धंधेबाज अखबार का एक और एडिशन

खबर आई है कि जागरण वालों ने ‘दैनिक जागरण सिटी प्लस’ नामक कथित वीकली अखबार हैदराबाद से भी लांच कर दिया है. इस अखबार की करीब 40 हजार कापियां कल हैदराबाद में मुफ्त में बांटी गईं. हैदराबाद में लांच हुए ‘सिटी प्लस’ को इसका 21वां एडिशन बताया जा रहा है. इससे पहले एनसीआर, मुंबई, पुणे, बेंगलोर आदि शहरों में इसके कई एडिशन लांच किए जा चुके है. इस अखबार के एनसीआर में पांच एडिशन हैं- नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, न्यू गाजियाबाद, फरीदाबाद और गुड़गांव। दिल्ली में चार एडिशन हैं- ईस्ट दिल्ली, वेस्ट दिल्ली, सेंट्रल दिल्ली और द्वारका. पुणे में चार, बेंगलोर में पांच, मुंबई में एक और अब हैदराबाद में एक एडिशन के साथ इस अखबार के कुल 21 एडिशन हो गए हैं. दैनिक जागरण सिटी प्लस का टैगलाइन है- Your guide to neighbourhood news, information and entertainment.

जागरण प्रबंधन इसे 25 से 50 उम्र वालों के लिए कम्युनिटी वीकली न्यूजपेपर बताता है. पाठकों का कहना है कि यह अखबार कम, धंधा करने के लिए और जागरण के नाम पर पैसा बटोरने के लिए निकाला गया पंफलेट ज्यादा है. इसका पता इस बात से भी चल जाता है कि इस अखबार के जो बिजनेस हेड हैं, वही इसके एडिटर भी हैं. नाम है सलिल टंडन. अखबार मालिक, जो कि एक तरह से बिजनेस हेड ही होता है, संपादक बनता है तो बात समझ में आती है कि चलो, आजकल यही रिवाज है. पर किसी शुद्ध मार्केटियर को संपादक बना दिया जाए तो समझ में आ जाता है कि अखबार निकालने के पीछे प्रबंधन की नीयत क्या है.

सूत्रों का कहना है कि जागरण प्रबंधन ने आईपीओ के जरिए जो पब्लिक का पैसा शेयर मार्केट से उठाया है, उसके बदले में उसने कई फर्जी और धंधा बटारने के लिए अखबार निकाल दिया है. इन्हीं अखबारों के बारे में सेबी को सूचित कर दिया है कि ये सब अखबार जनता के पैसे का सदुपयोग करके निकाला गया है. इस तरह एक तीर से दो निशाने सध गए. जनता से मिले पैसे दाब गए और अखबार के नाम पर विज्ञापन परिशिष्ट जैसा पंफलेट निकाल कमाई की रफ्तार में वृद्धि कर ली. सूत्र बताते हैं कि सिटी प्लस जैसे वीकली अखबार निकालने में कोई लागत नहीं आती क्योंकि जागरण के नाम पर सिटी प्लस की सेल्स टीम मार्केट से सस्ते रेट पर अच्छा विज्ञापन उठा लेती है और फिर हर पेज पर एक या आधा कलम स्पेस में कुछ भी उटपटांग मैटर भर कर प्रकाशित कर दिया जाता है.

इस अखबार में संपादकीय के नाम पर कोई भी टीम नहीं है. अगर टीम है तो उसमें सिर्फ मार्केटिंग और सेल्स वाले ही भरे हैं. एकाध कालम जो स्पेस कंटेंट के लिए बचता है तो इसी समूह के अन्य उत्पादों (मैग्जीनों-अखबारों) से कापी करके पेस्ट कर दिया जाता है. हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा ही चोखा. यह अखबार बिना दाम का फ्री में बांटा जाता है. अगर इसका दाम रखा गया होता तो शायद ही इसे कोई खरीदता. तो पाठक को फ्री में कुछ पन्नों का रद्दी मिल जाता है और जागरण प्रबंधन को ढेर सारा ‘नाम’ और ‘दाम’. सिटी प्लस के कानसेप्ट के बारे में जागरण वालों की बात सुनेंगे तो दंग रह जाएंगे. कितने अच्छे-अच्छे शब्दों में इस अखबार का कानसेप्ट बताया जाता है. यकीन न हो तो सिटी प्लस के बारे में जागरण ग्रुप का क्या कानसेप्ट है, उसे पढ़ लीजिए…

