माया की मार से त्रस्त एक डिप्टी एसपी

: सीबीआई में रहते माया से पूछताछ की थी : साजिश-फ्राड के जरिए प्रताड़ित किए गए : कोर्ट ने सरकार को फटकारा, जुर्माना ठोंका : मैं आप तक एक ऐसे मामले को पहुंचा रही हूं जिससे अंदाजा लगा सकते हैं कि ईमानदार-कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति बगैर गलती किस हद तक प्रताड़ित किया जा सकता है।

मामला उत्तर प्रदेश के पुलिस उपाधीक्षक धीरेन्द्र कुमार राय से संबंधित है। उन्हें 26/05/2008 को निलंबित किया गया। उसी दिन आरोप-पत्र भी दे दिया गया। उनके उपर आरोप लगाया गया कि 21 जुलाई 2007 को, उत्तर प्रदेश के मशहूर डकैत ठोकिया उर्फ अंबिका पटेल जिला चित्रकूट को पकड़ने के लिये चलाये गये अभियान में उन्होंने अपनी जिम्मेदारी ठीक ढंग से नही निभायी।

सच्चाई इसके ठीक उलट है।

डीके राय ने परिस्थितियां विपरीत होते देख वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, एसटीएफ अमिताभ यश के मोबाइल फोन नंबर 9415902216, एडीजी, एसटीएफ शैलजाकांत मिश्रा के मोबाइल फोन नंबर 9415902048 तथा डा. प्रीतेन्द्र सिंह, पुलिस अधीक्षक चित्रकूट के मोबाइल फोन नंबर 9415902832 पर लगातार फोन कर अतिरिक्त पुलिस बल की मांग की। पर घटनास्थल पर कोई फोर्स नहीं पहुंची। इसके फलस्वरूप छ: पुलिसकर्मी मारे गये। धीरेन्द्र राय को अपने दायित्वों को ठीक ढंग से न निभाने का दोषी मानते हुये निलंबित कर दिया गया।

इस घटना के बाद राय न्याय पाने की उम्मीद में दर-दर भटक रहे हैं। परन्तु अभी तक उन्हें राहत नहीं मिली है। पर कोर्ट ने जो कुछ कहा है उससे राय को मानसिक संबल मिला है। उनके दामन पर लगे दाग धुले हैं।

हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनउ पीठ ने रिट पेटिशन संख्या 768/2008 में राय को बहाल करने के बहुत ही स्पष्ट आदेश देने के साथ-साथ सरकार को जुर्माने के तौर पर दो लाख रुपये भी देने के आदेश दिये। श्री राय का कहना है कि प्रदेश सरकार उन्हें इस वजह से प्रताड़ित कर रही है क्योंकि उन्होंने राज्य की मुख्यमंत्री मायावती से तब पूछताछ की थी, जब वे सीबीआई में थे। हाई कोर्ट ने राय का सर्विस रिकार्ड देखने के बाद पाया कि वे ब्रह्मदत्त द्विवेदी मर्डर केस, ताज हेरिटेज कारिडोर तथा सेंचुरी स्कैम केस आदि महत्वपूर्ण मामलों से जुड़े रहे हैं।

राय के निलंबन के मामले में भी हाई कोर्ट ने पाया कि उनके द्वारा एडीजी स्तर से लेकर स्थानीय स्टेशन अधिकारी तक को कम से कम 29 फोन किये गये थे। इसके बावजूद मौके पर कोई पुलिस फोर्स नहीं भेजी गयी तथा बाद में इसी मामले में राय को छ: पुलिसकर्मियों की मौत का जिम्मेदार माना गया। इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति और क्या हो सकती है।

