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पत्रकार नहीं क्‍लर्क बनाने की साजिश

माखनलाल विवि छोड़े हुए करीब सात साल हो गए हैं और इस बीच केवल एक बार ही पूर्व छात्र की हैसियत से विवि कैम्पस में जाने का मौका मिला। करीब चार साल पहले मैं और संदीप विवि के नए परिसर में गए। बहुत खुशी हुई जब देखा कि हमें जो चीजें नहीं मिल पाईं वो हमारे बाद आने वाले छात्रों को मिल रही हैं। करीब सात-आठ साल से पेशेवर व अन्य जिम्मेदारियों के चलते पुरानी चीजें गौण होती गईं, लेकिन जब कभी भी वहां का कोई छात्र टकराता है सारी यादें एक झटके में ताजा हो जाया करती हैं।

माखनलाल विवि छोड़े हुए करीब सात साल हो गए हैं और इस बीच केवल एक बार ही पूर्व छात्र की हैसियत से विवि कैम्पस में जाने का मौका मिला। करीब चार साल पहले मैं और संदीप विवि के नए परिसर में गए। बहुत खुशी हुई जब देखा कि हमें जो चीजें नहीं मिल पाईं वो हमारे बाद आने वाले छात्रों को मिल रही हैं। करीब सात-आठ साल से पेशेवर व अन्य जिम्मेदारियों के चलते पुरानी चीजें गौण होती गईं, लेकिन जब कभी भी वहां का कोई छात्र टकराता है सारी यादें एक झटके में ताजा हो जाया करती हैं।

हम तुरंत तुलना करने लगते हैं कि आज सभी मीडिया संस्थानों में माखनलाल के छात्रों ने किस तरह एक अलग पहचान बना ली है। यहां तक कि दिल्ली के कुछ संस्थानों में माखनलाल के छात्र होने मात्र से टेस्ट के लिए बुला लिया जाता हैं। आईआईएमसी के छात्र अब माखनलाल से चुनौती महसूस करते हैं और यदाकदा खौफ भी खाते हैं। बड़े गर्व से कहते हैं कि हम उस विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं जहां केवल छात्रों की सुनी जाती है। छात्र अपने लिए शिक्षक तय करते हैं और किताबी कीड़ा बनने की बजाए व्यवहारिक व पेशेवर चुनौतियों से रूबरू होते हैं। सीमित संसाधनों में छात्रों को ऐसा माहौल मिलता था, जो उनके आगे बढ़ने की राह आसान करता और वह शनै: शनैः पत्रकार बनने की राह पर निकल पड़ते।

पेशेवर जिंदगी में हम आईआईएमसी या पत्रकारिता के अन्य संस्थानों को यह कहकर नकार देते हैं कि माखनलाल में पत्रकारिता सिखाई जाती है जबकि अन्य संस्थानों में पत्रकारिता पढ़ाई जाती है। ये सारी बातें सुनकर दूसरे संस्थानों से कोर्स कर आने वाले हमारे साथी आश्चर्यचकित हो जाते हैं। वे पूछतें हैं कि आखिर माखनलाल में छात्रों को ऐसी स्वतंत्रता कैसे मिल जाती है।

दरअसल, विवि में हमारे जैसे छात्रों को स्वतंत्रता नामक चीज विरासत में मिली थी। हमारे वरिष्‍ठ छात्रों ने एक ऐसा माहौल बनाया था, जिसमें पत्रकार बनने का सपना लेकर विवि आने वाले छात्रों को स्वतः ही पत्रकारिता का माहौल मिल जाता था, और वे कुछ ही समय में बड़े-बड़े सपने पालने की बजाय पत्रकारिता की वास्तविक दुनिया को समझ जाते थे। वर्ष 2000 में विवि में दाखिला लेने के कुछ माह बाद जबर्दस्त हड़ताल हुई। हम नए छात्र अपने करियर को लेकर काफी परेशान हो गए। लेकिन उस समय हमें हमारे वरिष्‍ठ छात्रों ने हमें पत्रकार होने का अहसास कराया और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का जोश पैदा किया।

इसी कारण हम अपने ही विभागाध्यक्ष को क्लास लेने से रोकने जैसे दुस्साहसिक कार्य करने में सक्षम हो पाए थे। हम विभागाध्यक्ष तक से उनकी क्लास में बैठने से मना कर देते थे। हम कहते थे कि उनकी पढ़ाई से हमें संतुष्टि नहीं मिलती। यानी हम विवि प्रशासन को हमेशा अपने अधिकारों से अवगत कराते रहते थे। दरअसल, मुझे लगता है कि उस वक्त विवि किसी ‘विचारधारा’ या सोच का गुलाम नहीं था। उस वक्त छात्रों के साथ कुछ ऐसे शिक्षक भी थे जो उनकी उचित मांगों को पत्रकारिता जगत की जमीनी हकीकत के संदर्भ में देखते थे। उन्हें लगता था कि छात्रों को केवल किताबी ज्ञान देने से पेशेवर दुनिया में उनका भला होने वाला नहीं है। उन्हीं में शामिल हैं पीपी सिंह, देवेंद्र कौर उप्पल और दीपेंद्र बघेल जैसे शिक्षक।

