जीने या होने का मकसद

हरिवंशलगभग एक माह से ऊपर हुए. इस विषय पर कुछेक खबरें पढ़ी थीं. तब से यह विषय या प्रसंग, मन-मस्तिष्क और विचार से उतरा नहीं. प्रसंग है, पड़ोसी देश का. पर इन खबरों के आईने में अपनी धरती, अपना मुल्क, अतीत और वर्तमान उभरे. राष्ट्रकवि मैथिलीशरण जी का कहा याद आया- ‘हम कौन थे? क्या हो गये हैं? और क्या होंगे अभी? क्या ये, नहीं याद करना चाहता. अतीत पर किसका बस है? क्या होंगे?, उभरता भविष्य और वर्तमान झिलमिलाते हैं. क्या थी खबर? चीन के श्यानामान चौराहे पर 1989 में छात्र आंदोलन हुआ था. 3-4 जून को. चीन ने टैंकों से छात्र आंदोलन कुचल दिया. तब से हर वर्ष छात्र उस दिन को याद करते हैं. चीन में इस घटना की 21वीं वर्षगांठ थी.

पुलिस ने इस बार भी किसी को वहां पहुंचने नहीं दिया. आंदोलन में शरीक रहे लोगों के स्वजनों को घर कैद रखा. या उन्हें उस दिन बीजिंग से बाहर जाने के लिए विवश कर दिया गया. सूजी, जिनके 22 वर्षीय पुत्र को उस दिन चीनी सेना ने गोली मार दी थी, कहा कि हमारी 24 घंटे निगरानी हो रही है. पिछले एक सप्ताह से हमें अपने घर से निकलने की इजाजत नहीं, ताकि हम अपना शोक प्रकट कर सकें.

इतना ही नहीं. चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री जाहो ज्यांग की बेटी वैंग यन्नान के घर पुलिस बैठा दी गयी थी. वैंग कभी राजनीति में सक्रिय नहीं रही. पर उनके पिता चीन में उदारवादी बयार के प्रणेता माने जाते हैं. वह 1989 में छात्रों पर टैंक चलाने के खिलाफ़ थे. तब वह प्रधानमंत्री जाहो ज्यांग, घर में कैद कर लिये गये. फ़िर 16 वर्षो तक उन्हें घर में ही कैद रखा गया. एकांतवास. 2005 में वह चल बसे. पर टूटे नहीं. झुके नहीं. इस वर्ष उनके निर्वासन, कैद और तनहाई के क्षणों के संस्मरण छपे हैं. ‘प्रिजनर ऑफ़ द स्टेट’ (द सीक्रेट जर्नल ऑफ़ चाइनीज प्रीमियर : जाहो ज्यांग).

उसी श्यानामान चौराहे पर हुए छात्र आंदोलन की इस बार भी बरसी मनायी चीन के लोगों ने. हांगकांग में भी यह आयोजन हुआ. हालांकि चीन में सख्त पाबंदी थी. सोसल नेटवर्किंग साइट, इमेल शेयरिंग वेबसाइट, ट्विटर और फ्लिकर बंद कर दिये गये थे. सरकार का सेंसर था. सीएनएन व अन्य विदेशी टीवी चैनलों पर चीन से संबंधित कोई खबर चीन में न दिखायी जाये. दो देशों के नेताओं ने इस घटना के संदर्भ में बयान दिया था. चीन सरकार ने अमेरिकी विदेश मंत्री और ताइवान के राष्ट्रपति के बयानों पर सख्त आपत्ति की. कहा, यह चीन के आंतरिक मामले में सीधा हस्तक्षेप है. पर हांगकांग में डेढ़ लाख से अधिक चीनी जुटे. सबके हाथ में जलती मोमबत्ती. मोमबत्ती का अथाह समुद्र बन गया. वहां उपस्थित लोगों ने कहा कि चीन की अंतरात्मा है, हांगकांग.

36 वर्ष की एनी चाऊ ने कहा- हांगकांग एक मात्र जगह है, जहां हम श्यानामान स्क्वायर के शहीदों को स्मरण कर पाते हैं. हमें ऐसा आयोजन हर साल करना है. बार-बार करना है, ताकि युवा पीढ़ी उस कुरबानी को न भूले. चाऊ कहती हैं, पिछले 20 वर्षो से हर साल वह इस समारोह में शरीक होती रही हैं. बिना नागा. 16 वर्ष की उम्र से. पर हांगकांग के एक युवा आज की चीन की पीड़ा बताते हैं. भौतिक समृद्धि के रास्ते, शिखर पर पहुंचता चीन. दुनिया की महाशक्ति बनता चीन. पर यह मुल्क अपनी युवा पीढ़ी को कहां झोंक चुका है? वे कहते हैं कि चीन की युवा पीढ़ी इन घटनाओं के बारे में कम जानती है. 1989 के बाद पैदा हुई और पनपी इस पीढ़ी को राजनीति से दूर रखा गया. इसके अंदर उन्मादी राष्ट्रीयता है. संपदा और भौतिक सुख अर्जन की धधकती आग है. निजी सपने व लक्ष्य हैं. समाज या देश से इस युवा चीनी पीढ़ी का सरोकार नहीं.