बहस के दौरान सरकारी वकील ने सरकार को प्राप्त विशेषाधिकारों का हवाला देते हुये रिट पेटिशन की वैधता को चुनौती दी। परन्तु उच्च न्यायालय ने वेबस्टर्स इनसाइक्लोपीडिया से 1598 के रूक केस से उच्चतम न्यायालय के यूनियन आफ इंडिया बनाम कुलदीप सिंह के निर्णयों को हवाला दिया। इसमें कहा गया है कि प्रदत्त अधिकार का प्रयोग करते समय सही और गलत का ध्यान रखना चाहिये और इसलिये अधिकारों का प्रयोग भेदभाव, एकपक्षीय और मनमाने तरीके से नहीं होना चाहिये।

इसी प्रकार, न्यायिक समीक्षा के अधिकार के संबंध में सरकारी वकील के तर्क को उच्च न्यायालय ने यह कहते हुये अस्वीकार कर दिया कि कार्यपालिका के निर्णय में न्यायपालिका के हस्तक्षेप न करने का वेडनसबरी सिद्धांत अब खत्म हो रहा है। साथ ही उच्चतम न्यायालय द्वारा हाल ही में दिये गये  कुछ निर्णयों का भी हवाला दिया जिसमें वेडनसबरी सिद्धांत को अलग रख कर निर्णय किया गया।

डीके राय के मामले में तथ्यों को देख कर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश भी हतप्रभ थे तभी तो उन्होंने ऐसी प्रतिक्रिया दी कि- “पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट को एक नजर पढ़ने से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि पूरी रिपोर्ट एकतरफा है। पूरी रिपोर्ट में यह इस बात की कहीं झलक भी नहीं दिखायी पड़ती कि अपीलकर्ता द्वारा बार-बार मदद मांगने पर भी क्यों अपीलकर्ता की टीम की सहायता के लिये अतिरिक्त पुलिस बल उस पूरे दिन नहीं भेजी गयी।”

यह बात भी अपने-आप में कितनी भयावह और ध्यान देने वाली है कि वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, एसटीएफ द्वारा यह स्वीकार किया गया कि मुठभेड़ की खबर मिलने पर भी ददुआ गिरोह के विरूद्ध चलाये जा रहे अभियान में शामिल होने की वजह से वे कोई सहायता मुहैया नहीं करा पाये। लेकिन यदि वे अपीलकर्ता की टीम को मदद पहुंचाने की स्थिति में नहीं थे तब भी उन्हें अन्य अधिकारियों से पुलिस बल भेजने का आग्रह करना चाहिये था जो नहीं किया गया बल्कि मुठभेड़ में मारे गये छहों पुलिसकर्मियों की मौत का सारा भार अपीलकर्ता के कंधों पर डाल दिया गया।

यह तो राय का सौभाग्य था कि पुलिस विभाग में घनश्याम अहिरवार तथा शैलजाकांत मिश्र जैसे लोग भी हैं जो दबाव के सामने नहीं झुके। उस इलाके के क्षेत्राधिकारी अहिरवार ने साफ शब्दों में कहा कि उन्होंने राय के खिलाफ राज्य सरकार को कोई रिपोर्ट नहीं भेजी है। इस बयान के बाद राज्य सरकार अपनी बात से पलट गई तथा वह अब यह कहने लगी कि रिपोर्ट अखिलेश नारायण सिंह ने भेजी थी, अहिरवार ने नहीं।

एसटीएफ के एडीजी शैलाजाकांत ने जांच कमेटी के सामने खुल कर यह कहा कि राय ने उनसे तथा तमाम अन्य अधिकारियों से बार-बार पुलिस बल का अनुरोध किया था और गड़बड़ियों के लिये वे कदापि जिम्मेदार नहीं माने जा सकते। उन्होंने स्थानीय पुलिस पर अपना कर्तव्य नहीं निर्वहन करने तथा राय पर गलत आरोप लगाने का आरोप भी लगाया।