Cityplus is a new venture of Jagran Prakashan Ltd, publisher of worlds largest read newspaper Dainik Jagran. The concept has been formed with the need of bringing in a community-commodity-lifestyle based compact weekly, which has the real zeal of making a strong community of its readers, and associates. City plus aims at informing, entertaining and empowering its readers and business partners alike. City Plus is a compact English weekly circulated in Delhi, Gurgaon, Faridabad, Noida, Ghaziabad, Greater Noida, Bangalore Pune and Mumbai(Vashi)……

Cityplus has been designed, derived and delivered keeping in mind the need of the hour. With the ever changing lifestyle and economy, Cityplus aims at bringing about the change much needed from the perspective of readers and advertisers. Retailing in metros is the buzzword of the day. With a shift in consumer behavior and spending patterns influenced by the upward shift in the Social Economic Class and with options of various purchasing modes (EMIs, Credit Cards), the markets are upbeat and every retailer, small or big, is now aware about the power of advertising.

Since the markets have become local in nature, this weekly tabloid offers the local advertisers to have a low value-high reach option to reach out to their potential customers in their own domain. Cityplus is delivered separately by a dedicated distribution chain. The placement of Cityplus is done across all the upper-middle and premium residential localities in each market it is launched in. Its also in all the malls, multiplexes, Caf’s, Institutes, Clubs, Hospitals, Gyms & other local gathering joints.

Cityplus is positioned editorially as a paper that focuses on life and lifestyle on a more local and sub-local level. There are localized Community news, Events and Happenings while the features will focus on lifestyle accompanied with customized information, inputs on a more local level for value-addition to the story, more relevant to the individual reader.

Cityplus is an English Information-Entertainment based weekly compact paper. An aesthetically designed all colour paper that covers a variety of topics from Food, Fashion, Lifestyle, etc. Apart from this, it also has reader interactivity through Contests, Coupons, Puzzles, Quiz, Crossword, Games, Polls, Suggestions and Views.

समझ में आ गया होगा कि यह अखबार हमारे-आपके या इस देश की सचेत जनता के लिए नहीं है, उनके लिए है जिनके पास माल है, जो माल जाते हैं, जो महानगरों में रहते हैं, जो अंधाधुंध खरीदारी  करते हैं, जो दिमाग का इस्तेमाल कम, पैसे का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं…. आप कह सकते हैं कि इनके लिए भी तो अखबार होना चाहिए…. बिलकुल होना चाहिए पर उनके लिए पहले होना चाहिए जो देश की रीढ़ हैं. इसी जागरण ने खेती-किसानी पर एक मैग्जीन ‘खेत-खलिहान’ निकाला है लेकिन उसका अच्छा खासा दाम रखा है. मैग्जीन से पहले खेत-खलिहान को दैनिक जागरण अखबार के परिशिष्ट के रूप में फ्री में बांटा जाता था. जब जागरण प्रबंधन को समझ में आया कि इसकी तो ग्रामीण इलाको में बड़ी डिमांड है तो इस फ्री के धंधे को बंद कर इसे पेड कर दिया. मैग्जीन फार्म में लाकर लांच कर दिया. अगर जागरण वाकई इस देश व समाज को लेकर सचेत मीडिया समूह है तो क्यों नहीं खेत-खलिहान मैग्जीन को फ्री में कर देता है. तब माना जाएगा कि वाकई, यह समूह किसानों-ग्रामीणों के लिए एक अच्छा काम कर रहा है. पर वह ऐसा नहीं करेगा. वहां तो अच्छा-खासा दाम रख दिया ताकि मुनाफा आए. इधर, सुपर शहरियों पर केंद्रित सिटी प्लस को मुफ्त में कर दिया ताकि ढेर सारा विज्ञापन प्रकाशित किया जा सके.