दरअसल यह रोग चीन की नयी पीढ़ी तक ही सीमित नहीं है. भौतिक संपदा के पीछे भागते हर समाज की यह नियति है. आत्मकेंद्रित होना. आत्मसुख में डूबना. विनोवा जी ने इसे ही इंद्रियजीवी कहा था. फ़िर भी ऐसे समाज में कैसे-कैसे लोग हैं? साहस के पुंज. अपने विश्वास पर अडिग रहनेवाले. इस उपभोक्तावादी दुनिया में जब भौतिक सुख पाना ही सफ़लता का सबसे बड़ा सामाजिक पैमाना हो, तब भी अपने कनविक्शन पर लोग कैसे टिकते हैं? यह खबर ही पिछले एक माह से मन-मस्तिष्क पर छायी है. वह खबर है, क्या?वर्ष 1989 में, जब चीन में छात्र आंदोलन उत्कर्ष पर था. तब व्यूयर कैक्सी दूसरे नंबर के बड़े छात्र नेता थे.

चीन की सूची में तब 21 मोस्ट वांटेड (अति वांछित) छात्र नेता थे. उस युवा विद्रोह के नायक, जिस पर टैंक चला कर हजारों लोगों को मार डाला गया. तब कैक्सी बच निकले. अब ताइवान में हैं. जहां उनका व्यवसाय है. निवेश बैंकर हैं. साथ में राजनीतिक टीकाकार भी. अब वह 42 वर्ष के हैं. तब उनकी उम्र 22 वर्ष के आसपास थी. 20 वर्षो पहले दिल में जली विद्रोह की वह आग, आज भी कैक्सी में धधक रही है. पिछले साल जून में वह छुप कर चीन जा पहुंचे. पर मकाव अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उन्हें रोक लिया गया. फ़िर वह वापस कर दिये गये. चीन से बाहर. इस बार फ़िर वह श्यानामान चौक संहार की बरसी पर जापान स्थित चीन के दूतावास में जा घुसे. अपनी गिरफ्तारी दी. फ़िर उन्हें एक सप्ताह बाद रिहा कर दिया गया. फ़िर वह जापान नैरिटा हवाई अड्डे से बीजिंग के लिए उड़ान भरना चाहते थे. अग्रिम टिकट बुक करा रखा था. फ़िर उन्हें चीन के हवाई जहाज से उतार कर जापान में छोड़ दिया गया.

इस खबर को पढ़ने के बाद से ही बार-बार यह सवाल बेचैन कर रहा है कि 42 वर्षीय कैक्सी ताइवान में सुख का जीवन जी रहे हैं. इनवेस्टमेंट बैंकर हैं. फ़िर भी वह चीन जाने को क्यों बेचैन हैं? क्यों मौत आमंत्रित करने की बेचैनी है, उनमें? चीन, जहां उन्हें बचा जीवन जेल के शिकंजों में ही गुजारना होगा या मृत्युदंड की सजा होगी. पर इस सवाल का उत्तर कैक्सी ने खुद दिया. वह बोले,1989 में छात्र नेता होना ही गौरव की बात थी. अगर मैं चीन वापस जा सका और अपने सहयात्री अध्यापक, मार्गदर्शक और अपने अच्छे मित्र लियो सियायोबो के साथ जेल के सेल में शेष जीवन गुजार सका, तो यह गौरव की बात होगी. फ़िलहाल लियो राज्यद्रोह के मामले में कठोर निर्वासन की सजा भुगत रहे हैं.

22 वर्षो से कैसे वह आग एक इंसान में धधकती रह सकती है? यह जानना, इंसान के उत्कर्ष को समझने जैसा है. वह भी इस भोग के युग में? किस तरह वह सुख का जीवन छोड़ अपने मार्गदर्शक और मित्र ली के साथ जेल काटना चाहते हैं? कैक्सी कहते हैं कि इस तरह का जीवन जीना ही मेरे लिए बड़ा सम्मान है. ‘इट विल बी ए ग्रेट ऑनर फ़ॉर मी’. एक तरफ़ चीन में आज भी ऐसे नेता हैं, अपने विचारों के लिए मर मिटनेवाले? पर क्या रीढ़ है, भारत के नेताओं की? पद और कुरसी के लिए हर क्षण अपनी आत्मा गिरवी रखने को तैयार हैं. कर्म, जीवन और कनविक्शन में भारतीय नेताओं का कोई तालमेल ही नहीं.

1975-1980 तक भारत में तपे-तपाये नेताओं की पीढ़ी बची थी. जब इमरजेंसी लगी, तो अनेक लोगों ने माफ़ी मांग ली. फ़िर भी रीढ़वाले लोग थे. आज की राजनीति में अगर भारत में यह अग्नि परीक्षा हो जाये, तो कैक्सी के चरित्र के कितने लोग मिलेंगे? आज मामूली प्रतिबद्धता या वैचारिक आग्रह भी हमारे नेताओं में नहीं है. जीतते किसी दल से हैं, समर्थन किसी सरकार को देते हैं. सरकार बनाने में कहीं फ़ुदक कर चले जाते हैं. याद करिए लालू जी के जमाने में भाजपा से लेकर माले तक के विधायक अपनी मूल नाभि (दल) विचार से टूट कर सत्ता पक्ष में जा मिले.

