अधिवक्ता अशोक पांडे और सामाजिक कार्यकर्त्री डॉ नूतन ठाकुर के लोकपाल बिल के ड्राफ्टिंग कमिटी से सम्बंधित एक रिट याचिका पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लखनऊ खंडपीठ ने आज भारत के एटार्नी जनरल को आदेशित किया है कि वे कोर्ट में उपस्थित होकर इस सम्बन्ध में स्थिति स्पष्ट करें. साथ ही कोर्ट ने प्रधान मंत्री कार्यालय, कैंबिनेट सेक्रेटरी तथा विधि व न्याय मंत्रालय को भी नोटिस जारी कर अपना जवाब देने को कहा है.
कोर्ट ने कहा है कि किन परिस्थितियों में संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए विधि के निर्माण हेतु यह ज्वायंट ड्राफ्टिंग कमिटी बनाई गयी. चीफ जस्टिस फर्दिनो रिबेलियो और जस्टिस डी के अरोड़ा की बेंच ने अधिवक्ता शांति भूषण और उनके पुत्र जयंत भूषण को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा भूखंड आवंटित करने से सम्बंधित एक खबर का भी अपने आदेश में हवाला दिया. कोर्ट ने कहा कि ड्राफ्टिंग कमिटी के दो सदस्यों पर इतने गंभीर आरोप लगे हैं पर चूँकि वे दोनों इस मामले में प्रतिपक्षी नहीं बनाए गए हैं अतः वे इस पर कोई अग्रिम कार्यवाही नहीं कर रहे.
कोर्ट ने कई सारे महत्वपूर्ण प्रश्न सामने रखे, जैसे जब इस तरह से विधि के निर्माण में संविधान और क़ानून में ड्राफ्टिंग कमिटी की व्यवस्था नहीं है तो भारत सरकार ने किन प्रावधानों के अंतर्गत यह कमिटी बनाई. साथ ही यह कि क्या इस प्रक्रिया से आम आदमी के विधि निर्माण की प्रक्रिया में जो सहभागिता का अधिकार है, वह कम नहीं हो जाता है. कोर्ट ने यह भी पूछा कि किन आधारों पर यही पांच लोग इस ड्राफ्टिंग कमिटी के लिए योग्य समझे गए.
कोर्ट ने प्रतिवादियों को तीन सप्ताह में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है और अग्रिम तिथि सोलह मई रखी है. अशोक पांडे और डॉ नूतन ठाकुर ने इस रिट याचिका में भारत सरकार द्वारा 08 अप्रैल 2011 को भारत सरकार द्वारा लोकपाल बिल के लिए जारी नोटिफिकेशन को विधि और संविधान के प्रावधानों के विपरीत बताया. याचीगण ने कहा कि अब तक भारत सरकार और न्यायालयों का यह मत रहा है कि विधि निर्माण विधायिका का एकाधिकार है. उन्होंने रिट याचिका 2568/ 2011 डॉ नूतन ठाकुर बनाम भारत सरकार का जिक्र लिया जिसमे उच्च न्यायालय ने स्वयं कहा था-“ यह न्यायालय इस क्षेत्र में दखल नहीं दे सकती क्योंकि यह विधायिका का कार्यक्षेत्र है.”
पांडेय और डॉ ठाकुर का कहना है कि इस तरह नोटिफिकेशन यह विधि के प्रावधानों के पूर्णतया विपरीत जान पड़ता है कि भारत सरकार इस तरह से वैधानिक प्रक्रिया के विपरीत जा कर कार्य करे. साथ ही उन्होंने “अन्ना हजारे के पांच नुमाइंदे” शब्द पर भी ऐतराज जताया था कि यह विधि-विरुद्ध है.













M P Singh
April 20, 2011 at 12:35 pm
It is a very dirty gimmick of the cheap pubilicity.Regrettably,Allahabad High Court is often either taken for ride by such publicity hungary petitioners and advocates or itself becomes the party to this game for reasons not far to seek.It is very strange that the same petitioner are blowing hot and cold in the same breathe and the High Court is wasting its precious judicial time by entertaining such writs as are worthy to be thrown in limine.High Court would do some service by imposing exemplary hefty fine on the petitioner,who appears to have not even the rudimentary knowledge of law and; yet showing the foolish bravado by challenging the process of the drafting of the Jan Lokpal bill.
Indian citizen
April 20, 2011 at 2:32 pm
बहुत बढ़िया..
डॉ नूतन ठाकुर
April 21, 2011 at 3:39 pm
सिंह साहब, मैं इसे उतना डर्टी और चीप नहीं समझ पा रही हूँ जितना आप समझने की कोशिश कर रहे हैं.
मुझे लगता है आप मुख्य मुद्दे को समझ नहीं पा रहे हैं और जिस प्रवाह में सभी लोग बहे जा रहे हैं, उसी में धाराप्रवाह बोल रहे हैं.
जब कोई व्यवस्था संवैधानिक शक्तियों और न्यायिक प्रक्रिया के बाहर जा कर की जायेगी तो क्या इसका विधिक रूप से विरोध करना डर्टी और चीप है?
जिस बात के भविष्य में गंभीर संवैधानिक दुरुपयोग और दुष्परिणाम हो सकते हैं, उस पर कानूनी कार्यवाही करना डर्टी और चीप है?
अगर क़ानून बनाना है तो एक प्रक्रिया से बनाएँ, क्या इन पाँचों के अलावा कोई इस कार्य के लिए सक्षम ही नहीं है?
डॉ नूतन ठाकुर
;लखनऊ
डॉ नूतन ठाकुर
April 21, 2011 at 3:50 pm
सिंह साहब,
मैं इसे उतना डर्टी और चीप नहीं समझ पा रही जितना आप देख ले पा रहे हैं. मेरी निगाह में चूँकि आप सीमित निगाह से चीज़ों को देख रहे हैं इसिलए आप ऐसा सोच रहे हैं.
यदि आप समग्रता में बात को समझेंगे तो मुझसे तुरंत सहमत हो जायेंगे कि संविधान के विपरीत किये गए किसी कार्य को विधिक ढंग से विरोध करना किसी भी प्रकार से चीप और डर्टी नहीं हो सकता
डॉ नूतन ठाकुर
न्यू योर्क