Connect with us

Hi, what are you looking for?

कहिन

सरकारी श्राद्ध की नहीं, श्रद्धा की जरूरत

राजेश त्रिपाठीहिंदी दिवस पर विशेष (1) : भाषा न सिर्फ अभिव्यक्ति का साधन अपितु किसी देश, किसी वर्ग का गौरव होती है। यही वह माध्यम है जिससे किसी से संपर्क साधा जा सकता है या किसी तक अपने विचारों को पहुंचाया जा सकता है। भारतवर्ष की प्रमुख भाषा हिंदी तो जैसे इस देश की पहचान ही बन गयी है। हिंदुस्तान से हिंदी का क्या नाता है यह किसी से छिपा नहीं है। भारतमाता के माथे की बिंदी है हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी। लेकिन आज अपने ही देश में यह उपेक्षित है। सरकार की ओर से हिंदी की श्री वृद्धि और इसके प्रचार-प्रसार के नाम पर हर साल हिंदी दिवस के दिन इसका सालाना श्राद्ध मनाया जाता है। संयोग से इस साल यह दिवस पितृपक्ष में ही पड़ गया है। लाखों रुपयों का बजट बनता है, जलसे होते हैं, कुछ कर्मचारियों को पुरस्कार बंटते हैं और हो जाता है हिंदी का विकास।

राजेश त्रिपाठी

राजेश त्रिपाठीहिंदी दिवस पर विशेष (1) : भाषा न सिर्फ अभिव्यक्ति का साधन अपितु किसी देश, किसी वर्ग का गौरव होती है। यही वह माध्यम है जिससे किसी से संपर्क साधा जा सकता है या किसी तक अपने विचारों को पहुंचाया जा सकता है। भारतवर्ष की प्रमुख भाषा हिंदी तो जैसे इस देश की पहचान ही बन गयी है। हिंदुस्तान से हिंदी का क्या नाता है यह किसी से छिपा नहीं है। भारतमाता के माथे की बिंदी है हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी। लेकिन आज अपने ही देश में यह उपेक्षित है। सरकार की ओर से हिंदी की श्री वृद्धि और इसके प्रचार-प्रसार के नाम पर हर साल हिंदी दिवस के दिन इसका सालाना श्राद्ध मनाया जाता है। संयोग से इस साल यह दिवस पितृपक्ष में ही पड़ गया है। लाखों रुपयों का बजट बनता है, जलसे होते हैं, कुछ कर्मचारियों को पुरस्कार बंटते हैं और हो जाता है हिंदी का विकास।

इस तरह के आयोजनों में देखा गया है कि भाषण दिलवाने के लिए कभी किसी संपादक, पत्रकार क्या किसी हिंदी अधिकारी को बुला लिया जाता है। वह सरकारी कार्यालयों के कर्मचारियों की हिंदी में किये कार्य की `दक्षता’ का मूल्यांकन करता है और उन्हें पुरस्कार देकर हिंदी में काम करने के लिए प्रोत्साहित करता है बस हो गया हिंदी दिवस और हिंदी के कल्याण का तथाकथित सरकारी प्रयास। इस तरह के हिंदी दिवसों और हिंदी के बारे में एक दिन चिंता जताने से कुछ होने वाला नहीं। हिंदी को इस तरह के सालाना श्राद्धों ( सरकार इसे हिंदी दिवस कहती है) की नहीं श्रद्धा की जरूरत है। हिंदी को हृदय में रखिए, इसके प्रति अगाध श्रद्धा रखिए और यह प्रण कीजिए की भाषा हमारी मां है हम इसका असम्मान नहीं होने देंगे और इसे मरने नहीं देंगे बस हिंदी लोकप्रियता के शिखर पर होगी। इसके लिए किसी सरकारी बैसाखी की नहीं जनांदोलन और जन चेतना की जरूरत है। हिंदी आज इंटरनेट की बांह थाम विश्व स्तर पर अपनी धाक जमा चुकी है। भला हो यूनिकोड फांट का जिसने इस भाषा को सर्व ग्राह्य और सर्वसुलभ बना दिया है। जो ब्लागर हैं या ब्लाग प्रेमी हैं वे जानते हैं कि आज हिंदी में कितना अच्छा काम हो रहा है। सात समंदर पार तक हिंदी के ब्लाग, वेबसाइट्स काम कर रही हैं जो इस भाषा से संबंधित साहित्य व अन्य सामग्री हिंदी प्रेमियों तक पहुंचा रही हैं। आज हिंदी दासी नहीं , वह विश्व पटल पर विराजती महारानी है। वह महारानी जिसका आंचल तुलसी, सूर. मीरा. रहीम, भारतेंदु, जयशंकर प्रसाद, निराला और ऐसे ही न जाने कितने साहित्य मनीषियों की साहित्य-साधना से समृद्ध है। वह किसी सरकार या किसी प्रशासन की मुंहताज नहीं। वह हर हिंदी प्रेमी के हृदय में बसती है और तब तक बसती रहेगी जब तक सू्र्य, चंद्र और इस सृष्टि का अस्तित्व है।