न्यूक्लीयर डील के सवाल पर संसद में क्या दृश्य दिखा? महंगाई के प्रश्न पर पिछले दिनों लोकसभा में मतदान के समय क्या स्थिति रही? अपने भ्रष्टाचार को तोपने और ढकने के लिए जिस देश के नेता पुलिस जांच से डर कर देश की किस्मत दावं पर लगाते हों, वहां कैक्सी जैसे चीनी युवा की कल्पना करिए.चीन में एक नहीं अनेक कैक्सी जेलों में बंद हैं. 20-20 वर्षो से. अपनी मान्यता, संकल्प, प्रतिबद्धता और विचार के कारण? क्या वे जीवन नहीं भोग सकते? रातोंरात पाला बदल कर सुख और सत्ता नहीं पा सकते? पर वे नहीं करेंगे. क्योंकि इससे राष्ट्रों का चरित्र नहीं बनता. हम भारतीयों का चरित्र भिन्न है. हम रीढ़हीन कौम हैं. पैसे और पद के लिए विचार, संकल्प और अंतरात्मा गिरवी रखनेवाले. हम जयचंद, मीरजाफ़र, जगत सेठ की परंपरा, विचार और प्रभाव में पले-बढ़े लोग हैं. हमारे रक्त में खोट और दोष है.

1857 से 1947 के बीच भारतीयों की एक रीढ़वाली कौम पैदा हुई. बहादुरशाह जफ़र, झांसी की रानी, कुंवर सिंह से चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और सुभाष की आवाज. आत्मबलवाले गांधीवादियों की साहसिक परंपरा. पर अब वह सब कुछ अतीत बन रहा है. इतिहास की वस्तु. अपनी आस्था, सोच, मूल्यों और संकल्पों के लिए जीनेवाली पीढ़ी खत्मप्राय है. विरोध की राजनीति करना, सम्मान की बात नहीं रही. आत्मा की सौदेबाजी कर या गिरवी रख सत्ता पाना उपलब्धि है. दलाल बनना गौरव की बात है.

शॉर्टकट सफ़लता आज  फ़ैशन में है. क्यों हैं हम ऐसे? शायद डॉ राममनोहर लोहिया ने इस पर गहराई से विचार किया था. उनका लंबा निबंध है. ‘निराशा के कत्तर्व्य’. इसमें उन्होंने भारतीयों के संकल्पहीन होने, विचारहीन होने और रीढ़हीन होने पर गौर किया है. पढ़िए उनके विचार युक्त निबंध के कुछ अंश:- पिछले 1,500 बरस में हिंदुस्तान की जनता ने एक बार भी किसी अंदरूनी जालिम के खिलाफ़ विद्रोह नहीं किया. यह कोई मामूली चीज नहीं है. इस पर लोगों ने कम ध्यान दिया है. कोई विदेशी हमलावर आये, उस वक्त यहां का देसी राज्य मुकाबला करे, वह बात भी अलग है. एक जो राजा अंदरूनी बन चुका है, देश का बन चुका है, लेकिन जालिम है, उसके खिलाफ़ जनता का विद्रोह नहीं हुआ यानी ऐसा विद्रोह जिसमें हजारों, लाखों हिस्सा लेते हैं, बगावत करते हैं. कानून तोड़ते हैं, इमारतें वगैरह को तोड़ते हैं या उन पर कब्जा करते हैं, जालिम को गिरफ्तार करते हैं, फ़ांसी पर लटका देते हैं. ये बातें पिछले 1,500 बरस में हिंदुस्तान में नहीं हुईं.

मुझको ऐसा लगता है कि अपने देश में क्रांति, असंभव शब्द मैं इस्तेमाल नहीं करूंगा, प्राय: असंभव हो गयी है. लोग आधे-मुर्दा हैं, भूखे और रोगी हैं, लेकिन संतुष्ट भी हैं. संसार के और देशों में गरीबी के साथ-साथ असंतोष है और दिल में जलन. यहां थोड़ी-बहुत जलन इधर-उधर हो तो हो, लेकिन कोई खास मात्रा में जलन या असंतोष नहीं है.०हिंदुस्तान में सचमुच दिलजला आदमी पाना मुश्किल है, जैसा कि यूरोप में होता है. यूरोप में तो आदमी अकड़ जाता है. अंदरूनी जुल्म के खिलाफ़ उस तरह का अकड़ा हुआ आदमी यहां पाना मुश्किल है. मैं इस बात को फ़िर दोहरा देना  चाहता हूं कि बाहरी जुल्म के खिलाफ़ तो हमारे यहां भी उखड़े हुए आदमी रहे हैं, लेकिन अंदरूनी जुल्म के खिलाफ़ नहीं.

किसी एक उपन्यासकार का मैंने एक वाक्य पढ़ा है. वैसे यह सही है कि उपन्यासकार विद्वान नहीं हुआ करते या जरूरी नहीं कि वे विद्वान हों, लेकिन कभी-कभी वे बिना ज्ञान के या विद्या की चीजों को पकड़ लेते हैं. उसने कहा हिंदुस्तान में तो क्रांति असंभव है, क्योंकि और जगहों पर जहां क्रांति होती है, वहां गैरबराबरी सापेक्ष होती है, यानी बिल्कुल संपूर्ण गैरबराबरी नहीं होती, और जिस देश में बिल्कुल बराबरी हो जाये या संपूर्ण गैरबराबरी हो जाये, तो वहां इंकलाब नहीं होगा. जिस देश में गैरबराबरी की खाई बिल्कुल गहरी हो जाये, दिमागों में घर कर ले, समाज के गठन में भी हो जाये, प्राय: संपूर्ण गैरबराबरी, तो वहां की जनता क्रांति के लिए बिल्कुल नाकाबिल हो जाती है. अजीब हालत है कि जिसको क्रांति चाहिए, उसके अंदर शक्ति है ही नहीं और वह शायद सचेत होकर उसकी चाह रखता ही नहीं है, और जिसमें क्रांति कर लेने की शक्ति है, उसको क्रांति चाहिए नहीं या तबीयत नहीं है. मोटे तौर पर राष्ट्रीय निराशा की यह बात है.