जो जागरण प्रबंधन जिस तरह मीडिया के नाम पर हर कोने से पैसे उगाह रहा है, वह बताता है कि इस देश का हश्र क्या होने वाला है. पहले चुनावों में खबरों का धंधा किया, खबरें बिकी, जोरशोर से बिकीं. अखबार भी नए निकाले तो जनहित, समाज हित और देश हित में कम, पैसा कमाने के उद्देश्य से ज्यादा. इस प्रकार पैसे के लालची प्रबंधन ने पैसे कमाने के चक्कर में दैनिक जागरण की साख और ब्रांड को ही दांव पर लगा दिया है. मीडिया होने के नाम पर ढेरों लाभ उठा रहे इस समूह से ऐसे में क्या कोई नैतिकता, पत्रकारीय धर्म, जनता और देशहित की अपेक्षा कर सकता है? प्रभाषजी ठीक ही कहा करते थे, ऐसे मीडिया समूहों को सिर्फ प्रिंटिंग प्रेस का लाइसेंस मिलना चाहिए, अखबार चलाने का नहीं!

लेखक यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया के एडिटर हैं.

जागरण के इस सिटी प्लस अखबार के बारे में अगर आपके पास कोई और जानकारी हो, आपकी कोई अलग राय रखते हों तो उसे भड़ास4मीडिया के पास पहुंचा सकते हैं. भड़ास4मीडिया से संपर्क bhadas4media@gmail.com या फिर yashwant@bhadas4media.com के जरिए कर सकते हैं.

Comments on “धंधेबाज अखबार का एक और एडिशन

  • hi
    Yaswant Ji

    This is first time… I am giving comment for bhadas4media. Whatever you have written is true to a certain extent. I was associated with Cityplus for almost 13 months. A new team under the editor Ms Sapna Khanna was created with a purpose to bring a world class community newspaper. I was given the charge to introduce the news section in newspaper. Since I have worked with neighbourhood FLASH for almost six years and was quite efficient in handling the community news. Till Ms Khanna was there we tried our best to make it a worthy community newspaper. But she has left and after that all the people recruited by her were compelled to submit their resignation under pressure from marketing. It was also surprising for us that once we were asked to do good stories and after a year were compelled to write about the things that must suit to the marketing interest of the people. Cityplus is not alone. There are other big newspapers who are adopting the same staregy to mint money.

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  • Hemant Tyagi, journalist, ghaziabad says:

    THESE NEWS PAPERS ARE BLACK MAILERS AND THEIR OWNERS ARE MINTING LOT OF MONEY BY COMPELLING THEIR TO DO SO. GOVT MUST STOP THEIR PUBLICATION.THE OWNERS SHOULD GO BEHIND THE THE BARS.

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  • yashvant singh ji, aapne likha to bahut achha hai lekin adhikansh bade akhbar aajkal yahi kar rahe hain. inke khilaf kuchh karana hoga varna ptrakarita barbad ho jayegi.

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  • amitsharma says:

    योवन शोषण दुसरा पहलु।

    लोग अपने मतलब को साधने के लीए महिलाओ का इस्तमाल करने लगे है-मेरी जानकारी में ऐसे प्रकरण है। जिसे कोर्ट ने योवन शोषण करने वाले एक शिक्षक के विरुद्ध शिक्षक को बा इज़ज़त बरी किया है । क्या ऐसा प्रकरण आप के जानकारी में है \ यदि है तो मीडिया को इस प्रकर कि जानकारी जूटआ कर उसे प्रकाशित नहीं करना चाहिये (यह किसी अक्भर ने प्रकाशित नही किया)

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