अरबों के भूमि घोटाले में घिरे उत्तराखंड के पत्रकार मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की अदा भी निराली है। पहले कायदे कानूनों को ठेंगा दिखा घोटाला करो और फिर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो समझो हो गई बल्ले-बल्ले। लेकिन पाप का घड़ा फूटने लगे तो बचाव के लिए बेशर्मी की हद तक उतर जाने में भी कोई संकोच नहीं। एक के बाद एक घोटालों में घिरते देख निशंक की अब तक की शैली यही है। लेकिन आखिर काली करतूतों पर पर्दा भी चढ़े रहे तो कब तक, वह तो कभी न कभी बेपर्दा हो ही जाती है।
ऋषिकेश स्थित करीब 2,000 करोड़ के स्टर्डिया भूमि घोटाले को लेकर हाईकोर्ट की तलवार लटकने के बाद निशंक ने अपने उसी ‘प्रतापी विवेक’ का सहारा लिया, जिसके बूते उन्होंने राज्य को करोड़ों के
राजस्व का चूना लगवाकर इस घोटाले के बीज बोये। अभी भी अपने मीडिया मैनेजमेंटी कौशल के बूते निशंक ने ऐसे दांव चले हैं कि जैसे वे इस खेल में पाक-साफ हों। महीनों से चले आ रहे इस विवाद में एकमात्र तहलका ने निशंक के विवेकी प्रताप पर सवाल उठाये हैं, बाकी सब बड़े मीडिया घराने निशंक के इस महाघोटाले पर कलम तो चला रहे हैं, लेकिन सवाल पूछने की हिम्मत नहीं दिखा रहे हैं। हकीकत यह है कि इस घोटाले को बुनने के लिए निशंक ने जिस विधायी प्रक्रिया की आड़ ली, वह ही निशंक के गले की फांस तो बन सकती है, साथ में तत्कालीन मुख्य सचिव को भी बेपर्दा करती है।
दरअसल, ऋषिकेश में वाडिया समूह की कंपनी स्टर्डिया केमिकल्स, दशकों से कैल्शियम कार्बोनेट
बनाने का धंधा करती आ रही थी। कंपनी ने कारखाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार से करीब 50 एकड़ भूमि महज एक लाख 24 हजार रुपये में लीज पर ली थी। नब्बे के दशक में दून घाटी और उसके आसपास चूने की खदानों पर रोक लगने के चलते कंपनी भी बीमार हो गई। कुछ सालों तक कंपनी ऐसी ही रुग्णता की हालत में रही। लेकिन जैसे ही देशभर में रीयल स्टेट कारोबार के चलते जमीन के दामों में रातोंरात शेयर मार्केट की उन्मादी उछालों के मार्फत इस धंधे का गुब्बारा फूलने लगा कंपनी के कारिंदे भी सक्रिय हो उठे।
वर्ष 2002 में कंपनी ने श्रमिकों के बेरोजगार होने की दलील देते हुए दस एकड़ जमीन बेचने और बाकी जमीन पर रीयल स्टेट कारोबार शुरू करने की इजाजत राज्य सरकार से मांगी। इस पर तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने इजाजत देने से इनकार कर दिया कि जो जमीन राज्य
सरकार की है उसे वह कंपनी को बेचने की अनुमति कैसे दे सकती है। तिवारी के इस दो टूक फैसले के बाद ही कंपनी के कारिंदों ने हथियार नहीं डाले और बीमार उद्योगों को पुनर्जीवित करने के लिए बने केंद्रीय बोर्ड आफ इंडस्ट्रीयल फाइनेंशियल रिक्रंस्टक्शन की शरण ली। यहां से अपने पक्ष में आदेश लेकर कंपनी फिर तिवारी के दरवाजे पर गई लेकिन उसे फिर मायूसी हाथ लगी। इसके बाद कंपनी ने तिवारी की विदाई के बाद भाजपाई निजाम के मुखिया बीसी खंडूड़ी के दरवाजे पर दस्तक दी, लेकिन तब भी कोई रियायत नहीं मिली। आखिर में जब चतुर निशंक मुखिया की कुर्सी पर बैठे तो कंपनी की मेहनत पलक झपकते ही रंग ले आई। जो काम तिवारी और खंडूड़ी नहीं कर पाये वह काम निशंक ने अपने प्रतापी विवेक से ऐसे किया कि उनके पूर्ववर्तियों को भी उनसे रश्क होना चाहिए।
दरअसल, निशंक ने बीमार हो चुकी इस कंपनी को सरकारी जमीन बेचने और उस पर रीयल स्टेट और टूरिज्म का धंधा शुरू करने की इजाजत देने के लिए मंत्रीपरिषद को अंधेरे में रखकर अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए ‘विचलन’ का सहारा लिया। बता दें कि विचलन वह विधायी प्रक्रिया है जिसके तहत कुछ विशिष्ट परिस्थतियों में किसी भी मुख्यमंत्री को अधिकार होता है कि वह व्यापक जनहित वाले विषय पर मंत्रीपरिषद को दरकिनार कर फैसला कर सकता है। कोई मुख्यमंत्री इस विशेषाधिकार का दुरुपयोग न करने पाये इसके लिए व्यवस्था है कि जब कैबिनेट की बैठक बुला पाना किन्हीं कारणों से संभव न हो तो मुख्यमंत्री ‘विचलन’ के माध्यम से किसी जरूरी विषय पर विवेक सम्मत निर्णय ले सकता है। अब ऐसे में सवाल उठता है कि स्टर्डिया कंपनी जो सरकारी जमीन बेचने और उस पर रीयल स्टेट कारोबार कर उस पर 2000 करोड़ का धंधा खड़ा
