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संघियों ने मीडियावालों को उनकी औकात बता दी

: वे हमें दुत्कारते रहे, हम पूंछ हिलाते रहे : अजमेर के इतिहास में बीते पांच दिन पत्रकारिता और पत्रकारों के लिए बेहद शर्मनाक गुजरे। देश को दिशा देने की बात करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघ चालक मोहन भागवत अजमेर में रहे, अनेक बैठकें कीं, अनेक संभ्रांत लोगों से मिले, अच्छी-अच्छी आदर्शपूर्ण बातें की, मगर एक बार भी प्रेस से मुखातिब नहीं हुए। कितने दुर्भाग्य की बात है कि इस राष्ट्रवादी संगठन ने कथित देश हित की खातिर अनेक मंत्रणाएं कीं पर मीडिया को गांठा तक नहीं।

: वे हमें दुत्कारते रहे, हम पूंछ हिलाते रहे : अजमेर के इतिहास में बीते पांच दिन पत्रकारिता और पत्रकारों के लिए बेहद शर्मनाक गुजरे। देश को दिशा देने की बात करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघ चालक मोहन भागवत अजमेर में रहे, अनेक बैठकें कीं, अनेक संभ्रांत लोगों से मिले, अच्छी-अच्छी आदर्शपूर्ण बातें की, मगर एक बार भी प्रेस से मुखातिब नहीं हुए। कितने दुर्भाग्य की बात है कि इस राष्ट्रवादी संगठन ने कथित देश हित की खातिर अनेक मंत्रणाएं कीं पर मीडिया को गांठा तक नहीं।

हां, अखबार वालों ने आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण ”सूत्रों के अनुसार” वाली एक्सक्लूसिव खबरें खोज निकालने में सफलता पाने का दावा किया और संघ की गतिविधियों पर नजर रख कर पेज के पेज छापे, मगर भागवत और संघ वालों ने अपनी तरफ से मीडिया को कोई भाव नहीं दिया। अजमेर के आजाद पार्क में तो हद ही हो गई। लगभग सार्वजनिक सभा (क्योंकि भीतर भले ही स्वयंसेवक और उनके परिजन थे, मगर वक्ताओं की आवाज मैदान के बाहर सुनाई दे रही थी) तक में मीडिया को नहीं बुलाया गया। बुलाना तो दूर, घुसने तक नहीं दिया। मीडिया से जुड़े व संघ विचारधारा के समर्थक, जो कि भागवत जी का बौद्धिक सुनने के इच्छुक थे, केवल इसी कारण नहीं गए कि अगर उन्हें मीडियाकर्मी जानकर बाहर निकाल दिया तो वह जलालत बर्दाश्त करना कठिन होगा।

संघ पृष्ठभूमि के जो एक-दो पत्रकार कवरेज के लिए येन-केन-प्रकारेण अंदर घुस गए, उन्हें यह कह कर बाहर निकाल दिया गया कि आप कवरेज नहीं कर सकते, मात्र स्वयंसेवक की भांति सुन सकते हैं। वस्तुत: ऐसा करके उन्होंने मीडिया को उसकी औकात व साथ खुद की फितरत दिखा दी है। उन्होंने जता दिया है कि उनका संगठन इतना मजबूत है कि वे मीडिया की सहायता के बिना ही देश के हिंदू को एकजुट करने में सक्षम हैं। और मीडिया की अनजानी मजबूरी देखिए कि संघ कार्यकर्ताओं की दुत्कार के बावजूद उसने पांचों दिन उनकी खबरों से पेज के पेज रंग दिए। व्यवसाय का रूप धारण चुकी मीडिया की भूमिका देखिए कि पेट की खातिर ड्यूटी पर लगे पत्रकारों ने अंदर की खबरें निकालने के लिए कई पापड़ बेले और बैठकों का बड़ा-बड़ा कवरेज किया। इसमें कदाचित उनकी हिंदूवादी मानसिकता भी काम आई। फोटोग्राफरों ने दूर-दूर से छिप-छिप कर फोटो लिए और आपस में प्रतिस्पर्धा करते रहे कि देख मैंने कितना साफ फोटो लिया है।