साथ में छोटी-छोटी और बातें भी हैं कि हिंदुस्तानी झूठा होता है. समय का खयाल नहीं रखता. बकवासी हो गया है. मेहनत करना नहीं जानता, आलसी हो गया है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस वक्त हिंदुस्तान, हमलोग, दुनिया में सबसे झूठे, सबसे आलसी और सबसे निकम्मे हो गये हैं.०डॉ लोहिया ने 1962 में यह भाषण दिया था. लगभग 50 वर्ष पहले. वह युवाओं के बीच बोले थे. तब उन्होंने चेताया था- वह ‘जोखिम’ क्रांतिकारी कर्म और तरह-तरह की गैर-बराबरी के विरूद्ध खड़े होने का युग बीत गया है. अब वह युग आ गया है कि जो कुछ मिल गया है, उसे बैठ कर भोगो. सब मिला कर ऐसा लगता है कि यह भोग का युग चल रहा है.

ऐसा क्यों हुआ? इस पर भी लोहिया ने टिप्पणी की और कहा- कांग्रेसी सरकार इस बात में सफ़ल हो गयी कि उसने इस भोग युग में लड़कों का ध्यान सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तरफ़ इस खूबी से बढ़ा दिया कि बुद्धिवाले या दिमागी कार्यक्रम, विचार और सिद्धांतों के कार्यक्रम ओझल हो गये. पिछड़ गये. सांस्कृतिक कार्यक्रम, नाच-गाना, संगीत वगैरह बड़ी अच्छी चीज है. बशर्ते कि वह नंबर दो पर हो. पहले नंबर पर दिमागी बहस, सिद्धांत, विचारों की उथल-पुथल, उधेड़बुन यह सब होना चाहिए. लेकिन विद्यार्थियों का दिमाग इस चीज से हटाया गया है. भोग की भूख में पागल राजनीति में स्वाभिमान या आत्मसम्मान के लिए जगह नहीं है. क्या हुआ भोपाल गैस प्रकरण के मामले में? इस मुल्क में साहस के साथ कोई सच बोलने को तैयार नहीं. जहां 15 हजार से अधिक लोग घुट-घुट कर मरे. वहां मूल दोषी एंडरसन को राजकीय संरक्षण में पूरी सुरक्षा के साथ कैसे बाहर पहुंचाया गया? इस पर इन बयानों पर गौर करिए:-

  1. जब बड़ी सत्ता मौजूद होती है. यानी प्रधानमंत्री. स्वाभाविक रूप से उन्होंने अंतिम निर्णय लिया होगा. इस पर सहमति प्रधानमंत्री की होगी : पीसी एलेक्जेंडर, तब प्रिंसिपल सेक्रेटरी ऑफ़ प्राइम मिनिस्टर.

  2. अर्जुन सिंह ने एंडरसन को जाने दिया : अरूण नेहरू, पूर्व मंत्री, राजीव गांधी के विश्वस्त सहयोगी.

  3. अरूण नेहरू यह नहीं बता पाये कि अर्जुन सिंह ने भोपाल में कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक और मुख्य सचिव के संरक्षण में राज्य सरकार के विमान से एंडरसन को दिल्ली भेजा. पर दिल्ली में उनको किसने सुरक्षा दी? वह बाहर कैसे गये?

  4. एंडरसन की रिहाई अमेरिकी दबाव में हुई होगी : दिग्विजय सिंह, कांग्रेसी नेता.

फ़िर कांग्रेसियों ने अर्जुन सिंह को घेरा. अर्जुन सिंह चुप्पी साधे हुए हैं. अचानक कांग्रेसियों को लगा कि अर्जुन सिंह मुंह खोल देंगे, तो कयामत हो जायेगी. फ़िर प्रणब मुखर्जी का बयान आया कि मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने एंडरसन को भोपाल से बाहर भेजने का फ़ैसला किया, ताकि इस घटना के बाद बिगड़ती कानून-व्यवस्था को संभाला जा सके. फ़िर कांग्रेसियों ने ही बयान दिया कि एंडरसन भारत छोड़ने के पहले तत्कालीन गृह मंत्री नरसिंह राव से मिले. राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से भी मिले. अब नरसिंह राव के लड़के अपने पिता के बचाव में उतरे हैं. यानी ऐसे स्वाभिमान के मुद्दे पर कांग्रेस ही पक्ष-विपक्ष की भूमिका में है. विपक्ष बयान देकर चुप है. सच कहने को कोई तैयार नहीं.अब इस प्रकरण में एक नयी जानकारी आयी है, द संडे गार्जियन (20 जून, 2010) में.

