आईबीएन7 में ‘लौंडा’ कहने पर लड़ाई

अखबारों और चैनलों के दफ्तरों में काम करने वालों के बीच कहासुनी आम बात है लेकिन इन ‘कहासुनियों’ से कई बार हम अपने समय और समाज के चरित्र को भी विश्लेषित कर पाते हैं. सामंती समाज से निकले हुए तलछट किस्म के अवशेष जब मीडिया के हिस्से बनते हैं तो अपने हिप्पोक्रेटिक चेहरे के बावजूद वे कई बार ओरीजनल रूप-स्वरूप में सामने आ जाते हैं और फिर उसी समय वे वहीं पर पकड़ लिए जाते हैं. एक न्यूज चैनल है आईबीएन7. इसके फिल्म सिटी स्थित मुख्यालय की कहानी है.

इस चैनल के नोएडा स्थित मुख्यालय में ढेर सारे किचकिच क्रांतिकारी, सुग्गा साहित्यकार, अचूक चिंतक, दिनदहाड़े दार्शनिक, बम-बम वामपंथी टाइप के जीव लाखों रुपये की सेलरी लेकर ‘जन पत्रकारिता’ करते रहने में जुटे रहते हैं. इन्हीं में एक एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर (ईपी) लेवल के सज्जन हैं जो अपने को बड़े साहित्यकार से कम नहीं समझते. एक दिन की बात है. प्रोड्यूसर व वीडियो एडिटर को सीट पर न पाकर वे ईपी महोदय जोर से बोल पड़ते हैं- ‘लौंडे कहां गए? लौंडे किधर हैं भाई?? अरे, ये लौंडे हैं किधर??’ उन्होंने कई बार ये वाक्य जोर-जोर से दुहराए और फिर यही सवाल एक प्रोड्यूसर से कर बैठे जो उस वक्त उनके सामने पड़ गया था. प्रोड्यूसर गरम खून का निकला. उसने ईपी महोदय की आंख में आंख डालकर पूछा कि ‘किस लौंडे को पूछ रहे हैं और आपका लौंडे शब्द से आशय क्या है? यहां किसी का नाम ‘लौंडा’ नहीं है. यहां काम करने वाले हर आदमी का एक नाम है और आपको उनका नाम लेकर बुलाना चाहिए.’

ईपी महोदय प्रोड्यूसर के तेवर देख थोड़े डर से गए. ईपी महोदय डाटने-डपटने फिर समझाने वाली मुद्रा में आ गए. पर उस प्रोड्यूसर ने ईपी महोदय की अच्छी खासी क्लास ली और समझा दिया कि दरअसल साहित्यकर दिखना और साहित्यकार वाली संवेदनशीलता के साथ जीना, दोनों अलग-अलग बातें होती हैं और आप जिस रूप में जी रहे हैं उसमें आप साहित्यकार दिखते हैं ज्यादा, अंतरआत्मा से हैं कम. दोनों के बीच काफी देर तक बकझक हुई. बाद में कई लोगों ने बीच-बचाव कर मामले को शांत कराया.

आईबीएन7 में ‘लौंडे’ प्रकरण की चर्चा अच्छी खासी है. यह चर्चा अब दूसरे न्यूज चैनलों तक पहुंच रही है. आईबीएन7 के कई पूर्व व वर्तमान लोग इस घटना की पुष्टि कर रहे हैं. इनका कहना है कि ईपी महोदय अपने आगे किसी को मनुष्य समझते ही नहीं और सभी की तौहीन करते रहने, खासकर वीडियो एडिटर्स के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करना उनके प्रिय शगल में है. ऐसे में अगर उन्हें एक प्रोड्यूसर ने अच्छी तरह से समझा दिया तो यही कहा जा सकता है कि सीनियरों, अपनी इज्जत अपने से बचाओ, वो दिन हवा हुए जब पसीना गुलाब था….

वैसे, ‘लौंडा’ शब्द का मतलब गलत नहीं होता है. इसका मतलब होता है नौजवान या नवयुवक या बच्चा. इसे ठेठ देहाती उर्फ देसज शब्द माना जाता है. हो सकता है कि ईपी महोदय ने अपनी सहजता में इस शब्द का इस्तेमाल किया हो और जूनियर भाई लोग बुरा मान गये हों लेकिन जूनियरों का कहना है कि बात किसी एक शब्द की नहीं बल्कि ईपी के एट्टीट्यूड का है. वे हमेशा दूसरों को कमतर आंकते हुए बिहैव करते हैं.