भाषा किसी जाति या देश के लिए क्या अर्थ और क्या प्रभाव रखती है इस पर हमारे साहित्य मनीषियों ने बहुत कुछ लिखा-कहा है। कवि मैथिलीशरण गुप्त ने तो यहां तक लिखा था-जिसको न निज भाषा तथा निज देश का अभिमान है, वह नर नहीं हैं पशु निरा और मृतक  समान है। यहां `अभिमान’ शब्द को घमंड नहीं गर्व के अर्थ में देखना चाहिए। वाकई अगर हमें अपनी भाषा पर गर्व नहीं, उसके प्रति श्रद्धा नहीं तो फिर जीवन ही अकारथ है।

भारतेंदु हरिश्चचंद्र ने तो और आगे बढ़ते हुए कहा था- निज भाषा उन्नति अहे सब उन्नति को मूल।  वाकई अगर भाषा की प्रगति नहीं होगी तो निश्चित ही उस समाज या देश की उन्नति भी ठिठक जायेगी। हिंदी के प्रति प्यार का सीधा अर्थ है देश और समाज के प्रति प्यार लेकिन पता नहीं क्यों आज भी समाज का बड़ा तबका हिंदी को हिकारत की दृष्टि से देखता है और अंग्रेजी को सिर पर चढ़ाये बैठा है। उसका बेटा उसे पिताश्री कह दे तो वह उसका उपहास उड़ायेगा और अगर डैडी ( जो अब संक्षिप्त होकर डैड बन गया है। वैसे ही जैसे दादा डाडा बन गये हैं) कह कर बुलाये तो उसकी बांछें खिल जायेंगी जैसे पता नहीं कहां का सिंहासन मिल गया। मैकाले की शिक्षा प्रणाली ने जो गजब ढाया है उसका ही दुष्परिणाम है की आज भी यह निश्चित धारणा बन गयी है कि अच्छी नौकरी पाना है तो अंग्रेजी माध्यम से बच्चों को पढ़ाओ। बहुत हद तक यह धारणा सच भी है क्योंकि आज भी नौकरियों में अंग्रेजीदां तबके का ही बोलबाला और रौब है जो हिंदीवालों को हिकारत और उपेक्षा की दृष्टि से देखता है। यह कटु सत्य है भले ही कोई इसे नकारे लेकिन यह आज का सच है और हिंदी और हिंदुस्तानियों के हित में यही अच्छा है कि यह जितना जल्द बदल जाये उतना ही बेहतर। मानाकि आज हिंदी के विद्वान भी समादृत और अच्छे स्थानों पर हैं लेकिन अगर औसत देखा जाये तो अंग्रेजों के जाने के बाद भी राष्ट्रभाषा हिंदीवाले देश हिंदुस्तान में आज भी अंग्रेजीदां राज करते हैं।