इस जानकारी के अनुसार एंडरसन की रिहाई के बाद मोहम्मद युनूस के बेटे की गंभीर सजा को अमेरिका ने माफ़ किया. मोहम्मद युनूस नेहरू परिवार के निकट मित्र और विश्वस्त सहयोगी रहे हैं. उनके पुत्र ओदल सहरयार को अमेरिका ने एक अपराध के मामले में 35 वर्ष की सख्त सजा सुनायी थी. इसके ठीक छह महीने पहले 7 दिसंबर 1984 को भारत ने यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वारेन एंडरसन को भारत से निकालने में मदद की. उनकी गिरफ्तारी नहीं की. एंडरसन को भारत आने के पहले ही सेफ़ पैसेज के तहत सुरक्षित आने-जाने का आश्वासन मिला था. द संडे गार्जियन की रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि सहरयार की रिहाई, एंडरसन को सुरक्षित अमेरिका पहुंचाने के बाद हुई. साफ़ है, दोनों घटनाओं के बीच कोई रिश्ता है.यह खेल है सत्ता का. पर भारत में कोई सच बोलने का साहस नहीं कर रहा.

दूसरी तरफ़ हाल में मैक्सिको की खाड़ी में तेल का रिसाव हुआ. अमेरिका के समुद्री तट से 65 किलोमीटर दूर. इसमें कुल 11 लोग मारे गये. इस मामले को खुद राष्ट्रपति ओबामा देख रहे हैं. दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी बीपी भारी मुसीबत में है. खुद ओबामा कंपनी के खिलाफ़ बयान दे चुके हैं. इसके बाद शेयर बाजार में कंपनी के मार्केट वैल्यूएशन में 90 मिलियन डॉलर गिरावट आयी है. विेषकों का अनुमान है कि बीपी कंपनी को प्रति बैरल तेल रिसाव की दर से हजार डॉलर देना होगा. पर भोपाल के दोषी इससे बहुत कम कीमत पर जमानत देकर रिहा हो गये.

कोई नहीं जानता, अमेरिका में हुई रिसाव घटना के बाद बीपी कंपनी का भविष्य क्या होगा? क्योंकि ह्वाइट हाउस के प्रवक्ता ने कहा है कि ‘पुट द बुट ऑन बीपी नेक’ (बीपी के गर्दन को बूटों से रौंद दो). फ़र्ज करिए, भारत में 11 व्यक्ति की मृत्यु ऐसी ही घटना में हो जाये, तो हमारी व्यवस्था की क्या प्रतिक्रिया होगी?  सरकार गौर करेगी? हमारे प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति ऐसी छोटी घटना को मुद्दा मानेंगे? व्यवस्था में आक्रोश होगा. अफ़सर नाराज और सक्रिय होंगे या वे मैनेज होंगे?भोपाल गैस कांड प्रकरण पर हुई राजनीति से भारतीय चरित्र ही उजागर हुआ. ऐसे अनेक सार्वजनिक सवाल हैं, जिन पर मौजूदा भारतीय चरित्र परखा जा सकता है. वह आग, जो जुल्म और अन्याय के खिलाफ़ धधक सके, कहां खत्म हो गयी या बुझ गयी है? बहुत पहले पढ़ा, रांगेय राघव के निबंध गेहूं का एक प्रसंग याद आया.

एक बार एक ही आदमी को सूली लगायी गयी थी, उस एक का परिणाम गुलामों का नजात साबित हुआ. एक ही आदमी को गोली मार दी गयी थी, उस एक का नतीजा हुआ नफ़रत की जलती हुई मशालें बुझ गयीं. सिर्फ़ 72 आदमियों ने नमक आंदोलन शुरू किया था, और उसके अंत में करोड़ों बिजलियां कौंधने लगी थीं. एक ही बच्चे को सामंत की गाड़ी ने कुचला था और उसके फ़लस्वरुप फ्रांस की गलियों में आजादी को बराबरी की पुकार लहू से भीग कर चिल्लाई थी. एक मंगल पांडेय के शरीर को गोलियों ने छेदा था और उसके नतीजे में लाखों गरज फ़ूट कर निकली थी, दिल्ली चलो- दिल्ली चलो. और एक ही हब्शी को जिंदा जलाया गया था, जब अब्राहम लिंकन ने कहा था कि गुलामी को नेस्तनाबूद कर दो.

बगावत एक ही लफ्ज है. उसकी बुनियाद में इंसान है, उसका फ़ैलाव इंकलाब है. उसका नतीजा तख्तों और जुल्मों को पलटनेवाली आजादी है. हजार बार दूध पीकर भी क्या इंसान एक दिन भी सांप का जहर पीना या उससे अपने को कटाना चाहता है? तो साबित हुआ कि यह एक बार भी स्थायी महत्व का है. इसका विरोध नहीं करना ही भूल है. क्योंकि एक ही अमीरचंद ने लालच से जो दस्तखत किये थे, वे करोड़ों की गुलामी का कारण बने. एक ही क्लाइव ने जो छल किया था, वह मुट्ठी भर मसाले के सौदागरों को तीन पीढ़ियों का ऐश दे गया. तो न एक, चाहे व्यक्ति, चाहे क्षण, चाहे काम और नहीं दो, वह तो बात की असलियत है, वह शाश्वत है.

केंटों ने तो ढाई हजार साल पहले रोम में यह आंदोलन किया था कि रोम की सुंदरियों ने भारत की मलमल देख कर सारे रोम को लुटवा दिया. रोम की सारी दौलत हिंद चली गयी..(रांगेय राघव के रेखाचित्र गेहूं से साभार) ऐसा नहीं था कि 30-40 वर्षो पहले भारत की राजनीति में ऐसे संकल्पवान या चरित्रवाले नायक नहीं थे. चीन के कैक्सी की खबर पढ़ते हुए, दशकों पहले पढ़ी गयी एक कविता याद आयी. मैं पागल हूं. रामदत्त जोशी की. रामदत्त जाशी पुराने समाजवादी नेता थे. प्रजा समाजवादी पार्टी के टिकट पर वे दो बार नैनीताल जिले के काशीपुर से उत्तरप्रदेश विधानसभा के लिए चुने गये थे. और एक बार तो उन्होंने अपने पुराने नेता नारायण दत्त तिवारी को भी पराजित कर दिया था. वह कवि भी थे. ‘नैनीताल की शाम’ नामक उनकी कविता काफ़ी चर्चित हुई थी. दशकों पूर्व गरीबी और अभाव में उनका निधन हो गया. मैं एक अघोषित पागल हूं. जो बीत गया मैं वो कल हूं.