लेकिन आज स्थिति उलट है। भोपाल से साथियों से मिल रही जानकारी और विवि प्रशासन द्वारा की गई नई व्यवस्थाओं से लगता है कि हुक्मरान विवि को एक टिपिकल संस्थान बनाना चाहते हैं, जो बिल्कुल स्कूल की तरह अनुशासित हो, जो व्यवस्था की हर खामी को मूकदर्शक बनकर देखते रहे। वह पत्रकार नहीं एक क्लर्क बने और उसमे प्रतिरोध की कोई क्षमता न हो। आज विवि पर ऐसी विचारधारा का कब्जा होता दिख रहा है जो लोकतांत्रिक मूल्यों मे विश्वास नहीं करता। राष्‍ट्रवाद और राष्‍ट्रप्रेम की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले ये लोग सार्वजनिक जिंदगी में कितना भ्रष्‍ट हो चुके हैं ये बात वे खुद जानते हैं और उनके करीब रहने वाले तो हमें बताते ही हैं।

रही बात पीपी सिंह की, तो मैं सीधे तौर पर पीपी सर के विभाग से संबंध नहीं रखता था लेकिन हमारे विभाग के सारे छात्र अपनी किसी भी समस्या के लिए उन्हीं के पास जाते थे। आखिर क्यों, क्योंकि वे छात्रों की हर जरूरत को पूरा करने के लिए तत्पर रहते थे। वे हर छात्र को पत्रकारिता की जमीनी हकीकत से रू-ब-रू कराते थे। लेकिन आज विश्वविद्यालय के शीर्ष पदों पर मौजूद तथाकथित राष्‍ट्रवादी लोगों को अपनी दुकान चलाने में पीपी सिंह सबसे बड़ा रोड़ा नजर आ रहे हैं, जिसे वे किसी भी तरह किनारा करना चाहते हैं। लेकिन वह भूल गए कि उनकी ही विचारधारा से इत्तेफाक रखने वाले कुछ ऐसे ईमानदार लोग भी हैं जो पीपी सिंह को हमेशा से अपना गुरु मानते आए हैं और मानते रहेंगे।

लेखक संतोष कुमार सिंह आईएएनएस की हिन्‍दी सर्विस में मुख्‍य उपसंपादक हैं.

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0 Comments

  1. अभिषेक माथुर

    September 29, 2010 at 4:03 pm

    भैय्या… सर खेल संजय द्विवेदी का बनाया हुआ है। जब वो पत्रकारिता विभाग में आये हैं तभी से वहां राजनीति तेज हो गई है। पीपी सिंह को हटाने के लिये छात्रों को जिस तरह से उन्होने आगे किया है और पर्दे के पीछे से उसका जिस तरह संचालन किया है इसके लिये तो उन्हें चुनाव लड़कर नेता बन जाना चाहिए। संजय द्विवेदी लिखते काफी अच्छा हैं लेकिन राजनीति भी उससे ज्यादा अच्छी करते हैं…. विश्वास नहीं हो तो इनका पूरा रिकार्ड देखा जा सकता है कि कैसे कब और कहां इन्होंने राजनीति करके बुलंदी हासिल की है। पीपी सिंह काण्ड के पीछे भी यही हैं।

  2. ratnesh

    September 29, 2010 at 4:53 pm

    kash aap bhopal main aur main aap se mil pata santosh singh jee

  3. संदीप मिश्र

    September 30, 2010 at 6:55 am

    सर स्वतंत्रता हमारा अधिकार है, ये बात आपकी बड़ी जंच गई, हालाँकि चुनौतियाँ आज भी विश्वविद्यालय को उस गति से आगे नहीं बढ़ने दे रही हैं! संदीप मिश्र

  4. xyz

    October 3, 2010 at 10:28 pm

    सर ये तो आपने बहुत बड़ी और उच्च स्तर की बात उठाई हैं, ज़रा निम्न और धरातल पर आके भी देखें तो. अब आप पत्रकार हैं, एक पत्रकार का फर्ज पत्रकारिता के लिए भी निभाए ना, ये तो हुई पत्रकारिता के सबसे बेहतर कॉलेज की बात लेकिन आज हर गली मोहल्ले (हर शहर छोटे से लेकर बड़े) में पत्रकारिता के विश्व स्तरीय संस्थान खोलने का दावा किया जा रहा हैं. गौरतलब हैं की इसकी गारंटी मशहूर पत्रकार आकर के अपने संबोधनों में देते हैं, जहा गरीब छात्र , जो लाचार होते हैं लाखों रूपये भी लुटाते हैं…क्या हैं कोई नीजि पत्रकारिता संस्थानों के लिए कोई रेगुलेटिंग इकाई…क्यों नहीं आवाज उठाते हैं…

  5. meghna

    October 4, 2010 at 7:56 pm

    sanjay dwiwedi ghor awsarvadi hai, saath hii darpok bhi, aaj jis sanjay ko hm log de rahe hain use sahara PP Singh ne hi diya tha lekin pp shingh ka vyaktitva itna udar hai ki wo ye nahi dekhte ki jiski wo madad kar rahe hain wo sapola hai ya ek student hai sanjay vahi sapola hai. sanjay ki abhi tak jisne bhi madad ki hai wo unhi ke sar par pair rakhkar aage badh gaya lekin yahan galti kardi qki PP Singh hone ka matlab hi usko nahi pata hai. sanjay par daya aa rhai hai

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