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भ्रष्टाचार रोकने के लिए कानून की कम, हजारों अन्ना की जरूरत ज्यादा

किसी ने गणना की थी कि इस दुनिया में करीब तीन करोड़ तीस लाख कानून हैं। अगर दुनिया के लोग बाइबिल के टेन कमांडमेंट्स या गीता का निष्काम कर्म या कुरान की कुछ पवित्र आयतों को मानने लगें, तो शायद एक भी कानून की जरूरत न पड़े। लेकिन हमने न तो पवित्र ग्रंथों से कुछ सीखा, न ही इतने सारे कानूनों के बावजूद अपराध रुक पाए। भ्रष्टाचार दरअसल नैतिक प्रश्न ज्यादा है।

किसी ने गणना की थी कि इस दुनिया में करीब तीन करोड़ तीस लाख कानून हैं। अगर दुनिया के लोग बाइबिल के टेन कमांडमेंट्स या गीता का निष्काम कर्म या कुरान की कुछ पवित्र आयतों को मानने लगें, तो शायद एक भी कानून की जरूरत न पड़े। लेकिन हमने न तो पवित्र ग्रंथों से कुछ सीखा, न ही इतने सारे कानूनों के बावजूद अपराध रुक पाए। भ्रष्टाचार दरअसल नैतिक प्रश्न ज्यादा है।

कानूनी पक्ष भ्रष्टाचारी को केवल हतोत्साहित करने की ही भूमिका निभा सकता है। जब भ्रष्टाचार जन-जन में व्याप्त हो, तो केवल कानून बनाकर इसे खत्म करने का दावा संशय पैदा करता है। औपचारिक संस्थाओं को विकसित करके या कुछ और कानून बनाकर इसका पूरा समाधान ढूंढ़ना रेगिस्तान में जल ढूंढ़ने जैसा होगा। गांधीवादी आंदोलन एक विदेशी हुकूमत के खिलाफ था। इसके बावजूद महात्मा गांधी ने लगातार यह कोशिश की कि इस आंदोलन के साथ ही समाज में आत्मोत्थान का एक सूक्ष्म संदेश जाता रहे।

भ्रष्टाचार का संपूर्ण समाधान तभी निकल सकता है, जब इसी तरह का सूक्ष्म संदेश समाज में अन्ना हजारे जैसे लोग देते रहें। कानून की अपनी सीमाएं होती हैं। मान लीजिए कि एक मजबूत लोकपाल, कुछ सख्त कानून और एक व्यापक एजेंसी बना दी जाती है। पर इस कानून को अमल में लाने वाले लोग कौन होंगे? वही चेहरे, जो ए राजा और कलमाडी के साथ थे? कहां से लाएंगे हम ऐसे लोग, जिनका नैतिक मूल्य बहुत ही पुख्ता हो और वे लालच से परे हों? आज जो लोग इस आंदोलन के शीर्ष पर हैं, कमोबेश उनके आचरण, उनकी नैतिकता और समाज के प्रति  उनकी प्रतिबद्धता के प्रति पूरा भारतीय समाज आश्वस्त है, ऐसे में जरूरत इस बात की है कि गांधी की तरह निजी जीवन में भी शुचिता, नैतिकता और सदाशयता का संदेश समानांतर रूप से भेजा जाए। खाली नैतिकता की बातें करना एक ऐसा सपना है, जो हकीकत नहीं बन सकता।

यहां हम जयप्रकाश नारायण के आंदोलन का उदाहरण लेते हैं, जिसे संपूर्ण क्रांति का नाम दिया गया था। बाद में इस आंदोलन से उपजे नेता कई घोटालों में लिप्त पाए गए या जातिवादी राजनीति के पुरोधा बने। इसलिए जरूरत इस बात की है कि जो लोग इस आंदोलन में शरीक हो रहे हैं, उन्हें यह शपथ भी दिलवाई जाए कि वे व्यक्तिगत तौर पर भी भ्रष्टाचार नहीं करेंगे और न ही होने देंगे। अन्यथा यह आंदोलन लोकपाल जैसी एक संस्था बनाने की कवायद भर रह जाएगा, जो शायद स्वयं भ्रष्ट होगी। गांधीजी ने हरिजन में 22 फरवरी, 1942 को ट्रस्टीशिप की व्याख्या करते हुए लिखा था, ‘अहिंसा का प्रयोग करते समय हमें यह विश्वास रखना चाहिए कि हर व्यक्ति को मानवीय संदेश देकर परिष्कृत किया जा सकता है। हमें मानव में अंतर्निहित अच्छाई को जगाना होगा।’ क्या अन्ना भी ऐसी कोशिश करेंगे?

लेखक एनके सिंह ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन के महासचिव हैं और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लिखा हिंदुस्तान में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

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