कालांतर ने परिभाषाएं, शब्दों के अर्थ बदल डाले, सिद्धांतनिष्ठ तो सनकी हैं, खब्ती हैं नैतिकता वाले, नहीं धन बटोरने का शऊर, ज्यों बंद अकल के हैं ताले, ईमानदार हैं बेवकूफ़, वह तो मूरख हैं मतवाले? आदर्शवाद है पागलपन, लेकिन मैं उसका कायल हूं. मैं एक अघोषित पागल हूं.निर्वाचित जन सेवक होकर भी मैंने वेतन नहीं लिया,जो फ़र्स्ट क्लास का नकद किराया भी मिलता था नहीं लिया, पहले दरजे में रेल सफ़र की फ्री सुविधा को नहीं लिया, साधारण श्रेणी में जनता के साथ खुशी से सफ़र किया, जो व्यर्थ मरूस्थल में बरसा मैं एक अकेला बादल हूं. मैं एक अघोषित पागल हूं. जनता द्वारा परित्यक्त विधायक को पेनशन के क्या माने? है एक डकैती-कानूनी, जनता बेचारी क्या जाने? कानून बनाना जनहित में जिनका कत्तर्व्य वही जाने- क्यों अपनी ही ऐवर्य वृद्धि के नियम बनाते मन-माने? आंसू से जो धुल जाता है, दुखती आंखों का काजल हूं.

मैं एक अघोषित पागल हूं. सादा जीवन, ऊंचे विचार, यह सब ढकोसले बाजी हैं? अबके ज्यादातर नेतागण झूठे पाखंडी पाजी है, कुर्सी पाने के लिए शत्रुवत सांप छछूंदर राजी हैं, कोई वैचारिक-वाद नहीं, कोई सैद्धांतिक सोच नहीं, सर्वोपरि कुर्सीवाद एका, जिसका निंदक मैं पागल हूं.मैं एक अघोषित पागल हूं. है राजनीति तिकड़म बाजी, धोखे, घपले, हैं घोटाले, गिरते हैं इसी समुंदर में, सारे समाज के पतनाले, गंगाजल हो या गंदाजल, हैं नीचे को बहने वाले, संपूर्ण राष्ट्र का रक्त हो गया है विषाक्त मानस काले, इसके दोषी जन प्रतिनिधियों को अपराधी कहता पागल हूं.

मैं एक अघोषित पागल हूं. बापू के मन में पीड़ा थी, भारत में व्याप्त गरीबी की, समृद्ध तबके के गांधी ने आधे वस्त्रों में रहकर ही, ग्रामीण कुटीरों से फूंकीथी स्वतंत्रता की रणभेरी, उनका संदेशा था ‘शासक नेताओं रहना सावधान’ सत्ता करती है भ्रष्ट, मगर यह पागलपन है, पागल हूं. मैं एक अघोषित पागल हूं.

जन प्रतिनिधियों का जीवन स्तर जन साधारण के ही समान, है लोकतंत्र में आवश्यक समुचित है नैतिक संविधान, कोई कोरा-उपदेश नहीं, है गांधी जी का कीर्तिमान, लंदन के राज-महल में भी, भारत के प्रतिनिधि ने महान, चरितार्थ किया आदर्शो को, जिनका मैं मन से कायल हूं. मैं एक अघोषित पागल हूं. कड़ियों, ईटों की छत-दीवारें दरकीं, बिना पलस्तर की,टूटे-उखड़े हैं फ़र्श और हैं फ़टी चादरें बिस्तर की,घर की न मरम्मत करा सका, दो बार विधायक रहकर भी, मैं एक खंडहरवासी हूं, खुश हूं इस बदहाली में भी, लाखों जनसाधारण बेघर उनकी पीड़ा से घायल हूं. मैं एक अघोषित पागल हूं. 111 करोड़ के इस मुल्क को आज ऐसे पागल चाहिए! अगर कहीं है, तो उनका विवरण और पता जरूर भेजें.

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. झारखंड-बिहार के प्रमुख हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनसे संपर्क आप harivansh@prabhatkhabar.in के जरिए कर सकते हैं.