लेखक झक्की दारूवाला मीडिया की आफ द रिकार्ड खबरों के ज्ञाता और भड़ास4मीडिया के व्याख्याता हैं। ये अक्सर दारू में टुन्न रहते हैं और खुद से भी सुन्न रहते हैं, लेकिन वे सब बूझते हैं। आप उन तक अपने संस्थान की अकथ कहानी अगड़म-बगड़म कालम में प्रकाशित होने के लिए भेजना चाहते हैं तो bhadas4media@gmail.com पर मेल करें और सब्जेक्ट लाइन में ”अगड़म-बगड़म” या ”agdam-bagdam” जरूर लिखें ताकि झक्की भाई साहब को अपनी खबर खोजने में दिक्कत न हो।

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Comments on “आईबीएन7 में ‘लौंडा’ कहने पर लड़ाई

  • Lounda shabd se bura manane ka koi tuk nahi hai, kabhi kabhi deshaj bhasha (jaise avadhi) me aatmiyata pradarshit karane ke liye prayha bade log isaka prayoga kar dete hain.

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  • g iss shabd ka asli arth janne k liye kabhi kisi punjabi ko iss apmanjanak shabd se bulayiye to wo achi trah se smjha dega k asal kon hota hai lo___a

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  • anil pande says:

    बिहार, यूपी मे ज़रा किसी को लौंडा बोलकर देखिए.
    लोग दौड़ा-दौड़ा कर मारेंगे.

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  • anil pande says:

    बिहार, पूर्वी उत्तरप्रदेश मे ज़रा किसी को लौंडा बोलकर देखिए.
    लोग दौड़ा-दौड़ा कर मारेंगे.

    Reply
  • sujit Thamke says:

    SIRJI
    LOUNDA SHABD ACCH HAI YAA BURA ES ANALYSIS ME MAT PADHIYE HAM TO US JAGAHA THE NAHI KIS ANDAAZ ME EP MOHODAY NE KAHA LEKIN USKE BAATO SE LAGTA HAI KI VO DUSROKO NICHA DIKHATA HAI VO SENIOR HONGE ISKAA MATLAB YE NAHI KO VO DUSTONKA RESPECT NAA KARE

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  • pawan kumar says:

    lounda shabd bura nahi hai, is parkaran se lagta hai k log ep mahodya k kilaaf apni bhadas nikalna chahte the or lounda word k matlab se anjaan logon ko baat ka batangad banane ka mouka mil gaya, or waise bhi jise bola tha, usne to kuch kaha nahi, jisne bhadas nikalni thi usey is word se mirchi lag gayi.

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  • जय हो says:

    अरे गुरु……यहाँ तो लौंडा बदनाम हो जाता है नसीबन के लिये… उस बेचारे प्रोड्युसर को पता नहीं था कि छपरहिया लौंडों को कद्र तो खुद लालू जी भी करते हैं।

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  • amit mishra says:

    lagta hai producer ka aise shabdo se pala nahi pada ya fir unki purani koi bhadas rahi hogi jisko bhunane ke liye unhone is shabd ka sahara liya…….nahi to delhi mein ye bilkul common hai………Mera makan malik apne bete-beti ko publicly…’Ye meri laundiya hai’ ya fir ‘ye mera bada launda hai’ kahke introduce karata hai….to fir aap samajh sakte hain…isko itna seriously lene ki zaroorat hi nahi thi…

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  • Darshan Mani P7news says:

    sir mea to yahee khunga ke agar aap kesi bhee jaghe per kaam kartey hay to waha per aap ko apnee bhasa salee ko theek parkar sey use karnee chaheey
    na kee nounda vonda bolna chaheey.

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  • khabardar khabari.com says:

    producer sahab kaabile taaref hain aap aur aap ka ye garam khoon…..dara sal har ek channel ka haal ye he hai… ab bhai kuch he 3-4 to jujharoo ep hai aap ke channel mein jo sukhe registan se bhi paani nikalne ka maada rakhte hain… lekin aapne bhi unke kudaal se usi registan se paani nikaal ke ye sabit kar diya hai ki ye kudaal paani nikalne ka alawa khoon bhi nikaal sakta hai… to behtar hai ibn-7 ke epsss apni jaban ko lagam do aur ibn-7 ka business badhao.. kyunki patrakarita ke sahi maayne badal chuke hain aur apne aap ko patrakaar hone ka hool dena band karo…. ep sahab… apni girebaan jara jhaank kar dekho ki kitne bade patrakaar ho….aur tumhari khabro aur copy writing se kitna channel ko revenu milta hai…. aur haan… eeee launda waunda apne ghar mein he istemaal kiya karo… nahi to baahar gaarmi bhi bahut hai aur laundo ka dara sal mausam ke meharbani se khoon bhi bahut garam hai samjheyo ki nahi… baaabuuuuu….

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  • मानस मिश्र says:

    इपी लोग अक्सर अपने आप को बहुत बड़े समझते है, इन सालो के लिए साल में एक दिन सभी कर्मचारियों को जमकर थप्पड़ मरने का मौका देना चाहिए ताकि इपी को अपनी अतीती औकात पता चल जाये..

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