आईबीएन7 में ‘लौंडा’ कहने पर लड़ाई

अखबारों और चैनलों के दफ्तरों में काम करने वालों के बीच कहासुनी आम बात है लेकिन इन ‘कहासुनियों’ से कई बार हम अपने समय और समाज के चरित्र को भी विश्लेषित कर पाते हैं. सामंती समाज से निकले हुए तलछट किस्म के अवशेष जब मीडिया के हिस्से बनते हैं तो अपने हिप्पोक्रेटिक चेहरे के बावजूद वे कई बार ओरीजनल रूप-स्वरूप में सामने आ जाते हैं और फिर उसी समय वे वहीं पर पकड़ लिए जाते हैं. एक न्यूज चैनल है आईबीएन7. इसके फिल्म सिटी स्थित मुख्यालय की कहानी है.

‘हू न्यूज़’ की टीआरपी कथा

अगड़म-बगड़म : ‘हू न्यूज़’ की टीआरपी इन दिनों उछाल ले रही है। वजह, यहां के संपादक को ये बात समझ में आ गयी है कि यहां उनके सहयोगी इनपुट एडीटर अपने काम के अलावा सारे काम करते हैं। सो, रिपोर्टरों की सीधे मीटिंग लेना, उन पर स्टोरी के लिए दबाव बनाना, नए आइडिया देना और उनके आउटपुट पर नज़र रखना… ये यहां के संपादक खुद करते हैं। सुबह 10 बजे दफ्तर आना और रात के 12 बजे घर जाना, शायद यही हू न्यूज़ की टीआरपी बढ़ने की सही वजह है। एक बार कुछ दिन पहले संपादक जी के दांत में दर्द काफी बढ़ गया था, सो वो कुछ दिनों के लिए दफ्तर नहीं आ पाए। उस हफ्ते टीआरपी पहुंची सीधे धड़ाम। यानी यहां के संपादक के पास अपने काम के अलावा इनपुट एडीटर का काम भी है। तो फिर इन्पुट एडीटर क्या करते हैं? ये महाशय अपने काम के अलावा सारे काम करते हैं। मसलन, शाम को प्रिंटर के पास फैले कागजों को डस्टबिन में डालना, आउटपुट एडीटर के काम करना और स्टोरी का रन आर्डर तय करना, एसाइनमेंट के बचे काम निबटाना, बुलेटिन के लिए शाट-बाइट कटवाना।

और अपने चोर एंकर को चलता कर दिया चैनल ने!

अगड़म-बगड़म : बहुत दिन से गायब था। ऐसी ही प्रकृति है अपनी। कभी यहां तो कभी वहां। आजकल लिखने का मन भी नहीं करता। खराबी एकाध दो हो तो लिखा जाए भइये, पर अब तो जहां नजर फेरो, गड़बड़ी की गाड़ी हड़बड़ी में नहीं, आराम से चलते दिखती है। एक के बारे में लिखने की सोचो तो चार और लिखवाने के लिए तैयार। इतनी गड़बड़ियों को देख कर बजाय लिखने के, अपना पौव्वा खोल लेता हूं और अलौकिक चिंतन में डूब जाता हूं। पर परलोक जाने से पहले जिंदगी तो लोक में ही कटनी है, इसलिए आज लोक चिंतन करने आ पहुंचा हूं। खबर दे रहा हूं, गासिप भी समझियो तो कोई बात नहीं क्योंकि आजकल खबरें गासिप होती हैं और गासिप खबरें होने लगी हैं। खबर एक बड़े मीडिया हाउस से है जिसने टीवी इंडस्ट्री में ढेर सारे गठजोड़ कर ढेर सारे चैनल लांच कर दिए हैं। इसी ग्रुप का एक चैनल है होम शापिंग का। रोज सामान बेचा जाता है इससे।

दोस्तों से छल दोस्त ही करने लगे हैं दोस्तों !

अगड़म-बगड़म : क्या जमाना आ गया है दोस्तों। दोस्त से छल दोस्त ही करने लगे हैं दोस्तों!! नेताओं से भी ज्यादा शातिर होते जा रहे हैं अपने मीडियाकर्मी भाई-बंधु। मीडियाकर्मी अपने ही मीडियाकर्मी साथियों का हक छीनने लगे हैं। बेचारी, अमृतसर की मीडिया, जिसे अब तक खबर ही नहीं कि जालंधर के उन्हीं के मीडियाकर्मी साथियों ने किस तरह उन्हें चपत लगा दी है। मामला कुछ यूं है। जालंधर में कुछ पत्रकारों के सिर पर क्रिकेट डिप्लोमेसी का भूत सवार हुआ। ये पत्रकार हर रविवार किसी न किसी टीम से मैच खेलते हैं और इसी बहाने अपने सामाजिक संबंध प्रगाढ़ करते हैं। हालांकि यह बात अलग है कि इस टीम में खेलने वाले अधिकतर पत्रकारों का पत्रकारिता से दूर-दूर तक वास्ता नहीं है।

मिस्टर टांगड़ा के टांग अड़ाने से भड़के मिस्टर रोनेदो

अगड़म-बगड़म : मंदी की मार से ‘भरोसा भारत परिवार’ भी अब अछूता नहीं है। हालांकि इसके चेयरमैन ‘नवव्रत राम भरोसा’ ने अपने ‘ध्यानयोगियों’ को यह भरोसा दिलाया था कि उनके यहां कोई भी छंटनी नहीं की जाएगी लेकिन आंतरिक सूत्र बताते हैं कि तकरीबन ढाई सौ लोगों की सूची तैयार कर ली गई है। इऩ लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा। इतना ही नहीं, टीआरपी की रेस में टंगड़ी खाकर काफी नीचे लुढ़के पड़े इसके राष्ट्रीय चैनल ‘हमारा वक्त’ में नया झगड़ा शुरू हो गया है। शायद यह ‘वक्त’ चैनल के लिए सबसे बुरा ‘वक्त’ है। दरअसल एक दो शुक्रवार पहले इस चैनल के हेड ‘धनंजय टांगड़ा’ ने अपने राष्ट्रीय ब्यूरो के संवाददाताओं की आपातकालीन बैठक ली।

चैनल में भूत, नहले पर दहला, ये लो ठन गई!

अगड़म-बगड़म : भूत- इस साल धूमधाम से लांच हुए और बाद में तेजी से धड़ाम हुए एक न्यूज चैनल में काम करने वालों के बीच इन दिनों एक अफवाह जमकर फैली हुई है। यह अफवाह भूत की है। कहा जा रहा है कि चैनल के बेसमेंट से एक अजीब सी आवाज आती रहती है। तरह-तरह की आवाजें अधिकतर रात में ही आती हैं। इससे कई लोगों में डर बैठ गया है। बताया जाता है कि आफिस की जगह पर पहले जूतों की फैक्ट्री थी। इसमें आग लग गई थी। कई मजदूर जल गए थे। अब यहां बसमेंट में ताला लग गया है। यहीं से आवाजें आती हैं।  कई लोग यहां तक कहते हैं कि इन भूतों के चलते ही चैनल लगातार अस्थिर है। हो सकता है निकट भविष्य में प्रबंधन के लोग ओझा-सोखा के साथ यहां झाड़-फूंक कराएं।