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शराबी के प्रवचन पर अपुन का प्रवचन

: मृत्यु है क्या, जीवन का अंत, या प्रारंभ, या कि स्वयं शाश्वत जीवन? : हमारे रोने में एक आह थी, एक प्रार्थना थी, जो सभी ईश्वरों से थी : यश जी प्रणाम, आपका आलेख पढ़ा. पढ़ के आनंद हुआ. मैं ये कहूँगा कि दुःख स्थायी भाव नहीं है. सुख भी नहीं. कोई भाव स्थायी हो ही नहीं सकता. सिर्फ वे भाव जो हमारी कल्पना में हैं, वे ही हमारी प्रतीति में स्थायी हो सकते हैं.

: मृत्यु है क्या, जीवन का अंत, या प्रारंभ, या कि स्वयं शाश्वत जीवन? : हमारे रोने में एक आह थी, एक प्रार्थना थी, जो सभी ईश्वरों से थी : यश जी प्रणाम, आपका आलेख पढ़ा. पढ़ के आनंद हुआ. मैं ये कहूँगा कि दुःख स्थायी भाव नहीं है. सुख भी नहीं. कोई भाव स्थायी हो ही नहीं सकता. सिर्फ वे भाव जो हमारी कल्पना में हैं, वे ही हमारी प्रतीति में स्थायी हो सकते हैं.

जीवन तो रंगीन है. अनेकानेक भावों का समुच्चय है. और जीवन? कोई अर्थ है इसका. नहीं. इसका तो कोई अर्थ ही नहीं. निरपेक्ष. एक तारों भरी रात में आकाश की ओर सर उठाना ही काफी है. कितना विस्मय भर जाता है मन में, अस्तित्व में. मेरा जीवन कितना अकेला, कितना निरपेक्ष है ये. जो चाहो अर्थ दे दो इसे. कितने ही अर्थ दिए गए हैं इसे, सदियों से. कितने ही और दिए जायेंगे आने वाली सदियों में. परन्तु अर्थ दे देने मात्र से सत्य का उद्घाटन नहीं होता. अर्थ सापेक्ष हैं. अर्थो से निर्मित जीवन बाह्य हैं. हमने इन्ही अर्थो से एक जीवन पथ का निर्माण किया है.

एक सिरे पे जीवन और अंतिम छोर पे मृत्यु. बहुत कम लोग हुए, और आने वाले समय में भी कम ही होंगे, जो अंतिम छोर को जान पाए. उसके पार देख पाए. दोनों छोरों में सामंजस्य कर पाए. सबकी अपनी प्रतीति, अपने अनुभव हैं. सबका अपना सफ़र है. बाकी सब दर्शक मात्र हैं. कोई पथ के प्रारंभ में या मध्य में मृत्यु को प्राप्त हो तो हम विचलित हो जाते हैं. दुःख होता है. जीवन-चक्र अभी पूरा नहीं हुआ. सफ़र बाकी था. हमने जैसा जीवन गढ़ा है वैसा तो अभी जिया ही नहीं गया. इसलिए दुःख है.

जब मेरे पिता जी की मृत्यु हुई तब मुझे बहुत दुःख हुआ. जीवन में असमय एक रिक्ति हुई. उनके चले जाने से जीवन में एक अनिश्चितता पैदा हुई उसका भी भय था. हमने स्थिति से समझौता किया. स्वीकारा. और जीवन आगे चल पड़ा. लम्बा समय गुज़रा 2011 आया. ये वर्ष बहुत अजीब रहा. मानो एक लम्बी गफलत भरी नींद टूटी. मेरा २१ वर्षीय मौसेरा भाई एक अल्प-बीमारी के बाद चल बसा. पिता की मृत्यु दुखदायी थी.

मौसेरे भाई की मृत्यु से एक आन्तरिक पीड़ा हुई, जिससे मै अभी भी गुज़र रहा हूँ. एक बालक जिसे मैंने गोद में खिलाया. एक हँसता-खेलता बालक जो मोबाइल कंप्यूटर जैसे आधुनिक उपकरणों से खेलता रहता था. अचानक चला गया. मोबाइल कंप्यूटर आई-पॉड सी-डी सब अपनी जगह रह गए अपनी खूबियों के साथ. क्या एप्पल क्या माइक्रोसोफ्ट क्या गीत क्या गजलें. सब रह गया. जो उपयोग करता था वो मौन साध गया. फिर बड़ी चाची गयीं. फिर बड़ी बुआ.

मृत्यु सत्य है. विचित्र है. पर मृत्यु है क्या. जीवन का अंत. या प्रारंभ. या के स्वयं शाश्वत जीवन. फिर एक निज अन्वेषण. निज अनुभव. निज सत्य. हम जितना जानना चाहेंगे, जान लेंगे. फिर भी बहुत कुछ रह जाएगा अबूझा. अनजान. क्योकि जीवन के नए अर्थो का उद्घाटन शेष है. जीवन की गतिशीलता इसे और आगे ले जाएगी. जो प्रतिति मुझे आज होती है तारो भरा आकाश देख के. यही हज़ारों साल पहले भी हुई होगी. यही हज़ारों साल बाद भी होगी. अब शब्द नहीं हैं. मौन है. आप इसको सुन नहीं सकते. जान नहीं सकते. पर ये मेरे और आपके जीवन में उतर सकता  है. उतर रहा है. अब आनंद होगा.

