उदय 1884 में लोर्ड सालिसबरी ने किया था, वह शुरू से ही असमानता तथा वर्चस्व के सिद्धांत पर आधारित था.
इसमें केवल वही देश शामिल हो सकते हैं जो कभी ब्रिटेन के गुलाम रहे हों और इस प्रकार यह गुलामी का प्रतीक है. ब्रिटिश शब्द 1949 के लन्दन घोषणा के बाद भले ही समाप्त कर दिया गया हो, पर आज भी ब्रिटेन का सम्राट ही इसका अध्यक्ष होता है और इसका मुख्यालय भी मेलबोरो हाउस, पाल माल, लन्दन में है, जो ब्रिटेन की प्रभुता का स्पष्ट प्रतीक है.
रिट में यह भी कहा गया है कि क्वीन बैटन गुलामी और ब्रिटिश प्रभुत्व का सबसे बड़ा प्रतीक है, जो बकिंघन पैलेस से निकल कर बाकी देशों में घूमता है और जिसके बाद ब्रिटेन का सम्राट आ कर खेलों का उदघाटन करता है. अनुच्छेद 14 तथा 21 के मौलिक अधिकारों का हनन होने की दशा में यह रिट याचिका दायर की गयी है. अशोक पाण्डेय तथा डॉ. शेष नारायण पाण्डेय वादी पक्ष के अधिवक्ता हैं.












satyam
October 1, 2010 at 7:21 am
यदि कामनवेल्थ गेम से खेल को अलग कर दिया जाये तो यह शब्द हमें यह याद दिलाता है कि हम इस बात को हमेशा याद रखें कि हम कभी अंग्रेजों के गुलाम रहें हैं और वे हमारे मालिक हैं. यह सोच उन शहीदों का अपमान है जिन्होंने अपनी जान हमें गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए दे दी.
क्वींस बेटन पुरे देश में दौड़ता रहा इसके स्वागत में हमारे छत्तीसगढ़ कि राजधानी में स्कूली बच्चे सुबह से ही रस्ते किनारे खड़े रहे. इस गुलामी के प्रतीक को हम सब ढोने को मजबूर रहे. किसी ने इसका विरोध नहीं किया. विदेशी भी चाहतें हैं कि हम आज भी गुलामी कि मानसिकता में रहें. हमारे नेता से लेकर नौकरशाह तक गुलामी के इस प्रतीक को एक नजर देख कर ही अपने आपको धन्य समझ बैठें.
जिन्हें अपने स्वाभिमान की चिंता नहीं है उन्हें गुलामी ही मुबारक लेकिन स्वाभिमानी लोगों कि ओर से इस तरह के हर मुद्दे को आप उठायें और इसमें सफल भी रहें यही मेरी शुभकामनायें हैं.
सत्यनारायण पाठक
जगदलपुर