: दिव्या प्रकरण में कानपुर पुलिस झुकी : प्रबंधक के बेटे को गिरफ्तार करना पड़ा : यशवंत जी, दिव्या प्रकरण में हिन्दुस्तान की तथ्यपरक रिपोर्टिंग के बाद आखिरकार कानपुर पुलिस को स्कूल प्रबंधक के बेटे को गिरफ्तार करना पड़ा। पुलिस शुरू से ही इस मामले में लीपापोती में लगी रही यह प्रमाणित करने के लिए इस केस में पुलिस द्वारा 19 दिनों में दिए गए बयान, उनकी करतूत काफी है। इतना ही नहीं इसी बौखलाहट का नतीजा है कि कानपुर पुलिस प्रशासन ने हिन्दुस्तान पर चौतरफा हमला बोल दिया।
शायद पुलिस प्रशासन इस मुगालते में था कि हिन्दुस्तान उनके सामने हथियार डाल देगा और इस प्रकरण के लीपापोती में उनका साथ देगा, लेकिन हो गया इसके उलट। क्योंकि बात सरोकारों से जुड़ी थी। पुलिस ने हिन्दुस्तान अखबार के सप्लाई की सात गाड़ियों को सीज कर दिया। हालांकि इससे सप्लाई प्रभावित जरूर हुई, इसके बावजूद हिन्दुस्तान टीम ने पुलिस प्रशासन के आगे घुटने नहीं टेके। हालांकि इसका खामियाजा हिन्दुस्तान और उसके कर्मचारियों को भुगतना पड़ा, लेकिन शहर में जिस तरह से दिव्या प्रकरण में हिन्दुस्तान को समर्थन मिल रहा है वह किसी भी खामियाजे की क्षतिपूर्ति करने में सक्षम है। लोग खुद आगे आ रहे हैं। इस प्रकरण की सीबीआई जांच कराने की मांग के लिए शहर के जिम्मेदार लोग खुद आगे आ रहे हैं। अब तैयारी है हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करने की ताकि कोर्ट के संज्ञान में यह प्रकरण आ सके।
इस पूरे मामले में आपकी वेबसाइट पर जो कुछ भी प्रकाशित किया गया उससे तो फिलहाल यही लगता है कि आप खुद पत्रकारिता भूल चाटुकारों की पंगत में शामिल हो गए हैं। आप हमेशा दंभ भरते हैं पत्रकारीय मूल्यों की, सरोकारों की, लेकिन फिलहाल लगता यही है कि यह सा आपके लिए महज दिखावा है, लोकप्रियता पाने के हथकंडे हैं। यशवंत जी, आज मुझे यह सब लिखने में प्रसन्नता नहीं हो रही है। अपने ही एक वरिष्ठ के बारे में ऐसा लिखने में कष्ट भी हो रहा है, लेकिन आप द्वारा बिना सोचे विचारे किया गया यह कृत्य मुझे लिखने को मजबर कर दिया। कानपुर में पिछले तीन महीनों में एक के बाद एक वारदातों को अंजाम दिया गया। ज्यादातार घटनाओं में पुलिस की भूमिका सवालों के घेरे में रही है।
ऐसे में आप ने किन तथ्यों के आलोक में डीआईजी को हीरो साबित करने का प्रयास किया। कहीं आपके कुछ स्वार्थ तो नहीं निहित रहे। कुछ भी लिखने से पहले कम से कम इस दौरान के अखबारों को एकबारगी देख तो लिया होता अथवा अखबार का भी पक्ष जान लिया होता, जो रिपोर्टिंग का सिद्धांत भी माना जाता है। रही बात घटनाओं के कवरेज की, तो मैं यह साफ कर देना चाहता हूं कि इसमें किसी साथी रिपोर्टर का व्यक्तिगत इंवाल्वमेंट जैसी कोई चीज नहीं है। हां, इतना जरूर है कि अभी हमारी आंखों में कुछ पानी बचा जरूर है। पुलिस प्रशासन कुछ भी कर ले, हम सरोकारों से समझौता नहीं कर सकते।
एक पत्रकार
हिंदुस्तान, कानपुर
(हिंदुस्तान, कानपुर में कार्यरत एक साथी ने यह मेल भेजा है. उन्होंने अपना फोन नंबर और नाम भी भेजा है लेकिन अनुरोध किया है कि उनका नाम, परिचय भड़ास4मीडिया पर न प्रकाशित हो. उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए बिना उनके नाम के उनकी बात को यहां प्रकाशित किया गया है.)
प्रिय साथी
मैं आपके लिखे के जवाब में दो-चार बातें कहना चाहता हूं, अपनी सफाई में. डीआईजी प्रेम प्रकाश को मैं निजी तौर पर एक बहादुर व साहसी पुलिस अधिकारी मानता हूं और उनका प्रशंसक हूं. ऐसा इसलिए कि उन्होंने पिछले दिनों कानपुर में दैनिक जागरण के मामले में जो साहसिक कदम उठाया, वह बहुत कम पुलिस अधिकारी कर पाते हैं. संपादकों, रिपोर्टरों से पंगा तो सभी लेते हैं लेकिन अखबारों के मालिकान के सही-गलत में हाथ डालते हुए उन्हें कानून का भय बहुत कम लोग दिखा पाते हैं. रही बात मेरे लिखने की तो मुझे कानपुर में अपने सूत्रों से जो जानकारी मिली, उसके आधार पर मैंने लिखा. और, उसी अपने आलेख के ठीक नीचे कानपुर में हिंदुस्तान के साथ पुलिस का जो कुछ व्यवहार रहा, उस पर दो साथियों की प्रतिक्रियाएं भी प्रकाशित की हैं जो पुलिस की दबंगई और पत्रकारों को खामखा परेशान किए जाने की प्रवृत्ति पर प्रहार है.