मेरे एक मित्र चमत्कारों में यकीन करते हैं. जब तक के उनका निज फायदा हो. ऐसा ज्यादातर लोग करते हैं. मित्र का यकीन उनके भय के कारण है. एक बार उनकी माताजी बहुत बीमार हुईं. डाक्टरों ने दिल्ली ले जाने की सलाह दी. मित्र रो पड़े. और *** बाबा को पुकारा. प्रार्थना की. अगली सुबह माताजी के स्वास्थय में लाभ हुआ. घटना मुझे बताई और बोले तू सबको एक डंडे से ना हांका कर. *** बाबा में बात है. वे सच्चे थे. मैंने कहा निसंदेह वे सच्चे थे, पर ये बता क्या अपनी माता के प्रति तेरे प्यार और विश्वास और तेरे पिता का तेरी माता के प्रति प्यार और विश्वास क्या ये किसी प्रार्थना से कम थे. और तुमने ये कैसे जान लिया कि माता में अब जीने की इच्छा ख़त्म हो गयी थी. वे नहीं माने और एक जयकारा लगाया.

मैंने कहा तुम्हे याद हो जब मेरे पिता की मृत्यु हुई थी तब हम सब बहुत रोये. मैं. छोटे भाई- बहन, माताजी. हमारे रोने में एक आह थी एक प्रार्थना थी. जो सभी ईश्वरों से थी. सभी देवों से. सभी पैगम्बरों से. सभी बाबाओं से थी. के पिताजी जी उठें. पर कोई चमत्कार नहीं हुआ. शायद उन अर्थों में कोई चमत्कार् नहीं होता जिन अर्थों में हम उन्हें देखना चाहतें हैं. जो गया वो गया. वो अपने साथ अपनी पूरी दुनिया ले गया. अपना चाँद ले गया. सूरज ले गया. सितारे ले गया. हो सकता है वो फिर से आये  अपनी नयी दुनिया के साथ. पर ये दुनिया तो छोड़ गया. कालजयी कोई नहीं. कोई हुआ ही नहीं. जो पीछे रह गए और जो आने वाली पीड़ियाँ हैं वे उपयोगिता के आधार पे किसी को भी कालजयी बना सकती है. पर क्या सभी कुछ वैसा ही हो सकता है जैसा आप चाहें. नहीं. आप राम को कालजयी बनायेंगे रावण अपने आप कालजयी हो जायेगा.

मृत्यु किसी की हो एक रिक्ति पैदा करती है. दुःख देती है. अपनों को, चाहने वालों को. पर निराशा किसी बात का हल नहीं. ना ही शराबनोशी. आवशकता इस जीवन को सुन्दर बनाने की है. आइये अपने  अपने स्तर से छोटे छोटे प्रयास जारी रखें. सुख हो. शांति हो. प्रेम हो. थोड़े से बहकते हुए कदम हों. आनंद हो.

दुश्मनों के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना के साथ….

कुशल प्रताप सिंह

बरेली
मोबाइल- +91-9412417994
मेल- [email protected]

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0 Comments

  1. श्रीकांत सौरभ

    October 13, 2011 at 2:01 pm

    बहुत बढ़िया कुशल भाई . खबरों की आपाधापी से इतर भड़ास पर दर्शन की बातें अपनी जड़ो का अहसास दिलाती है . वास्तव में दर्शन ही अध्यात्म,धर्म व संपूर्ण जीवन शैली है . यही एक बला है जो मनुष्य को मानवीयता का बोध कराता है . और यह भी कि किस हद तक हम तमाम तरह की बुराईयों से जकड़े हुए हैं . साथ ही एक पशु सरीखा जीवन बीताते इस दुनिया से सैकड़ों अरमान लिए असमय कूच कर जाते हैं . फिलहाल मैं तो इतना ही कहूंगा कि बिन दर्शन भी क्या जीना .

  2. कुमार सौवीर, लखनऊ

    October 14, 2011 at 10:11 am

    दुश्मनों के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना के साथ….
    बहुत खूब।
    दोस्‍ती के अस्तित्‍व की नींव दुश्‍मनी के अस्तित्‍व के बिना हो ही नहीं सकती। सिक्‍के का दूसरा पहलू भी होता है और इस दूसरे पहलू को समझने की नितांत आवश्‍यकता होती है। खट्टा न हो तो मीठे का पता ही नहीं लगाया जा सकता।
    तो दोस्‍त के साथ दुश्‍मनी भी अनिवार्य है। दोस्‍ती के साथ दुश्‍मनी को भी सलाम।

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