पूरे पत्रकार जगत में आजकल नीरा राडिया का नाम रेडिएशन की तरह फ़ैल गया है. ख़ास करके दिल्ली के पत्रकार एक दूसरे से मजाक में ही सही, यह पूछना नहीं भूल रहे हैं कि डियर! तुमको भी राडिया ने फोन किया या नहीं? पूरा मामला एक उच्च स्तरीय महिला दलाल और सत्ता के गलियारों में उसकी घुसपैठ का है और कहने में गुरेज नहीं कि जिसे नीरा ने फोन किया और उनके टेप एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत सार्वजनिक हो गए, वे अब खिसियाकर अपना खम्भा भूल दूसरे का खम्भा नोच रहे हैं. इस पूरे एपिसोड में और भी दिलचस्प यह है कि बहुत से लोग प्रवचन बघार रहे हैं, और ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि वे अब तक नहीं फंसे.
एनडीटीवी की स्टार रिपोर्टर बरखा दत्त, हिन्दुस्तान टाइम्स के वीर सांघवी और आजतक के सीधी बात वाले आदरणीय प्रभु चावला के राडिया से बातचीत के टेपों की ट्रांस-स्क्रिप्ट पढ़ चुके लोग जानते हैं कि बावेला इसलिए मच रहा है क्योंकि यह मामला पत्रकारिता का तो कतई नहीं है. आजकल पत्रकारों के साथ अनिवार्य रूप से नत्थी हो चुके दीगर कामों का है और गुड़ खाकर गुलगुले से परहेज की दलीलें देने जैसा ही कुछ है. सब जानते हैं कि जो जितना बड़ा है वो दिनरात मैनेज करने में भिड़ा है और मैनेज की राह में हर मोड़ पर एक नीरा राडिया खड़ी है.
नेता-अफसर-ठेकेदार गठजोड़ की एक पूरी जमात ने पहले पत्रकारों का इस्तेमाल किया (या वे खुद इस्तेमाल हुए )और ख़बरों की, एक दूसरे को धकिया कर रातों-रात पदोन्नत होने, नाम कमाने की पिपासा ने पत्रकारों को एक ऐसे अंधे कुँए में धकेला जिसमें से निकलना मुश्किल है. इस पूरे प्रसंग में राडिया की भूमिका खुली किताब की तरह है. वो जो है सो घोषित है, मगर जो बड़े-बड़े लोग हैं, जिनके नाम लेकर नए पत्रकार लिखने के लिए प्रेरित होते रहे हैं उनका कड़वा सच एक थप्पड़ के तौर पर पत्रकारिता के गाल पर पड़ा है.
अब भले ही वे लोग कहें कि हम पत्रकार हैं और ख़बरों के लिए हमें दलालों से भी संपर्क रखना पड़ता है मगर एक सीधी बात दीखती है कि “बातचीत” में सब कुछ है बस खबर ही गायब है. यहाँ सवाल पत्रकारिता की हकीकत का है और जिनको नहीं मालूम कि अब पत्रकारिता मिशन नहीं रही उनको आँखें खोल लेनी चाहिए और जो काजल की इस कोठरी में बेदाग़ रहने का इरादा रखते हों तो जान लें कि नीरा राडिया हर कदम पर है, मगर बातचीत क्या करेंगे यह खुद तय कर लें और यह भी पूरे होश में जान लें कि दूसरों को आईना दिखाने वालों के लिए बहुत आईना देख चुके लोगों ने लगता है अब कमर कस ली है.
लेखक रमेश शर्मा पत्रकार हैं. लगभग ढाई दशक से पत्रकारिता कर रहे हैं. कई पत्र-पत्रिकाओं में काम किया. फिलहाल राष्ट्रीय सहारा छत्तीसगढ़ के ब्यूरो प्रमुख हैं. यह लेख उनके ब्लाग यायावर से साभार लिया गया है.












kshama sharma
December 2, 2010 at 8:01 am
well done ramesh
पंकज झा.
December 2, 2010 at 2:08 pm
बहुत थोड़े में काफी सटीक बात कह दी रमेश जी आपने. वास्तव ने इन पत्रकार कहे जाने वाले लोगों द्वारा भरोसे पर लगाए गए तमाचे को पीढ़ियों तक याद रखा जाएगा. अब कौन नया पत्रकार किसको आदर्श माने यह समझ नहीं आता. थूकने का मन कर रहा है इन नामों पर तो.खैर.
joseph
December 2, 2010 at 3:00 pm
sahi baat likhi hai…ye patrakaron se dalalon mein badal chuke logon kaa maamala hai…patrakarita to unke neeche kaam karane vaale vo log karate hain jo inse mili salary se ghar chalate hain..jinki khabre kaat dee jaati hai..jinhe nirdesh dekar apne anukul khabre banane ko kaha jaata hai
aadesh thakur
December 3, 2010 at 5:46 pm
भइया, कुएं में कूदे के बाद तो… समझ गए न ! कोई निकालने वाला चाहिए न। तहलका तो बीती बात हुई, इसके बाद तो शशि थरूर है जिन्हें इज्जत बचावे का खातिर सात फेरा तक लगाना पड़ा हो। तो भइया आगे कुछ कहना तो…। बहरहाल रमेश जी, आपने जिस मुद्दे पर लिखा है वह तो सटीक तो है, पर हमरा सर के 15-20 फीट ऊपर से ही निकल गया… वरना हम भी कुछ…. बुझलू के नाहि… बाकी तो पब्लिक है ये सब जानती है… हमरा पास तो कुच्छौ शब्दै ना बचा है…