Comments on “जीने या होने का मकसद

  • कमल शर्मा says:

    भारत के नेताओं में कैक्‍सी कोई नहीं है बल्कि कैकेयी हैं, मंथरा हैं, बिकाऊ हैं, नंगे हैं। देश से बड़ा अपने को मानते हैं। यहां के नेताओं को बलिदान देना पड़े देश की खातिर तो पासपोर्ट और वीजा पकडकर भारत से भाग निकलेंगे। कांग्रेस, बीजेपी, सपा,बसपा या कोई भी दल हो, जो भी सत्ता में आएगा लूटेगा देश को। विस्‍टन चर्चिल ने शायद सही ही कहा था कि हम सत्ता लूटेरों के हाथ सौंपकर जा रहे हैं। एक से एक मंत्री, मुख्‍यमंत्री, नगर सेवक देखिए जो आते हैं फटेहाल और पांच साल में मालदार बन जाते हैं। कर्नाटक में दो मंत्री भाईयों ने खनन के माध्‍यम से जो करोड़ों कमाए, या मधु कोडा ने जिस स्‍पीड से पैसे कमाए, वह सीखने लायक है। ये नालायक यदि घोटाला यूनिवर्सिटी खोल डाले तो दुनिया भर से स्‍टूडेंट मिल सकते हैं। आज तक जहां पुलिस ने लाठियां बरसाई है बताइए कितने नेता पीटे हैं। सारे मक्‍कार और कहीं बैठे रहते हैं और उनकी ओर से आंदोलन या झंझट कर रहे लोग पीटते रहते हैं। देश के स्‍वाभिमान की बात सिर्फ कागजी बनकर रह गई है। जनता से चुपचाप जाकर पूछिए तो कहेंगे इन साले नेताओं को कोई उड़ा दे तो हम उसकी जयजयकार कर डालें। यह बात क्‍यों आती है जनता के मन में। इस पर मनन करें।

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  • बहुत अच्छा आलेख है, एक ही सांस में पूरा पढ़ गया ।

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  • अक्सर कई बार जब किसी भी संज्ञा के दो रुपों यानि उसके वर्तमान और भूतकाल को लेकर जेहन में सवाल उठते हैं, लगभग हर बार मनुष्य उसके वर्तमान के स्वरूप से अधिक प्रभावित होता है। ऐसा होना लाजमी भी है और वैज्ञानिकता भी। अतीत के ऐसे कई हिस्से जो मनुष्य के वर्तमान को प्रभावित करते हैं, प्र्त्यक्ष रुप से नजर नहीं आते हैं। हम जिस शख्सियत के बारे में आज चर्चा करने जा रहे हैं, वह शख्स निस्संदेह देश के सर्वश्रेष्ठ हिंदी पत्रकारों में से एक हैं। अक्सर जब भी उन्हें मैं देखता हूं या उनके बारे में सोचता हूं तो मुझे उनमें अतीत के कई महापुरुषों का अंश दिखाई देता है।

    अभी हाल ही में 15 जुलाई को दिल्ली में एक कार्यक्रम हुआ। यह कार्यक्रम थोड़ा अलग था। इसका नाम रखा गया था प्रभास परंपरा। हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में भीष्म पितामह के रुप में विख्यात प्रभास जोशी जी का जन्म इसी दिन हुआ था। उनके चाहने वालों ने इस कार्यक्रम का आयोजन किया था। जो लोग उपस्थित हुए, उन्होंने बताया कि पूरे कार्यक्रम में प्रभास जी के उसूलों को एक बार फ़िर से याद करने की कोशिश की गयी। हरिवंश जी इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे।

    मुझे इन दोनों यानि प्रभास जोशी जी और हरिवंश जी के व्यक्तित्व में एक पागलपन दिखाई देता है। संभवतः मेरा यह शब्द “पागलपन” कई लोगों को नागवार गुजरे, क्योंकि आज की तारीख में सच को सच लिखना पागलपन नहीं तो और क्या है। जहां आज की पत्रकारिता में चाटुकारिता प्रमुख तत्व बन गया हो, पत्रकार पैरवीकार बन गये हों और अखबार सरकारी तंत्र का मुखपत्र बन गया हो तो कुछ लोगों का तंत्र के विरोध में लिखना अथवा बात करना या फ़िर दोनों आज के कारपोरेट जगत के हिसाब से पागलपन ही है।

    अबतक मैंने हरिवंश जी के अनेकों लेख पढे। जबतक प्रभास जी जिंदा थे तबतक उनके लेखों को पढता था। इन्टरनेट पर उनके सिक्सर को भी चाव से पढता था। मुझे हरिवंश जी में प्रभास परंपरा को आगे बढाने की क्षमता का अहसास होता है। चुंकि मैं अपने आपको प्रभास जी का अघोषित शिष्य मानता हूं। उनके ब्राह्मणवाद ने मुझे पत्रकार बनने पर सबसे अधिक मजबूर किया। आज हरिवंश जी राजपूत वाद कर रहे हैं। इससे पहले भी कई परंपरा अथवा वाद रहे होंगे, जिसके ध्वजवाहक कभी जोशी जी रहे और अब यह काम हरिवंश जी कर रहे हैं।

    कल जब मैंने हरिवंश जी की लेखनी से निकले कुछ बुलंद इरादों वाले शब्दों को देखा, मुझे लगा भारत सरकार अथवा किसी भी सरकार के विज्ञापनरूपी टैंकों के सामने यदि कोई शख़्स अपना सीना आगे कर सकता है, तो उनमें से एक हमारे हरिवंश जी हो सकते हैं। लेकिन जब कभी उनके द्वारा संपादित अखबार को पढता हूं, तो अक्सर मुझे उसमें प्रभास परंपरा का नकारात्मक प्रभाव दिखता है। सरकार का मुखपत्र बन चुका उनका अखबार मुझे चुनौती देता है। उसकी चाटूकारिता मुझे नफ़रत का अहसास कराती है। चुंकि मुझे अखबार खरीदने नहीं पड़ते हैं और मैं एक निठल्ला पत्रकार हूं, इसलिये समय काटने के लिये हरिवंश जी द्वारा संपादित अखबार भी पढ ही लेता हूं।