उसी मेरे लिखे के नीचे पत्रकार साथी संजय शर्मा और अभिषेक पांडेय की दो रिपोर्टों से आपको नहीं लगता कि मेरी मंशा किसी की चापलूसी करने की नहीं बल्कि मिली हुई जानकारी पर अपना मत-अभिमत रखने के साथ-साथ इस मुद्दे पर अन्य विचारों को एक साथ प्रकाशित करने की थी ताकि किसी भी पाठक को कंप्लीट जानकारी मिल सके, एकतरफा रिपोर्टिंग न हो. उसी आलेख में हिंदुस्तान में प्रकाशित पुलिस उत्पीड़न संबंधी खबर की कटिंग का भी प्रकाशन किया गया है. मेरे खयाल से कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति उस पूरी पोस्ट व उसमें लिखित तीन लेखकों के विचारों व हिंदुस्तान में प्रकाशित खबर की कटिंग को पढ़कर यह नहीं कह सकता है कि मैंने हिंदुस्तान के खिलाफ और प्रेम प्रकाश के फेवर में वो पूरी पोस्ट प्रकाशित की है. जिस पोस्ट को लेकर आप मेरी ऐसी-तैसी कर रहे हैं, उस पोस्ट को एक बार आप फिर पढ़िए, इस शीर्षक पर क्लिक करके- मीडिया को आइना दिखाने वाला एक आईपीएस
और, प्रेम प्रकाश के बारे में मेरी जो धारणा है, वह ऐसा नहीं है कि पत्थर की लकीर है या चिर-स्थायी है और कभी बदल नहीं सकती. वे अगर बुरा और गलत काम करेंगे तो उसको हम लोग प्रकाशित करेंगे और उनकी निंदा भी की जाएगी. कानपुर में हिंदुस्तान के मीडियाकर्मियों को परेशान व आतंकित किए जाने की घटना की मैं निंदा करता हूं क्योंकि कोई भी लोकतांत्रिक व्यक्ति यह नहीं चाहेगा कि पुलिस भय के जरिए किसी को अपना स्टैंड व मत बदलवाने को मजबूर करे. बाकी, आपकी राय व सोच की मैं कद्र करता हूं. यह लोकतंत्र है और कोई किसी के भी बारे में अपना एक नजरिया बनाने और उसे व्यक्त करने को स्वतंत्र है.
यशवंत
एडिटर
भड़ास4मीडिया












anil kumar
October 19, 2010 at 10:34 pm
yaswant yaar tumhara chritra tumko janne walon ko batane ki jarurat hai.
k. abhishek
October 19, 2010 at 11:46 pm
yashwant ji aap mei etni himmat hai tabhi aap ye sab, khud ke bhi khilaaf chhap dete hain, yahi real journalism tradition hai. i proud of u.
k. abhishek
संजय कुमार
October 20, 2010 at 2:37 am
यशवंत भाई ,
बात आपकी भी सही है ,पर यह भी सत्य है कि आपसे थोडी जल्दबाजी हो गयी । पर चलता है गलती किसी से भी हो सकती है।
वैसे कानपुर के हालात बहुत बुरे हैं दिव्या हो या कविता हर मामले में पुलिस का रोल संदिग्ध रहा है । लगता है जैसे पुलिस आरोपियों को बचाने के लिये पूरा जोर लगा रही है और जो भी बीच में रोडा बनता है उसे निपटाने में जुट जाती है चाहे आम नागरिक हों या मीडिया । पर अहंकार तो रावण का भी नहीं बचा था तो ये डीआईजी क्या बेचता है। इस बार लगता है दिव्या केस प्रेम प्रकाश का वाटरलू साबित होगा। कृपया इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाये, जनहित में आपका सहयोग अपेक्षित है ।
संजय कुमार
पत्रकार
Rizwan Mustafa
October 20, 2010 at 7:35 pm
Rattu tota mat baniye yashwant ji,
Maya ki police zalim hai, kahani banakar kisi bhi patrkar, sansthan k upar ilzam laga sakti,aapne Galat kiya Hai, Aap ke Saat Galat Hua Hai,Patrkaro me kuch mauka Parast Zaroor hai Lekin Zaydatar Bekasoor Hai,Ladai Patrkaro ki Ladai,Hindustan, Jagran ko to Ghamand Kha Gaya, Yeh log agar patrkaro par policiya zulm ko highlight karte to inko zillat na uthani padti,Patrkaro ki ekta ko Mazboot Karne Me Lagiye,Humare Jaise Aapke saat Har Qurbani Me saat Dene Ke liye Har Waqt tayyr Milege
भारतीय़ नागरिक
October 21, 2010 at 5:47 am
ये श्रीमान जी मुरादाबाद में आईटीबीपी के एक सब-इन्सपेक्टर को धुन चुके हैं. अहंकार का अन्त होना ही चाहिये..