इस मामले में कागजात में तमाम गड़बड़ियां की गईं। तथ्यों के साथ छेड़छाड़ तक किये गये। उच्च न्यायालय के अनुसार- 01/09/2007 के सीओ, सिटी, चित्रकूट की रिपोर्ट में घटना का दिन 22/02/2007 से 22/07/2007 बदला गया है।  फ्यूइड लगा कर क्षेत्राधिकारी नगर शब्द के स्थान पर प्रभारी निरीक्षक, कर्वी शब्द डाला गया है। यह सब साफ दिखता है।

उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि याची राय के खिलाफ आरोप बनाने के लिए और उन्हें फंसाने के लिए अभिलेखों से खिलवाड़ किया गया। इसके आधार पर उच्च न्यायालय यह निष्कर्ष निकालती है कि इतने सारे ठोस सबूतों से ऐसा दिखता है कि अधिकारियों ने याची को अकारण, बिना आधार के राजनैतिक अथवा अन्य कारणों के वशीभूत हो कर प्रताड़ित करने का काम किया है। उच्च न्यायालय का मानना है कि इस मामले में सीधे-सीधे फ्राड किया गया है जिसके आधार पर याची राय के खिलाफ विभागीय कार्यवाही की जा सके।

उच्च न्यायालय द्वारा प्रस्तुत शब्दों में छिपी पीड़ा को पहचानें- “याची के खिलाफ की गयी कार्यवाहियां न केवल रंजिशन की गयी दिखती हैं अपितु साफ तौर पर उत्पीड़नात्मक हैं।”

इन तथ्यों के आधार पर उच्च न्यायालय ने न सिर्फ राय को बहाल करने का आदेश दिया अपितु उन्हें मुआवजे के तौर पर 2 लाख रूपये अतिरिक्त दिये जाने के आदेश तक दे डाले। उसने यह धनराशि उन लोगों से वसूले जाने की बात भी कही जिनकी नूतन ठाकुरइस कृत्य में गलत भूमिका थी। साथ ही एक कमेटी बना कर इस बात की जांच कराने के निर्देश  भी दिये गये कि सही समय पर आवश्यक पुलिस बल क्यों नहीं प्रदान किया गया और इसके लिये जिम्मेदार कौन हैं।

तो ये हाल है उत्तर प्रदेश की सरकार का और उसके इशारे पर नाचने वाले अफसरों का. कोई ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ कैसे काम करे?.

लेखिका डॉ. नूतन ठाकुर लखनऊ से प्रकाशित ‘पीपल्स फोरम’ की एडिटर हैं.

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Comments on “माया की मार से त्रस्त एक डिप्टी एसपी

  • politician hi system ko ganda bana rahe hai ek aur aisa hi example hai mulayam sarkar me ek deputy sp mr. singh jo is samay congress party me hai unhone bhi tang akar resign kar diya tha. wakt hai bureaucracy me antarik sudhar aur sath hi swayatta ka. bureaucracy kyu cabinet system ki gulam hai uske bhi kuch right hote hai. ek minister ragad ragad ke ias ya ips nahi ho sakta lekin ek ias ya ips jis din chahe election ladkar ya kisi party ka daman tham kar nominated member ya minister ban sakta hai yahi fark hai ias aur politician me akhir hamare neta kab samjhege ye sab

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  • prashanti singh says:

    just think about their family, what type of tough time they had just because of system. still he is not reins tit….
    UP administration is in bad shape state that gives 80 seats in parliament. where we are going.

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  • sandeep tiwari says:

    netao ki purani aadat ki badle ki bhawna se kaam karna jab ki aisa nahi hona chahiye jab kursi mil jaye to sabko mila kar kaam karana chahiye yehi nahi hota hai

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  • ruchir bajpai says:

    we always say and discuss that truth will triumph the whole matter is that only my condolence to the family of the martyrs. and my regards and well wishes to mr dk rai. gem of a person i can say …….honesty is the best policy. younger generation should take an example and behave like a true indian like mr rai. no one should bend his knees infront of the system if he is correct…so once again good work from dr. thakur too

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