    पिछले साल लोकसभा चुनाव को लेकर प्रभास जोशी जी ने चुनाव परिणाम आने के तुरंत बाद एक संघर्ष छेड़ा था। यह संघर्ष था पेड न्यूज छापने का विरोध करने का। यह उस समय मुझे वैसा ही लगा था जैसा कि एक मुहावरे में कहा गया है। सांप के बिल में जाने पर लाठी पटकना। पटना में भी प्रभास जोशी जी का संबोधन हुआ। हरिवंश जी ने उस आयोजन की अध्यक्षता की थी। मैंने पांच सवाल पूछे थे प्रभास जी से। हांलाकि उन्होंने मेरे प्रश्नों का उत्तर दे दिया था, परंतु मैं निरुत्तर ही था। यह मेरे लिये पहला मौका था जब मैंने सच को समय गुजरने के बाद सच लिखने अथवा कहने की हिम्मत करने वाले दो महान पुरूषों को एक साथ देखा।

    इस साल बिहार के राजनीतिक गलियारे में यह चर्चा जोरों पर थी कि जदयू इस बार एक बहुत बड़े बुद्धिजीवी को राज्यसभा पहूंचायेगी। प्रभास जी भी सांसद रह चुके थे। इस हालत में उनके वारिस को भी संसद जाना ही चाहिये। परंतु बेचारे नीतीश कुमार ठहरे सोशल इंजीनियरिंग के एक्सपर्ट। कुर्मी-कोईरी को बढावा देने वाले श्री कुमार को शायद हरिवंश जी का राजपूतवाद पसंद नहीं आया और ऐन मौके पर उन्होंने उपेंद्र कुशवाहा यानि कोईरी समाज के सबसे बड़े प्रतिनिधि और कुरमी के प्रतिनिधि के रुप में अपने सहायक आर सी पी प्रसाद को यह मौका दे दिया। वैसे श्री प्रसाद की एक और खासियत है कि वह नीतीश कुमार के गृह जिले नालंदा के रहने वाले हैं।

    हरिवंश जी में जनप्रतिनिधि बनने की छटपटाहट आज के पत्रकारों के लिये प्रेरणाश्रोत है। कई पत्रकार इसी फ़िराक में आजकल कई दलों के कार्यालयों में रात के स्न्नाटे में चक्कर काट रहे हैं। कई बड़े नेताओं के जनता दरबार में माथा टेकते नजर आते हैं। लेकिन हरिवंश जी ने ऐसा कुछ नहीं किया। भागवद गीता में भी कहा गया है –

    कर्मण्येवाधिकारस्ते माफ़लेषु कदाचन्।

    मा कर्मफ़ल हेतुभूर्माते संगस्त्वकर्मणि॥

    यानि मनुष्य को अपने कर्तव्य धर्म का पालन करना चाहिये, बगैर यह सोचे कि उसका फ़ल क्या होगा। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि यदि यह श्लोक नहीं होता तो देश के 77 फ़ीसदी लोग आत्महत्या कर चुके होते। अर्जून सेन गुप्ता के रिपोर्ट के ये 77 फ़ीसदी लोग रोजाना 20 रुपये से भी कम में अपना गुजारा कर लेते हैं। ये केवल अपना कर्म करते हैं। यदि ये थोड़ा इधर-उधर देखें या फ़िर अपनी तुलना अनिल अंबानी, मुकेश अंबानी, मनमोहन सिंह, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद या फ़िर हरिवंश जी से करने की कोशिश करेंगे तो बेचारों के पास आत्महत्या करने के अलावे कोई चारा नहीं बचेगा। अभी हाल में कुछेक घटनाओं ने मेरे जेहन में आग लगा दी है। एक घटना दिल्ली की है। एक बच्चे की मौत इसलिये हो गई क्योंकि जिस रास्ते से उसके माता-पिता उसे अस्पताल ले जा रहे थे, उसी रास्ते से प्रधानमंत्री का काफ़िला गुजर रहा था। पुलिसवालों ने रास्ता रोककर यम्दूतों को बुला भेजा और बेचारे बच्चे की मौत उसी जाम में हो गई। दिल्ली के एक अखबार ने इस संबंध में एक रिपोर्ट प्रकाशित की। बच्चे की मां एक मजदूर पार्टी की नेता थीं, इसलिये पीएमओ तक इस घटना की गूंज पहूंची। दूसरी घटना पटना की है। उस दिन हमारे मुख्यमंत्री जी जा रहे थे, टेम्पो पर एक आदमी छ्टपटा रहा था। उसके परिजन उसे अस्पताल ले जाना चाह रहे थे। उसकी हालत नाजूक थी। मैं नहीं जान सका कि उस व्यक्ति का क्या हुआ, लेकिन मुझे उस बच्चे की याद आ गई।

    हरिवंश जी की एक खासियत मुझे दिखाई देती है, वह है उनकी तलाश्। अपने एक आलेख में उन्हें एक ऐसे पागल की तलाश है जो सच को सच लिखने का पागलपन करे। उनके इसी तलाश ने मेरी लेखनी को मजबूर किया। संभव है आज के कारपोरेट कल्चर में ऐसे पागल तो कम ही मिलेंगे, इसलिये हरिवंश जी को मुश्किलों का सामना न करना पड़े, इसलिये मैं अपने आपको पागल के रुप में घोषित करता हूं। शायद हरिवंश जी को मेरा पागलपन पसंद आये।

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