इसके लिए हिंदीभाषी कम दोषी नहीं जो बड़े-बड़े और महत्वपूर्ण स्थानों में होने के बावजूद सिर्फ और सिर्फ अपनी रोजी-रोटी तक ही सीमित हैं। वे सामर्थ्यवान हैं, ऐसे केंद्रों में हैं जहां से हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं लेकिन करते नहीं यह सोच कर कि क्या हमने इसका ठेका ले रखा है। यों तो भारत सरकार हिंदी के विकास और संवर्धन के लिए अथक प्रयास कर रही है। करोड़ों रुपये राजभाषा की पारिभाषिक शब्दावली बनाने में सरकार ने खर्च किये, अपनी समझ में बड़ा काम किया लेकिन हिंदी का भला करने की बजाय उसके साथ वेवजह की छेड़छाड़ की। हिंदी के इन सरकार पोषित विद्वानों ने एक ऐसी हिंदी गढ़ दी जो लोगों को डराने लगी। साधारण से शब्दों के लिए लोगों को शब्दकोश झांकने की जरूरत पड़ने लगी। सरकार ने तो बाकायदे अपनी ओर से गढ़ायी गयी इस तथाकथित सरकारी हिंदी का शब्दकोश तक जारी कर दिया पारिभाषिक शब्दावली के नाम पर। भाई हमारी हिंदी इतनी बेचारी और लाचार तो नहीं कि इसके सरकारी प्रयोग के लिए नयी शब्दावली गढ़नी पड़े। इसके अपने प्रचलित शब्द क्या तकलीफ दे रहे थे जो यह तमाशा किया गया। साधारण सा जारी शब्द (माना कि यह उर्दू का है लेकिन हिंदी ने अपनी बहन उर्दू को कभी पराया नहीं समझा और गांधी जी ने भी उस हिंदी का समर्थन किया था जो सीधी-सादी और सर्व ग्राह्य हो) के लिए सरकार के इन विद्वानों ने भारी भरकम निर्गम शब्द रच डाला। आप किसी से पूछिए उसके लिए जारी ज्यादा आसान होगा या निर्गम मैं यकीन के साथ कहता हूं ज्यादातर लोग जारी के पक्ष में खड़े नजर आयेंगे। ऐसे ही अनेक शब्द हैं। इस तरह की हिंदी गढ़ने पर इससे जुड़े बड़े-बड़े हिंदी विद्वानों की तो पौ-बारह हुई लेकिन इससे हिंदी भाषा का क्या कल्याण हुआ। वह तो और भी कठिन हो गयी। अहिंदीभाषी क्षेत्रों के जो लोग पहले ही इससे बिदकते थे वे इससे और भी दूर होते गये। इस तरह गांधी जी का इसे आसान बनाने का प्रयास भी फीका पड़ता गया।

 आज अगर हिंदी को आगे बढ़ाना है तो इसके लिए जरूरी है कि हर स्तर पर इसके लिए ईमानदारी से प्रयास करने होंगे। ईमानदारी शब्द इसलिए प्रयोग कर रहा हूं कि हमारे यहां भाषा आदि के मायने में होने वाले प्रयास अब महज फर्जअदायी बन कर रह गये हैं। सरकारी संस्थान सालाना जो हिंदी पखवाड़ा मनाते हैं उससे हिंदी का क्या भला होता होगा मुझे नहीं पता। दुर्भाग्य या सौभाग्य से मैं भी ऐसे कई समारोहों का साक्षी रहा हूं जहां अगर कुछ होता है तो चायपान कुछ पुरस्कार वितरण पर हिंदी का कल्याण नहीं।  सरकार से सालाना बजट मिलता है उसे खपाना है बस यही उद्देश्य है इन समारोहों का। किसी को यह बात बुरी लगे तो लगे मगर मुझे तो नहीं लगता कि इस तरह के समारोहों की आवश्यकता है। हिंदी का केवल एक दिन ही क्यों हो हर दिन हिंदी दिवस क्यों न हो। हम कार्यालय में पहुंचे और शपथ लें कि हम रोज अपना कामकाज अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी में ही करेंगे। हां हिंदी के साथ-साथ क्षेत्रीय भाषाओं व जन भाषाओं का संरक्षण-संवर्धन आवश्यक है क्योंकि उनकी अपनी एक अलग पहचान और महत्ता है। हिंदी को हृदय में बसाइए और आज से सिर्फ और सिर्फ हिंदी में काम करने की शपथ लीजिए देखिए

आपको आत्मिक शांति मिलेगी कि आपने अपनी भाषा अपने देश के लिए कुछ तो किया। जय हिंदी, जयहिंद।


लेखक राजेश त्रिपाठी कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार हैं और तीन दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। इन दिनों हिंदी दैनिक सन्मार्ग में कार्यरत हैं। राजेश से संपर्क  [email protected]  के जरिए कर सकते हैं। वे ब्लागर भी हैं और अपने ब्लाग में समसामयिक विषयों पर  अक्सर लिखते रहते हैं।

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

Uncategorized

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम तक अगर मीडिया जगत की कोई हलचल, सूचना, जानकारी पहुंचाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. इस पोर्टल के लिए भेजी...

टीवी

विनोद कापड़ी-साक्षी जोशी की निजी तस्वीरें व निजी मेल इनकी मेल आईडी हैक करके पब्लिक डोमेन में डालने व प्रकाशित करने के प्रकरण में...

हलचल

: घोटाले में भागीदार रहे परवेज अहमद, जयंतो भट्टाचार्या और रितु वर्मा भी प्रेस क्लब से सस्पेंड : प्रेस क्लब आफ इंडिया के महासचिव...

प्रिंट

एचटी के सीईओ राजीव वर्मा के नए साल के संदेश को प्रकाशित करने के साथ मैंने अपनी जो टिप्पणी लिखी, उससे कुछ लोग आहत...

Advertisement