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हरीश गुप्ता सुखी हैं या दुखी?

विश्लेषण

हरीश गुप्ता। इंडिया न्यूज के सीईओ और एडीटर इन चीफ। उनके लोगों को एक एक कर और कभी इकट्ठे इस चैनल से बाहर कर दिया जाता है। वे न तो खुश हो पाते हैं न दुखी हो पाते हैं। खुश होंगे तो जिन लोगों को उन्होंने रखा था और उन्हें एक झटके से निकालकर बाहर फेंक दिया गया,  वे क्या सोचेंगे। दुखी होंगे तो जो मालिक उन्हें इतनी बड़ी कुर्सी पर बिठा रखा है, वो क्या सोचेगा। तो इन दोनों पाटों के बीच फंसे हैं हरीश गुप्ता। न वे दुखी हो सकते हैं न तो सुखी। भड़ास4मीडिया ने कई बार फोन कर हरीश गुप्ता से इंडिया न्यूज में चल रही हलचल पर राय जानने के लिए संपर्क करना चाहा।

विश्लेषण

हरीश गुप्ता। इंडिया न्यूज के सीईओ और एडीटर इन चीफ। उनके लोगों को एक एक कर और कभी इकट्ठे इस चैनल से बाहर कर दिया जाता है। वे न तो खुश हो पाते हैं न दुखी हो पाते हैं। खुश होंगे तो जिन लोगों को उन्होंने रखा था और उन्हें एक झटके से निकालकर बाहर फेंक दिया गया,  वे क्या सोचेंगे। दुखी होंगे तो जो मालिक उन्हें इतनी बड़ी कुर्सी पर बिठा रखा है, वो क्या सोचेगा। तो इन दोनों पाटों के बीच फंसे हैं हरीश गुप्ता। न वे दुखी हो सकते हैं न तो सुखी। भड़ास4मीडिया ने कई बार फोन कर हरीश गुप्ता से इंडिया न्यूज में चल रही हलचल पर राय जानने के लिए संपर्क करना चाहा।

शुरू में एक बार फोन उठाया और जब भड़ास4मीडिया का नाम सुना तो खुद के कांफ्रेंस में होने की बात कहकर दस मिनट बाद फोन करने को कह दिया। उसके बाद उन्हें भड़ास4मीडिया की तरफ से कई बार फोन किया गया, एसएमएस डाला गया पर उनका पलटकर कोई जवाब नहीं आया।

इंडिया न्यूज से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस न्यूज चैनल में अब सब कुछ इसके मालिक और एमडी कार्तिकेय शर्मा के हाथों ही होता है। वे एक तरह से चैनल हेड से लेकर डायरेक्टर न्यूज तक की भूमिका निभा रहे हैं। पिछले दिनों जितनी भी नियुक्तियां हुईं,  वे चाहे किशोर मालवीय की या फिर अनुरंजन झा की वापसी,  यह सब कुछ इस चैनल के मालिक कार्तिकेय शर्मा का फैसला है और इसमें हरीश गुप्ता की रत्ती भर कोई सहमति या असहमति नहीं है। ऐसे हालात में हरीश गुप्ता की हालत न उगलने वाली और न निगलने वाली हो चुकी है। वे चैनल के मुखौटा होकर रह गए हैं। चैनल के असरी चेहरे कोई और हैं। चैनल में सब कुछ और लोग तय करते हैं। हरीश गुप्ता बस नाममात्र के रह गए हैं।

सवाल उठता है कि वे इस चैनल में अब तक बने क्यों हुए हैं? उनके लोग निकाल दिए गए और वे चुपचाप अपनी कुर्सी पर बने हुए हैं। अगर मैनेजमेंट उन्हें बाहर जाने के लिए केवल इशारा भर नहीं कर रहा है और बाकी सब कुछ कर रहा है तो उन्हें इसका मतलब समझना चाहिए या नहीं? विश्लेषकों का कहना है कि दरअसल एक बड़ा संकट बड़े पद व पैसे का है। आदमी एक जगह बड़े पद व पैसे पर होता है तो वो इसे छोड़ देने का साहस नहीं जुटा पाता। दूसरे, एकदम से छोड़ देने से मीडिया की मुख्य धारा से बाहर हो जाने का लेवल लग जाता है इससे किसी नई जगह पर पद व पैकेज बारगेन करने की ताकत घट जाती है। इसी के चलते स्थितियां प्रतिकूल होने पर भी कई बार लोग दम साधे बने रहते हैं और नई जगहों पर बातचीत चलाए रहते हैं।

अब देखना ये है कि अपनी जनता के बिना हरीश गुप्ता इंडिया न्यूज में कब तक न काहू से दोस्ती न काहू से बैर वाली स्थिति में रह पाते हैं।

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