यह ठीक है कि किसी भी संगठन का यह आतंरिक मामला है कि वह अपनी गोपनीय बैठकों में मीडिया को कवरेज न करने दे, मगर उसकी ब्रीफिंग करने का शिष्टाचार तो निभा ही सकता है। यदि किसी को स्विस खातों में जमा भारतीय नेताओं का काला धन उजागर करने के लिए सरकार पर दबाव बनाने का अधिकार है, यदि किसी को लोकतंत्र की दुहाई दे कर श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने की जिद करने का अधिकार है, तो क्या लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया और लोकतांत्रिक देश के आम जनता को यह जानने का अधिकार है नहीं है कि आपने बैठकों में क्या किया? वह भी तब जब कि आप पर भगवा आतंकवाद जैसे तिलमिलाहट पैदा करने वाले कथित झूठे आरोप लग रहे हैं। इतनी गोपनीयता की आखिर जरूरत क्या थी? आप चाहते तो आखिरी दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस कर लेते, लेकिन इतनी औपचारिकता भी नहीं निभा पाए।

एक ओर देश-प्रेम और लोकतंत्र की ऊंची-ऊंची बातें करते हैं और दूसरी ओर लोकतंत्र के ही चौथे स्तम्भ मीडिया को हेय दृष्टि से देखते हैं। क्या यह आपके दोहरे चरित्र को उजागर नहीं करता? सवाल ये है कि मीडिया का आपसे संबंधित जानकारी हासिल करने से खुद मीडिया का भला कौन सा स्वार्थ सिद्ध हो रहा है? उसे तो आप जो कर रहे हैं या करने जा रहे हैं, उन चीजों को आम जनता को बताना भर है। वह अगर आप पर लगाए जा रहे भगवा आतंकवाद की बात को सामने ला रहा है तो वह जनता को यह भी बताना चाहता है कि आपका पक्ष क्या है। जैसा कि बताया गया कि आप पूरे देश के हिंदू को एक करने की मुहिम चला रहे हैं (हालांकि आपने अपने मुंह से कुछ नहीं कहा),  तो यह बात मीडिया के माध्यम से आम जन तक जाने में आखिर बुराई ही क्या है?

सवाल ये है कि जो संगठन पत्रकारों से ही अछूत का सा व्यवहार करता है, वह भला समाज को कैसे जोड़ेगा? क्या इससे मीडिया में यह भय पैदा नहीं होगा कि आज जब कि आप सत्ता के खिलाफ खड़े हैं, तभी मीडिया के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं तो कल जब आपका राजनीतिक चेहरा भाजपा के लोग पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज होंगे तो मीडिया का क्या हाल करेंगे? संभव है ये बातें कुछ कड़वी लगती हों, मगर हैं खरी-खरी। अगर आप खरे हैं तो इन पर गौर करना चाहिए।

अजमेर से गिरधर तेजवानी की रिपोर्ट

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0 Comments

  1. ashok nath tripathi

    February 6, 2011 at 4:38 pm

    यसवंत भाई ,मेरे समझ से जब भी कोई व्यक्ति या संगठन दोहरा चरित्र अपनाता है तो वह मीडिया ही नहीं खुद से भी बात करने का साहस नहीं कर पाता.हम सभी मिडिया कर्मी को भी इतना जरूर सोचना चाहिए यदि कोई आपसे संवाद नहीं करना चाहता तो आप मात्र इसकी ही सूचना दीजीये.

  2. ??? ?? ??????

    February 6, 2011 at 5:22 pm

    सही किया.. पूरा अधिकार है.. ब्रीफ करना चाहिये था.

  3. nitinmohan sharma

    February 6, 2011 at 5:43 pm

    solah aane such, media ke prati sangh ki ye berukhi batati he ki taqat me aane ke bad ye aur nirmam honge…indore me bhi sangh mukhiya ka doura prastavit he…shayad agle mahine…
    kalamkar aur chhayakar se jyada upar baithe logo ko ye samjhna hoga ki jin sanghtano ki media se duri he ran-niti he, unse kaise pesh aaye..?

  4. vimal singh

    February 6, 2011 at 1:27 pm

    vimal singh

    pane sahi kaha hai ye sirf desh me dange karwa sakte hai. hindu k nam pr rajniti kr sakte hai. aj ya to mohan bhagwat ki himat nahi hai media k samne ki ya vo naya paryog karna chahte hain ki media k bina hi chala jay. media ko partis pargha chod kr unki khabro ka bahiskar karna chaiy

  5. jai kumar jha

    February 6, 2011 at 1:38 pm

    अच्छा होता संघ कम से कम ऐसे स्वतंत्र पत्रकारों को जो बेहद ईमानदारी से इस देश व समाज के लिए लिख और सोच रहें हैं को जरूर बुलाती……..मिडिया के संचालक चोर व उच्च्कें हैं सभी पत्रकार चोर और उच्चके नहीं हैं….

