राजनीति में मुखौटा और मुखौटों के पीछे छिपे घिनौनी राजनीति का खेल खेलने वाले लोगों की चालें, जनता को हर तरीके से ठगने और उल्लू बनाने की कोशिशों में जुटी रहती हैं. ताज़ा उदहारण के रूप में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में मनमोहन सिंह की चुप्पी, नए टेलीकाम मंत्री कपिल सिब्बल का निर्लज्ज बयान और सोनिया गांधी के आदर्शवादी पाखंडी बातों को लें.सोनिया गांधी ने एक तरफ कहा कि भारत आर्थिक विकास तो कर रहा है लेकिन नैतिक रूप से मर रहा है. उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि हमारे समाज के लोग लालची और बेईमान होते जा रहे हैं और एक खराब समाज का निर्माण कर रहे हैं.
दूसरी तरफ, घोटाले पर नरसिम्हा राव से भी ज्यादा गहरी चुप्पी साधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बचाने के लिए नए मंत्री और सोनिया गांधी के दल के ही प्रमुख नेता कपिल सिब्बल ने उतना ही ज्यादा अनैतिक बयान दिया. सिब्बल ने बेधड़क लहजे में कहा कि वे टेलकाम ऑथोरिटी ऑफ इंडिया को कुछ भी नहीं मानते. जिनको स्पेक्ट्रम आवंटित कर दिया गया है, उनका आवंटन रद्द नहीं किया जायेगा. उनसे सरकार, बकाया पैसे की वसूली कर लेगी. अब सोनिया जी ही बताएं कि उनके पार्टी की सरकार के लोग कैसे हैं और किस तरह के समाज का निर्माण कर रहे हैं. जिन लोगों को घोटाले के तहत स्पेक्ट्रम आवंटित किया गया है, अगर सरकार उन्हीं के पक्ष में खड़े होकर बोले. उन्हीं भ्रष्ट तत्वों को बचाने के लिए खुलेआम सामने आये तो सोनिया जी की बातों को पाखंड ही कहा जा सकता है.
दरअसल, इस पाखण्ड के पीछे की भी शातिर राजनीति को समझने की जरुरत है. सोनिया कांग्रेस दल की मुखिया हैं लेकिन सरकार का हिस्सा नहीं हैं. वो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मुखौटे के पीछे छिपी सत्ता की केन्द्र बिंदू हैं. उनकी छवि खराब होने का मतलब है कि कांग्रेस गयी काम से. इसलिए उनको सता की प्रत्यक्ष राजनीति से हटाकर नेपथ्य में रखा गया है. मनमोहन सिंह या कपिल सिब्बल की छवि खराब होने से कांग्रेस पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, फिर भी मनमोहन सिंह की अच्छी छवि बचाने के लिए उससे नीचे के नेता का भौंकना पहले जरूरी है. अगर मामला सिर्फ छोटे नेताओं के भौंकने से खत्म हो सकता है, तो बड़े नेताओं को बोलने की क्या जरुरत.
फिलहाल सोनिया गांधी का मुखौटा मनमोहन सिंह हैं और मनमोहन सिंह के मुखौटे के रूप में कपिल सिब्बल बोल रहे हैं. मुखौटे के अंदर हज़ार मुखौटे. जनता बेचारी के पास इतना दिमाग कहाँ कि वो इन मुखौटों के पीछे की असलियत समझें. मुझे लगता है कि संविधान निर्माताओं को संविधान में ‘हम भारत के लोग’ की जगह ‘हम भारत के मुखौटे’ लिखना चाहिए था क्योंकि भारत का लोकतंत्र वास्तव में एक मुखौटा लोकतंत्र है, जिसमे जनता भी बस एक मुखौटा ही है जिसकी आड़ में सारे नेता मक्कारी राजनीति करते हैं.
लेखक राजीव सिंह पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.