करने की अनुमति चाहने वाली फाइल से राज्य का ऐसा कौन से हित जुड़ा था, जिस पर निशंक इतने मेहरबान हो गए कि उन्होंने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग कर कंपनी के हित में अपना फैसला सुना दिया।
खैर, निशंक की काली करतूतों की इस घोटालागाथा से हाईकोर्ट के दखल के बाद पर्दा तो उठ गया, लेकिन इसने एक नई बहस को भी जन्म दे दिया। इस बहस का एक सिरा निशंक को विचलन से स्टर्डिया जमीन मामले में फैसला करने का सुझाव देने वाले तत्कालीन मुख्य सचिव पर जाकर टिकता है, तो दूसरा मधु कोडा से लेकर निशंक तक विशेषाधिकार के नाम पर आखिर कब तक ऐसे खेल करते रहेंगे। पहले बात तत्कालीन मुख्य सचिव की। क्या जमीन घोटाले के लिए जितने जिम्मेदार निशंक हैं, तत्कालीन मुख्य सचिव उससे कमतर हैं? इस नौकरशाह से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि उन्हें ऐसा क्या जनहित का मामला लगा कि उन्होंने सरकारी जमीन की बंदरबांट के लिए निशंक को विचलन का फार्मूला थमाकर इस घोटाले की नींव रखने में मदद की।
कहने के लिए तत्कालीन मुख्य सचिव कह सकते हैं कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर ही उन्होंने स्टर्डिया की फाइल में उन्होंने विचलन से फैसला लेने का प्रस्ताव पेश किया। पर क्या नौकरशाहों को इतना स्वामिभक्त
होना चाहिए कि उनका बिग बॉस जैसा कहें, वैसे ही पाप की इस गंगा में डुबकी लगा लें, यह देखे-समझे बगैर कि इससे उनकी काया भी चर्म रोग से घिर सकती है। खैर निशंक और तत्कालीन मुख्य सचिव के इस विवेकी पाखंड का भांडा तो फूट चुका है, लेकिन न यह कोई आखिरी जमीनी घोटाला ही है, जिसके फूटने से निशंक पसीना-पसीना हो रहे हैं। कई और घोटाले सचिवालय की फाइलों में कैद हैं जो बाहर आने का इंतजार कर रहे हैं।
लेखक दीपक आजाद हाल-फिलहाल तक दैनिक जागरण, देहरादून में कार्यरत थे. इन दिनों स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं.












narayan pargain
December 11, 2010 at 1:11 pm
hi likh to thik hai lakin antim do linay cm par likhi hai wo thik nahi hai deepak ji kabhi kabhi garim ka bhi dhyan rakh liya karoo ……………..
narayan pargain
December 11, 2010 at 1:12 pm
saboot hai to kabar likoo par use daba kar kabhi bhi uska galat istmal mat karoo kab ho raha hai naya khulasaa
Rachna
December 11, 2010 at 4:35 pm
अरे इस घोटालेबाज निशंक का एक hydro और sturdia जमीन घोअते के बाद अब एक और अरबो का घोटाला सामने आने वाला है…. बस थोडा सा इन्तजार… इस बार तो देश के सामने नंगा हो ही जायेगा… वैसे कसर तो बची नहीं है
Thapa
December 14, 2010 at 11:10 am
निशंक सरकार की जितनी भी ऐसी तैसी हुयी है उसके लिए उत्तराखंड का एक पत्रकार जिम्मेदार है, जिसे निशंक ने हल्के में ले लिया….. कुछ भी कहो लड़के में हिम्मत है, सरकार द्वारा आधा दर्ज़न मुक्कदमे दर्ज होने के बावजूद भी सरकार के कब्ज़े में नहीं आया… मुझे तो लगता है की अगर निशंक समय रहते नहीं चेते तो कंही सरकार को ही न निपटा डाले…… सब बड़ी बड़ी बाते करते हैं, किसी को ये मालुम है की सभी स्टिंग किसने किये… बस इतना ही काफी है बताने के लिए…उसकी दूकान में अभी इतना सामान है की अगर पिटारा खुल गया तो बस जय उत्तराखंड
Arun
January 24, 2011 at 10:53 am
इसी कला के लिये निशंक जी को अब पदम््ाश्री(छद्मश्री नहीं) का सम्मान भी मिल रहा है। चलो सत्ता का एक और सुख सही। जब चारों ओर चाटुकार बैठे हों और पत्रकारिता वैश्यावृत्ति हो गयी हो तो सब कुछ चलता है। शायद ज्यादातर लोगों को पता नहीं होता है कि पद्मश्री की सिफारिश मंत्री,मुख्यमंत्री और सासंद या विधायक करते हैं। और तब राज्य सरकार उसे केन्द्र को अग्रसारित करती है।इससे पहले निशंक जी ने नारायण दत्त तिवारी जी से भी सिफारिश कराई थी। किसी से साहित्य लिखाओं और किसी से पद्मश्री मनोनयन लिखाओं और पा जा जाओं पद्मश्री।ई टी.बी के चाटुकारों को भी बधाई दे दो। इस प्रदेश को लुटवाने में ई टीवी का भी बराबर का हाथ है।