  6. KAMAL JAIN

    February 6, 2011 at 1:47 pm

    GIRDHAR TEJWANI JI APNE KAYA KHUB LIKHA SANGH VIRODHIYO KO YAH ARTICAL JAROOR PASAND AAYAGA AGAR APKO RSS KO SAMJHANA HAI TO SHAKHA JOIN KAR LO SEHAT BHI ACCHI RAHEGI OR DIMAG BHI APP LEKTHE BAHUT ACCHA HAI

  7. yogesh

    February 6, 2011 at 4:34 pm

    मासूमों जैसी बातें मत करो गिरधर जी। आरएसएस से ऐसी आशाएं तो कोई मासूम ही पाल सकता है या फिर वह जिसे इस संगठन के चिंतन और चरित्र की कोई जानकारी न हो। जो संगठन हाथ में हाथी लेकर संस्कृति और सुधार की बात करता है उससे आप भला उम्मीद क्या करते हैं। मैं तो इतना जानता हूं मेरे शहर मैं ऐसा साथी जो या तो क्लास में हमेशा पिछली पंक्ति के हिस्सा रहे या फिर अपने मुहल्ले में चरित्र को लेकर हर दूसरे तीसरे दिन ठुकते रहे वे आज इस संगठन के झंडाबरदार हैं। अब भी आपकी आरएसएस से भले की रिरियाहट जारी रहती है तो भला कोई क्या कर सकता है।

  8. suresh Bablani

    February 7, 2011 at 8:54 am

    Girdhar ji,
    Namaskar,
    Kewal Yad karwa raha hun Bhagwat ji ka statement Dialy Bhaskar main chppa tha ki Sar Sangh Chalak ko press se bat karne ka smay tay hai. Shesh samay anya samay ke liye anya adhikari tay hain ve hi bat karenge.
    Comments hain ki hindu ke nam par rajniti karna- RSS ko samjhne ke liye pahle RSS ko join karo phir samjh main ayega. Bina kisi ka swad liye ap swad ki charcha nahi kar sakte hain.
    Dange failana Ativadiyon ka kam hai Hindu samaj ka nahi.
    Yadi Dange hi karwane hote to Sangh ki Shakha main Banduk aur Rifle ke trainning di jati Dand ki nahi.
    Kewal Alchona ke liya alchona karne se bachen

  9. चंदन सिंह

    February 7, 2011 at 4:28 pm

    संघ ने जिस तरह मीडिया का बायकॉट किया है, उसके बाद कहीं न कहीं हम पत्रकारों को भी आत्मचिंतन की जरुरत है । संघ के खिलाफ लिखना एक फैशन बन चुका है, जिसे पत्रकारों का एक बड़ा समूह हवा देता है। हम पत्रकारों में वामपंथी और कांग्रेस के साथ सहानुभूति रखनेवालों(या कांग्रेसियों के चैनल में काम करनेवालों की) की भरमार है, जो संघ के बारे में नेगेटिव खबरें छापने में शान समझते हैं ।
    संघ ने मीडिया के साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं किया, उसने सिर्फ उससे किनारा कर लिया, इसमें गलत क्या है ।

  10. tejwani girdhar

    February 8, 2011 at 3:32 am

    बबलानी जी, आपको बडी पीढा हुई है शायद, मैं संघ में भी रह चुका हूं, मुख्य शिक्षक तक, मुझे न सिखाइये कि संघ अच्छा है बुरा. मुझे अच्छाई पता है तो बुराई भी पता है. रहा सवाल मीडिया को औकात दिखाने के मामले में टिप्पणी करने का तो उसके लिए आपको पहले मीडिया में प्रवेश करना होगा, तब जा कर पता लगेगा कि मीडिया के मायने क्या होते हैं

  11. dhruva

    February 8, 2011 at 5:38 am

    such hai ke media such nahi masala pesh karti hai

  12. chandrakant

    March 6, 2011 at 2:12 pm

    swaymbhu ko ptrakar kah kar patrkarita ka majak mat udaiey
    press release ke adhar per patrakar Ex-clusive story by line letey hain phir uskey adhar per Editorial tak likha jata hai
    jahan tak RSS ka saval hai khud RSS waley rss ko nahin jantey
    aap to bhut door ki bat ho janab
    patrkarita ki degree lene wala patrkar bhi patrakar nahin ban pata
    woh to chori hi karega

  13. abhishek purohit

    April 16, 2011 at 4:39 pm

    it is not necessary it is very genral rule that if some one invite you then you should go,and there were nothing for exclusive,sangh did good work for not inviting media,because media is playing in hands of communists,it shows that media’s effect on sangh is nothing and articles who orgenised in janpath or politberua are not affect sangh thinkings and sangh is much stronger then media…………try to understand sangh work is not work of propoganda or broadcasting works,where it is need they invite all media,if some one want to listion him can go with required dress……………

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